30 मार्च 08
नई टेक्नालॉजी और समाज पर उसके असर को लेकर लिखा गया पढऩा मेरे लिए हमेशा दिलचस्पी का रहता है। और आज इस्तेमाल में आ चुकी टेक्नालॉजी, विकसित देशों के समाज के अधिक बदलती है क्योंकि वहां उसका इस्तेमाल अधिक है। हमारी तरह के लोग इंटरनेट को ही आज पूरी दुनिया की नई टेक्नालॉजी मान लेते हैं जिसका असर हमारे इर्द-गिर्द सीधे कम पड़ता है। जिन समाजों में इंटरनेट और संचार के बाकी तरीकों ने लोगों को अधिक गिरफ्त में लिया है, वहां अब एक नई किस्म की वर्ण व्यवस्था बन रही है।
अपने तमाम वयस्क जीवन में मैंने धर्म और जाति पर आधारित संगठनों से परहेज किया, फिर धीरे-धीरे किसी भी किस्म के संगठन से किनारा कर लिया। इसलिए कि यह लगते रहा कि किसी भी एक किस्म के नफे-नुकसान के लिए बने संगठन में जाने पर उसके लोगों के भले के लिए तो कंधे से कंधा लड़ाकर संघर्ष हो सकता है लेकिन वह संघर्ष एक व्यापक जनहित के पक्ष में अक्सर नहीं रह जाता। उद्योग और व्यापार के संगठन सरकार की नीतियों को खरीदने के लिए एक हो जाते हैं, ठेकेदार अफसरों के खिलाफ एक हो जाते हैं, और राजनीतिक दलों में लोग विरोधियों को निपटाने के लिए एक होते हैं, बजाय किसी नीति या सिद्घांत के।
एक वक्त भारत में वर्ण व्यवस्था शुरू हुई थी जिसमें चार तबकों में से हर कोई अपनी बढ़ोतरी, बेहतरी के लिए लगा रहता था। अब दुनिया में इंटरनेट बुने जा रहे हैं। इस सोशल नेटवर्किंग में लोग इंटरनेट पर अपनी एक तस्वीर गढ़ते हैं जिसमें अपनी उम्र, रंग, पढ़ाई, कमाई, पते, कद-काठी, अंगों के नाम, शौक, आदतें, पसंद जैसे सैकड़ों पैमानों पर अपनी मनपसंद जानकारी डाल सकते हैं। अपना ऐसा व्यक्तित्व बना लेने के बाद आप किस सेक्स, धर्म, देश, प्रदेश, शहर, के कैसे व्यक्तित्व से, किस किस्म के, कितने गहरे या उथले संबंध बनाना चाहते हैं, यह फरमाइश डाल सकते हैं और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट अपने करोड़ों लोगों में से आपकी पसंद वाले ऐसे लोगों की लिस्ट बना देती है जिनकी पसंद पर आप भी लगभग खरे उतरें।
इसके बाद लोग एक-दूसरे से संपर्क करते हैं और पसंद की लिस्ट में से छंटाई होते-होते कुछ लोग दोस्ती के लायक बचते हैं, कुछ से पे्रम होता है और कुछ के साथ मिलकर हमबिस्तर भी हो लेते हैं। पूरा सिलसिला गढ़ी हुई मनचाही मूर्ति सा होता है जिसमें हर बात पसंदीदा होती है।
प्रकृति और फिर समाज ने जिन विविधताओं के साथ जीना और विकास सीखा, वह सिलसिला पूरी तरह खत्म होते दिखता है इन वेबसाइटों पर। अब लोग मर्जी के पुर्जे जुड़वाकर पसंद के कम्प्यूटर की तरह संबंध भी बनाने लगे हैं। आज की जिंदगी में जब इन संबंधों पर लोगों का वक्त नियमित रूप से खर्च होने लगता है, तो फिर असल जिंदगी के लिए वक्त कम बचने लगता है और समाज में रोजमर्रा की जिंदगी में आ खड़ी होने वाली विविधता की गुंजाइश कम होने लगती है। एक ही किस्म की खूबियों और खामियों वाले, या उनकी चाह वाले लोगों का नया तबका बन जाता है, वर्ण व्यवस्था के भीतर की जाति व्यवस्था के भीतर प्रजाति व्यवस्था के भीतर और बारीक भेद वाले छोटे-छोटे समुदायों जैसे समुदाय इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग से बनने लगे हैं।
इससे इंटरनेट के बाहर के मानव समाज और मानवीय सोच पर अच्छा या बुरा कैसा असर पड़ रहा है इसे लेकर लाखों लोग विश्लेषण और अध्ययन में लगे हैं। लेकिन पहली नजर में जो बात लगती है वह यह है कि इंटरनेट की यह नेटवर्किंग लोगों की जिंदगी से एक स्वाभाविक सामाजिक विकासहीन चुकी है। अब लोग शाम अपने दायरे के करीबी लोगों के साथ वक्त गुजारने की राह देखने के बजाय यह राह तकते हैं कि आधी दुनिया पार उनका चैट पार्टनर कब इंटरनेट पर आए और कब वे उससे बात करें।
कई बरस पहले रोज कई घंटे दुनियाभर में बिखरे अपने ऐसे दोस्तों के साथ गुजारने का एक दौर पूरी कर लेने के बाद मुझे लगता कि मैं एक ऐसे दायरे में फंस रहा हूँ जैसा कि मेरे शहर की हर बरस की सौ-पचास शादियों में जुटता है जहां वे ही गिने-चुने लोग आपस में गपियाते हैं। मैं एक बरस की ऐसी पचास शादियां भी याद करता हूँ तो वहां लंबी बातचीत वाले सौ लोगों से मिलना भी याद नहीं पड़ता। इंटरनेट पर तो इस दायरे को मैं और समेट सकता हूँ, दस, बीस या पाँच भी। जिससे मैं चाहूँ, बात करूं, जिसे चाहे उसे पता लगाने दूं कि मैं इंटरनेट पर हूँ।
यह सिलसिला शायद मेरी किस्म के बहुत से लोगों को कुछ बरस या कुछ महीने में थका, ऊबा या लुटा देता होगा। लुटाने से मतलब यह कि ये डिजिटल रिश्ते, असल जिंदगी के रिश्तों, वक्त, की कीमत पर ही तो चलते हैं और लोग इंटरनेट से हटने के बाद भी अपनी असल जिंदगी के लोगों पर इंटरनेट चर्चा लाद देते हैं। ऐसे दौर से उबरने के बाद मैंने पाया कि दुनिया के लोगों को जानने-समझने के लिए सोशल नेटवर्किंग एक खासा समय खोर तरीका था और अनचाहे लोगों से अनचाहे वक्त, अनचाही बातचीत में न फंसना ही ठीक है।
इस चक्कर में मैं अपने आसपास के लोगों से उनके मुद्दों से कट रहा था और अमरीका में हिस्पनिक बिरादरी के लोगों की दिक्कतों की जानकारी मुझे खासी होने लगी थी। आखिरकार मुझे लगने लगा कि असल जिंदगी में एक नकली दायरे का दखल नुकसानदेह है।
ऐसे में मैं उन लोगों के बारे में फिर सोचता हूँ जो कि इस नकली दायरे को अपनी पसंद के रंग से खींचना शुरू करते हैं और फिर इसके भीतर अपनी पसंद के लोगों को या पसंद के नकली मुखौटों को छांट-छांटकर जुटाते हैं। फिर घरोबा बढ़ता है और दायरे के भीतर दायरे बनते चलते हैं, असल जिंदगी की तरह। लेकिन तंग होते ऐसे डिजिटल दायरे लोगों को असल जिंदगी के मुद्दों और सरोकारों से दूर ले जाते हैं, विविधता से दूर ले जाते हैं।
यह सोचें कि विधिता के बिना इंसान क्या उन नस्लों जैसा नहीं हो जाएगा जैसे कि उन जातियों के हो जाते हैं जो रक्त शुद्घि के नाम पर तंग दायरे के भीतर ही रिश्ते करते हैं।
और विविधता की चाह की एक बड़ी अनोखी मिसाल यहां लिखना जरूरी है। कुछ बरस पहले इतिहास के एक बड़े दुस्साहसी सैलानी पर एक डाक्यूमेंटरी फिल्म आ रही थी जिसमें उसके ऐतिहासिक रास्ते पर फिल्म टीम सैकड़ों बरस बाद फिर चल रही थी। ऐसी राह पर चीन की एक पहाड़ी पर बिल्कुल अकेले बसा एक आदिवासी गांव था जहां आने वाले किसी भी मर्द मुसाफिर को गांव अपनी औरतों के साथ सोने का न्यौता देता था।
इसकी यह वजह नहीं थी कि वह गांव देह बेचने का धंधा करता था, उसकी सोच थी कि कुछ सौ लोगों के बीच ही घूमते-फिरते, उस बिरादरी के जीन्स कमजोर होते जा रहे हैं और ऐसे में बिलकुल अलग जीन्स किसी सैलानी से आकर नई पीढ़ी बनाएं तो वह हवा के एक ताजे झोंके की तरह बेहतर पीढ़ी होगी। यही वजह है कि दुनिया में यह स्थापित हो गया है कि अलग-अलग नस्लों के औरत-मर्द के मेल से बनी नई पीढ़ी अधिक मजबूत और बेहतर होती है।
लेकिन विविधताओं का यह मेल सिर्फ तन के लिए बेहतर नहीं होता, मन के लिए भी बेहतर होता है।
-सुनील कुमार
नई टेक्नालॉजी और समाज पर उसके असर को लेकर लिखा गया पढऩा मेरे लिए हमेशा दिलचस्पी का रहता है। और आज इस्तेमाल में आ चुकी टेक्नालॉजी, विकसित देशों के समाज के अधिक बदलती है क्योंकि वहां उसका इस्तेमाल अधिक है। हमारी तरह के लोग इंटरनेट को ही आज पूरी दुनिया की नई टेक्नालॉजी मान लेते हैं जिसका असर हमारे इर्द-गिर्द सीधे कम पड़ता है। जिन समाजों में इंटरनेट और संचार के बाकी तरीकों ने लोगों को अधिक गिरफ्त में लिया है, वहां अब एक नई किस्म की वर्ण व्यवस्था बन रही है।
अपने तमाम वयस्क जीवन में मैंने धर्म और जाति पर आधारित संगठनों से परहेज किया, फिर धीरे-धीरे किसी भी किस्म के संगठन से किनारा कर लिया। इसलिए कि यह लगते रहा कि किसी भी एक किस्म के नफे-नुकसान के लिए बने संगठन में जाने पर उसके लोगों के भले के लिए तो कंधे से कंधा लड़ाकर संघर्ष हो सकता है लेकिन वह संघर्ष एक व्यापक जनहित के पक्ष में अक्सर नहीं रह जाता। उद्योग और व्यापार के संगठन सरकार की नीतियों को खरीदने के लिए एक हो जाते हैं, ठेकेदार अफसरों के खिलाफ एक हो जाते हैं, और राजनीतिक दलों में लोग विरोधियों को निपटाने के लिए एक होते हैं, बजाय किसी नीति या सिद्घांत के।
एक वक्त भारत में वर्ण व्यवस्था शुरू हुई थी जिसमें चार तबकों में से हर कोई अपनी बढ़ोतरी, बेहतरी के लिए लगा रहता था। अब दुनिया में इंटरनेट बुने जा रहे हैं। इस सोशल नेटवर्किंग में लोग इंटरनेट पर अपनी एक तस्वीर गढ़ते हैं जिसमें अपनी उम्र, रंग, पढ़ाई, कमाई, पते, कद-काठी, अंगों के नाम, शौक, आदतें, पसंद जैसे सैकड़ों पैमानों पर अपनी मनपसंद जानकारी डाल सकते हैं। अपना ऐसा व्यक्तित्व बना लेने के बाद आप किस सेक्स, धर्म, देश, प्रदेश, शहर, के कैसे व्यक्तित्व से, किस किस्म के, कितने गहरे या उथले संबंध बनाना चाहते हैं, यह फरमाइश डाल सकते हैं और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट अपने करोड़ों लोगों में से आपकी पसंद वाले ऐसे लोगों की लिस्ट बना देती है जिनकी पसंद पर आप भी लगभग खरे उतरें।
इसके बाद लोग एक-दूसरे से संपर्क करते हैं और पसंद की लिस्ट में से छंटाई होते-होते कुछ लोग दोस्ती के लायक बचते हैं, कुछ से पे्रम होता है और कुछ के साथ मिलकर हमबिस्तर भी हो लेते हैं। पूरा सिलसिला गढ़ी हुई मनचाही मूर्ति सा होता है जिसमें हर बात पसंदीदा होती है।
प्रकृति और फिर समाज ने जिन विविधताओं के साथ जीना और विकास सीखा, वह सिलसिला पूरी तरह खत्म होते दिखता है इन वेबसाइटों पर। अब लोग मर्जी के पुर्जे जुड़वाकर पसंद के कम्प्यूटर की तरह संबंध भी बनाने लगे हैं। आज की जिंदगी में जब इन संबंधों पर लोगों का वक्त नियमित रूप से खर्च होने लगता है, तो फिर असल जिंदगी के लिए वक्त कम बचने लगता है और समाज में रोजमर्रा की जिंदगी में आ खड़ी होने वाली विविधता की गुंजाइश कम होने लगती है। एक ही किस्म की खूबियों और खामियों वाले, या उनकी चाह वाले लोगों का नया तबका बन जाता है, वर्ण व्यवस्था के भीतर की जाति व्यवस्था के भीतर प्रजाति व्यवस्था के भीतर और बारीक भेद वाले छोटे-छोटे समुदायों जैसे समुदाय इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग से बनने लगे हैं।
इससे इंटरनेट के बाहर के मानव समाज और मानवीय सोच पर अच्छा या बुरा कैसा असर पड़ रहा है इसे लेकर लाखों लोग विश्लेषण और अध्ययन में लगे हैं। लेकिन पहली नजर में जो बात लगती है वह यह है कि इंटरनेट की यह नेटवर्किंग लोगों की जिंदगी से एक स्वाभाविक सामाजिक विकासहीन चुकी है। अब लोग शाम अपने दायरे के करीबी लोगों के साथ वक्त गुजारने की राह देखने के बजाय यह राह तकते हैं कि आधी दुनिया पार उनका चैट पार्टनर कब इंटरनेट पर आए और कब वे उससे बात करें।
कई बरस पहले रोज कई घंटे दुनियाभर में बिखरे अपने ऐसे दोस्तों के साथ गुजारने का एक दौर पूरी कर लेने के बाद मुझे लगता कि मैं एक ऐसे दायरे में फंस रहा हूँ जैसा कि मेरे शहर की हर बरस की सौ-पचास शादियों में जुटता है जहां वे ही गिने-चुने लोग आपस में गपियाते हैं। मैं एक बरस की ऐसी पचास शादियां भी याद करता हूँ तो वहां लंबी बातचीत वाले सौ लोगों से मिलना भी याद नहीं पड़ता। इंटरनेट पर तो इस दायरे को मैं और समेट सकता हूँ, दस, बीस या पाँच भी। जिससे मैं चाहूँ, बात करूं, जिसे चाहे उसे पता लगाने दूं कि मैं इंटरनेट पर हूँ।
यह सिलसिला शायद मेरी किस्म के बहुत से लोगों को कुछ बरस या कुछ महीने में थका, ऊबा या लुटा देता होगा। लुटाने से मतलब यह कि ये डिजिटल रिश्ते, असल जिंदगी के रिश्तों, वक्त, की कीमत पर ही तो चलते हैं और लोग इंटरनेट से हटने के बाद भी अपनी असल जिंदगी के लोगों पर इंटरनेट चर्चा लाद देते हैं। ऐसे दौर से उबरने के बाद मैंने पाया कि दुनिया के लोगों को जानने-समझने के लिए सोशल नेटवर्किंग एक खासा समय खोर तरीका था और अनचाहे लोगों से अनचाहे वक्त, अनचाही बातचीत में न फंसना ही ठीक है।
इस चक्कर में मैं अपने आसपास के लोगों से उनके मुद्दों से कट रहा था और अमरीका में हिस्पनिक बिरादरी के लोगों की दिक्कतों की जानकारी मुझे खासी होने लगी थी। आखिरकार मुझे लगने लगा कि असल जिंदगी में एक नकली दायरे का दखल नुकसानदेह है।
ऐसे में मैं उन लोगों के बारे में फिर सोचता हूँ जो कि इस नकली दायरे को अपनी पसंद के रंग से खींचना शुरू करते हैं और फिर इसके भीतर अपनी पसंद के लोगों को या पसंद के नकली मुखौटों को छांट-छांटकर जुटाते हैं। फिर घरोबा बढ़ता है और दायरे के भीतर दायरे बनते चलते हैं, असल जिंदगी की तरह। लेकिन तंग होते ऐसे डिजिटल दायरे लोगों को असल जिंदगी के मुद्दों और सरोकारों से दूर ले जाते हैं, विविधता से दूर ले जाते हैं।
यह सोचें कि विधिता के बिना इंसान क्या उन नस्लों जैसा नहीं हो जाएगा जैसे कि उन जातियों के हो जाते हैं जो रक्त शुद्घि के नाम पर तंग दायरे के भीतर ही रिश्ते करते हैं।
और विविधता की चाह की एक बड़ी अनोखी मिसाल यहां लिखना जरूरी है। कुछ बरस पहले इतिहास के एक बड़े दुस्साहसी सैलानी पर एक डाक्यूमेंटरी फिल्म आ रही थी जिसमें उसके ऐतिहासिक रास्ते पर फिल्म टीम सैकड़ों बरस बाद फिर चल रही थी। ऐसी राह पर चीन की एक पहाड़ी पर बिल्कुल अकेले बसा एक आदिवासी गांव था जहां आने वाले किसी भी मर्द मुसाफिर को गांव अपनी औरतों के साथ सोने का न्यौता देता था।
इसकी यह वजह नहीं थी कि वह गांव देह बेचने का धंधा करता था, उसकी सोच थी कि कुछ सौ लोगों के बीच ही घूमते-फिरते, उस बिरादरी के जीन्स कमजोर होते जा रहे हैं और ऐसे में बिलकुल अलग जीन्स किसी सैलानी से आकर नई पीढ़ी बनाएं तो वह हवा के एक ताजे झोंके की तरह बेहतर पीढ़ी होगी। यही वजह है कि दुनिया में यह स्थापित हो गया है कि अलग-अलग नस्लों के औरत-मर्द के मेल से बनी नई पीढ़ी अधिक मजबूत और बेहतर होती है।
लेकिन विविधताओं का यह मेल सिर्फ तन के लिए बेहतर नहीं होता, मन के लिए भी बेहतर होता है।
-सुनील कुमार
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