23 मार्च 08
अडवानी की आत्मकथा उम्मीद के कुछ पहले आ गई। भाजपा-एनडीए की ओर से उन्हें प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की तरह पेश करने के बाद आई इस किताब का मकसद क्या देश में उनकी लीडरशिप को स्थापित करना है? या फिर यह एक सहज अनायास लेखन है?
राजनीति को जरूरत से कुछ अधिक वक्त से, जरूरत से कुछ अधिक करीब से, देखने वाले बता सकते हैं कि राजनीति में इतने ऊपर पहुंचने वाले कुछ भी अनायास, सहज और मासूम नहीं करते। कुटिलता या चौकन्नापन उनके मिजाज में घर कर जाते हैं और जब वे जाहिर तौर पर जिन्न की तारीफ करके हमकदमों से छिटकते दिखते हैं, तो हो सकता है कि वे असल में कुछ दाग-धब्बे धोकर मूलधारा में शामिल होकर एक व्यापक आधार तैयार कर रहें हों, हमकदमों की गिनती बढ़ाने की कोशिश में।
जो भी हो, आत्मकथाओं को मैं खासी दिलचस्पी से पढ़ता हूँ क्योंकि उनमें सच चाहे न लिखा हो, लिखने वाला या वाली, उन बातों को अपने नाम से तो रखता / रखती ही है। इतना सच तो रहता ही है कि उस तारीख पर उसने तब तक की घटना और सोच को उस तरह रखा है।
लेकिन अपने पढऩे के मजे से परे मैं सोचता हूँ कि जिंदा रहने, और राजनीति जैसे पेशे में सक्रिय रहते हुए कोई कितनी ईमानदारी से लिख सकता है? क्या पता किस सच, या झूठ, पर फिर कौन सा जिन्न आकर खड़ा हो जाए? फिर सच लिखने की ईमानदारी क्या दूसरों के लिए बेईमानी नहीं हो जाएगी जब उनसे हुई अंदरूनी बातें लिखने में आएंगी? क्या अपने लिखने की ईमानदारी रिश्तों की बेईमानी नहीं होगी?
पहली खबर में यह आया है कि अडवानी ने किताब में जिक्र किया है कि मुशर्रफ ने बातचीत में जब इस बात से साफ इंकार किया था कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में नहीं है तो बाद में वहां मौजूद एक पाक अफसर ने अडवानी से अलग से कहा था कि मुशर्रफ झूठ बोल रहे थे। अब इस ताजा-ताजा बात का खुलासा करके अडवानी मुशर्रफ के लिए तो एक मामूली सी परेशानी शायद खड़ी कर पा रहे हों। लेकिन एक पाकिस्तानी अधिकारी को यह कहकर वे मुसीबत में भी डाल रहे हैं जो कि अभी शायद नौकरी में ही होगा।
इसी किताब का एक दूसरा हिस्सा एक दूसरी खबर में सामने आया है कि गुजरात दंगों के बाद मोदी के इस्तीफे के सवाल पर वाजपेयी ने दो दूसरे नेताओं की मौजूदगी में अडवानी से क्या कहा और किस तरह इस मुद्दे पर अटल-अडवानी ने मतभेद थे। यह बिल्कुल ताजा मतभेद और विवाद खड़ा करके क्या एक आत्मकथा को ईमानदार बनाया गया है या फिर आज की राजनीतिक नजाकत को भुनाने की एक कोशिश?
मैं खुद जब कभी अपने पिछले दिनों की कुछ बातों पर लिखने की सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि क्या उसकी बहुत सी बातें कई लोगों के साथ दगाबाजी नहीं होगी? क्या वे तमाम बातें होते समय यह बात साफ थी कि दोनों ही पक्ष किसी दिन इन बातों को लिख सकेंगे? लेकिन यह तो वह साधारण दुविधा है जिससे हर आत्मकथा या आत्मकथ्यात्मक लेखक गुजरता होगा।
लालकृष्ण अडवानी की दिक्कत दोहरी है। वे वाजपेयी की तरह चौथेपन में नहीं चले गए हैं। अभी तो उनके सामने सबसे महत्वपूर्ण रथयात्रा बाकी ही है। ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा में सत्य, अर्धसत्य और असत्य की मैं बस कल्पना ही कर सकता हूँ। फिर यह भी कि कहां-कहां पर याददाश्त सुविधाजनक रूप से तेज हो गई होगी और कहां पर वह उम्र का शिकार हो गई होगी।
फिर मेरे जेहन में अडवानी को लेकर सौ सवाल उठते हैं कि उन्होंने इस बारे में क्या कुछ लिखा होगा? क्या सच लिखा होगा, क्या झूठ लिखा होगा? इन सवालों को मैं अभी रोककर बैठा हूं किताब हाथ आ जाने तक के लिए। लेकिन जिसे अभी अपने गठबंधन-साथियों, विविधता वाले इस देश के मतदाताओं, धर्मों और जातियों, के बीच वोट के लिए जाना है, उसने इस कठिन मौके पर यह किताब छपवाना क्यों तय किया?
आत्मकथा तो एक अधिक स्थायी और अधिक सच दस्तावेज माना जाता है, रोजाना के राजनीतिक बयानों के मुकाबिले। चुनाव के मौके पर क्या इसे एक पोस्टर की तरह पेश किया गया है? क्या इसे एक तस्वीर की तरह इस्तेमाल किया जाएगा?
सक्रिय, सत्ता केंद्रित, राजनीति करने वालों में अगर अपने जीते-जी और आखिरी खन्दक में खड़े रहकर भी सच कहने का साहस, उसकी ईमानदारी हो सकती है, तो अडवानी बड़ी तारीफ के हकदार होंगे। मेरे हिसाब से आत्मकथा लिखने का वक्त राजनीति की ढलान का सफर शुरू होने के बाद ठीक रहता है जब सारे शिखर भूतकाल बन चुके होते हैं।
-सुनील कुमार
अडवानी की आत्मकथा उम्मीद के कुछ पहले आ गई। भाजपा-एनडीए की ओर से उन्हें प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की तरह पेश करने के बाद आई इस किताब का मकसद क्या देश में उनकी लीडरशिप को स्थापित करना है? या फिर यह एक सहज अनायास लेखन है?
राजनीति को जरूरत से कुछ अधिक वक्त से, जरूरत से कुछ अधिक करीब से, देखने वाले बता सकते हैं कि राजनीति में इतने ऊपर पहुंचने वाले कुछ भी अनायास, सहज और मासूम नहीं करते। कुटिलता या चौकन्नापन उनके मिजाज में घर कर जाते हैं और जब वे जाहिर तौर पर जिन्न की तारीफ करके हमकदमों से छिटकते दिखते हैं, तो हो सकता है कि वे असल में कुछ दाग-धब्बे धोकर मूलधारा में शामिल होकर एक व्यापक आधार तैयार कर रहें हों, हमकदमों की गिनती बढ़ाने की कोशिश में।
जो भी हो, आत्मकथाओं को मैं खासी दिलचस्पी से पढ़ता हूँ क्योंकि उनमें सच चाहे न लिखा हो, लिखने वाला या वाली, उन बातों को अपने नाम से तो रखता / रखती ही है। इतना सच तो रहता ही है कि उस तारीख पर उसने तब तक की घटना और सोच को उस तरह रखा है।
लेकिन अपने पढऩे के मजे से परे मैं सोचता हूँ कि जिंदा रहने, और राजनीति जैसे पेशे में सक्रिय रहते हुए कोई कितनी ईमानदारी से लिख सकता है? क्या पता किस सच, या झूठ, पर फिर कौन सा जिन्न आकर खड़ा हो जाए? फिर सच लिखने की ईमानदारी क्या दूसरों के लिए बेईमानी नहीं हो जाएगी जब उनसे हुई अंदरूनी बातें लिखने में आएंगी? क्या अपने लिखने की ईमानदारी रिश्तों की बेईमानी नहीं होगी?
पहली खबर में यह आया है कि अडवानी ने किताब में जिक्र किया है कि मुशर्रफ ने बातचीत में जब इस बात से साफ इंकार किया था कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में नहीं है तो बाद में वहां मौजूद एक पाक अफसर ने अडवानी से अलग से कहा था कि मुशर्रफ झूठ बोल रहे थे। अब इस ताजा-ताजा बात का खुलासा करके अडवानी मुशर्रफ के लिए तो एक मामूली सी परेशानी शायद खड़ी कर पा रहे हों। लेकिन एक पाकिस्तानी अधिकारी को यह कहकर वे मुसीबत में भी डाल रहे हैं जो कि अभी शायद नौकरी में ही होगा।
इसी किताब का एक दूसरा हिस्सा एक दूसरी खबर में सामने आया है कि गुजरात दंगों के बाद मोदी के इस्तीफे के सवाल पर वाजपेयी ने दो दूसरे नेताओं की मौजूदगी में अडवानी से क्या कहा और किस तरह इस मुद्दे पर अटल-अडवानी ने मतभेद थे। यह बिल्कुल ताजा मतभेद और विवाद खड़ा करके क्या एक आत्मकथा को ईमानदार बनाया गया है या फिर आज की राजनीतिक नजाकत को भुनाने की एक कोशिश?
मैं खुद जब कभी अपने पिछले दिनों की कुछ बातों पर लिखने की सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि क्या उसकी बहुत सी बातें कई लोगों के साथ दगाबाजी नहीं होगी? क्या वे तमाम बातें होते समय यह बात साफ थी कि दोनों ही पक्ष किसी दिन इन बातों को लिख सकेंगे? लेकिन यह तो वह साधारण दुविधा है जिससे हर आत्मकथा या आत्मकथ्यात्मक लेखक गुजरता होगा।
लालकृष्ण अडवानी की दिक्कत दोहरी है। वे वाजपेयी की तरह चौथेपन में नहीं चले गए हैं। अभी तो उनके सामने सबसे महत्वपूर्ण रथयात्रा बाकी ही है। ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा में सत्य, अर्धसत्य और असत्य की मैं बस कल्पना ही कर सकता हूँ। फिर यह भी कि कहां-कहां पर याददाश्त सुविधाजनक रूप से तेज हो गई होगी और कहां पर वह उम्र का शिकार हो गई होगी।
फिर मेरे जेहन में अडवानी को लेकर सौ सवाल उठते हैं कि उन्होंने इस बारे में क्या कुछ लिखा होगा? क्या सच लिखा होगा, क्या झूठ लिखा होगा? इन सवालों को मैं अभी रोककर बैठा हूं किताब हाथ आ जाने तक के लिए। लेकिन जिसे अभी अपने गठबंधन-साथियों, विविधता वाले इस देश के मतदाताओं, धर्मों और जातियों, के बीच वोट के लिए जाना है, उसने इस कठिन मौके पर यह किताब छपवाना क्यों तय किया?
आत्मकथा तो एक अधिक स्थायी और अधिक सच दस्तावेज माना जाता है, रोजाना के राजनीतिक बयानों के मुकाबिले। चुनाव के मौके पर क्या इसे एक पोस्टर की तरह पेश किया गया है? क्या इसे एक तस्वीर की तरह इस्तेमाल किया जाएगा?
सक्रिय, सत्ता केंद्रित, राजनीति करने वालों में अगर अपने जीते-जी और आखिरी खन्दक में खड़े रहकर भी सच कहने का साहस, उसकी ईमानदारी हो सकती है, तो अडवानी बड़ी तारीफ के हकदार होंगे। मेरे हिसाब से आत्मकथा लिखने का वक्त राजनीति की ढलान का सफर शुरू होने के बाद ठीक रहता है जब सारे शिखर भूतकाल बन चुके होते हैं।
-सुनील कुमार
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