2 मार्च 08
एक प्रमुख अमरीकी पत्रिका 'टाइमÓ में एक बड़ा दिलचस्प लेख आया है। लोग फ्लर्ट क्यों करते हैं? इसे हिंदी में कहें तो मतलब यह कि लोग लाइन क्यों मारते हैं? कुआरों की यह हरकत तो जायज है क्योंकि जीवनसाथी की तलाश में उनको तो एक सिलसिले की शुरूआत करनी ही है, लेकिन शादीशुदा लोग भी फ्लर्ट क्यों करते हैं? वे तो जीवनसाथी पा चुके हैं और अगली पीढ़ी पैदा करने की प्राकृतिक जिम्मेदारी पूरी कर लेने के बाद, अच्छा जीवनसाथी पा लेने के बाद भी लोग कम अच्छे या कम अच्छी को देखकर लाईन क्यों मारने लगते हैं?
इस लेख की बातों पर आगे चर्चा करने के पहले इसकी वैज्ञानिक बातों पर कुछ चर्चा करना चाहिए जो कि पाठकों की दिलचस्पी की होंगी।
फ्लर्ट करने का मतलब जुबान से कुछ कहना जरूरी नहीं होता। किसी को देखकर चेहरे पर वैसे भाव आ जाना, आंखों में वह रंग उतर आना भी लाइन मारना होता है। जब आप किसी से बात करते हुए उसकी ओर झुकने लगते हैं, और एडिय़ां हवा की तरफ उठने लगती हैं, और आप अपने पंजों पर आने लगते हैं। जरा सोचें कि आपकी भौहें, आपकी मुस्कराहट पर कब एक फर्क दिखने लगता है। अगर आप महिला हैं तो याद करें कि कब किसी पुरुष से बात करते हुए आप अपने सिर को इस तरह घुमाने लगती हैं कि आपके चेहरे, गरदन का एक बेहतर पहलू सामने आए। अगर आप पुरुष हैं तो आप कब सांस खींचकर पेट को भीतर करने लगते हैं, या कसरती बदन को सामने रखने लगते हैं।
वैज्ञानिक इनको संपर्क के लिए तैयार स्थिति कहते हैं क्योंकि बिना शब्दों के भी ये हलचलें बताती हैं कि आप कुछ अधिक संपर्क के लिए तैयार हैं। ये सारे कहे-अनकहे इशारे विज्ञान की जुबान में विपरीत लिंग वाले से संबंध कायम करने की शुरूआत बताते हैं। जिसे किसी बोलचाली हिंदुस्तानी में कहा जा सकता है- आंग पर आना... (कमिंग ऑन टू समवन)।
बहुत साधारण जुबान में कहें तो ये ऐसे शारीरिक इशारे होते हैं कि आप सामने वाले पर हावी होना नहीं चाहते, और न ही छोड़कर जाना चाहते हैं। लाईन मारने की कुछ अटपटी लडख़ड़ाती जुबान शुरू होने के पहले की यह इशारेबाजी बड़ी मायने रखती है। ये शुरूआत की शुरूआत होती है।
लाईन मारने के पीछे की एक वजह यह है कि हम इसके बिना रह नहीं सकते। हम बने ही इस हिसाब से हैं, चाहे जीवविज्ञान कहें या सामाजिक संस्कृति, इन्होंने हमें ढाला ही इस हिसाब से है। जीवविज्ञान वाले हिस्से पर तो बहुत सी रिसर्च हुई हैं। जर्मनी के एक विख्यात शोध संस्थान ने 1960 में अफ्रीकी आदिवासियों पर शोध किया था और पाया था कि वहां भी महिलाएं उसी तरह सिर जरा सा झुका कर देर तक आंखों में आंखें डालती थीं जैसा कि शोधकर्ता ने अमरीका में देखा था।
इंसानी पीढिय़ों के विकास के विशेषज्ञ जीवविज्ञानी बताते हैं कि जो लोग ऐसी लाईन मारने में अधिक काबिल रहते हैं, ऐसा करते हैं, वे एक साथी पाने में और अगली पीढ़ी तैयार करने में अधिक सफल रहते हैं। और इसीलिए यह व्यवहार सभी इंसानों में फैल गया। सामाजिक मनोविज्ञान के एक विशेषज्ञ का कहना है कि बहुत से लोग यह महसूस करते हैं कि जुबान खोले बिना बोलने की, बिना सरहदों वाली जुबान, फ्लर्टिंग ही है।
ये मनोवैज्ञानिक अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में अभी ये अध्ययन कर रहे हैं कि किसी महिला के ओवुलेशन (अंडा बनने) की साइकिल (चक्र) के वक्त आकर्षण और फ्लर्टिंग का क्या असर पड़ता है। उनका शोध सुझाता है कि जब महिला के शरीर में ओवुलेशन होता रहता है (ओवम यानी डिम्ब यानी अंडा बनना), तब उसके साथ की गई फ्लर्टिंग, या उसे मारी गई लाईन से वे अधिक आकर्षित होती हैं। उन्हें एक छोटे दौर में अधिक प्रभावित करने वाले पुरुष, मतलब फ्लर्ट करने वाले, उस वक्त अधिक पसंद आते हैं। यहां पर शोधकर्ता इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों तक अधिक नहीं पहुंच पाया लेकिन एक तथ्य यह है कि जब महिला के शरीर में ओवम बनता रहता है तब शारीरिक संपर्क से उसके गर्भवती होने की संभावना अधिक रहती है और फ्लर्ट करने वाले से वे लाईन मारने वाली जीन्स भी संतान में आ जाती हैं, जिनसे कि उन संतानों की भी अधिक संतानें होंगी।
हालांकि यह बात भी अपनी जगह है कि यह सोचा-समझा नहीं होता है, ठीक वैसे ही जैसे फ्लर्टिंग हमेशा सोची-समझी नहीं होती है। जुबान से बोलचाल शुरू होने के पहले तक बहुत से लोगों को शायद इसका अहसास भी नहीं रहता कि वे लाईन मार रहे हैं। लोग चूंकि दूसरों से बात करते हुए अपने-आपको देखते नहीं रहते, इसलिए उन्हें अंदाज नहीं रहता कि वे अंखियों से किस तरह गोली मार रहे हैं, नजरों से निकली बर्छियां किसे किस तरह घायल कर रही हैं।
लेकिन कुछ लोग एक मकसद के साथ फ्लर्ट करते हैं, सोच-समझकर, इरादतन। जब लोग लाईन मारते हुए जुबानी जमाखर्च करने लगते हैं, तो फिर तो वह इरादतन ही होता है।
और कुछ लोग ऐसा सोचने वाले भी होते हैं कि इसमें गलत कुछ भी नहीं है। इस खेल में कैसे पैर धरे जाएं यह सब जानते हैं। एक-दूसरे शोधकर्ता का निष्कर्ष है कि लोग खुलकर लाईन मार सकते हैं, बिना किसी मकसद के। यह शोधकर्ता पिछले तीस बरस से फ्लर्टिंग पर काम कर रहा है। उसका निष्कर्ष यह है कि फ्लर्टिंग सामने वाले व्यक्ति में दिलचस्पी पैदा करती है और उकसाती है कि इस खेल को खेलने में उसकी दिलचस्पी है क्या? इस खेल का सबसे रोमांचक पहलू यह होता है कि इसमें सामाजिक अंतरसंबंधों के नियम लचीले हो जाते हैं।
फ्लर्टिंग से संभावनाओं का एक आसमान ही खुल जाता है। हाँ और ना के बीच की संभावनाएं। इस शोधकर्ता का कहना है कि लोग लाईन मारते हुए 'शायदÓ पर टिके इस जटिल खेल में उलझ जाते हैं। यह खेल कोई नया नहीं है और फ्लर्ट कैसे किया जाए इस पर पहली गाइड करीब 2000 बरस पहले लिखी गई थी। तब से लेकर अब तक अनगिनत ऐसी किताबें आई हैं। अभी एक किताब आई है- ''आप चाहे कैसे भी दिखते हों, ऐसी खूबसूरत औरत को कैसे पटाएं जिसे पाने की आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।ÓÓ
एक बार जब हम 'शायदÓ वाले इस खेल को समझ लेते हैं तो यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा ही बन जाता है। जब इस खेल को खेलने की जरूरत नहीं रह जाती, तब भी हम इसे खेलते रह जाते हैं क्योंकि हम इसे दूसरे खेलों के मुकाबिले बेहतर खेलने लगते हैं। जिस तरह लोग रेस्तरां या बिजनेस मीटिंग में खास किस्म का व्यवहार करना सीख जाते हैं, उसी तरह लोग विपरीत सेक्स के व्यक्ति को लाईन मारने के तौर-तरीके सीखे लेते हैं। कुछ लोग इसमें इतने माहिर हो जाते हैं कि दूसरों के साथ बर्ताव करने के लिए उन्हें व्यवहार का यह एक आसान तरीका लगता है। मतलब यह कि जब कोई तरीका न सूझे, फ्लर्ट करने लगो।
यह एक और बात है कि ऐसा करने वाले अधिकांश लोग ऐसे नहीं होते कि उन्हें विपरीत सेक्स के व्यक्ति के बर्ताव का कोई और तरीका न सूझता हो। वे उत्सुकता में भी ऐसा करते हैं। फ्लर्टिंग एक किस्म से अपना यौन आकलन भी होता है और विकल्पों की तलाश भी। यह मानना है न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के साइकोलॉजी के एक प्रोफेसर का। मानव विकास के विशेषज्ञ जीव वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि इसके फायदे बड़े साफ हैं, जीवनसाथी आगे-पीछे मर सकते हैं और बच्चे भी मर सकते हैं। इसलिए इंसानी बदन, दिल-दिमाग आगे की संभावनाओं को खुला रखकर चलते हैं। फ्लर्टिंग एक किस्म से शारीरिक जोड़ीदारी के लिए बीमे की तरह होता है।
और बुरे से बुरा यह हो सकता है कि आप फ्लर्टिंग में कामयाब न हों (हालांकि इसकी आशंका कम ही होती है) तो उससे भी आपका अपने जीवनसाथी, जोड़ीदार की नजरों में एक नया महत्व पैदा हो जाता है। इससे एक अलग तरह का फायदा तय होता है। मतलब यह कि लाइन मारने से या तो बाहर फायदा होता है या घर में!! मतलब यह कि यह विन-विन सिचुएशन है।
फ्लर्टिंग एक ऐसा भावनात्मक हथियार भी है जिसे शुक्रिया की तरह किसी छोटे-मोटे अहसान के एवज में दिया जा सकता है। भीड़ भरी दूकान में पहले सामान पाने के लिए कोई महिला अपनी आवाज और आंखों में कब कैसा नशा भरकर काम निकलवा लेती है, उसे पता भी नहीं लगता कि कब उसकी आदत में शुमार हो गया। दूसरी तरफ कब कोई सेल्समैन निगाहों, बातों और आवाज में तारीफ भरकर किसी महिला को सामान बेचने में सफल हो जाता है, इसे पारखी ही समझ सकते हैं, हालांकि यह होते रोज चलता है। किसी भरे रेस्तरां में टेबिल पाने के लिए या खरीदा सामान लौटाने के लिए महिलाएं वह कातिल मुस्कराहट मानो जवान होते ही पा लेती हैं।
फ्लर्टिंग एक किस्म से समाज की मशीन के पुर्जों के लिए चिकनाई का काम भी करता है। रोजमर्रा के व्यवहार में लाने कुप्पी से तेल न डाला, लाईन मार दी। लेकिन ऐसी फ्लर्टिंग किसी रोमांटिक नीयत से की गई होने के बजाय एक बख्शीश या शुक्रिया की तरह होती है, पहले हुई तो नजराना, बाद में हुई तो शुकराना।
क्या आपने कभी ऐसा पुरुष हेयर ड्रेसर या टेलर देखा है जो फ्लर्ट न करता हो? इससे औरतें वहां से कुप्पा होकर निकलती हैं और वापिस जल्दी लौटती हैं। आपने सब्जी बाजार में कई सेठों को रोज पहुंचकर कुछ खास सब्जीवालियों से चुहलबाजी करते देखा होगा, फिर चाहे जिंदगीभर दोनों के बीच कई टोकरियां हमेशा ही बनी रहें।
लेकिन पेशे और काम धंधे के सिलसिले को छोड़ दें तो बाहर बातें इतनी मासूम भी नहीं रहतीं। गलत समय पर गलत तरह से फ्लर्ट करें और थप्पड़ से लेकर अदालती कार्रवाई तक आपके लिए तैयार हैं। और अमरीका जैसे देश में भी जहां अनौपचारिक साफगोई को जीवनशैली माना जाता है, वहां भी यह जीवन शैली फ्लर्टिंग नाम के उस खेल में खास मददगार नहीं होती जिसकी पूरी रचना ही धुंध के साथ हुई है।
कुछ दूसरी रिसर्च फ्लर्टिंग का स्याह पहलू भी बताती हैं। यह जरा सी सरहद पार करते ही शोषण में बदल सकती है या जान-पहचान के भीतर बलात्कार में भी। आमतौर पर तो फ्लर्टिंग तब थम जाती है जब सामने के भागीदार से सकारात्मक जवाब नहीं मिलता है। लेकिन इस शोधकर्ता का कहना है कि कुछ लोग मनाही के संकेत समझ नहीं पाते, कुछ समझने से इंकार ही कर देते हैं क्योंकि वे इस बात को सुनना ही नहीं चाहते।
(अमरीका जैसी दुनिया ने संदर्भ में) आज डिजिटल दुनिया फ्लर्टिंग की सबसे बड़ी जमीन बन गई है। यह वह जगह है जहां शब्द ही शब्द हैं और शरीर की भाषा की कोई जरूरत नहीं, चाहे इंटरनेट पर ऑनलाइन रहे या टेलीफोन पर एसएमएस। और चूंकि इन दोनों जरियों से फ्लर्टिंग करने के लिए आंखों में आंखें डालने की जरूरत नहीं रहती, यह अधिक रफ्तार से, अधिक दुस्साहस से और बिना अधिक सोचे विचार रहती है।
डिजिटल शब्दों से फ्लर्टिंग सबको मोह लेती है, हालांकि अब तक इस पर अधिक शोध नहीं हुआ है लेकिन एक बात साफ है कि इंटरनेट पर लोग अब अनजाने लोगों से अपनी निजी बातें अधिक खुलकर करते हैं और इससे फ्लर्टिंग की रफ्तार बढ़ जाती है।
याहू की फ्लर्टिंग वेबसाइट, जैसे- मैरिड एंड फ्लर्टिंग, या फ्लर्टिंग ई-मेल गु्रप या मैरिड बट प्लेयिंग डॉट कॉम और मैरिड-बट-फ्लर्टिंग.कॉम को देखें तो लगेगा कि यहां फ्लर्टिंग का मतलब है उत्तेजक (या गंदी) बातें करना। अमरीका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी ने इंटरनेट के ऐसे एक चैट रूम के 86 लोगों की बातचीत पर अध्ययन प्रकाशित किया है। इसमें बात करने वाले लगभग सभी लोगों का मानना था कि वे शुरू में यह महसूस करते थे कि वे एक कम्प्यूटर से ही फ्लर्ट कर रहे हैं, लेकिन बाद में करीब एक तिहाई लोगों की रूबरू मुलाकात अपने चैट-पार्टनरों से हुई। और इनमें से दो को छोड़कर बाकी तमाम जोड़ों के बीच बात में कुछ चक्कर भी चला।
इंटरनेट से परे असली जिंदगी में फ्लर्ट करने वाले लोगों में से अधिकांश कोई अफेयर (प्रसंग) नहीं चाहते। लेकिन एक बात शादीशुदा लोगों की फ्लर्टिंग को अकेले लोगों की फ्लर्टिंग से अलग करती है। शादीशुदा लोगों के लाईन मारने से अधिक खतरे जुड़े रहते हैं और इसके साथ सपनीली कल्पनाएं भी अधिक जुड़ी रहती हैं। इसमें दांव पर भी काफी अधिक लगा होता है और खतरे भी अधिक जुड़े होते हैं, चाहे कुछ होने की संभावनाएं कम ही क्यों न हों। पर इसका नशा सिर अधिक चढ़ता है।
मनोचिकित्सक कहते हैं कि जिन लोगों के अपने जोड़ीदार से परे चक्कर होते हैं, वे अपने जोड़ीदार से उतने असंतुष्टï नहीं रहते कि उनके साथ जिंदगी तबाह ही हो गई। मतलब यह कि बाहर बेईमानी से चुराकर हासिल जरा सी खुशी, घर के गम को कम कर देती है। जब कोई आपके प्यार में पड़ जाता है या आप पर फिदा हो जाता है तो आप-आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे- अंदाज में चलने लगते हैं।
फ्लर्टिंग एक निरापद नशे सी है जिसमें लोग अपने-आपको अधिक जिंदा महसूस करने लगते हैं। जिसे आप चाहते हैं, उसे ठेस पहुंचाए बिना आप किसी और जगह से ऐसा महत्व पाते हैं जिससे आप अपने को बेहतर महसूस करने लगते हैं।
'टाईमÓ पत्रिका में छपे बेलिन्डा लश्कॉम्ब के लिए इस लेख का मैंने काफी कुछ हिस्सा अपनी जुबान में यहां पेश किया है। अपनी बात लिखने की इस जगह पर मैंने किसी और की बात को खुलासे से इसलिए लिखा कि बहुत सी वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रिसर्च पर आधारित इस महत्वपूर्ण लेख की टुकड़ा-टुकड़ा बातों का गुमनाम जिक्र करके अपने नाम से लिखना बेईमानी होती। किसी विषय पर अधिक जानकार का बेहतर लिखा पेश करके मैं आगे अपनी बात ठीक से रख सकता हूँ।
हिंदुस्तानी समाज में गरीब अपनी पसीनासनी थकान के चलते, मध्यमवर्गीय अपने सपनों से लड़ते और सम्पन्न लोग ऐशोआराम के मुर्दा सामानों को जिंदा लोगों से बेहतर समझते हुए, रोमांस से भी दूर बसे बैठे दिखते हैं। कम ही जोड़े ऐसे होते हैं जो अपनी सांसों और बदन की बदबुओं को भी दूर करने के बारे में चौकन्ने रहते हों। शादी के पहले की मोहब्बत मुखौटों के मुकाबिले का दौर होता है और शादी के साथ ही मुखौटे उतर जाते हैं कि अब अच्छा बनकर दिखाने की कोई बेबसी तो है नहीं!
बहुत से जोड़ों में औरत, बच्चे और खाना, घर की सफाई और बूढ़ों को दवाई देकर, जिम्मा पूरा समझती है और आदमी कमाकर लाकर देने को सब कुछ मान लेता है। जब जिंदगी ऐसी नीरस हो जाए तो उसमें बाहर जहां कहीं, जो कोई जरा सा रस डाले, वह तुरंत सोख लिया जाता है। मैं इस मुद्दे पर इतना लंबा (लिखा नहीं) पेश कर रहा हूँ क्योंकि मुर्दादिल लोग चौकन्ने हो जाएं कि उनकी नीरस जीवन शैली के बीच कब उनके जीवनसाथी या जोड़ीदार पर कोई रंग बरसाने लगे और गोरी का यार खाने लगे। प्यार, महत्व, देह या लाईन मारने वाले की मिसाल समझानी हो तो मनीप्लांट कहे जाने वाले फिलाडेंड्रान पौधे को देखें, पानी की तलाश में उसकी जड़ें कई फीट लंबी होकर तलाश करने लगती हैं। इस हफ्ते मेरी खुद की लिखी बस जरा सी असहमति भारतीय जीवनशैली के एक हिस्से से।
-सुनील कुमार
एक प्रमुख अमरीकी पत्रिका 'टाइमÓ में एक बड़ा दिलचस्प लेख आया है। लोग फ्लर्ट क्यों करते हैं? इसे हिंदी में कहें तो मतलब यह कि लोग लाइन क्यों मारते हैं? कुआरों की यह हरकत तो जायज है क्योंकि जीवनसाथी की तलाश में उनको तो एक सिलसिले की शुरूआत करनी ही है, लेकिन शादीशुदा लोग भी फ्लर्ट क्यों करते हैं? वे तो जीवनसाथी पा चुके हैं और अगली पीढ़ी पैदा करने की प्राकृतिक जिम्मेदारी पूरी कर लेने के बाद, अच्छा जीवनसाथी पा लेने के बाद भी लोग कम अच्छे या कम अच्छी को देखकर लाईन क्यों मारने लगते हैं?
इस लेख की बातों पर आगे चर्चा करने के पहले इसकी वैज्ञानिक बातों पर कुछ चर्चा करना चाहिए जो कि पाठकों की दिलचस्पी की होंगी।
फ्लर्ट करने का मतलब जुबान से कुछ कहना जरूरी नहीं होता। किसी को देखकर चेहरे पर वैसे भाव आ जाना, आंखों में वह रंग उतर आना भी लाइन मारना होता है। जब आप किसी से बात करते हुए उसकी ओर झुकने लगते हैं, और एडिय़ां हवा की तरफ उठने लगती हैं, और आप अपने पंजों पर आने लगते हैं। जरा सोचें कि आपकी भौहें, आपकी मुस्कराहट पर कब एक फर्क दिखने लगता है। अगर आप महिला हैं तो याद करें कि कब किसी पुरुष से बात करते हुए आप अपने सिर को इस तरह घुमाने लगती हैं कि आपके चेहरे, गरदन का एक बेहतर पहलू सामने आए। अगर आप पुरुष हैं तो आप कब सांस खींचकर पेट को भीतर करने लगते हैं, या कसरती बदन को सामने रखने लगते हैं।
वैज्ञानिक इनको संपर्क के लिए तैयार स्थिति कहते हैं क्योंकि बिना शब्दों के भी ये हलचलें बताती हैं कि आप कुछ अधिक संपर्क के लिए तैयार हैं। ये सारे कहे-अनकहे इशारे विज्ञान की जुबान में विपरीत लिंग वाले से संबंध कायम करने की शुरूआत बताते हैं। जिसे किसी बोलचाली हिंदुस्तानी में कहा जा सकता है- आंग पर आना... (कमिंग ऑन टू समवन)।
बहुत साधारण जुबान में कहें तो ये ऐसे शारीरिक इशारे होते हैं कि आप सामने वाले पर हावी होना नहीं चाहते, और न ही छोड़कर जाना चाहते हैं। लाईन मारने की कुछ अटपटी लडख़ड़ाती जुबान शुरू होने के पहले की यह इशारेबाजी बड़ी मायने रखती है। ये शुरूआत की शुरूआत होती है।
लाईन मारने के पीछे की एक वजह यह है कि हम इसके बिना रह नहीं सकते। हम बने ही इस हिसाब से हैं, चाहे जीवविज्ञान कहें या सामाजिक संस्कृति, इन्होंने हमें ढाला ही इस हिसाब से है। जीवविज्ञान वाले हिस्से पर तो बहुत सी रिसर्च हुई हैं। जर्मनी के एक विख्यात शोध संस्थान ने 1960 में अफ्रीकी आदिवासियों पर शोध किया था और पाया था कि वहां भी महिलाएं उसी तरह सिर जरा सा झुका कर देर तक आंखों में आंखें डालती थीं जैसा कि शोधकर्ता ने अमरीका में देखा था।
इंसानी पीढिय़ों के विकास के विशेषज्ञ जीवविज्ञानी बताते हैं कि जो लोग ऐसी लाईन मारने में अधिक काबिल रहते हैं, ऐसा करते हैं, वे एक साथी पाने में और अगली पीढ़ी तैयार करने में अधिक सफल रहते हैं। और इसीलिए यह व्यवहार सभी इंसानों में फैल गया। सामाजिक मनोविज्ञान के एक विशेषज्ञ का कहना है कि बहुत से लोग यह महसूस करते हैं कि जुबान खोले बिना बोलने की, बिना सरहदों वाली जुबान, फ्लर्टिंग ही है।
ये मनोवैज्ञानिक अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में अभी ये अध्ययन कर रहे हैं कि किसी महिला के ओवुलेशन (अंडा बनने) की साइकिल (चक्र) के वक्त आकर्षण और फ्लर्टिंग का क्या असर पड़ता है। उनका शोध सुझाता है कि जब महिला के शरीर में ओवुलेशन होता रहता है (ओवम यानी डिम्ब यानी अंडा बनना), तब उसके साथ की गई फ्लर्टिंग, या उसे मारी गई लाईन से वे अधिक आकर्षित होती हैं। उन्हें एक छोटे दौर में अधिक प्रभावित करने वाले पुरुष, मतलब फ्लर्ट करने वाले, उस वक्त अधिक पसंद आते हैं। यहां पर शोधकर्ता इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों तक अधिक नहीं पहुंच पाया लेकिन एक तथ्य यह है कि जब महिला के शरीर में ओवम बनता रहता है तब शारीरिक संपर्क से उसके गर्भवती होने की संभावना अधिक रहती है और फ्लर्ट करने वाले से वे लाईन मारने वाली जीन्स भी संतान में आ जाती हैं, जिनसे कि उन संतानों की भी अधिक संतानें होंगी।
हालांकि यह बात भी अपनी जगह है कि यह सोचा-समझा नहीं होता है, ठीक वैसे ही जैसे फ्लर्टिंग हमेशा सोची-समझी नहीं होती है। जुबान से बोलचाल शुरू होने के पहले तक बहुत से लोगों को शायद इसका अहसास भी नहीं रहता कि वे लाईन मार रहे हैं। लोग चूंकि दूसरों से बात करते हुए अपने-आपको देखते नहीं रहते, इसलिए उन्हें अंदाज नहीं रहता कि वे अंखियों से किस तरह गोली मार रहे हैं, नजरों से निकली बर्छियां किसे किस तरह घायल कर रही हैं।
लेकिन कुछ लोग एक मकसद के साथ फ्लर्ट करते हैं, सोच-समझकर, इरादतन। जब लोग लाईन मारते हुए जुबानी जमाखर्च करने लगते हैं, तो फिर तो वह इरादतन ही होता है।
और कुछ लोग ऐसा सोचने वाले भी होते हैं कि इसमें गलत कुछ भी नहीं है। इस खेल में कैसे पैर धरे जाएं यह सब जानते हैं। एक-दूसरे शोधकर्ता का निष्कर्ष है कि लोग खुलकर लाईन मार सकते हैं, बिना किसी मकसद के। यह शोधकर्ता पिछले तीस बरस से फ्लर्टिंग पर काम कर रहा है। उसका निष्कर्ष यह है कि फ्लर्टिंग सामने वाले व्यक्ति में दिलचस्पी पैदा करती है और उकसाती है कि इस खेल को खेलने में उसकी दिलचस्पी है क्या? इस खेल का सबसे रोमांचक पहलू यह होता है कि इसमें सामाजिक अंतरसंबंधों के नियम लचीले हो जाते हैं।
फ्लर्टिंग से संभावनाओं का एक आसमान ही खुल जाता है। हाँ और ना के बीच की संभावनाएं। इस शोधकर्ता का कहना है कि लोग लाईन मारते हुए 'शायदÓ पर टिके इस जटिल खेल में उलझ जाते हैं। यह खेल कोई नया नहीं है और फ्लर्ट कैसे किया जाए इस पर पहली गाइड करीब 2000 बरस पहले लिखी गई थी। तब से लेकर अब तक अनगिनत ऐसी किताबें आई हैं। अभी एक किताब आई है- ''आप चाहे कैसे भी दिखते हों, ऐसी खूबसूरत औरत को कैसे पटाएं जिसे पाने की आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।ÓÓ
एक बार जब हम 'शायदÓ वाले इस खेल को समझ लेते हैं तो यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा ही बन जाता है। जब इस खेल को खेलने की जरूरत नहीं रह जाती, तब भी हम इसे खेलते रह जाते हैं क्योंकि हम इसे दूसरे खेलों के मुकाबिले बेहतर खेलने लगते हैं। जिस तरह लोग रेस्तरां या बिजनेस मीटिंग में खास किस्म का व्यवहार करना सीख जाते हैं, उसी तरह लोग विपरीत सेक्स के व्यक्ति को लाईन मारने के तौर-तरीके सीखे लेते हैं। कुछ लोग इसमें इतने माहिर हो जाते हैं कि दूसरों के साथ बर्ताव करने के लिए उन्हें व्यवहार का यह एक आसान तरीका लगता है। मतलब यह कि जब कोई तरीका न सूझे, फ्लर्ट करने लगो।
यह एक और बात है कि ऐसा करने वाले अधिकांश लोग ऐसे नहीं होते कि उन्हें विपरीत सेक्स के व्यक्ति के बर्ताव का कोई और तरीका न सूझता हो। वे उत्सुकता में भी ऐसा करते हैं। फ्लर्टिंग एक किस्म से अपना यौन आकलन भी होता है और विकल्पों की तलाश भी। यह मानना है न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के साइकोलॉजी के एक प्रोफेसर का। मानव विकास के विशेषज्ञ जीव वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि इसके फायदे बड़े साफ हैं, जीवनसाथी आगे-पीछे मर सकते हैं और बच्चे भी मर सकते हैं। इसलिए इंसानी बदन, दिल-दिमाग आगे की संभावनाओं को खुला रखकर चलते हैं। फ्लर्टिंग एक किस्म से शारीरिक जोड़ीदारी के लिए बीमे की तरह होता है।
और बुरे से बुरा यह हो सकता है कि आप फ्लर्टिंग में कामयाब न हों (हालांकि इसकी आशंका कम ही होती है) तो उससे भी आपका अपने जीवनसाथी, जोड़ीदार की नजरों में एक नया महत्व पैदा हो जाता है। इससे एक अलग तरह का फायदा तय होता है। मतलब यह कि लाइन मारने से या तो बाहर फायदा होता है या घर में!! मतलब यह कि यह विन-विन सिचुएशन है।
फ्लर्टिंग एक ऐसा भावनात्मक हथियार भी है जिसे शुक्रिया की तरह किसी छोटे-मोटे अहसान के एवज में दिया जा सकता है। भीड़ भरी दूकान में पहले सामान पाने के लिए कोई महिला अपनी आवाज और आंखों में कब कैसा नशा भरकर काम निकलवा लेती है, उसे पता भी नहीं लगता कि कब उसकी आदत में शुमार हो गया। दूसरी तरफ कब कोई सेल्समैन निगाहों, बातों और आवाज में तारीफ भरकर किसी महिला को सामान बेचने में सफल हो जाता है, इसे पारखी ही समझ सकते हैं, हालांकि यह होते रोज चलता है। किसी भरे रेस्तरां में टेबिल पाने के लिए या खरीदा सामान लौटाने के लिए महिलाएं वह कातिल मुस्कराहट मानो जवान होते ही पा लेती हैं।
फ्लर्टिंग एक किस्म से समाज की मशीन के पुर्जों के लिए चिकनाई का काम भी करता है। रोजमर्रा के व्यवहार में लाने कुप्पी से तेल न डाला, लाईन मार दी। लेकिन ऐसी फ्लर्टिंग किसी रोमांटिक नीयत से की गई होने के बजाय एक बख्शीश या शुक्रिया की तरह होती है, पहले हुई तो नजराना, बाद में हुई तो शुकराना।
क्या आपने कभी ऐसा पुरुष हेयर ड्रेसर या टेलर देखा है जो फ्लर्ट न करता हो? इससे औरतें वहां से कुप्पा होकर निकलती हैं और वापिस जल्दी लौटती हैं। आपने सब्जी बाजार में कई सेठों को रोज पहुंचकर कुछ खास सब्जीवालियों से चुहलबाजी करते देखा होगा, फिर चाहे जिंदगीभर दोनों के बीच कई टोकरियां हमेशा ही बनी रहें।
लेकिन पेशे और काम धंधे के सिलसिले को छोड़ दें तो बाहर बातें इतनी मासूम भी नहीं रहतीं। गलत समय पर गलत तरह से फ्लर्ट करें और थप्पड़ से लेकर अदालती कार्रवाई तक आपके लिए तैयार हैं। और अमरीका जैसे देश में भी जहां अनौपचारिक साफगोई को जीवनशैली माना जाता है, वहां भी यह जीवन शैली फ्लर्टिंग नाम के उस खेल में खास मददगार नहीं होती जिसकी पूरी रचना ही धुंध के साथ हुई है।
कुछ दूसरी रिसर्च फ्लर्टिंग का स्याह पहलू भी बताती हैं। यह जरा सी सरहद पार करते ही शोषण में बदल सकती है या जान-पहचान के भीतर बलात्कार में भी। आमतौर पर तो फ्लर्टिंग तब थम जाती है जब सामने के भागीदार से सकारात्मक जवाब नहीं मिलता है। लेकिन इस शोधकर्ता का कहना है कि कुछ लोग मनाही के संकेत समझ नहीं पाते, कुछ समझने से इंकार ही कर देते हैं क्योंकि वे इस बात को सुनना ही नहीं चाहते।
(अमरीका जैसी दुनिया ने संदर्भ में) आज डिजिटल दुनिया फ्लर्टिंग की सबसे बड़ी जमीन बन गई है। यह वह जगह है जहां शब्द ही शब्द हैं और शरीर की भाषा की कोई जरूरत नहीं, चाहे इंटरनेट पर ऑनलाइन रहे या टेलीफोन पर एसएमएस। और चूंकि इन दोनों जरियों से फ्लर्टिंग करने के लिए आंखों में आंखें डालने की जरूरत नहीं रहती, यह अधिक रफ्तार से, अधिक दुस्साहस से और बिना अधिक सोचे विचार रहती है।
डिजिटल शब्दों से फ्लर्टिंग सबको मोह लेती है, हालांकि अब तक इस पर अधिक शोध नहीं हुआ है लेकिन एक बात साफ है कि इंटरनेट पर लोग अब अनजाने लोगों से अपनी निजी बातें अधिक खुलकर करते हैं और इससे फ्लर्टिंग की रफ्तार बढ़ जाती है।
याहू की फ्लर्टिंग वेबसाइट, जैसे- मैरिड एंड फ्लर्टिंग, या फ्लर्टिंग ई-मेल गु्रप या मैरिड बट प्लेयिंग डॉट कॉम और मैरिड-बट-फ्लर्टिंग.कॉम को देखें तो लगेगा कि यहां फ्लर्टिंग का मतलब है उत्तेजक (या गंदी) बातें करना। अमरीका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी ने इंटरनेट के ऐसे एक चैट रूम के 86 लोगों की बातचीत पर अध्ययन प्रकाशित किया है। इसमें बात करने वाले लगभग सभी लोगों का मानना था कि वे शुरू में यह महसूस करते थे कि वे एक कम्प्यूटर से ही फ्लर्ट कर रहे हैं, लेकिन बाद में करीब एक तिहाई लोगों की रूबरू मुलाकात अपने चैट-पार्टनरों से हुई। और इनमें से दो को छोड़कर बाकी तमाम जोड़ों के बीच बात में कुछ चक्कर भी चला।
इंटरनेट से परे असली जिंदगी में फ्लर्ट करने वाले लोगों में से अधिकांश कोई अफेयर (प्रसंग) नहीं चाहते। लेकिन एक बात शादीशुदा लोगों की फ्लर्टिंग को अकेले लोगों की फ्लर्टिंग से अलग करती है। शादीशुदा लोगों के लाईन मारने से अधिक खतरे जुड़े रहते हैं और इसके साथ सपनीली कल्पनाएं भी अधिक जुड़ी रहती हैं। इसमें दांव पर भी काफी अधिक लगा होता है और खतरे भी अधिक जुड़े होते हैं, चाहे कुछ होने की संभावनाएं कम ही क्यों न हों। पर इसका नशा सिर अधिक चढ़ता है।
मनोचिकित्सक कहते हैं कि जिन लोगों के अपने जोड़ीदार से परे चक्कर होते हैं, वे अपने जोड़ीदार से उतने असंतुष्टï नहीं रहते कि उनके साथ जिंदगी तबाह ही हो गई। मतलब यह कि बाहर बेईमानी से चुराकर हासिल जरा सी खुशी, घर के गम को कम कर देती है। जब कोई आपके प्यार में पड़ जाता है या आप पर फिदा हो जाता है तो आप-आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे- अंदाज में चलने लगते हैं।
फ्लर्टिंग एक निरापद नशे सी है जिसमें लोग अपने-आपको अधिक जिंदा महसूस करने लगते हैं। जिसे आप चाहते हैं, उसे ठेस पहुंचाए बिना आप किसी और जगह से ऐसा महत्व पाते हैं जिससे आप अपने को बेहतर महसूस करने लगते हैं।
'टाईमÓ पत्रिका में छपे बेलिन्डा लश्कॉम्ब के लिए इस लेख का मैंने काफी कुछ हिस्सा अपनी जुबान में यहां पेश किया है। अपनी बात लिखने की इस जगह पर मैंने किसी और की बात को खुलासे से इसलिए लिखा कि बहुत सी वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रिसर्च पर आधारित इस महत्वपूर्ण लेख की टुकड़ा-टुकड़ा बातों का गुमनाम जिक्र करके अपने नाम से लिखना बेईमानी होती। किसी विषय पर अधिक जानकार का बेहतर लिखा पेश करके मैं आगे अपनी बात ठीक से रख सकता हूँ।
हिंदुस्तानी समाज में गरीब अपनी पसीनासनी थकान के चलते, मध्यमवर्गीय अपने सपनों से लड़ते और सम्पन्न लोग ऐशोआराम के मुर्दा सामानों को जिंदा लोगों से बेहतर समझते हुए, रोमांस से भी दूर बसे बैठे दिखते हैं। कम ही जोड़े ऐसे होते हैं जो अपनी सांसों और बदन की बदबुओं को भी दूर करने के बारे में चौकन्ने रहते हों। शादी के पहले की मोहब्बत मुखौटों के मुकाबिले का दौर होता है और शादी के साथ ही मुखौटे उतर जाते हैं कि अब अच्छा बनकर दिखाने की कोई बेबसी तो है नहीं!
बहुत से जोड़ों में औरत, बच्चे और खाना, घर की सफाई और बूढ़ों को दवाई देकर, जिम्मा पूरा समझती है और आदमी कमाकर लाकर देने को सब कुछ मान लेता है। जब जिंदगी ऐसी नीरस हो जाए तो उसमें बाहर जहां कहीं, जो कोई जरा सा रस डाले, वह तुरंत सोख लिया जाता है। मैं इस मुद्दे पर इतना लंबा (लिखा नहीं) पेश कर रहा हूँ क्योंकि मुर्दादिल लोग चौकन्ने हो जाएं कि उनकी नीरस जीवन शैली के बीच कब उनके जीवनसाथी या जोड़ीदार पर कोई रंग बरसाने लगे और गोरी का यार खाने लगे। प्यार, महत्व, देह या लाईन मारने वाले की मिसाल समझानी हो तो मनीप्लांट कहे जाने वाले फिलाडेंड्रान पौधे को देखें, पानी की तलाश में उसकी जड़ें कई फीट लंबी होकर तलाश करने लगती हैं। इस हफ्ते मेरी खुद की लिखी बस जरा सी असहमति भारतीय जीवनशैली के एक हिस्से से।
-सुनील कुमार
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