6 अपै्रल 08
एक नई मोबाइल फोन कंपनी ने अपना काम शुरू किया है और बड़े हमलावर अंदाज में इश्तहार भी। उसने अपने ग्राहकों को उनके नंबरों पर आने वाली कॉल्स के लिए दस पैसे मिनट देने की घोषणा की है। ये दस पैसे शायद उस फोन के बिल में जमा हो जाएंगे। सड़क किनारे के बड़े से इश्तहार में एक लड़की की तस्वीर है जिसके टी-शर्ट पर एक मोबाइल नंबर लिखा है और लिखा है- कॉल मी।
कुछ दिन पहले खबर थी कि मोबाइल फोन कंपनियां अब उन लोगों के लिए फोन मुफ्त कर देंगी जो लोग कुछ विज्ञापनों को पाना मंजूर कर लेंगे। यह सेवा कुछ वैसी ही हो जाएगी जैसी कि कुछ देशों के मुफ्त अखबारों में है। वहां वसूली विज्ञापनदाता से होती है और अखबार लाखों की संख्या में छापकर ट्रेनों, बसों में रख दिए जाते हैं।
मुफ्त मोबाइल फोन सेवा उन फ्री टेलीविजन चैनलों सी भी होगी जो विज्ञापनों से कमाई करते हैं और प्रसारण मुफ्त में देते हैं।
भारत में सरकार ने टेलीफोन नियमों को ढीला किया है जिससे उम्मीद है कि मोबाइल कॉल दस पैसे मिनट तक हो जाएगी। इसके बाद शायद ऐसे एसएमएस मुफ्त हो जाएंगे, जिनके नीचे किसी विज्ञापन को चस्पा करने की छूट कंपनियों को मिल जाए। फिर शायद घंटी की आवाज की जगह इश्तहार और फोन पर सुनाई देने वाले रिंग टोन की जगह इश्तहार आकर सामान बेचने लगेंगे और लोगों को कॉल करने, कॉल पाने से कमाई भी होने लगेगी।
टेलीफोन का इस्तेमाल जिंदगी को बदल चुका है। खासकर उस तबके की, जो कि फोन का इस्तेमाल करता है। लोगों के सामाजिक संबंधों को तो अब फोन उस तरह से नियंत्रित कर रहा है कि जिस तरह बाहर से आई बहू घर के तौर-तरीकों पर कब्जा कर ले और सब कुछ उसकी मर्जी से चलने लगे। आज लोगों का मिलना-जुलना, उठना-बैठना, टेलीफोन तय करने लगा है और उसमें भी मोबाइल फोन।
अब ताजा खबर यह है कि 'नोमोफोबियाÓ नाम की एक ऐसी मानसिक स्थिति मनोचिकित्सकों ने पाई है जिसमें कोई व्यक्ति फोन की बैटरी-चार्जिंग खत्म हो जाने पर, या फोन रेंज के बाहर हो जाने पर, या फोन का टॉक-टाईम खत्म हो जाने पर लोग दहशत में घिर जाते हैं। पहले ही कुछ सौ किस्म के फोबिया थे, लेकिन यह नया 'नोमोफोबियाÓ (नो मोबाइल फोबिया) सबसे आगे निकल जा रहा है।
दरअसल टेलीफोन पर, और खासकर मोबाइल फोन पर लोग इतने अधिक टिक गए हैं कि वे घर-दफ्तर से निकलते हुए पूरा काम करके नहीं निकलते कि रास्ते से फोन करके वे काम निपटा लेंगे। और यह अधूरापन अंतहीन तनाव पैदा करते चलता है। लोगों ने जिंदगी को इस तरह ढाल लिया है कि उनके बहुत से काम उनके फोन के शुरू रहने पर हो सकते हैं, और बंद होने पर तबाह भी हो सकते हैं। एक वक्त पुलिस के वायरलेस का यह काम होता था लेकिन आज तो रिक्शेवाले को, या रद्दी वाले को बुलाने के लिए भी फोन लगता है और घर के करीब पहुंचने पर खाना लगाने के लिए लोग फोन करने लगे हैं।
मोबाइल फोन ने लोगों की जिंदगी 24 गुणा 7 कर दी है और जब फोन काम नहीं करता तो उसे वक्त, उतनी देर तो लोग दहशत में आ ही जाते हैं। ऐसा वक्त न आ जाए यह सोचकर बाकी वक्त भी कई लोग अपने फोन को देखते रहते हैं कि कोई कॉल मिस तो नहीं हो गई? कोई मैसेज तो मिस नहीं हो गया? यह नया नंबर किसका है? इसकी कॉल पर अभी क्या जवाब दूं? मेरे फोन को बच्चे देख रहे थे उस पर वयस्क लतीफा तो उन्होंने नहीं देख लिया? उस पर की ब्लू फिल्म तो उन्होंने नहीं देख ली?
एक नई तकनीक, नए सामान और नई सेवा ने लोगों को अभूतपूर्व सहूलियत तो दी है, लेकिन अभूतपूर्व तनाव भी खड़ा कर दिया है। अब होली-दीवाली भी लोगों के रिश्ते इस बात पर टिक गए हैं कि वे एसएमएस पर मौजूद हैं या नहीं। बूढ़े भी जवाब देना सीख रहे हैं और जवान अधेड़ों से अश्लील या सेक्सी संदेशों का रिश्ता आसानी से बना लेते हैं। अफसरों के जिस तबके में दो बरस से अधिक सीनियर को सिर्फ सर या मैंडम कहकर ही बात होती है, वहां भी दस-दस बरस सीनियरों के साथ ऐसे एसएमएस बिना झिझक आते-जाते हैं।
यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि इस औजार ने लोगों के बीच हास्यबोध बढ़ा दिया है क्योंकि लोग आए हुए संदेशों को ही दस-बीस गुना लोगों में फैलाते हैं, और इनकी शुरूआत शायद मोबाइल कंपनियां खुद ही करती हैं। लेकिन जिंदगी का रूख इससे बदल गया है।
मोबाइल फोन से किस तरह का फर्क पडऩे वाला है यह सर्विस के रेट और हैंडसेट के वेट से भी तय होने जा रहा है। अभी-अभी मेरे बेटे ने नसीहत वाला इतना लंबा मैसेज मुझे भेजा कि वह एक चि_ïी जैसा था। आजकल के बड़े फोन की मेहरबानी से वह एक बार में आ भी गया।
आपकी जिंदगी में अगर मोबाइल फोन है तो मुझे आप पर पड़ा फर्क इस नंबर पर एसएमएस कर सकते हैं- 098936-25000
(अभी इस पर इनकमिंग कॉल से कमाई शुरू नहीं हुई है)।
- सुनील कुमार
एक नई मोबाइल फोन कंपनी ने अपना काम शुरू किया है और बड़े हमलावर अंदाज में इश्तहार भी। उसने अपने ग्राहकों को उनके नंबरों पर आने वाली कॉल्स के लिए दस पैसे मिनट देने की घोषणा की है। ये दस पैसे शायद उस फोन के बिल में जमा हो जाएंगे। सड़क किनारे के बड़े से इश्तहार में एक लड़की की तस्वीर है जिसके टी-शर्ट पर एक मोबाइल नंबर लिखा है और लिखा है- कॉल मी।
कुछ दिन पहले खबर थी कि मोबाइल फोन कंपनियां अब उन लोगों के लिए फोन मुफ्त कर देंगी जो लोग कुछ विज्ञापनों को पाना मंजूर कर लेंगे। यह सेवा कुछ वैसी ही हो जाएगी जैसी कि कुछ देशों के मुफ्त अखबारों में है। वहां वसूली विज्ञापनदाता से होती है और अखबार लाखों की संख्या में छापकर ट्रेनों, बसों में रख दिए जाते हैं।
मुफ्त मोबाइल फोन सेवा उन फ्री टेलीविजन चैनलों सी भी होगी जो विज्ञापनों से कमाई करते हैं और प्रसारण मुफ्त में देते हैं।
भारत में सरकार ने टेलीफोन नियमों को ढीला किया है जिससे उम्मीद है कि मोबाइल कॉल दस पैसे मिनट तक हो जाएगी। इसके बाद शायद ऐसे एसएमएस मुफ्त हो जाएंगे, जिनके नीचे किसी विज्ञापन को चस्पा करने की छूट कंपनियों को मिल जाए। फिर शायद घंटी की आवाज की जगह इश्तहार और फोन पर सुनाई देने वाले रिंग टोन की जगह इश्तहार आकर सामान बेचने लगेंगे और लोगों को कॉल करने, कॉल पाने से कमाई भी होने लगेगी।
टेलीफोन का इस्तेमाल जिंदगी को बदल चुका है। खासकर उस तबके की, जो कि फोन का इस्तेमाल करता है। लोगों के सामाजिक संबंधों को तो अब फोन उस तरह से नियंत्रित कर रहा है कि जिस तरह बाहर से आई बहू घर के तौर-तरीकों पर कब्जा कर ले और सब कुछ उसकी मर्जी से चलने लगे। आज लोगों का मिलना-जुलना, उठना-बैठना, टेलीफोन तय करने लगा है और उसमें भी मोबाइल फोन।
अब ताजा खबर यह है कि 'नोमोफोबियाÓ नाम की एक ऐसी मानसिक स्थिति मनोचिकित्सकों ने पाई है जिसमें कोई व्यक्ति फोन की बैटरी-चार्जिंग खत्म हो जाने पर, या फोन रेंज के बाहर हो जाने पर, या फोन का टॉक-टाईम खत्म हो जाने पर लोग दहशत में घिर जाते हैं। पहले ही कुछ सौ किस्म के फोबिया थे, लेकिन यह नया 'नोमोफोबियाÓ (नो मोबाइल फोबिया) सबसे आगे निकल जा रहा है।
दरअसल टेलीफोन पर, और खासकर मोबाइल फोन पर लोग इतने अधिक टिक गए हैं कि वे घर-दफ्तर से निकलते हुए पूरा काम करके नहीं निकलते कि रास्ते से फोन करके वे काम निपटा लेंगे। और यह अधूरापन अंतहीन तनाव पैदा करते चलता है। लोगों ने जिंदगी को इस तरह ढाल लिया है कि उनके बहुत से काम उनके फोन के शुरू रहने पर हो सकते हैं, और बंद होने पर तबाह भी हो सकते हैं। एक वक्त पुलिस के वायरलेस का यह काम होता था लेकिन आज तो रिक्शेवाले को, या रद्दी वाले को बुलाने के लिए भी फोन लगता है और घर के करीब पहुंचने पर खाना लगाने के लिए लोग फोन करने लगे हैं।
मोबाइल फोन ने लोगों की जिंदगी 24 गुणा 7 कर दी है और जब फोन काम नहीं करता तो उसे वक्त, उतनी देर तो लोग दहशत में आ ही जाते हैं। ऐसा वक्त न आ जाए यह सोचकर बाकी वक्त भी कई लोग अपने फोन को देखते रहते हैं कि कोई कॉल मिस तो नहीं हो गई? कोई मैसेज तो मिस नहीं हो गया? यह नया नंबर किसका है? इसकी कॉल पर अभी क्या जवाब दूं? मेरे फोन को बच्चे देख रहे थे उस पर वयस्क लतीफा तो उन्होंने नहीं देख लिया? उस पर की ब्लू फिल्म तो उन्होंने नहीं देख ली?
एक नई तकनीक, नए सामान और नई सेवा ने लोगों को अभूतपूर्व सहूलियत तो दी है, लेकिन अभूतपूर्व तनाव भी खड़ा कर दिया है। अब होली-दीवाली भी लोगों के रिश्ते इस बात पर टिक गए हैं कि वे एसएमएस पर मौजूद हैं या नहीं। बूढ़े भी जवाब देना सीख रहे हैं और जवान अधेड़ों से अश्लील या सेक्सी संदेशों का रिश्ता आसानी से बना लेते हैं। अफसरों के जिस तबके में दो बरस से अधिक सीनियर को सिर्फ सर या मैंडम कहकर ही बात होती है, वहां भी दस-दस बरस सीनियरों के साथ ऐसे एसएमएस बिना झिझक आते-जाते हैं।
यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि इस औजार ने लोगों के बीच हास्यबोध बढ़ा दिया है क्योंकि लोग आए हुए संदेशों को ही दस-बीस गुना लोगों में फैलाते हैं, और इनकी शुरूआत शायद मोबाइल कंपनियां खुद ही करती हैं। लेकिन जिंदगी का रूख इससे बदल गया है।
मोबाइल फोन से किस तरह का फर्क पडऩे वाला है यह सर्विस के रेट और हैंडसेट के वेट से भी तय होने जा रहा है। अभी-अभी मेरे बेटे ने नसीहत वाला इतना लंबा मैसेज मुझे भेजा कि वह एक चि_ïी जैसा था। आजकल के बड़े फोन की मेहरबानी से वह एक बार में आ भी गया।
आपकी जिंदगी में अगर मोबाइल फोन है तो मुझे आप पर पड़ा फर्क इस नंबर पर एसएमएस कर सकते हैं- 098936-25000
(अभी इस पर इनकमिंग कॉल से कमाई शुरू नहीं हुई है)।
- सुनील कुमार