सेक्स की तरफदारी में ही समझदारी है

16 मार्च 08
अमरीका में न्यूयॉर्क राज्य के गवर्नर (मुख्यमंत्री सरीखा पद, राज्यपाल जैसा नहीं) इलियट स्पिट्जर को इस्तीफा देना पड़ा। वहां की जांच एजेंसी एफबीआइ्र ने वेश्यावृत्ति के एक रैकेट का भंडाफोड़ किया जिसमें इंटरनेट, टेलीफोन नंबर, मैसेज, कॉल और बैंक के मार्फत भुगतान करने वाले ग्राहक पकड़ाए, इनमें यह गवर्नर भी पकड़ाया जो न्यूयॉक्र का एक सफल सरकारी वकील था और बरसों अपराधियों को सजा दिलाते आया था। कॉलगर्ल के जिस धंधे का वह एक से अधिक बार ग्राहक बना उसमें हजारों डॉलर प्रति घंटे फसी, और बाकी तमाम खर्चों वाला इंतजाम था। तीन बेटियों के पिता इस पति को शर्मिंदगी के साथ इस्तीफा देना पड़ा है। आगे की कानूनी कार्रवाई अभी बाकी ही है।
यह घटना एक दूसरे किस्म की घटना याद दिलाती है जिसमें अमरीका राष्टï्रपति बिल क्लिंटन के शारीरिक संबंध अपनी ही एक मातहत युवती मोनिका लेविंस्की से हो गए थे और इसे लेकर क्लिंटन ने जांच में झूठा जवाब दिया, जिसे लेकर अमरीकी संसद में उन पर महाभियोग चला।
ताकत की जगहों पर बैठे राजाओं, व्यापारी और उद्योगपतियों, जजों और अफसरों के इर्द-गिर्द एक आभामंडल विकसित हो जाता है। कभी वह धनबल से तो कभी पद की महिमा से, कभी अहसान करने की ताकत से तो कभी शोहरत से, ताकतवर लोगों के लिए यह आसान हो जाता है कि वे देहसुख पा सकें। फिल्मी सितारे, खिलाड़ी, गायक, इसे कई बार मुफ्त में पाते चलते हैं, लेकिन कुछ लोगों को इन तमाम नेमतों के बावजूद यह शौक रहता है कि वे खरीदे सेक्स का भी मजा उठाएं।
दो ही दिन हुए हैं, इंग्लैंड के एक चर्च ने सेक्स को लेकर अपनी सदियों की चुप्पी को तोड़ा और एक लंबा दस्तावेज जारी किया कि सेक्स किस तरह प्रकृतिक दिया हुआ उपहार है और कैसे शादीशुदा जोड़ों को भी आपसी संतुष्टिï के लिए एक-दूसरे का ख्याल रखना चाहिए, वरना तलाक की नौबत भी आती है।
चर्च सेक्स को केवल इंसानी नस्ल को आगे बढ़ाने का काम ही मानते आया था और इसीलिए वह समलैंगिकता को अपराध भी मानते रहा क्योंकि उससे कुछ पैदा नहीं होता। दूसरी तरफ चर्चा का नजरिया सेक्स के प्रति बड़ा बागी रहा और धर्म में जगह-जगह अनुत्पादक सेक्स को पाप माना गया। बाकी कई धर्मों में भी सेक्स को पाप बताने की एक मूर्खतापूर्ण हरकत चलती आई है। हिंदू धर्म में सेक्स को विषय, वासना जैसी कई गालियां देते हुए जगह-जगह कहा भजन-प्रार्थना में कहा गया है कि ईश्वर पापी वासना से बचाए।
ईसाइ्र धर्म के पादरियों ने जगह-जगह अपने सेक्स के लिए चर्च के स्कूल-हॉस्टल में छोटे बच्चों का इंतजाम कर रखा है और सम्पन्न अमरीका के सम्पन्न चर्च, अपने ऐसे सेक्स कुकर्मांे के लिए हजारों करोड़ रुपए का जुर्माना चुकाते हैं। भारत में गुजरात में स्वामीनारायण सम्प्रदाय के कितने ही साधुओं पर बलात्कार के मुकदमे चल रहे हैं और उनकी सेक्स फिल्में वहां गांव-गांव बिकती हैं। बहुत से बाकी धर्मों, सम्प्रदायों का भी कमोबेश यही हाल है, हालांकि लगभग हर धर्म के पास स्वर्ग और नर्क की अपनी-अपनी किस्म की तस्वीरें हैं। इन तस्वीरों को दिखाकर धर्म लोगों में सेक्स के प्रति नफरत पैदा करने में लगे रहते हैं कि इस जन्म में अगर वासना के चंगुल में फंसे तो मरने के बाद नर्क तय है, वरना स्वर्ग मिलेगा।
यह कैसा विरोधाभास है कि प्रकृति का बनया सेक्स-सुख का स्वर्ग छोड़कर यह पूरी जिंदगी कुंठा में प्यासे गुजारो, ताकि मरने के बाद स्वर्ग मिले!! मरने के बाद का तो किसने देखा है, लेकिन ब्रम्हकुमारियों का एक आध्यात्मिक संगठन पति-पत्नी को भाई-बहन की तरह रहने की नसीहत बांटता है। पति-पत्नी, भाई-बहन की तरह रहेंगे तो देह ही जरूरतें समाज में तलाक बढाएंगी, विवाहेत्तर, संबंध बढ़ाएंगे, बच्चों का यौन शोषण बढाएंगी और वेश्यावृत्ति बढाएंगी।
अमरीका के गवर्नर इलियट की इडियट हरकत के पीछे जीवन साथी से असंतुष्टिï, अधिक देह सुख की चाह, वर्जित फल का स्वाद चखने का रोमांच जैसी बहुत सी बातें हो सकती हैं। अमरीका में भी ब्रिटेन की ही तरह कुआंरा मातृत्व बढ़ रहा हे, विवाह अधिक टूट रहे हैं, कल की ही खबर है कि हर चौथी अमरीकी लड़की यौन रोग ग्रस्त है (हालांकि आंकड़ा कुछ अविश्वसनीय है)। जब कभी धर्म या अध्यात्म अपने लोगों को प्राकृतिक जरूरतों पर अप्राकृतिक नियंत्रण सुझाता है, उन पर लादता है तो उससे अनुयायियों का निजी जीवन इसी तरह तबाह होता है।
कामसूत्र ने भारत में सैकड़ों बरस पहले सेक्स में विविधता का एक पूरा इन्द्रधनुष तान दिया था। उन चौरासी आसनों की मदद से दो वयस्क लोग एक-दूसरे की जटिल विविध अनोखी जरूरतों को भी पूरा करने के लायक रह सकते थे। उसको एक पाखंडी सोच ने अनैतिक करार देकर कहीं कंडोम को रोका, तो कहीं सेक्स शिक्षा को। नतीजा यह निकला कि किसी देश के जवान खुलकर यौन-अराजकता के साथ जीने लगे, तो कहीं कुंठाओं के चलते अपूरित इच्छाएं मानसिक रोग बन गईं और समाज बीमार होकर बाबा, तांत्रिक, मंतर के चक्कर में पड़ गया।
ये वही चर्च है तो अभी हाल तक कंडोम का भी विरोधी था, लेकिन बढ़ती बीमारियों, बढ़ते अवांछित गर्भ देखकर उसने हड़बड़ाकर अपना रूख बदला। अब वह अपना पाखंड छोड़कर सेक्स की वकालत कर रहा है। आखिर चर्च की अपनी दूकान भी तो तभी चलेगी जब उसके मेम्बर स्वस्थ और जिंदा रहेंगे, जब उनकी शादियां होंगी और परिवार बचेंगे। अपने पापी पेट को बचाने के लिए चर्च एकदम से उदार हुआ है। भारत के पाखंडी लोगों को कामसूत्र पर से धूल झड़ाने में पता नहीं अभी सौ-पचास बरस, कितने लगेंगे।
-सुनील कुमार

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