फोन, खर्च से कमाई की ओर!

6 अपै्रल 08
एक नई मोबाइल फोन कंपनी ने अपना काम शुरू किया है और बड़े हमलावर अंदाज में इश्तहार भी। उसने अपने ग्राहकों को उनके नंबरों पर आने वाली कॉल्स के लिए दस पैसे मिनट देने की घोषणा की है। ये दस पैसे शायद उस फोन के बिल में जमा हो जाएंगे। सड़क किनारे के बड़े से इश्तहार में एक लड़की की तस्वीर है जिसके टी-शर्ट पर एक मोबाइल नंबर लिखा है और लिखा है- कॉल मी।
कुछ दिन पहले खबर थी कि मोबाइल फोन कंपनियां अब उन लोगों के लिए फोन मुफ्त कर देंगी जो लोग कुछ विज्ञापनों को पाना मंजूर कर लेंगे। यह सेवा कुछ वैसी ही हो जाएगी जैसी कि कुछ देशों के मुफ्त अखबारों में है। वहां वसूली विज्ञापनदाता से होती है और अखबार लाखों की संख्या में छापकर ट्रेनों, बसों में रख दिए जाते हैं।
मुफ्त मोबाइल फोन सेवा उन फ्री टेलीविजन चैनलों सी भी होगी जो विज्ञापनों से कमाई करते हैं और प्रसारण मुफ्त में देते हैं।
भारत में सरकार ने टेलीफोन नियमों को ढीला किया है जिससे उम्मीद है कि मोबाइल कॉल दस पैसे मिनट तक हो जाएगी। इसके बाद शायद ऐसे एसएमएस मुफ्त हो जाएंगे, जिनके नीचे किसी विज्ञापन को चस्पा करने की छूट कंपनियों को मिल जाए। फिर शायद घंटी की आवाज की जगह इश्तहार और फोन पर सुनाई देने वाले रिंग टोन की जगह इश्तहार आकर सामान बेचने लगेंगे और लोगों को कॉल करने, कॉल पाने से कमाई भी होने लगेगी।
टेलीफोन का इस्तेमाल जिंदगी को बदल चुका है। खासकर उस तबके की, जो कि फोन का इस्तेमाल करता है। लोगों के सामाजिक संबंधों को तो अब फोन उस तरह से नियंत्रित कर रहा है कि जिस तरह बाहर से आई बहू घर के तौर-तरीकों पर कब्जा कर ले और सब कुछ उसकी मर्जी से चलने लगे। आज लोगों का मिलना-जुलना, उठना-बैठना, टेलीफोन तय करने लगा है और उसमें भी मोबाइल फोन।
 अब ताजा खबर यह है कि 'नोमोफोबियाÓ नाम की एक ऐसी मानसिक स्थिति मनोचिकित्सकों ने पाई है जिसमें कोई व्यक्ति फोन की बैटरी-चार्जिंग खत्म हो जाने पर, या फोन रेंज के बाहर हो जाने पर, या फोन का टॉक-टाईम खत्म हो जाने पर लोग दहशत में घिर जाते हैं। पहले ही कुछ सौ किस्म के फोबिया थे, लेकिन यह नया 'नोमोफोबियाÓ (नो मोबाइल फोबिया) सबसे आगे निकल जा रहा है।
दरअसल टेलीफोन पर, और खासकर मोबाइल फोन पर लोग इतने अधिक टिक गए हैं कि वे घर-दफ्तर से निकलते हुए पूरा काम करके नहीं निकलते कि रास्ते से फोन करके वे काम निपटा लेंगे। और यह अधूरापन अंतहीन तनाव पैदा करते चलता है। लोगों ने जिंदगी को इस तरह ढाल लिया है कि उनके बहुत से काम उनके फोन के शुरू रहने पर हो सकते हैं, और बंद होने पर तबाह भी हो सकते हैं। एक वक्त पुलिस के वायरलेस का यह काम होता था लेकिन आज तो रिक्शेवाले को, या रद्दी वाले को बुलाने के लिए भी फोन लगता है और घर के करीब पहुंचने पर खाना लगाने के लिए लोग फोन करने लगे हैं।
मोबाइल फोन ने लोगों की जिंदगी 24 गुणा 7 कर दी है और जब फोन काम नहीं करता तो उसे वक्त, उतनी देर तो लोग दहशत में आ ही जाते हैं। ऐसा वक्त न आ जाए यह सोचकर बाकी वक्त भी कई लोग अपने फोन को देखते रहते हैं कि कोई कॉल मिस तो नहीं हो गई? कोई मैसेज तो मिस नहीं हो गया? यह नया नंबर किसका है? इसकी कॉल पर अभी क्या जवाब दूं? मेरे फोन को बच्चे देख रहे थे उस पर वयस्क लतीफा तो उन्होंने नहीं देख लिया? उस पर की ब्लू फिल्म तो उन्होंने नहीं देख ली?
एक नई तकनीक, नए सामान और नई सेवा ने लोगों को अभूतपूर्व सहूलियत तो दी है, लेकिन अभूतपूर्व तनाव भी खड़ा कर दिया है। अब होली-दीवाली भी लोगों के रिश्ते इस बात पर टिक गए हैं कि वे एसएमएस पर मौजूद हैं या नहीं। बूढ़े भी जवाब देना सीख रहे हैं और जवान अधेड़ों से अश्लील या सेक्सी संदेशों का रिश्ता आसानी से बना लेते हैं। अफसरों के जिस तबके में दो बरस से अधिक सीनियर को सिर्फ सर या मैंडम कहकर ही बात होती है, वहां भी दस-दस बरस सीनियरों के साथ ऐसे एसएमएस बिना झिझक आते-जाते हैं।
यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि इस औजार ने लोगों के बीच हास्यबोध बढ़ा दिया है क्योंकि लोग आए हुए संदेशों को ही दस-बीस गुना लोगों में फैलाते हैं, और इनकी शुरूआत शायद मोबाइल कंपनियां खुद ही करती हैं। लेकिन जिंदगी का रूख इससे बदल गया है।
मोबाइल फोन से किस तरह का फर्क पडऩे वाला है यह सर्विस के रेट और हैंडसेट के वेट से भी तय होने जा रहा है। अभी-अभी मेरे बेटे ने नसीहत वाला इतना लंबा मैसेज मुझे भेजा कि वह एक चि_ïी जैसा था। आजकल के बड़े फोन की मेहरबानी से वह एक बार में आ भी गया।
आपकी  जिंदगी में अगर मोबाइल फोन है तो मुझे आप पर पड़ा फर्क इस नंबर पर एसएमएस कर सकते हैं- 098936-25000
(अभी इस पर इनकमिंग कॉल से कमाई शुरू नहीं हुई है)।
- सुनील कुमार

किस्सा, तन और मन की विविधताओं का

30 मार्च 08
नई टेक्नालॉजी और समाज पर उसके असर को लेकर लिखा गया पढऩा मेरे लिए हमेशा दिलचस्पी का रहता है। और आज इस्तेमाल में आ चुकी टेक्नालॉजी, विकसित देशों के समाज के अधिक बदलती है क्योंकि वहां उसका इस्तेमाल अधिक है। हमारी तरह के लोग इंटरनेट को ही आज पूरी दुनिया की नई टेक्नालॉजी मान लेते हैं जिसका असर हमारे इर्द-गिर्द सीधे कम पड़ता है। जिन समाजों में इंटरनेट और संचार के बाकी तरीकों ने लोगों को अधिक गिरफ्त में लिया है, वहां अब एक नई किस्म की वर्ण व्यवस्था बन रही है।
अपने तमाम वयस्क जीवन में मैंने धर्म और जाति पर आधारित संगठनों से परहेज किया, फिर धीरे-धीरे किसी भी किस्म के संगठन से किनारा कर लिया। इसलिए कि यह लगते रहा कि किसी भी एक किस्म के नफे-नुकसान के लिए बने संगठन में जाने पर उसके लोगों के भले के लिए तो कंधे से कंधा लड़ाकर संघर्ष हो सकता है लेकिन वह संघर्ष एक व्यापक जनहित के पक्ष में अक्सर नहीं रह जाता। उद्योग और व्यापार के संगठन  सरकार की नीतियों को खरीदने के लिए एक हो जाते हैं, ठेकेदार अफसरों के खिलाफ एक हो जाते हैं, और राजनीतिक दलों में लोग विरोधियों को निपटाने के लिए एक होते हैं, बजाय किसी नीति या सिद्घांत के।
एक वक्त भारत में वर्ण व्यवस्था शुरू हुई थी जिसमें चार तबकों में से हर कोई अपनी बढ़ोतरी, बेहतरी के लिए लगा रहता था। अब दुनिया में इंटरनेट बुने जा रहे हैं। इस सोशल नेटवर्किंग में लोग इंटरनेट पर अपनी एक तस्वीर गढ़ते हैं जिसमें अपनी उम्र, रंग, पढ़ाई, कमाई, पते, कद-काठी, अंगों के नाम, शौक, आदतें, पसंद जैसे सैकड़ों पैमानों पर अपनी मनपसंद जानकारी डाल सकते हैं। अपना ऐसा व्यक्तित्व बना लेने के बाद आप किस सेक्स, धर्म, देश, प्रदेश, शहर, के कैसे व्यक्तित्व से, किस किस्म के, कितने गहरे या उथले संबंध बनाना चाहते हैं, यह फरमाइश डाल सकते हैं और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट अपने करोड़ों लोगों में से आपकी पसंद वाले ऐसे लोगों की लिस्ट बना देती है जिनकी पसंद पर आप भी लगभग खरे उतरें।
इसके बाद लोग एक-दूसरे से संपर्क करते हैं और पसंद की लिस्ट में से छंटाई होते-होते कुछ लोग दोस्ती के लायक बचते हैं, कुछ से पे्रम होता है और कुछ के साथ मिलकर हमबिस्तर भी हो लेते हैं। पूरा सिलसिला गढ़ी हुई मनचाही मूर्ति सा होता है जिसमें हर बात पसंदीदा होती है।
प्रकृति और फिर समाज ने जिन विविधताओं के साथ जीना और विकास सीखा, वह सिलसिला पूरी तरह खत्म होते दिखता है इन वेबसाइटों पर। अब लोग मर्जी के पुर्जे जुड़वाकर पसंद के कम्प्यूटर की तरह संबंध भी बनाने लगे हैं। आज की जिंदगी में जब इन संबंधों पर लोगों का वक्त नियमित रूप से खर्च होने लगता है, तो फिर असल जिंदगी के लिए वक्त कम बचने लगता है और समाज में रोजमर्रा की जिंदगी में आ खड़ी होने वाली विविधता की गुंजाइश कम होने लगती है। एक ही किस्म की खूबियों और खामियों वाले, या उनकी चाह वाले लोगों का नया तबका बन जाता है, वर्ण व्यवस्था के भीतर की जाति व्यवस्था के भीतर प्रजाति व्यवस्था के भीतर और बारीक भेद वाले छोटे-छोटे समुदायों जैसे समुदाय इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग से बनने लगे हैं।
इससे इंटरनेट के बाहर के मानव समाज और मानवीय सोच पर अच्छा या बुरा कैसा असर पड़ रहा है इसे लेकर लाखों लोग विश्लेषण और अध्ययन में लगे हैं। लेकिन पहली नजर में जो बात लगती है वह यह है कि इंटरनेट की यह नेटवर्किंग लोगों की जिंदगी से एक स्वाभाविक सामाजिक विकासहीन चुकी है। अब लोग शाम अपने दायरे के करीबी लोगों के साथ वक्त गुजारने की राह देखने के बजाय यह राह तकते हैं कि आधी दुनिया पार उनका चैट पार्टनर कब इंटरनेट पर आए और कब वे उससे बात करें।
कई बरस पहले रोज कई घंटे दुनियाभर में बिखरे अपने ऐसे दोस्तों के साथ गुजारने का एक दौर पूरी कर लेने के बाद मुझे लगता कि मैं एक ऐसे दायरे में फंस रहा हूँ जैसा कि मेरे शहर की हर बरस की सौ-पचास शादियों में जुटता है जहां वे ही गिने-चुने लोग आपस में गपियाते हैं। मैं एक बरस की ऐसी पचास शादियां भी याद करता हूँ तो वहां लंबी बातचीत वाले सौ लोगों से मिलना भी याद नहीं पड़ता। इंटरनेट पर तो इस दायरे को मैं और समेट सकता हूँ, दस, बीस या पाँच भी। जिससे मैं चाहूँ, बात करूं, जिसे चाहे उसे पता लगाने दूं कि मैं इंटरनेट पर हूँ।
यह सिलसिला शायद मेरी किस्म के बहुत से लोगों को कुछ बरस या कुछ महीने में थका, ऊबा या लुटा देता होगा। लुटाने से मतलब यह कि ये डिजिटल रिश्ते, असल जिंदगी के रिश्तों, वक्त, की कीमत पर ही तो चलते हैं और लोग इंटरनेट से हटने के बाद भी अपनी असल जिंदगी के लोगों पर इंटरनेट चर्चा लाद देते हैं। ऐसे दौर से उबरने के बाद मैंने पाया कि दुनिया के लोगों को जानने-समझने के लिए सोशल नेटवर्किंग एक खासा समय खोर तरीका था और अनचाहे लोगों से अनचाहे वक्त, अनचाही बातचीत में न फंसना ही ठीक है।
इस चक्कर में मैं अपने आसपास के लोगों से उनके मुद्दों से कट रहा था और अमरीका में हिस्पनिक बिरादरी के लोगों की दिक्कतों की जानकारी मुझे खासी होने लगी थी। आखिरकार मुझे लगने लगा कि असल जिंदगी में एक नकली दायरे का दखल नुकसानदेह है।
ऐसे में मैं उन लोगों के बारे में फिर सोचता हूँ जो कि इस नकली दायरे को अपनी पसंद के रंग से खींचना शुरू करते हैं और फिर इसके भीतर अपनी पसंद के लोगों को या पसंद के नकली मुखौटों को छांट-छांटकर जुटाते हैं। फिर घरोबा बढ़ता है और दायरे के भीतर दायरे बनते चलते हैं, असल जिंदगी की तरह। लेकिन तंग होते ऐसे डिजिटल दायरे लोगों को असल जिंदगी के मुद्दों और सरोकारों से दूर ले जाते हैं, विविधता से दूर ले जाते हैं।
यह सोचें कि विधिता के बिना इंसान क्या उन नस्लों जैसा नहीं हो जाएगा जैसे कि उन जातियों के हो जाते हैं जो रक्त शुद्घि के नाम पर तंग दायरे के भीतर ही रिश्ते करते हैं।
और विविधता की चाह की एक बड़ी अनोखी मिसाल यहां लिखना जरूरी है। कुछ बरस पहले इतिहास के एक बड़े दुस्साहसी सैलानी पर एक डाक्यूमेंटरी फिल्म आ रही थी जिसमें उसके ऐतिहासिक रास्ते पर फिल्म टीम सैकड़ों बरस बाद फिर चल रही थी। ऐसी राह पर चीन की एक पहाड़ी पर बिल्कुल अकेले बसा एक आदिवासी गांव था जहां आने वाले किसी भी मर्द मुसाफिर को गांव अपनी औरतों के साथ सोने का न्यौता देता था।
इसकी यह वजह नहीं थी कि वह गांव देह बेचने का धंधा करता था, उसकी सोच थी कि कुछ सौ लोगों के बीच ही घूमते-फिरते, उस बिरादरी के जीन्स कमजोर होते जा रहे हैं और ऐसे में बिलकुल अलग जीन्स किसी सैलानी से आकर नई पीढ़ी बनाएं तो वह हवा के एक ताजे झोंके की तरह बेहतर पीढ़ी होगी। यही वजह है कि दुनिया में यह स्थापित हो गया है कि अलग-अलग नस्लों के औरत-मर्द के मेल से बनी नई पीढ़ी अधिक मजबूत और बेहतर होती है।
लेकिन विविधताओं का यह मेल सिर्फ तन के लिए बेहतर नहीं होता, मन के लिए भी बेहतर होता है।
-सुनील कुमार

समय पूर्व प्रसव?

23 मार्च 08
अडवानी की आत्मकथा उम्मीद के कुछ पहले आ गई। भाजपा-एनडीए की ओर से उन्हें प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की तरह पेश करने के बाद आई इस किताब का मकसद क्या देश में उनकी लीडरशिप को स्थापित करना है? या फिर यह एक सहज अनायास लेखन है?
राजनीति को जरूरत से कुछ अधिक वक्त से, जरूरत से कुछ अधिक करीब से, देखने वाले बता सकते हैं कि राजनीति में इतने ऊपर पहुंचने वाले कुछ भी अनायास, सहज और मासूम नहीं करते। कुटिलता या चौकन्नापन उनके मिजाज में घर कर जाते हैं और जब वे जाहिर तौर पर जिन्न की तारीफ करके हमकदमों से छिटकते दिखते हैं, तो हो सकता है कि वे असल में कुछ दाग-धब्बे धोकर मूलधारा में शामिल होकर एक व्यापक आधार तैयार कर रहें हों, हमकदमों की गिनती बढ़ाने की कोशिश में।
जो भी हो, आत्मकथाओं को मैं खासी दिलचस्पी से पढ़ता हूँ क्योंकि उनमें सच चाहे न लिखा हो, लिखने वाला या वाली, उन बातों को अपने नाम से तो रखता / रखती ही है। इतना सच तो रहता ही है कि उस तारीख पर उसने तब तक की घटना और सोच को उस तरह रखा है।
लेकिन अपने पढऩे के मजे से परे मैं सोचता हूँ कि जिंदा रहने, और राजनीति जैसे पेशे में सक्रिय रहते हुए कोई कितनी ईमानदारी से लिख सकता है? क्या पता किस सच, या झूठ, पर फिर कौन सा जिन्न आकर खड़ा हो जाए? फिर सच लिखने की ईमानदारी क्या दूसरों के लिए बेईमानी नहीं हो जाएगी जब उनसे हुई अंदरूनी बातें लिखने में आएंगी? क्या अपने लिखने की ईमानदारी रिश्तों की बेईमानी नहीं होगी?
पहली खबर में यह आया है कि अडवानी ने किताब में जिक्र किया है कि मुशर्रफ ने बातचीत में जब इस बात से साफ इंकार किया था कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में नहीं है तो बाद में वहां मौजूद एक पाक अफसर ने अडवानी से अलग से कहा था कि मुशर्रफ झूठ बोल रहे थे। अब इस ताजा-ताजा बात का खुलासा करके अडवानी मुशर्रफ के लिए तो एक मामूली सी परेशानी शायद खड़ी कर पा रहे हों। लेकिन एक पाकिस्तानी अधिकारी को यह कहकर वे मुसीबत में भी डाल रहे हैं जो कि अभी शायद नौकरी में ही होगा।
इसी किताब का एक दूसरा हिस्सा एक दूसरी खबर में सामने आया है कि गुजरात दंगों के बाद मोदी के इस्तीफे के सवाल पर वाजपेयी ने दो दूसरे नेताओं की मौजूदगी में अडवानी से क्या कहा और किस तरह इस मुद्दे पर अटल-अडवानी ने मतभेद थे। यह बिल्कुल ताजा मतभेद और विवाद खड़ा करके क्या एक आत्मकथा को ईमानदार बनाया गया है या फिर आज की राजनीतिक नजाकत को भुनाने की एक कोशिश?
मैं खुद जब कभी अपने पिछले दिनों की कुछ बातों पर लिखने की सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि क्या उसकी बहुत सी बातें कई लोगों के साथ दगाबाजी नहीं होगी? क्या वे तमाम बातें होते समय यह बात साफ थी कि दोनों ही पक्ष किसी दिन इन बातों को लिख सकेंगे? लेकिन यह तो वह साधारण दुविधा है जिससे हर आत्मकथा या आत्मकथ्यात्मक लेखक गुजरता होगा।
लालकृष्ण अडवानी की दिक्कत दोहरी है। वे वाजपेयी की तरह चौथेपन में नहीं चले गए हैं। अभी तो उनके सामने सबसे महत्वपूर्ण रथयात्रा बाकी ही है। ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा में सत्य, अर्धसत्य और असत्य की मैं बस कल्पना ही कर सकता हूँ। फिर यह भी कि कहां-कहां पर याददाश्त सुविधाजनक रूप से तेज हो गई होगी और कहां पर वह उम्र का शिकार हो गई होगी।
फिर मेरे जेहन में अडवानी को लेकर सौ सवाल उठते हैं कि उन्होंने इस बारे में क्या कुछ लिखा होगा? क्या सच लिखा होगा, क्या झूठ लिखा होगा? इन सवालों को मैं अभी रोककर बैठा हूं किताब हाथ आ जाने तक के लिए। लेकिन जिसे अभी अपने गठबंधन-साथियों, विविधता वाले इस देश के मतदाताओं, धर्मों और जातियों, के बीच वोट के लिए जाना है, उसने इस कठिन मौके पर यह किताब छपवाना क्यों तय किया?
आत्मकथा तो एक अधिक स्थायी और अधिक सच दस्तावेज माना जाता है, रोजाना के राजनीतिक बयानों के मुकाबिले। चुनाव के मौके पर क्या इसे एक पोस्टर की तरह पेश किया गया है? क्या इसे एक तस्वीर की तरह इस्तेमाल किया जाएगा?
सक्रिय, सत्ता केंद्रित, राजनीति करने वालों में अगर अपने जीते-जी और आखिरी खन्दक में खड़े रहकर भी सच कहने का साहस, उसकी ईमानदारी हो सकती है, तो अडवानी बड़ी तारीफ के हकदार होंगे। मेरे हिसाब से आत्मकथा लिखने का वक्त राजनीति की ढलान का सफर शुरू होने के बाद ठीक रहता है जब सारे शिखर भूतकाल बन चुके होते हैं।
-सुनील कुमार

सेक्स की तरफदारी में ही समझदारी है

16 मार्च 08
अमरीका में न्यूयॉर्क राज्य के गवर्नर (मुख्यमंत्री सरीखा पद, राज्यपाल जैसा नहीं) इलियट स्पिट्जर को इस्तीफा देना पड़ा। वहां की जांच एजेंसी एफबीआइ्र ने वेश्यावृत्ति के एक रैकेट का भंडाफोड़ किया जिसमें इंटरनेट, टेलीफोन नंबर, मैसेज, कॉल और बैंक के मार्फत भुगतान करने वाले ग्राहक पकड़ाए, इनमें यह गवर्नर भी पकड़ाया जो न्यूयॉक्र का एक सफल सरकारी वकील था और बरसों अपराधियों को सजा दिलाते आया था। कॉलगर्ल के जिस धंधे का वह एक से अधिक बार ग्राहक बना उसमें हजारों डॉलर प्रति घंटे फसी, और बाकी तमाम खर्चों वाला इंतजाम था। तीन बेटियों के पिता इस पति को शर्मिंदगी के साथ इस्तीफा देना पड़ा है। आगे की कानूनी कार्रवाई अभी बाकी ही है।
यह घटना एक दूसरे किस्म की घटना याद दिलाती है जिसमें अमरीका राष्टï्रपति बिल क्लिंटन के शारीरिक संबंध अपनी ही एक मातहत युवती मोनिका लेविंस्की से हो गए थे और इसे लेकर क्लिंटन ने जांच में झूठा जवाब दिया, जिसे लेकर अमरीकी संसद में उन पर महाभियोग चला।
ताकत की जगहों पर बैठे राजाओं, व्यापारी और उद्योगपतियों, जजों और अफसरों के इर्द-गिर्द एक आभामंडल विकसित हो जाता है। कभी वह धनबल से तो कभी पद की महिमा से, कभी अहसान करने की ताकत से तो कभी शोहरत से, ताकतवर लोगों के लिए यह आसान हो जाता है कि वे देहसुख पा सकें। फिल्मी सितारे, खिलाड़ी, गायक, इसे कई बार मुफ्त में पाते चलते हैं, लेकिन कुछ लोगों को इन तमाम नेमतों के बावजूद यह शौक रहता है कि वे खरीदे सेक्स का भी मजा उठाएं।
दो ही दिन हुए हैं, इंग्लैंड के एक चर्च ने सेक्स को लेकर अपनी सदियों की चुप्पी को तोड़ा और एक लंबा दस्तावेज जारी किया कि सेक्स किस तरह प्रकृतिक दिया हुआ उपहार है और कैसे शादीशुदा जोड़ों को भी आपसी संतुष्टिï के लिए एक-दूसरे का ख्याल रखना चाहिए, वरना तलाक की नौबत भी आती है।
चर्च सेक्स को केवल इंसानी नस्ल को आगे बढ़ाने का काम ही मानते आया था और इसीलिए वह समलैंगिकता को अपराध भी मानते रहा क्योंकि उससे कुछ पैदा नहीं होता। दूसरी तरफ चर्चा का नजरिया सेक्स के प्रति बड़ा बागी रहा और धर्म में जगह-जगह अनुत्पादक सेक्स को पाप माना गया। बाकी कई धर्मों में भी सेक्स को पाप बताने की एक मूर्खतापूर्ण हरकत चलती आई है। हिंदू धर्म में सेक्स को विषय, वासना जैसी कई गालियां देते हुए जगह-जगह कहा भजन-प्रार्थना में कहा गया है कि ईश्वर पापी वासना से बचाए।
ईसाइ्र धर्म के पादरियों ने जगह-जगह अपने सेक्स के लिए चर्च के स्कूल-हॉस्टल में छोटे बच्चों का इंतजाम कर रखा है और सम्पन्न अमरीका के सम्पन्न चर्च, अपने ऐसे सेक्स कुकर्मांे के लिए हजारों करोड़ रुपए का जुर्माना चुकाते हैं। भारत में गुजरात में स्वामीनारायण सम्प्रदाय के कितने ही साधुओं पर बलात्कार के मुकदमे चल रहे हैं और उनकी सेक्स फिल्में वहां गांव-गांव बिकती हैं। बहुत से बाकी धर्मों, सम्प्रदायों का भी कमोबेश यही हाल है, हालांकि लगभग हर धर्म के पास स्वर्ग और नर्क की अपनी-अपनी किस्म की तस्वीरें हैं। इन तस्वीरों को दिखाकर धर्म लोगों में सेक्स के प्रति नफरत पैदा करने में लगे रहते हैं कि इस जन्म में अगर वासना के चंगुल में फंसे तो मरने के बाद नर्क तय है, वरना स्वर्ग मिलेगा।
यह कैसा विरोधाभास है कि प्रकृति का बनया सेक्स-सुख का स्वर्ग छोड़कर यह पूरी जिंदगी कुंठा में प्यासे गुजारो, ताकि मरने के बाद स्वर्ग मिले!! मरने के बाद का तो किसने देखा है, लेकिन ब्रम्हकुमारियों का एक आध्यात्मिक संगठन पति-पत्नी को भाई-बहन की तरह रहने की नसीहत बांटता है। पति-पत्नी, भाई-बहन की तरह रहेंगे तो देह ही जरूरतें समाज में तलाक बढाएंगी, विवाहेत्तर, संबंध बढ़ाएंगे, बच्चों का यौन शोषण बढाएंगी और वेश्यावृत्ति बढाएंगी।
अमरीका के गवर्नर इलियट की इडियट हरकत के पीछे जीवन साथी से असंतुष्टिï, अधिक देह सुख की चाह, वर्जित फल का स्वाद चखने का रोमांच जैसी बहुत सी बातें हो सकती हैं। अमरीका में भी ब्रिटेन की ही तरह कुआंरा मातृत्व बढ़ रहा हे, विवाह अधिक टूट रहे हैं, कल की ही खबर है कि हर चौथी अमरीकी लड़की यौन रोग ग्रस्त है (हालांकि आंकड़ा कुछ अविश्वसनीय है)। जब कभी धर्म या अध्यात्म अपने लोगों को प्राकृतिक जरूरतों पर अप्राकृतिक नियंत्रण सुझाता है, उन पर लादता है तो उससे अनुयायियों का निजी जीवन इसी तरह तबाह होता है।
कामसूत्र ने भारत में सैकड़ों बरस पहले सेक्स में विविधता का एक पूरा इन्द्रधनुष तान दिया था। उन चौरासी आसनों की मदद से दो वयस्क लोग एक-दूसरे की जटिल विविध अनोखी जरूरतों को भी पूरा करने के लायक रह सकते थे। उसको एक पाखंडी सोच ने अनैतिक करार देकर कहीं कंडोम को रोका, तो कहीं सेक्स शिक्षा को। नतीजा यह निकला कि किसी देश के जवान खुलकर यौन-अराजकता के साथ जीने लगे, तो कहीं कुंठाओं के चलते अपूरित इच्छाएं मानसिक रोग बन गईं और समाज बीमार होकर बाबा, तांत्रिक, मंतर के चक्कर में पड़ गया।
ये वही चर्च है तो अभी हाल तक कंडोम का भी विरोधी था, लेकिन बढ़ती बीमारियों, बढ़ते अवांछित गर्भ देखकर उसने हड़बड़ाकर अपना रूख बदला। अब वह अपना पाखंड छोड़कर सेक्स की वकालत कर रहा है। आखिर चर्च की अपनी दूकान भी तो तभी चलेगी जब उसके मेम्बर स्वस्थ और जिंदा रहेंगे, जब उनकी शादियां होंगी और परिवार बचेंगे। अपने पापी पेट को बचाने के लिए चर्च एकदम से उदार हुआ है। भारत के पाखंडी लोगों को कामसूत्र पर से धूल झड़ाने में पता नहीं अभी सौ-पचास बरस, कितने लगेंगे।
-सुनील कुमार

सीखने-सिखाने कमाने-खाने का नया दौर

9 मार्च 08
दुनिया के और बहुत से देशों की तरह हांगकांग में भी बेहतर अंगे्रजी जानना एक बड़ी चुनौती है। स्कूल-कॉलेज से निकलकर अच्छे कोर्स में जाने, अच्छा काम पाने के लिए युवा पीढ़ी में चल रही दौड़ में आगे निकलने के लिए हांगकांग में अंगे्रजी की निजी कक्षाएं एक बहुत बड़ा व्यापार बन गया है। ये दूकानें एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए जो तरकीबें इस्तेमाल कर रही हैं, उनको पढऩा बड़ा दिलचस्प था।
कुछ ही महीने हुए एक परिचित ने रायपुर के एक बड़े स्कूल से लौटकर कहा कि वहां रिसेप्शन पर एक बड़ी साधारण दिखने वाली लड़की बैठी थी जबकि आजकल महानगरों के स्कूलों में तमाम शिक्षिकाएं बनी-ठनी रहती हैं और रिसेप्शनिस्ट उनसे भी अधिक। उसने बताया कि माँ-बाप और बच्चे, सभी, स्मार्ट टीचर्स देखना चाहते हैं।
यह सोच मैंने अब तक हवाई उड़ानों में देखी थी जहां खाना-पानी देने और फिर जूठे बर्तन उठाने के लिए, सुरक्षा के नियमों पर अमल करवाने और सामान बेचने के लिए जरूरत से कुछ अधिक सुंदर और स्मार्ट लड़कियों को रखा जाता है। कई बार पूरा हवाई सफर एक अजीब सी बेचैनी के साथ गुजरता है कि जब इन लड़कियों की बराबरी की उम्र नहीं रह गई, तब हवाई सफर नसीब होता है।
खैर बात तो भारत के स्कूलों और हांगकांग (पता नहीं क्या दिक्कत है, जितनी बार 'कांगÓ लिख रहा हूँ, वह 'कांडÓ लिखा रहा है) के कोचिंग सेंटरों की हो रही थी। भारत में तो बनने-ठनने और स्मार्टनेस की बात दिखने लगी है, लेकिन हांगकांग तो हांगकांग है। वहां का माहौल देखें।
चीन का यह महानगरिया टापू आधुनिक व्यापार का बहुत बड़ा केन्द्र है। जाहिर है कि अंगे्रजी का वहां बोलबाला है। कैंटोनीज नाम की स्थानीय बोली के लोगों में शहरी अभिजात्य प्रतिष्ठïा प्रतीक की तरह अंगे्रजी सीखना हो गया है और लोगों के लिए ये कोचिंग सेंटर मिलने-जुलने की जगह हो गए हैं। भाषा सिखाने के अलावा ये आगे की परीक्षाओं की तैयारी भी करवाते हैं और आने वाले पर्चों का अंदाज लगाने के लिए ये विशेषज्ञ भी रखते हैं। लेकिन एक-एक करके जब सभी कोचिंग सेंटरों की पर्चों की भविष्यवाणियां लगभग बराबर सही निकलने लगीं तो फिर फर्क करने का, धंधे में आगे निकलने का नया तरीका निकाला गया।
हांगकांग के टेलीविजन, वहां के होर्डिंग सड़के और ट्रेन के इश्तिहार अब बताते हैं कि किस कोचिंग सेंटर की टीचर्स कितनी सेक्सी हैं। इंटरनेट पर इन टीचर्स की वीडियो क्लिप भी है जिससे नौजवान छांट सकें कि उन्हें अंगे्रजी कहां सीखना है।
बड़े कोचिंग सेंटरों की स्टार टीचर्स के लिए उनका सेंटर फैशन स्टाइलिस्टों और फोटोग्राफरों के साथ कई हफ्ते गुजारने का खर्च उठाता है ताकि वे अधिक मादक बन सकें और दिख सकें। हफ्तों की मेहनत से तय होता है कि उनकी मिनी स्कर्ट कैसी हो और ऊंची ऐडिय़ों की सैंडिलें कैसी हों, तब जाकर वे अपने सेंटर के विज्ञापन की मॉडलिंग करती हैं। ये अंगे्रजी टीचर्स लंबी चौड़ी तनख्वाह भी पाती हैं और शोहरत भी।
हांगकांग के एक सबसे बड़े कोचिंग सेंटर मॉडर्न एजुकेशन के प्रमुख का कहना है कि एंजेला और स्टेला नाम की उनकी इंग्लिश टीचर्स की लंबी टांगें पूरे कोचिंग व्यापार में सबसे सुंदर हैं, और वे हमारी मुख्य बिकाऊ चीज है।
बहुत सेक्सी, बहुत दुस्साहसी और मादक-उत्तेजक शिक्षिकाओं की मांग हांगकांग में फिल्मी सितारों सी है और उनके दाम भी। उनके टीवी, स्टेशन, बस, होर्डिंग और अखबारों के पूरे पन्नों पर कोचिंग सेंटर पूरे उत्तेजक रूप में पेश करता है। कुछ टीचस्र तो ऐसी हैं जिनकी अपनी स्थायी टीम है जिनमें स्टाइलिस्ट, फैशन डिजाइनर और फोटोग्राफर हैं जो पूरे वक्त उसे और दर्शनीय, और वांछनीय बनाते चलते हैं। उनकी अपनी वेबसाइटें हैं जहां संभावित छात्र उनकी तस्वीरों के अलबम देख सकते हैं, उनकी डायरी पढ़ सकते हैं और क्लासरूम के 'मस्ती के पलोंÓ की वीडियो क्लिप डाऊनलोड भी कर सकते हैं।
दरअसल हांगकांग में हाईस्कूल के सात बरसों की पढ़ाई के बाद छात्र-छात्राओं (मैं और जगहों पर पहले महिला का जिक्र करने की कोशिश करता हूँ लेकिन आज के इस उत्तेजक विषय में पहले छात्र लिखना ही ठीक है) को विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए पहाड़ी चढऩी पड़ती है जिसके लिए कोचिंग सेंटर लगातार लोकप्रिय होते जा रहे हैं।
पिछले बरस एक बड़े कोचिंग सेंटर ने एक शिक्षिका को काम पर रखा जो पहले एक मॉडलिंग मुकाबला जीती हुई थी। इसे सेंटर ने अपने इश्तहारों में एक मादक भूतपूर्व वकील बताकर पेश किया। इस शिक्षिका का कहना था कि मॉडलिंग के पेशे की जिंदगी बहुत लंबी नहीं होती। मुझे भविष्य की भी योजना बनानी थी और मुझे पता है कि रूप-रंग की बाजार में मांग है। ऐसे में एक आकर्षक टीचर के लिए हांगकांग बड़े फायदे की जगह है।
एक विज्ञापन एजेंसी का कहना है कि हांगकांग का कोचिंग व्यवसाय अपनी टीचर्स को फिल्मी सितारों को बढ़ाने की तकनीक से आगे बढ़ाता है। उनके नए नाम गढ़े जाते हैं जैसे अंग्रेजी की एनी...। विज्ञापनों में कोचिंग सेंटरों को स्कूल के बाद की फैशनेबल जगह की तरह पेश किया जाता है।
हांगकांग के चीनी विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता का कहना है कि ट्यूटोरियल्स बहुत बारीकी से उपभेक्ता संस्कृति को आगे बढ़ाते हैं और उनको फायदे का लगे तो वे अपनी शिक्षिकाओं की निजी जिंदगी को भी उजागर करते हैं।
जिन अधेड़ और बूढ़े हवाई मुसाफिरों को एयर होस्टेस देखकर अफसोस होता होगा, उनको अब यह अफसोस और पालने का मौका है कि उन्होंने अपनी साधारण शिक्षिका से अंगे्रजी क्यों सीख ली।
मीडिया में आए दिन आटोमोबाइल प्रदर्शनियों की तस्वीरें आती हैं जिनमें कम कपड़ों में सुंदरियां गाडिय़ों को अपने यौन साथी की तरह करीब रखते दिखती हैं। रूस के एक समाचार चैनल की चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं जो अपने नाम 'नग्न सत्यÓ पर खरा उतरते हुए न्यूज रीडर को एक-एक कपड़ा उतारते हुए भी दिखाता है, हर खबर के साथ।
लेकिन नारी देह का अंगे्रजी शिक्षा में योगदान मैंने पहली बार पढ़ा, तो मुझे लगा कि अपना मलाल मैं अपने हमउम्र लोगों को भी बांटू, और नई पीढ़ी के युवकों के लिए अंगे्रजी सीखने के लिए एक नई वजह भी इससे सामने आती है। सीखने-सिखाने, कमाने-खाने वाले सभी लोगों को दुनिया का यह नया दौर मुबारक।
-सुनील कुमार

रंग बरसे और खाए गोरी का यार

2 मार्च 08
एक प्रमुख अमरीकी पत्रिका 'टाइमÓ में एक बड़ा दिलचस्प लेख आया है। लोग फ्लर्ट क्यों करते हैं? इसे हिंदी में कहें तो मतलब यह कि लोग लाइन क्यों मारते हैं? कुआरों की यह हरकत तो जायज है क्योंकि जीवनसाथी की तलाश में उनको तो एक सिलसिले की शुरूआत करनी ही है, लेकिन शादीशुदा लोग भी फ्लर्ट क्यों करते हैं? वे तो जीवनसाथी पा चुके हैं और अगली पीढ़ी पैदा करने की प्राकृतिक जिम्मेदारी पूरी कर लेने के बाद, अच्छा जीवनसाथी पा लेने के बाद भी लोग कम अच्छे या कम अच्छी को देखकर लाईन क्यों मारने लगते हैं?
इस लेख की बातों पर आगे चर्चा करने के पहले इसकी वैज्ञानिक बातों पर कुछ चर्चा करना चाहिए जो कि पाठकों की दिलचस्पी की होंगी।
फ्लर्ट करने का मतलब जुबान से कुछ कहना जरूरी नहीं होता। किसी को देखकर चेहरे पर वैसे भाव आ जाना, आंखों में वह रंग उतर आना भी लाइन मारना होता है। जब आप किसी से बात करते हुए उसकी ओर झुकने लगते हैं, और एडिय़ां हवा की तरफ उठने लगती हैं, और आप अपने पंजों पर आने लगते हैं। जरा सोचें कि आपकी भौहें, आपकी मुस्कराहट पर कब एक फर्क दिखने लगता है। अगर आप महिला हैं तो याद करें कि कब किसी पुरुष से बात करते हुए आप अपने सिर को इस तरह घुमाने लगती हैं कि आपके चेहरे, गरदन का एक बेहतर पहलू सामने आए। अगर आप पुरुष हैं तो आप कब सांस खींचकर पेट को भीतर करने लगते हैं, या कसरती बदन को सामने रखने लगते हैं।
वैज्ञानिक इनको संपर्क के लिए तैयार स्थिति कहते हैं क्योंकि बिना शब्दों के भी ये हलचलें बताती हैं कि आप कुछ अधिक संपर्क के लिए तैयार हैं। ये सारे कहे-अनकहे इशारे विज्ञान की जुबान में विपरीत लिंग वाले से संबंध कायम करने की शुरूआत बताते हैं। जिसे किसी बोलचाली हिंदुस्तानी में कहा जा सकता है- आंग पर आना... (कमिंग ऑन टू समवन)।
बहुत साधारण जुबान में कहें तो ये ऐसे शारीरिक इशारे होते हैं कि आप सामने वाले पर हावी होना नहीं चाहते, और न ही छोड़कर जाना चाहते हैं। लाईन मारने की कुछ अटपटी लडख़ड़ाती जुबान शुरू होने के पहले की यह इशारेबाजी बड़ी मायने रखती है। ये शुरूआत की शुरूआत होती है।
लाईन मारने के पीछे की एक वजह यह है कि हम इसके बिना रह नहीं सकते। हम बने ही इस हिसाब से हैं, चाहे जीवविज्ञान कहें या सामाजिक संस्कृति, इन्होंने हमें ढाला ही इस हिसाब से है। जीवविज्ञान वाले हिस्से पर तो बहुत सी रिसर्च हुई हैं। जर्मनी के एक विख्यात शोध संस्थान ने 1960 में अफ्रीकी आदिवासियों पर शोध किया था और पाया था कि वहां भी महिलाएं उसी तरह सिर जरा सा झुका कर देर तक आंखों में आंखें डालती थीं जैसा कि शोधकर्ता ने अमरीका में देखा था।
इंसानी पीढिय़ों के विकास के विशेषज्ञ जीवविज्ञानी बताते हैं कि जो लोग ऐसी लाईन मारने में अधिक काबिल रहते हैं, ऐसा करते हैं, वे एक साथी पाने में और अगली पीढ़ी तैयार करने में अधिक सफल रहते हैं। और इसीलिए यह व्यवहार सभी इंसानों में फैल गया। सामाजिक मनोविज्ञान के एक विशेषज्ञ का कहना है कि बहुत से लोग यह महसूस करते हैं कि जुबान खोले बिना बोलने की, बिना सरहदों वाली जुबान, फ्लर्टिंग ही है।
ये मनोवैज्ञानिक अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में अभी ये अध्ययन कर रहे हैं कि किसी महिला के ओवुलेशन (अंडा बनने) की साइकिल (चक्र) के वक्त आकर्षण और फ्लर्टिंग का क्या असर पड़ता है। उनका शोध सुझाता है कि जब महिला के शरीर में ओवुलेशन होता रहता है (ओवम यानी डिम्ब यानी अंडा बनना), तब उसके साथ की गई फ्लर्टिंग, या उसे मारी गई लाईन से वे अधिक आकर्षित होती हैं। उन्हें एक छोटे दौर में अधिक प्रभावित करने वाले पुरुष, मतलब फ्लर्ट करने वाले, उस वक्त अधिक पसंद आते हैं। यहां पर शोधकर्ता इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों तक अधिक नहीं पहुंच पाया लेकिन एक तथ्य यह है कि जब महिला के शरीर में ओवम बनता रहता है तब शारीरिक संपर्क से उसके गर्भवती होने की संभावना अधिक रहती है और फ्लर्ट करने वाले से वे लाईन मारने वाली जीन्स भी संतान में आ जाती हैं, जिनसे कि उन संतानों की भी अधिक संतानें होंगी।
हालांकि यह बात भी अपनी जगह है कि यह सोचा-समझा नहीं होता है, ठीक वैसे ही जैसे फ्लर्टिंग हमेशा सोची-समझी नहीं होती है। जुबान से बोलचाल शुरू होने के पहले तक बहुत से लोगों को शायद इसका अहसास भी नहीं रहता कि वे लाईन मार रहे हैं। लोग चूंकि दूसरों से बात करते हुए अपने-आपको देखते नहीं रहते, इसलिए उन्हें अंदाज नहीं रहता कि वे अंखियों से किस तरह गोली मार रहे हैं, नजरों से निकली बर्छियां किसे किस तरह घायल कर रही हैं।
लेकिन कुछ लोग एक मकसद के साथ फ्लर्ट करते हैं, सोच-समझकर, इरादतन। जब लोग लाईन मारते हुए जुबानी जमाखर्च करने लगते हैं, तो फिर तो वह इरादतन ही होता है।
और कुछ लोग ऐसा सोचने वाले भी होते हैं कि इसमें गलत कुछ भी नहीं है। इस खेल में कैसे पैर धरे जाएं यह सब जानते हैं। एक-दूसरे शोधकर्ता का निष्कर्ष है कि लोग खुलकर लाईन मार सकते हैं, बिना किसी मकसद के। यह शोधकर्ता पिछले तीस बरस से फ्लर्टिंग पर काम कर रहा है। उसका निष्कर्ष यह है कि फ्लर्टिंग सामने वाले व्यक्ति में दिलचस्पी पैदा करती है और उकसाती है कि इस खेल को खेलने में उसकी दिलचस्पी है क्या? इस खेल का सबसे रोमांचक पहलू यह होता है कि इसमें सामाजिक अंतरसंबंधों के नियम लचीले हो जाते हैं।
फ्लर्टिंग से संभावनाओं का एक आसमान ही खुल जाता है। हाँ और ना के बीच की संभावनाएं। इस शोधकर्ता का कहना है कि लोग लाईन मारते हुए 'शायदÓ पर टिके इस जटिल खेल में उलझ जाते हैं। यह खेल कोई नया नहीं है और फ्लर्ट कैसे किया जाए इस पर पहली गाइड करीब 2000 बरस पहले लिखी गई थी। तब से लेकर अब तक अनगिनत ऐसी किताबें आई हैं। अभी एक किताब आई है- ''आप चाहे कैसे भी दिखते हों, ऐसी खूबसूरत औरत को कैसे पटाएं जिसे पाने की आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।ÓÓ
एक बार जब हम 'शायदÓ वाले इस खेल को समझ लेते हैं तो यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा ही बन जाता है। जब इस खेल को खेलने की जरूरत नहीं रह जाती, तब भी हम इसे खेलते रह जाते हैं क्योंकि हम इसे दूसरे खेलों के मुकाबिले बेहतर खेलने लगते हैं। जिस तरह लोग रेस्तरां या बिजनेस मीटिंग में खास किस्म का व्यवहार करना सीख जाते हैं, उसी तरह लोग विपरीत सेक्स के व्यक्ति को लाईन मारने के तौर-तरीके सीखे लेते हैं। कुछ लोग इसमें इतने माहिर हो जाते हैं कि दूसरों के साथ बर्ताव करने के लिए उन्हें व्यवहार का यह एक आसान तरीका लगता है। मतलब यह कि जब कोई तरीका न सूझे, फ्लर्ट करने लगो।
यह एक और बात है कि ऐसा करने वाले अधिकांश लोग ऐसे नहीं होते कि उन्हें विपरीत सेक्स के व्यक्ति के बर्ताव का कोई और तरीका न सूझता हो। वे उत्सुकता में भी ऐसा करते हैं। फ्लर्टिंग एक किस्म से अपना यौन आकलन भी होता है और विकल्पों की तलाश भी। यह मानना है न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के साइकोलॉजी के एक प्रोफेसर का। मानव विकास के विशेषज्ञ जीव वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि इसके फायदे बड़े साफ हैं, जीवनसाथी आगे-पीछे मर सकते हैं और बच्चे भी मर सकते हैं। इसलिए इंसानी बदन, दिल-दिमाग आगे की संभावनाओं को खुला रखकर चलते हैं। फ्लर्टिंग एक किस्म से शारीरिक जोड़ीदारी के लिए बीमे की तरह होता है।
और बुरे से बुरा यह हो सकता है कि आप फ्लर्टिंग में कामयाब न हों (हालांकि इसकी आशंका कम ही होती है) तो उससे भी आपका अपने जीवनसाथी, जोड़ीदार की नजरों में एक नया महत्व पैदा हो जाता है। इससे एक अलग तरह का फायदा तय होता है। मतलब यह कि लाइन मारने से या तो बाहर फायदा होता है या घर में!! मतलब यह कि यह विन-विन सिचुएशन है।
फ्लर्टिंग एक ऐसा भावनात्मक हथियार भी है जिसे शुक्रिया की तरह किसी छोटे-मोटे अहसान के एवज में दिया जा सकता है। भीड़ भरी दूकान में पहले सामान पाने के लिए कोई महिला अपनी आवाज और आंखों में कब कैसा नशा भरकर काम निकलवा लेती है, उसे पता भी नहीं लगता कि कब उसकी आदत में शुमार हो गया। दूसरी तरफ कब कोई सेल्समैन निगाहों, बातों और आवाज में तारीफ भरकर किसी महिला को सामान बेचने में सफल हो जाता है, इसे पारखी ही समझ सकते हैं, हालांकि यह होते रोज चलता है। किसी भरे रेस्तरां में टेबिल पाने के लिए या खरीदा सामान लौटाने के लिए महिलाएं वह कातिल मुस्कराहट मानो जवान होते ही पा लेती हैं।
फ्लर्टिंग एक किस्म से समाज की मशीन के पुर्जों के लिए चिकनाई का काम भी करता है। रोजमर्रा के व्यवहार में लाने कुप्पी से तेल न डाला, लाईन मार दी। लेकिन ऐसी फ्लर्टिंग किसी रोमांटिक नीयत से की गई होने के बजाय एक बख्शीश या शुक्रिया की तरह होती है, पहले हुई तो नजराना, बाद में हुई तो शुकराना।
क्या आपने कभी ऐसा पुरुष हेयर ड्रेसर या टेलर देखा है जो फ्लर्ट न करता हो? इससे औरतें वहां से कुप्पा होकर निकलती हैं और वापिस जल्दी लौटती हैं। आपने सब्जी बाजार में कई सेठों को रोज पहुंचकर कुछ खास सब्जीवालियों से चुहलबाजी करते देखा होगा, फिर चाहे जिंदगीभर दोनों के बीच कई टोकरियां हमेशा ही बनी रहें।
लेकिन पेशे और काम धंधे के सिलसिले को छोड़ दें तो बाहर बातें इतनी मासूम भी नहीं रहतीं। गलत समय पर गलत तरह से फ्लर्ट करें और थप्पड़ से लेकर अदालती कार्रवाई तक आपके लिए तैयार हैं। और अमरीका जैसे देश में भी जहां अनौपचारिक साफगोई को जीवनशैली माना जाता है, वहां भी यह जीवन शैली फ्लर्टिंग नाम के उस खेल में खास मददगार नहीं होती जिसकी पूरी रचना ही धुंध के साथ हुई है।
कुछ दूसरी रिसर्च फ्लर्टिंग का स्याह पहलू भी बताती हैं। यह जरा सी सरहद पार करते ही शोषण में बदल सकती है या जान-पहचान के भीतर बलात्कार में भी। आमतौर पर तो फ्लर्टिंग तब थम जाती है जब सामने के भागीदार से सकारात्मक जवाब नहीं मिलता है। लेकिन इस शोधकर्ता का कहना है कि कुछ लोग मनाही के संकेत समझ नहीं पाते, कुछ समझने से इंकार ही कर देते हैं क्योंकि वे इस बात को सुनना ही नहीं चाहते।
(अमरीका जैसी दुनिया ने संदर्भ में) आज डिजिटल दुनिया फ्लर्टिंग की सबसे बड़ी जमीन बन गई है। यह वह जगह है जहां शब्द ही शब्द हैं और शरीर की भाषा की कोई जरूरत नहीं, चाहे इंटरनेट पर ऑनलाइन रहे या टेलीफोन पर एसएमएस। और चूंकि इन दोनों जरियों से फ्लर्टिंग करने के लिए आंखों में आंखें डालने की जरूरत नहीं रहती, यह अधिक रफ्तार से, अधिक दुस्साहस से और बिना अधिक सोचे विचार रहती है।
डिजिटल शब्दों से फ्लर्टिंग सबको मोह लेती है, हालांकि अब तक इस पर अधिक शोध नहीं हुआ है लेकिन एक बात साफ है कि इंटरनेट पर लोग अब अनजाने लोगों से अपनी निजी बातें अधिक खुलकर करते हैं और इससे फ्लर्टिंग की रफ्तार बढ़ जाती है।
याहू की फ्लर्टिंग वेबसाइट, जैसे- मैरिड एंड फ्लर्टिंग, या फ्लर्टिंग ई-मेल गु्रप या मैरिड बट प्लेयिंग डॉट कॉम और मैरिड-बट-फ्लर्टिंग.कॉम को देखें तो लगेगा कि यहां फ्लर्टिंग का मतलब है उत्तेजक (या गंदी) बातें करना। अमरीका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी ने इंटरनेट के ऐसे एक चैट रूम के 86 लोगों की बातचीत पर अध्ययन प्रकाशित किया है। इसमें बात करने वाले लगभग सभी लोगों का मानना था कि वे शुरू  में यह महसूस करते थे कि वे एक कम्प्यूटर से ही फ्लर्ट कर रहे हैं, लेकिन बाद में करीब एक तिहाई लोगों की रूबरू मुलाकात अपने चैट-पार्टनरों से हुई। और इनमें से दो को छोड़कर बाकी तमाम जोड़ों के बीच बात में कुछ चक्कर भी चला।
इंटरनेट से परे असली जिंदगी में फ्लर्ट करने वाले लोगों में से अधिकांश कोई अफेयर (प्रसंग) नहीं चाहते। लेकिन एक बात शादीशुदा लोगों की फ्लर्टिंग को अकेले लोगों की फ्लर्टिंग से अलग करती है। शादीशुदा लोगों के लाईन मारने से अधिक खतरे जुड़े रहते हैं और इसके साथ सपनीली कल्पनाएं भी अधिक जुड़ी रहती हैं। इसमें दांव पर भी काफी अधिक लगा होता है और खतरे भी अधिक जुड़े होते हैं, चाहे कुछ होने की संभावनाएं कम ही क्यों न हों। पर इसका नशा सिर अधिक चढ़ता है।
मनोचिकित्सक कहते हैं कि जिन लोगों के अपने जोड़ीदार से परे चक्कर होते हैं, वे अपने जोड़ीदार से उतने असंतुष्टï नहीं रहते कि उनके साथ जिंदगी तबाह ही हो गई। मतलब यह कि बाहर बेईमानी से चुराकर हासिल जरा सी खुशी, घर के गम को कम कर देती है। जब कोई आपके प्यार में पड़ जाता है या आप पर फिदा हो जाता है तो आप-आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे- अंदाज में चलने लगते हैं।
फ्लर्टिंग एक निरापद नशे सी है जिसमें लोग अपने-आपको अधिक जिंदा महसूस करने लगते हैं। जिसे आप चाहते हैं, उसे ठेस पहुंचाए बिना आप किसी और जगह से ऐसा महत्व पाते हैं जिससे आप अपने को बेहतर महसूस करने लगते हैं।
'टाईमÓ पत्रिका में छपे बेलिन्डा लश्कॉम्ब के लिए इस लेख का मैंने काफी कुछ हिस्सा अपनी जुबान में यहां पेश किया है। अपनी बात लिखने की इस जगह पर मैंने किसी और की बात को खुलासे से इसलिए लिखा कि बहुत सी वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रिसर्च पर आधारित इस महत्वपूर्ण लेख की टुकड़ा-टुकड़ा बातों का गुमनाम जिक्र करके अपने नाम से लिखना बेईमानी होती। किसी विषय पर अधिक जानकार का बेहतर लिखा पेश करके मैं आगे अपनी बात ठीक से रख सकता हूँ।
हिंदुस्तानी समाज में गरीब अपनी पसीनासनी थकान के चलते, मध्यमवर्गीय अपने सपनों से लड़ते और सम्पन्न लोग ऐशोआराम के मुर्दा सामानों को जिंदा लोगों से बेहतर समझते हुए, रोमांस से भी दूर बसे बैठे दिखते हैं। कम ही जोड़े ऐसे होते हैं जो अपनी सांसों और बदन की बदबुओं को भी दूर करने के बारे में चौकन्ने रहते हों। शादी के पहले की मोहब्बत मुखौटों के मुकाबिले का दौर होता है और शादी के साथ ही मुखौटे उतर जाते हैं कि अब अच्छा बनकर दिखाने की कोई बेबसी तो है नहीं!
बहुत से जोड़ों में औरत, बच्चे और खाना, घर की सफाई और बूढ़ों को दवाई देकर, जिम्मा पूरा समझती है और आदमी कमाकर लाकर देने को सब कुछ मान लेता है। जब जिंदगी ऐसी नीरस हो जाए तो उसमें बाहर जहां कहीं, जो कोई जरा सा रस डाले, वह तुरंत सोख लिया जाता है। मैं इस मुद्दे पर इतना लंबा (लिखा नहीं) पेश कर रहा हूँ क्योंकि मुर्दादिल लोग चौकन्ने हो जाएं कि उनकी नीरस जीवन शैली के बीच कब उनके जीवनसाथी या जोड़ीदार पर कोई रंग बरसाने लगे और गोरी का यार खाने लगे। प्यार, महत्व, देह या लाईन मारने वाले की मिसाल समझानी हो तो मनीप्लांट कहे जाने वाले फिलाडेंड्रान पौधे को देखें, पानी की तलाश में उसकी जड़ें कई फीट लंबी होकर तलाश करने लगती हैं। इस हफ्ते मेरी खुद की लिखी बस जरा सी असहमति भारतीय जीवनशैली के एक हिस्से से।
-सुनील कुमार

छोटी सी बात


जो लोग समय पर कहीं पहुंचने के हिसाब से अपनी घडिय़ों को आगे रखते हैं, वे लोग पहले तो खुद अपने को धोखा देते हैं, बाद में वे तब धोखा खा जाते हैं जब किसी को सही घड़ी के मुताबिक चलाने लगते हैं।

रविशंकर की समझदारी की बात


3 जून 2011
ऑर्ट ऑफ लिविंग के लिए जाने जाने वाले श्री श्री रविशंकर ने आज एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही कि लोकपाल को एक समानांतर सरकार बनाने की कोशिशों से बचना चाहिए। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं, लोकपाल के समर्थक हैं और प्रधानमंत्री और बड़े जजों को लोकपाल के दायरे में लाने के हिमायती हैं, लेकिन यह बारीक फर्क करके उन्होंने लोकतंत्र की अपनी बारीक समझ का सुबूत दिया है और आज जब पूरे देश का माहौल भीड़ के सिरों की तरह का हो गया है तब उन्होंने बड़े दिमाग की यह बात कही है। उन्होंने योरप के प्रवास के बीच से भारत के एक अखबार, द इंडियन एक्सपे्रस को कहा कि लोकपाल बनाते हुए किसी को भी कानून से ऊपर नहीं रखना चाहिए लेकिन खुद लोकपाल कहीं एक समानांतर सरकार न बना दिया जाए।  रविशंकर पूरी तरह से अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं।
अन्ना हजारे के आंदोलन के पहले से देश में सत्ता का बेजा इस्तेमाल करके बेईमानी करने वालों के खिलाफ एक गहरी नफरत गहरे बैठ चुकी है। लोग अब अंगे्रजों के जमाने के भी इससे तो बेहतर होने की बात कहने लगे हैं और यह भी कहने लगे हैं कि इससे तो फौज का राज अच्छा होगा। आजादी की पौन सदी होने के करीब आकर भी लोगों के बीच में लोकतंत्र को लेकर समझ मजबूत नहीं हो पाई है और लोगों की आस्था अब नाना पाटेकर किस्म की हिंसक फिल्मों पर जम गई है कि सत्ता चला रहे बेईमानों को इसी तरह निपटा देना चाहिए। ऐसे में जब अन्ना हजारे और देश के कुछ दूसरे भरोसेमंद लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया तो देश की सरकार सिर से पैर तक कालिख से पुती हुई थी, वह सहमी हुई खड़ी थी और उसका वक्त जितना संसद में लग रहा था उतना ही अदालती कटघरों में, जांच कमेटियों में लग रहा था। ऐसे माहौल में एक गांधीवादी अन्ना हजारे की भूख हड़ताल से चर्बी चढ़ी सरकार एकदम से दहशत में आ गई और उसने आनन-फानन लोकपाल कमेटी बना दी। चूंकि उस कमेटी में सारे के सारे गैरसरकारी सदस्य उस जनलोकपाल आंदोलन के मुखिया थे जो कि लोकपाल को भारतीय लोकतंत्र के भीतर एक तानाशाह का दर्जा देना चाहते हैं, इसलिए आज की तनातनी कुछ इस सोच को लेकर भी है। हम इस बात के पूरी तरह हिमायती हैं कि जनता के पैसों पर जीने वाला कोई भी सरकारी या संवैधानिक पद प्राप्त व्यक्ति लोकपाल के दायरे से परे नहीं होना चाहिए। हमने इस देश में बड़े-बड़े जजों से लेकर प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों तक की बेईमानी चर्चा में रही है और चाहे वह किसी अदालत में स्थापित न हो पाई हो, यह तो साफ है कि आम जनता की नजरों में कोई भी पद भ्रष्टाचार से बचा हुआ नहीं है। ऐसे में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को किस आधार पर लोकपाल से बाहर रखने की बात लोग करते हैं यह हमारी समझ से परे है। हमारा बड़ा साफ मानना है कि किसी पद की गरिमा उस पद को जांच से परे रखने में नहीं होती, उस पद को जांच के लिए खोल देने में ही होती है।
लेकिन जब ऐसे ताकतवर लोकपाल की बात होती है तो एक खतरा यह भी सामने आता है कि उस लोकपाल के बेईमान, बददिमाग या बेदिमाग हो जाने पर उस पर किसका काबू रहेगा? भारत का लोकतंत्र संतुलन की एक मिसाल है जिसमें कार्यपालिका यानी सरकार, न्यायपालिका यानी अदालत और विधायिका यानी संसद-विधानसभा का एक-दूसरे पर तरह-तरह का नियंत्रण रहता है। इनकी जिम्मेदारियां और इनके अधिकार इस तरह से तय किए गए हैं कि ये आपस में एक-दूसरे के काम में अड़ंगा बने बिना भी एक-दूसरे के गलत कामों को रोक सकें। इसलिए जब लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों में एक और स्तंभ जोड़ा जा रहा है तो उसके बारे में भी इन तीनों संस्थाओं के साथ एक अंतरसंबंध तय करने की जरूरत है कि लोकपाल को लेकर इन तीनों संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारियां क्या होंगी और उनके अधिकार क्या होंगे? आज दरअसल देश में भ्रष्टाचार की हालत देखकर एक ऐसा माहौल बन गया है कि लोकपाल कोई रामबाण दवा हो जिससे कि इस देश की सारी खामियां दूर हो जाएंगी। लोकपाल को एक वेताल, मैनड्रेक, सुपरमैन या स्पाईडरमेन की तरह का सोचा जा रहा है। लेकिन ऐसी असीमित क्षमता और ताकत बिना खतरों के नहीं आती। ताकत का बेजा इस्तेमाल इस देश ने आपातकाल में देखा हुआ है और लोकपाल बनकर अगर कोई ताकत का वैसा ही इस्तेमाल करने लगेगा तो लोकतंत्र का क्या होगा? दरअसल आज लोकपाल के आंदोलन से जुड़े हुए अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव, या रविशंकर हों या किरण बेदी, इन तमाम लोगों के तौर-तरीके लोकतंत्र से खासे दूर हैं। और आज के माहौल में ये अपने थोड़ी सी करिश्माई लोकप्रियता के चलते बहुत भले लग रहे हैं लेकिन अगर ध्यान से इनकी बातों को सुनें तो उनका लोकतंत्र से लेना-देना बहुत कम है। इसलिए नुक्कड़ पर लगते नारों के मुताबिक अगर लोकपाल को बनाने की बात कोई सोचता है तो वह जान ले कि नारे किसी आईटम सॉंग में तो भले लग सकते हैं लेकिन जब एक जटिल लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात हम करते हैं तो वहां पर हकीकत बहुत चटपटी नहीं होती और वह खासी गंभीर और कम आकर्षक लग सकती है। इसलिए आज रविशंकर की कही हुई बात को हम बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं और उससे लोकपाल कमेटी के बहकने का खतरा कुछ कम होगा।

साइबर और परमाणु खतरे,दोनों के निशानों पर भारत


2 जून 2011
अमरीका ने कल ही यह नीति घोषित की है कि अगर उस पर साइबर हमला हुआ तो वह उसके जवाब में फौजी कार्रवाई भी कर सकता है। अब साइबर हमला तो किसी भी बात को कहा जा सकता है, और अमरीकी इंटरनेट वेबसाईटों में अगर कोई घुसपैठ हुई तो उसके बदले दुनिया बमबारी झेलने तैयार रहे। कल ही अमरीकी इंटरनेट सर्विस देने वाले जीमेल में चीनी हैकरों ने घुसपैठ कर ली और उसके बहुत से खातों के भीतर वे पहुंच गए। उन्होंने अमरीकी अफसरों के ईमेल बॉक्सों तक रास्ता बना लिया, जिसे अमरीका पर साइबर हमला कहा जा सकता है। खैर, अमरीका दुनिया का क्या करेगा इस पर अब किसी का रोक तो है नहीं इसलिए अब हम सिर्फ इस पर बात करें कि लोग अपने बचाव की तैयारी कैसे करें और भारत जैसे देश अपने बचाव की तैयारी में क्या करे?
कल जब दिल्ली में प्रधानमंत्री भारत के परमाणु संयंत्रों की हिफाजत के लिए एक लंबी और ऊंची बैठक ले रहे थे तब हमें यही लग रहा था कि भारत में परमाणु बिजलीघर आज लगना शुरू भी नहीं हुए हैं और जर्मनी ने यह घोषणा कर दी है कि अगले दस बरसों में वहां का आज का सबसे नया परमाणु बिजलीघर भी खत्म कर दिया जाएगा। वहां के बाकी बहुत से बिजलीघर तो उसके पहले ही खत्म किए जाएंगे। मतलब यह कि एक तरफ भारत में कुछ बरस बाद जो परमाणु बिजलीघर लगने जा रहे हैं, उनके कुछ बरस के भीतर ही जर्मनी उनसे हाथ धोना शुरू कर चुका रहेगा। दुनिया के बहुत से विकसित देशों में परमाणु बिजलीघरों को अच्छा नहीं माना जा रहा है और वहां उन्हें लगाने के खिलाफ फैसले हो चुके हैं। हम साइबर हमले के सिलसिले में इस बात की चर्चा कर रहे हैं और इन दोनों के साथ हम एक तीसरी चर्चा यह भी करना चाहते हैं कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के मुखिया ने पिछले दिनों यह कहा कि भारत के ठिकाने हमले के लिए छांटे जा चुके हैं। जाहिर है कि जब किसी देश पर कोई दूसरा देश पूरी तरह और बुरी तरह हमला करना चाहेगा तो वह उसके परमाणु ठिकानों पर भी हमला करने की सोचेगा। इस चर्चा के बीच हम यह भी कहना चाहेंगे कि आज अमरीका के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले जिन इंटरनेट कम्प्यूटरों में चीनी हैकरों ने घुसपैठ कर ली है, उनसे कम सुरक्षित भारतीय कम्प्यूटर ही भारत के परमाणु ठिकाने पर रहेंगे और पाकिस्तान के साथ चीन के गहरे दोस्ताना रिश्ते जगजाहिर हैं। हमारी यह बात एक पल के लिए किसी को चंडूखाने के अफीमची की उड़ान जैसी लग सकती है, लेकिन दुनिया के किसी भी समझदार देश जब अपनी बचाव-तैयारी करनी होती है तो उसे तमाम किस्म की मुमकिन साजिशों को सोचकर तैयारी करनी चाहिए। हम उस पाकिस्तान से हमले की बात कर रहे हैं जहां पर आज यह चर्चा है कि वहां की फौज के भीतर आतंकी और कट्टरपंथी घुसपैठ कर चुके हैं। यह चर्चा बाहर तो बरसों से है लेकिन वहां भीतर भी आज यह एक गंभीर चर्चा है। ऐसे में भारत पर एक ऐसा साइबर हमला भी हो सकता है जो यहां के न सिर्फ परमाणु कम्प्यूटरों में घुसपैठ कर सकता है, बल्कि पाकिस्तानी हमला भारत के परमाणु ठिकानों पर भी इसलिए हो सकता है क्योंकि जब आतंकी इस तरह के हमले तय करेंगे तो सरकार के तर्क धरे रह जाएंगे। न पाक सरकार का कोई काबू अपनी सेना और खुफिया एजेंसी पर रह जाएगा और न ही भारत सरकार के किसी स्तर पर ऐसी बात कर पाएगी।
यहां पर हम दो बातों पर आना चाहते हैं, सिर्फ पाकिस्तान नहीं, दुनिया के किसी और देश से भी भारत पर साइबर हमला हो सकता है जो यहां की ट्रेन, उड़ानें, बैंक, बीमा और तमाम किस्म के बाकी ऑनलाईन काम खत्म कर सकता है। दूसरी बात यह कि भारत में किसी परमाणु-हमले, परमाणु केंद्र पर हमले या परमाणु हादसे को लेकर बचाव की कोई तैयारी आज नहीं दिख रही है और इस बारे में पुख्ता इंतजाम किए बिना सरकार को किसी परमाणु बिजलीघर बनाने की इजाजत मिलनी ही नहीं चाहिए, मौजूदा खतरों से निपटने के लिए उसके इंतजाम भी काफी और पुख्ता होने चाहिए। ऐसे में भारत को एक इंतजाम यह भी रखना चाहिए कि अगर अंतरिक्ष से ही हमला करके भारत की सारी संचार व्यवस्था और सारी कम्प्यूटर जानकारी अगर खत्म कर दी जाएगी तो यहां की जिंदगी चलने के लिए वैकल्पिक इंतजाम क्या हैं? कल को यह भी हो सकता है कि कहीं बाहर के कोई आतंकी या भारत के भीतर के आतंकी अमरीका पर एक बड़ा साइबर हमला भारत की ही जमीन से करके भारत को अमरीकी फौज के निशाने पर लाकर खड़ा कर दें। ऐसे में भारत किस तरह से अपना बचाव करेगा? यह बात जाहिर है कि भारत जितने किस्म के आतंक अपनी जमीन पर देख रहा है उनमें से एक से अधिक किस्म की विचारधाराएं अमरीका पर ऐसा हमला करने की सोच रखती हैं। नक्सलियों से लेकर इस्लाम के नाम पर आतंक करने वाले तक बहुत से ऐसे लोग हैं जो अमरीका से नीतिगत नफरत करते हैं। भारत को अपने भीतर से हो सकने वाले ऐसे खतरे से लेकर बाहर से हो सकने वाले हमलों तक के बारे में सोचना चाहिए और हम साइबर हमले, साइबर खतरे, परमाणु हादसे और परमाणु केंद्रों पर हमले, परमाणु हमले तक की सभी किस्म की बातों के बारे में सोचते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि सरकार इन सबसे निपटने की पूरी तैयारी रखेगी। जनता के करने का यहां पर कुछ नहीं है और सब कुछ सरकार के पाले में है। जनता महज इतना कर सकती है कि साइबर हमलों के खतरों को देखते हुए ऐसे दिन की कल्पना करे जब उसके किसी कम्प्यूटर और किसी ईमेल बॉक्स पर कोई भी जानकारी नहीं बच जाएगी और उस दिन वह अपनी जरूरत की सूचना कहां से जुटाएगी? हर किसी को अपनी-अपनी वैकल्पिक व्यवस्था सोच लेनी चाहिए।

बाबा का हठयोग और आगे-पीछे


1 जून 2011
सुनील कुमार
देश में एक बार फिर एक निहायत गैरजरूरी बात खबरों की जगह पर लद गई है। पाठकों को याद होगा कि बहुत बरस पहले एक बार गणेश के दूध पीने की अफवाह ने देश के दिल-दिमाग कैद कर लिए थे और अक्ल के इस्तेमाल को छोड़कर लोग गणेश प्रतिमाओं पर दूध लेकर टूट पड़े थे। पिछले कुछ दिनों में बाबा रामदेव और लोकपाल मसौदा कमेटी के कुछ लोग ऐसे ही काम में जुटे हुए हैं। कल तक जो रामदेव इस कमेटी में सामाजिक क्षेत्र से मनोनीत किए गए लोगों के साथ थे, आज वे रामदेव शतरंज के ऊंट की तरह तिरछे-तिरछे चलते दिख रहे हैं, और आने वाले दिनों में वे बेमुद्दत अनशन पर बैठने पर अड़े हुए हैं। उनका मुद्दा देश के बाहर गए हुए भारतीय धन को वापिस देश लाने का है और भ्रष्टाचारियों को फांसी देने का कानून बनाने का है और साथ में उन्होंने प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे करवाने की मांग भी की है और लोकपाल के दायरे से वे प्रधानमंत्री को बाहर भी रखना चाहते हैं। कुल मिलाकर वे मीडिया और मंच पर बात करते हुए हर बार अपनी मांगों को जितना फैला रहे हैं, उतना ही अपना वजन खो रहे हैं। लेकिन हमारी फिक्र बाबा की विश्वसनीयता या उनका वजन कम होना नहीं है। हमारी फिक्र है कि इस देश में पहली बार एक नया कानून बनाने के लिए जितनी महत्वपूर्ण लोकपाल कमेटी बनी है, और वह जिस रफ्तार से एक महत्वपूर्ण काम कर रही है, उसे जनता के बीच मंच पर जाकर तबाह करने का काम इस कमेटी के सामाजिक कार्यकर्ता सदस्य कर रहे हैं। जब एक बड़ी अहमियत वाली जिम्मेदारी देश में इस कमेटी को दी है तो उसे बक-बक में बर्बाद करने की हड़बड़ी करने वाले अपनी साख खो रहे हैं। आज अगर इस देश में अन्ना हजारे और उनके साथियों के बारे में साधारण जनता से ही पूछा जाए तो शायद कुछ महीने पहले उन्हें मिला जनसमर्थन आज कायम नहीं रह गया है। जब जिम्मेदारी का एक काम चल रहा है तब गैरजिम्मेदारी के ऐसे बयान जिनसे कि इस कमेटी के दोनों पक्षों के बीच एक-दूसरे के खिलाफ कटुता बढ़े उसकी क्या जरूरत है। फिर यह बात भी है कि जब एक कमेटी में बैठकर मतभेदों पर बहस करने और किसी किनारे तक पहुंचने की संभावना खत्म नहीं हो गई हो, उसके खत्म होने की शुरुआत भी नहीं हुई है तब अगर अन्ना हजारे मंच पर जाकर सोनिया गांधी की तरफ इशारे करके उन्हें कोसते हैं, तो हमारा मानना है कि बेइंसाफी की ऐसी बात को लेकर जनता के मन में भी अन्ना हजारे की इज्जत घटी होगी। इस देश के ताजा इतिहास में यह दर्ज है कि जब सोनिया गांधी पर उनके विदेशी मूल के होने को लेकर ओछे हमले किए गए थे तो उन्हें जनता की अभूतपूर्व हमदर्दी मिली थी। आज जब लोकपाल मसौदा कमेटी में अन्ना टोली के ही पांच लोगों को इस देश के पूरे सामाजिक क्षेत्र के प्रतिनिधि मानकर उन्हें पांचों गैरसरकारी कुर्सियां दे दी गई हैं तो उसके बाद भी उनका यह इशारा कि सोनिया गांधी रिमोट कंट्रोल से मनमोहन सिंह को चला रही हैं, यह एक गैरगांधीवादी और हिंसक बात है।
कल जब दिल्ली में इस कमेटी के अब तक के कामकाज और आज की उसकी कार्रवाई के बारे में केंद्र सरकार के दो मंत्री कमेटी सदस्य के रूप में मीडिया को बता रहे थे और सवालों के जवाब दे रहे थे तो उनकी तमाम बातें तर्कसंगत लग रही थीं। जब इस देश में बनने जा रहे लोकपाल कानून के तहत राज्यों में भी लोकायुक्त बनेंगे तो यह बहुत साधारण सी बात है कि ऐसे प्रस्ताव पर राज्यों से भी उनके विचार लेने चाहिए। अब अगर इस बात को अन्ना टोली देर करने का आरोप लगाकर सड़कों पर कोस रही है तो हमारा मानना है कि इस देश के संघीय ढांचे, इस देश के बाकी सामाजिक दायरे के लिए यह अन्ना और उनके साथियों के मन की एक ऐसी हिकारत है जिसका कि साथ शायद ही कोई समझदार देगा। हमने इस कमेटी के बनने के एक या दो दिन के भीतर ही यह लिखना शुरू कर दिया था कि कमेटी में सामाजिक क्षेत्र से एक ही टोली के पांच लोगों को ले लेना एक अलोकतांत्रिक बात है और ऐसी पांचों कुर्सियों पर कब्जा करके बैठ जाना और समाज के प्रतिनिधित्व पर इस किस्म का एकाधिकार जमा लेना गांधीवाद के खिलाफ है। इसके साथ-साथ हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि शांति भूषण और प्रशांत भूषण जैसे दो दिग्गज वकीलों की इस कमेटी में एक साथ जरूरत नहीं थी क्योंकि दोनों एक ही सोच वाले, लोकपाल के मोर्चे पर पहले से सक्रिय पिता-पुत्र थे और उनमें से किसी एक की जगह किसी और को समाज के किसी दूसरे तबके से लाना चाहिए था। हमारा मानना है कि इस मसौदा कमेटी में अलग-अलग विचारधाराओं, अलग-अलग विशेषज्ञताओं, अलग-अलग तबकों के लोगों को रहना था, और अपने-आपको गांधीवादी कहने वाले अन्ना हजारे को भला यह कैसे ठीक लगा कि इस कमेटी के पांचों सामाजिक कार्यकर्ताओं में न कोई दलित, न कोई आदिवासी, न कोई अल्पसंख्यक, न कोई महिला और न कोई किसी दूसरे तबके की सोच को सामने रखने वाला। यह तो साबरमती आश्रम में एक ऐसी थाली जैसा हो गया जिसमें बापू ने अकेले ही तमाम खाने को अपने लिए सजा लिया।
आज जब समाज के दूसरे तबकों की राय लेने के लिए केंद्र सरकार लोकपाल के मुद्दों को जनता के सामने रख रही है, राज्य सरकारों को भेज रही है और यह इरादा खुलकर दुहरा रही है कि वह तीस जून तक इस मसौदे को पूरा करने के लिए कमर कसकर काम कर रही है, तो अन्ना टोली को चुप रहकर, देश के दूसरे लोगों को भी कुछ कहने का मौका देना चाहिए। किसी एक स्वघोषित गांधीवादी तबके की तानाशाही भी गांधीवाद नहीं कही जा सकती।
हम इस मुद्दे पर बहुत सी बातों को जनता के बीच एक व्यापक बहस के लायक जरूरी मानते हैं, जिनमें प्रधानमंत्री को, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों को लोकपाल के दायरे के भीतर या बाहर रखने बात है, और संसद के भीतर सांसदों के किए हुए काम को भी इससे बाहर रखने की बात है। देश के संविधान के तहत आज कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के जो अलग-अलग अधिकार हैं और उनकी जो अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं, उनके साथ लोकपाल के ऐसे टकराव इस कानून में नहीं छूट जाने चाहिए जिनके लिए फिर कुछ महीने बाद संविधान संशोधन शुरू हो जाएं। हमें ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे और उनके साथी एक गैरजरूरी हड़बड़ी के शिकार हैं और उन्हें संदेह का लाभ देते हुए हम अपनी इस आशंका को अभी अलग रख रहे हैं कि सरकार को बदनाम करने की उनकी नीयत भी दिखती है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की मुहिम का हमने खुलकर समर्थन किया और बार-बार देश के लोगों से अपील की कि ऐसे अभियान में उन्हें जुडऩा चाहिए। लेकिन आज यह अभियान अगर अपनी निहायत गैरजरूरी और नाजायज हरकतों से अपनी विश्वसनीयता खो रहा है तो हम इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का नुकसान मानते हुए अन्ना टोली को सावधान करना चाहते हैं कि वे अपना ध्यान इस गंभीर मुद्दे से हटाकर तालियां पिटवाने जैसे फुटपाथी काम में खराब न करें। हम भ्रष्टाचार के खिलाफ आज की मौजूदा लड़ाई को छेडऩे के लिए अन्ना हजारे की तारीफ करते हैं लेकिन हम उन्हें पूरे देश का प्रतिनिधि मानने से इंकार करते हैं। हमारा मानना है कि इस विशाल देश में इतनी विविधता है कि उसके बहुत से तबकों की बात सुने बिना सिर्फ जनलोकपाल आंदोलनकारियों को पूरा देश मान लेना एक बहुत बड़ी गलती होगी। हम यह भी नहीं जानते कि लोकपाल मसौदा कमेटी में इस पूरी टोली को इस मौजूदा शक्ल में एक साथ शामिल करके केंद्र सरकार ने कोई गलती की थी या यह उसकी एक सोची-समझी चाल थी कि इससे अन्ना टोली की विश्वसनीयता कम होगी। और ऐसा हुआ भी। पिछले कुछ महीनों में अन्ना हजारे और उनके साथियों की जनता में लोकप्रियता हमें घटते हुए दिखी है और लोग उनके बारे में नौटंकीबाज जैसी जुबान बोलने लगे हैं। इस नौबत से निकलने के लिए इस टोली को ही कोशिश करनी होगी क्योंकि इसने भारतीय समाज के प्रतिनिधि होने पर जिस तानाशाही के साथ अपनी बपौती जमा ली है, उससे वह लोगों की हमदर्दी की हकदार भी अब नहीं रह गई है। यह सिलसिला शुरू से ही गलत शुरू हुआ था और अब केंद्र सरकार देश भर से इस पर राय मांग रही है जो कि देर से ही सही, पर एक सही शुरुआत है। पूरे देश की, सरकारों की सुने बिना इस तीस जून को किसी महूरत की तरह पेश करने की जरूरत नहीं है, जरूरत सबको सुनने की है। फिलहाल यह बात बाबा रामदेव के अनशन से शुरू हुई थी लेकिन उसके बारे में आने वाले दिनों में सामने आती नौबत देखकर फिर लिखना ठीक होगा, आज तो यह भी लगता है कि अन्ना टोली के मुकाबले पिछले हफ्तों में बाबा जिस तरह हाशिए पर चले गए थे, तो वे अब अखबार के पन्नों के बीच में आने के लिए भी ऐसा कर रहे हैं। लोकतंत्र हठयोग पर नहीं चलता।