किसानों के नाम पर फर्जी लोन की संगठित साजिश करने वाले बैंकरों को उम्रकैद तो हो ही...

18 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के सहकारी बैंकों ने गजब का काम किया है। कांग्रेस पार्टी ने 2018 के चुनाव के पहले किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की थी, उसे देखते हुए इस राज्य में जगह-जगह सहकारी बैंकों ने किसानों के नाम से फर्जी कर्ज खाते खोल दिए, उन्हें रकम देना दिखा दिया, और बैंक के अधिकारी-कर्मचारी खुद पैसा खा गए। अकेले अंबिकापुर में ऐसा सैकड़ों करोड़ का घोटाला हुआ, और अब जांच में ईडी की दखल भी हो चुकी है। अभी सबसे ताजा मामला महासमुंद जिले का है, वहां ठीक इसी तौर-तरीके से किसानों की जानकारी के बिना उनके नाम से पौने दो करोड़ का लोन निकाल लिया गया, और अब मामला पकड़ में आने पर बैंक ने धोखाधड़ी की रिपोर्ट की है। जिन बैंकों का काम गांव-गांव तक लोगों को बैंकिंग की सहूलियत देना है, फसल का बीमा करवाने में मध्यस्थ का काम करना है, किसानों को खेती के लिए कर्ज देना है, वे अगर इतने संगठित रूप से जालसाजी और धोखाधड़ी में लग गए हैं, तो फिर सरकार और किसान इन दोनों के बचने की कोई संभावना कहां रह जाती है? 

अभी कुछ हफ्ते पहले ही हमने कुछ राष्ट्रीयकृत बैंकों की धोखाधड़ी के बारे में लिखा था, ऐसा एक बड़ा मामला पंजाब-हरियाणा के इलाके में हुआ था जिसमें सैकड़ों करोड़ की धांधली बैंक अफसरों ने की थी। एक दूसरा मामला उत्तरप्रदेश में और गजब हुआ जिसमें पंजाब नेशनल बैंक के एक नगदी-तिजोरी में 17 करोड़ के आसपास के नोट बदलकर उनकी जगह नकली नोट रख दिए गए। खुद बैंक इस धोखाधड़ी से हैरान रह गया है कि जिस तिजोरी में घुसने के लिए बैंक के अधिकृत कर्मचारी-अधिकारी को भी फिंगर प्रिंट देने पड़ते हैं, जो ताले दो अलग-अलग अधिकारियों की चाबियों के बिना खुलते नहीं है, वहां भीतर इतनी बड़ी रकम के असली नोट गायब होकर नकली नोट रख दिए गए! यह पूरा सिलसिला बताता है कि भारत में एक वक्त राष्ट्रीयकृत होने के पहले भी बैंकों की जो साख रहती थी, जिस वक्त एक अकेले मैनेजर ही अपनी निजी साख के दम पर बैंक के लिए जमा भी जुटा लेते थे, और कर्जदार के परिवार को डांटकर फिजूलखर्ची से रोक भी देते थे, आज निजी बैंकों से लेकर राष्ट्रीयकृत बैंकों तक हर स्तर पर लूटपाट के तौर-तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं। यह सिलसिला निराश करता है कि जहां एक रूपए का लेन-देन भी कागज पर दर्ज होने के बाद होता है, वहां इतने बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है।

हमने पिछले संपादकीय में यह लिखा भी था कि बैंक आज साइबर क्राइम करने वाले लोगों की कमाई को जमा करने, और फिर गुमनाम तरीके से उन्हें देश के बाहर भेजने तक में जिस तरह भागीदार हो गए हैं, उनसे लगता है कि जिस तरह एक आम मुजरिम काम करते हैं, बैंकों के अफसर भी उसी तरह काम कर रहे हैं। देश के एक प्रमुख अखबार ने कुछ हफ्ते पहले स्टिंग ऑपरेशन के साथ यह खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि किस तरह बड़े-बड़े नामी-गिरामी बैंकों के अधिकारी सटोरियों और साइबर मुजरिमों की ठगी और लूट की रकम जमा करने के लिए बेनामी खाते खोलने के लिए तैयार खड़े रहते हैं, और रिजर्व बैंक या जांच अधिकारियों की कार्रवाई से इन जालसाजों को बचाने की गारंटी भी देते हैं। हम अपने आसपास भी देखते हैं कि ऐसा कोई हफ्ता नहीं गुजरता जब बैंकों में गरीब लोगों के कुछ खाते न पकड़ाते हों जिन्हें साइबर मुजरिमों और सट्टेबाजों ने भाड़े पर लेकर रखा हुआ है। ऐसी हर हरकत बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ मिलकर ही हो सकती है। इस तरह राष्ट्रीयकृत बैंक, राष्ट्रीय स्तर के निजी बैंक, और राज्य स्तर के सरकार-नियंत्रित सहकारी बैंक, इनमें से कोई भी जालसाजी और धोखाधड़ी से बचे हुए नहीं हैं, बाहरी लोगों के किए हुए जुर्म नहीं, खुद बैंक के लोगों के किए हुए ऐसे जुर्म। 

इसके अलावा बैंकों का हाल यह है कि देश के बड़े-बड़े कारोबारियों को डूबने की गारंटी वाले ऐसे कर्ज देते हैं कि आखिर में जाकर उस घाटे को बैंक के आम खातेदारों को ही ढोना पड़ता है। भारत के बैंक कर्मचारियों की यूनियन बीच-बीच में यह आंकड़े सामने रखती है कि किस बैंक ने बीते बरसों में कितने हजार करोड़ रूपए की कर्जमाफी बड़े-बड़े खातेदारों की की है। देश के लिए यह एक गर्व की बात है कि सबसे छोटे खातेदारों की कर्ज अदायगी सबसे ईमानदार है, और सबसे बड़े कर्जदार सबसे अधिक डिफाल्टर निकलते हैं। फिर बैंकों की मेहरबानी से देश में यह खेल भी चल रहा है कि किस तरह कोई बड़ी कंपनी अपने आपको घाटे में आया हुआ दिखाती है, और उसका दसियों हजार करोड़ रूपया का कर्ज माफ करके उस कंपनी को किसी दूसरी कंपनी को पांच-दस फीसदी दाम पर दे दिया जाता है। छोटे से लेकर बड़े तक, हर किस्म की जलासजी, और धोखाधड़ी बहुत आम बात है, और बैंकों की अपनी कोई जेब नहीं रहती, उसकी जेब वहां रकम जमा करने वाले, वहां ब्याज पटाने वाले लोगों की ही रहती है, ऐसी जेब से रकम निकालकर बड़े-बड़े दीवालिया लोगों को जिस अंदाज में भारत के बैंक दे रहे हैं, उससे इन सबकी मिलीजुली साजिश बहुत साफ-साफ दिखाई पड़ती है। कहने के लिए तो भारत में बैंकिंग के नियम बहुत कड़े हैं, और रिजर्व बैंक से लेकर दूसरे सरकारी रेगुलेटर तक तरह-तरह से नजर रखते हैं, लेकिन इसके बावजूद जब बैंकों के भीतर जिम्मेदारी के ओहदों पर बैठे हुए लोग ही मुजरिमों के साथ भागीदार बन जाते हैं, तो बैंकों के बचने की कोई संभावना नहीं रहती है। जहां बैंक के अधिकारी-कर्मचारी साजिश में मिले हुए दिखें, वहां पर उन्हें उम्रकैद से कम कुछ भी नहीं होना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

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