रविशंकर की समझदारी की बात


3 जून 2011
ऑर्ट ऑफ लिविंग के लिए जाने जाने वाले श्री श्री रविशंकर ने आज एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही कि लोकपाल को एक समानांतर सरकार बनाने की कोशिशों से बचना चाहिए। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं, लोकपाल के समर्थक हैं और प्रधानमंत्री और बड़े जजों को लोकपाल के दायरे में लाने के हिमायती हैं, लेकिन यह बारीक फर्क करके उन्होंने लोकतंत्र की अपनी बारीक समझ का सुबूत दिया है और आज जब पूरे देश का माहौल भीड़ के सिरों की तरह का हो गया है तब उन्होंने बड़े दिमाग की यह बात कही है। उन्होंने योरप के प्रवास के बीच से भारत के एक अखबार, द इंडियन एक्सपे्रस को कहा कि लोकपाल बनाते हुए किसी को भी कानून से ऊपर नहीं रखना चाहिए लेकिन खुद लोकपाल कहीं एक समानांतर सरकार न बना दिया जाए।  रविशंकर पूरी तरह से अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं।
अन्ना हजारे के आंदोलन के पहले से देश में सत्ता का बेजा इस्तेमाल करके बेईमानी करने वालों के खिलाफ एक गहरी नफरत गहरे बैठ चुकी है। लोग अब अंगे्रजों के जमाने के भी इससे तो बेहतर होने की बात कहने लगे हैं और यह भी कहने लगे हैं कि इससे तो फौज का राज अच्छा होगा। आजादी की पौन सदी होने के करीब आकर भी लोगों के बीच में लोकतंत्र को लेकर समझ मजबूत नहीं हो पाई है और लोगों की आस्था अब नाना पाटेकर किस्म की हिंसक फिल्मों पर जम गई है कि सत्ता चला रहे बेईमानों को इसी तरह निपटा देना चाहिए। ऐसे में जब अन्ना हजारे और देश के कुछ दूसरे भरोसेमंद लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया तो देश की सरकार सिर से पैर तक कालिख से पुती हुई थी, वह सहमी हुई खड़ी थी और उसका वक्त जितना संसद में लग रहा था उतना ही अदालती कटघरों में, जांच कमेटियों में लग रहा था। ऐसे माहौल में एक गांधीवादी अन्ना हजारे की भूख हड़ताल से चर्बी चढ़ी सरकार एकदम से दहशत में आ गई और उसने आनन-फानन लोकपाल कमेटी बना दी। चूंकि उस कमेटी में सारे के सारे गैरसरकारी सदस्य उस जनलोकपाल आंदोलन के मुखिया थे जो कि लोकपाल को भारतीय लोकतंत्र के भीतर एक तानाशाह का दर्जा देना चाहते हैं, इसलिए आज की तनातनी कुछ इस सोच को लेकर भी है। हम इस बात के पूरी तरह हिमायती हैं कि जनता के पैसों पर जीने वाला कोई भी सरकारी या संवैधानिक पद प्राप्त व्यक्ति लोकपाल के दायरे से परे नहीं होना चाहिए। हमने इस देश में बड़े-बड़े जजों से लेकर प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों तक की बेईमानी चर्चा में रही है और चाहे वह किसी अदालत में स्थापित न हो पाई हो, यह तो साफ है कि आम जनता की नजरों में कोई भी पद भ्रष्टाचार से बचा हुआ नहीं है। ऐसे में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को किस आधार पर लोकपाल से बाहर रखने की बात लोग करते हैं यह हमारी समझ से परे है। हमारा बड़ा साफ मानना है कि किसी पद की गरिमा उस पद को जांच से परे रखने में नहीं होती, उस पद को जांच के लिए खोल देने में ही होती है।
लेकिन जब ऐसे ताकतवर लोकपाल की बात होती है तो एक खतरा यह भी सामने आता है कि उस लोकपाल के बेईमान, बददिमाग या बेदिमाग हो जाने पर उस पर किसका काबू रहेगा? भारत का लोकतंत्र संतुलन की एक मिसाल है जिसमें कार्यपालिका यानी सरकार, न्यायपालिका यानी अदालत और विधायिका यानी संसद-विधानसभा का एक-दूसरे पर तरह-तरह का नियंत्रण रहता है। इनकी जिम्मेदारियां और इनके अधिकार इस तरह से तय किए गए हैं कि ये आपस में एक-दूसरे के काम में अड़ंगा बने बिना भी एक-दूसरे के गलत कामों को रोक सकें। इसलिए जब लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों में एक और स्तंभ जोड़ा जा रहा है तो उसके बारे में भी इन तीनों संस्थाओं के साथ एक अंतरसंबंध तय करने की जरूरत है कि लोकपाल को लेकर इन तीनों संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारियां क्या होंगी और उनके अधिकार क्या होंगे? आज दरअसल देश में भ्रष्टाचार की हालत देखकर एक ऐसा माहौल बन गया है कि लोकपाल कोई रामबाण दवा हो जिससे कि इस देश की सारी खामियां दूर हो जाएंगी। लोकपाल को एक वेताल, मैनड्रेक, सुपरमैन या स्पाईडरमेन की तरह का सोचा जा रहा है। लेकिन ऐसी असीमित क्षमता और ताकत बिना खतरों के नहीं आती। ताकत का बेजा इस्तेमाल इस देश ने आपातकाल में देखा हुआ है और लोकपाल बनकर अगर कोई ताकत का वैसा ही इस्तेमाल करने लगेगा तो लोकतंत्र का क्या होगा? दरअसल आज लोकपाल के आंदोलन से जुड़े हुए अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव, या रविशंकर हों या किरण बेदी, इन तमाम लोगों के तौर-तरीके लोकतंत्र से खासे दूर हैं। और आज के माहौल में ये अपने थोड़ी सी करिश्माई लोकप्रियता के चलते बहुत भले लग रहे हैं लेकिन अगर ध्यान से इनकी बातों को सुनें तो उनका लोकतंत्र से लेना-देना बहुत कम है। इसलिए नुक्कड़ पर लगते नारों के मुताबिक अगर लोकपाल को बनाने की बात कोई सोचता है तो वह जान ले कि नारे किसी आईटम सॉंग में तो भले लग सकते हैं लेकिन जब एक जटिल लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात हम करते हैं तो वहां पर हकीकत बहुत चटपटी नहीं होती और वह खासी गंभीर और कम आकर्षक लग सकती है। इसलिए आज रविशंकर की कही हुई बात को हम बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं और उससे लोकपाल कमेटी के बहकने का खतरा कुछ कम होगा।

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