किसके विकास में रोड़ा है चुनाव आचार संहिता?


संपादकीय
23 फरवरी 2012
केंद्र सरकार अब चुनाव आयोग के पर कतरने की ताक में है। भ्रष्टाचार पर गठित मंत्री समूह की बैठक में यह मसला उठा, हालांकि सरकार ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता का नाम लेकर विकास को रोकने के मसले पर उड़ती उड़ती बातचीत हुई, लेकिन अब सामने आ गया है कि यह बातचीत उड़ती उड़ती नहीं हुई, जैसा कि प्रणब मुखर्जी बता रहे हैं। इस बैठक  की कार्यसूची में ही अचार संहिता के मुद्दे को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकालने पर चर्चा शामिल थी।  खबरें हैं कि सरकार में इस पर बाकायदा प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। विपक्षी दलों को इसका जो विरोध करना था, वह कर रहे हंै। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में देश ने यह भी देखा कि किस तरह वोट जुटाने के लिए देश का कानून मंत्री ही चुनाव आयोग को ललकारने लगा, और कैसे जब तक चुनाव आयुक्त ने इस बात की शिकायत राष्ट्रपति से नहीं की, देश के प्रधानमंत्री हरकत में नहीं आए। अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक बैठक की कार्यसूची में यह मुद्दा चुनाव आयोग से हाल ही में आचार संहिता भंग करने के लिए डांट खा चुके कानून मंत्री के अनुरोध पर रखा गया था। कंेद्र सरकार के दो मंत्रियों के डांट खाने तक, अपने नेताओं को चुनाव आयोग का सम्मान करने की सीख ऊपरी मन से ही सही, कांग्रेस देती रही, लेकिन जब बात राहुल गांधी के आचार संहिता भंग करने की बात आ गई, तो कांग्रेस को विकास की राह में आचार संहिता का मुद्दा सबसे बड़ा रोड़ा लगने लगा। इसके पहले उनके जीजा रॉबर्ट वाढेरा की रैली पर कार्रवाई करने वाले अफसर के तबादले के भी चर्चे हो चुके थे। इतने बरसों से देश में चुनाव करवाते आ रहा चुनाव आयोग,  चुनावी आचार संहिता लागू करने के अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते आ रहा था, तब तक कांग्रेसियों को इसमें कुछ गलत नजर नहीं आया। अब उसकी अगुवाई वाली सरकार के सबसे बड़े मंत्री यह कहते हंै कि आचार संहिता विकास कार्यों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। एक सरकार के पांच साल का कार्यकाल खत्म होने पर चुनावों के पहले बमुश्किल दो महीनों के लिए लागू होती आचार संहिता के समय में ही क्या सरकार विकास का सारा काम कर लेती है? प्रणब मुखर्जी की बन्द दरवाजे में की गई यह टिप्पणी आज जब सामने आ गई है, तो इससे यह सबित होता है कि यह सरकार विकास के नाम पर ऐन चुनावों के  समय मतदाता को ठगने की छूट चाहती है। 
यह सच है कि चुनाव आयोग के अफसर अतिउत्साही होकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हंै, और कुछेक बार प्रशासनिक दिक्कतें पेश आती हैं। चुनाव आयोग पर सीबीआई की तरह सत्ता पक्ष की शाखा के रूप मे काम करने का आरोप भी कभी-कभार राजनीतिक दल लगा लेते हैं। जैसे गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने पूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह पर इस तरह के आरोप लगाए थे। लिंगदोह के ईसाई होने के नाते सोनिया से सहानुभूति रखने की बातें भी  की गई थीं, लेकिन आज हालात उल्टे हंै। आज यूपीए की सरकार के रहते एक मुसलमान कानून मंत्री के खिलाफ, एक मुसलमान मुख्यचुनाव आयुक्त ने शिकायत की है। इस स्थिति से साफ है कि एक संस्था के रूप में चुनाव आयोग पर कभी-कभार भी लगाए गए इस तरह के आरोप बेबुनियाद रहे हैं। सच तो यह है कि चुनाव आयोग आज देश में एक  निष्पक्ष  और प्रभावशाली संस्था के रूप में स्थापित हो चुका है। समय-समय पर इसके बड़े पदों पर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं, धर्मों के लोग आए, लेकिन कभी इस संस्था के खिलाफ किसी भी मुद्दे पर कोई गंभीर, या सतही आरोप सबित नहीं हो सका। आरोप, अगर लगाए भी गए, जैसा कि गुजरात में हुआ, तो जनता ने उन पर यकीन नहीं किया। न तो कभी चुनाव आयोग के खिलाफ कोई बड़ा स्टिंग ऑपरेशन हुआ, न ही इसके किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप लगा। इस संस्था के बारे में देश में आम राय यही है, कि यह भ्रष्ट और अवसरवादी नेताओं की आंख में खटकने वाली, ताकतवर, निष्पक्ष संस्था है, जिस पर इस देश की आम जनता अपनी उम्मीदें टिका सकती है। हम भी इस राय से सहमत हैं। हमें भी चुनाव आयोग और उसके कामकाज से कोई शिकायत नहीं, सिवाय इसके कि यह चुनावों में कालेधन और फिजूलखर्ची रोकने में नाकाम रहा है। हम इससे इस मामले में भी प्रभावी होने की उम्मीद करते हंै, वर्ना चुनाव आयोग की आमतौर पर स्वच्छ, निष्पक्ष छवि से हम भी सहमत हैं। दूसरी तरफ इसके पर कतरने की कोशिश में दिखती यूपीए सरकार, और उसका नेतृत्व कर रहे दल कांग्रेस को देखें, तो उसकी विश्वसनीयता आज तार तार है। इसके नेताओं को आयोग की लताड़ खानी पड़ी है। जब तक देश में हो-हल्ला नहीं मचता, इसके बड़े नेता गलत बर्ताव कर रहे  अपने नेताओं को आंख दिखाने का नाटक भी नहीं करते। एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब यूपीए में शामिल दलों के नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार की कोई बात नहीं होती। प्रफुल्ल पटेल के सरकारी विमानसेवा के घरेलू कार जैसे इस्तेमाल की खबर अभी ताजा ही थी कि, मुंबई में कांग्रेस के पार्टी अध्यक्ष की सम्पत्ति जब्त करने का आदेश हाईकोर्ट ने दिया। राहुल गांधी जनसभा में वाहवाही लूटने और अपने तेज तेवर दिखाने के नाम पर सपा का चुनावी घोषणापत्र कहकर जिस कागज़ को फाड़ते है, वह कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम की फेहरिस्त निकलती है। कहने की बात यह है कि छोटी से ले कर बड़ी बातों तक, यूपीए की हालत आज ऐसी है कि उसकी कोई विश्वसनीयता जनता के बीच बची नहीं है, इसलिए अगर वह कोई ठीक बात भी करती है तो उस पर कोई यकीन नहीं करता। चुनावी आचार संहिता के मामले में भी उसके नेताओं का झूठ उसकी पहले से ही तार-तार  हो चुकी विश्वसनीयता को और भी जर्जर कर रहा है।
चुनावी आचार संहिता मतदाता के हित में है कि उसे चुनाव के समय अपने प्रतिनिधि की काबीलियत तय करते समय लालचों से बचाया जा सके, न तो कोई उसे खरीदने की कोशिश करे, न ही झूठी खबरें फैलाकर, ऐन चुनाव के समय लुभावनी योजनाओं की घोषणाएं करके उसके फैसले को प्रभावित करने की कोशिश करे। यह व्यावस्था यह तय करती है कि सत्ताधारी दल सरकरी तंत्र का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए न कर सके। चुनावी आचार संहिता को चुनाव आयोग के अधिकार के दायरे से निकालकर उसे कानूनी रूप देने की यूपीए सरकार की कोशिश देखने में जितनी मासूम लगती है, उतनी है नहीं, इससे चुनाव आयोग की ताकत बहुत कम हो जाएगी। फिर इसकी जरूरत भी क्या है, जब आयोग आचार संहिता लागू तो प्रशासन और पुलिस के जरिये ही करता है?
कांग्रेस पर देश में संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करते चलने का आरोप अक्सर लगाया जाता है। मंत्री समूह की बैठक में चुनावी आचार संहिता पर ताजा चर्चा भी ऐसा ही एक कदम है। कैग को आंखें दिखा चुकी सरकार अब चुनाव आयोग को आंखें दिखाने की कोशिश करती दिखती है। मौजूदा आम चुनावों में मतदाताओं का बड़ी तादाद में मतदान करना चुनाव आयोग की बड़ी सफलता मानी जाएगी। आज जब देश भर में प्रशासनिक तंत्र का निक्म्मापन बात बात पर जाहिर होता है, बड़े-बड़े घोटाले, और सरकारी कर्मियों की करोड़ों रुपयों की काली कमाई सामने आ रही है, देश में संवैधानिक संस्थाओं का कामकाज सराहनीय है। कैग हो या चुनाव आयोग, या ओडिशा का मानवाधिकार आयोग, जिसने सरकार को एक दलित लड़की के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूर कर दिया, या कर्नाटक का लोकायुक्त, जिसने दबंग खान माफिया को जेल जाने का रास्त खोला, और  उसे बचाने वाले मुख्यमंत्री को घर जाने पर मजबूर कर दिया। हम देखते हैं कि कार्यपालिका बनकर देश चलाने का दम भरने वालों को संवैधानिक संस्थाओं का डंडा ही सही रास्ते पर रख पा रहा है। जाहिर है यह संस्थाएं कार्यपालिका पक्ष के लोगों को अपने " विकास" में "सबसे बड़ी रुकावटें" लगती हो, लेकिन हम मानते हंै यह संस्थाएं देश के लोकतंत्र और संघीय ढांचे की मजबूती के लिए बहुत काम की हैं। यूपीए सरकार, और खासकर कांग्रेस की, व्यक्ति पूजा और  चुनाव जीतने के लिए इन संस्थाओं से छेड़छाड़ और  यूपीए सरकार की चुनाव आचार संहिता के बारे में ताजा कोशिश निहायत ही गैर जरूरी है।   

फिजूलखर्ची से बचने की जरूरत


छोटी सी बात
फरवरी 2012
रोज की जिंदगी में हम कारखानों में बने हुए ऐसे सामान इस्तेमाल करते हैं जो तरह-तरह के रसायनों से बने होते हैं। इनसे शरीर को भी नुकसान हो सकता है और धरती को तो नुकसान होता ही है। इसलिए टूथपेस्ट, साबुन, शैंपू से लेकर मच्छर भगाने और मारने तक के सामानों का इस्तेमाल कैसे कम से कम हो सकता है यह सोचना चाहिए। मच्छरों और कीड़े-मकोड़ों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले जहर इंसानों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। हर किसी की जिंदगी में और उनके घर-दफ्तर में ऐसी बातों का इलाज अलग-अलग किस्म का हो सकता है, लेकिन इस बारे में कुछ ध्यान देने से खर्च और सेहत दोनों की बचत हो सकती है।
कुछ तरह के साबुन और शैंपू कुछ इलाकों के पानी से आसानी से नहीं धुलते और इनसे नहाते हुए कई गुना अधिक पानी खर्च हो जाता है। ऐसे ब्रांड कभी दुबारा नहीं लेने चाहिए। इसी तरह यह ध्यान भी रखना चाहिए कि ठंड के मौसम में ऐसे साबुन का ही इस्तेमाल करें जिनमें तेल या उस तरह कोई दूसरी चीज अधिक अनुपात में हो। ध्यान से देखेंगे तो पैकिंग पर यह दिख जाएगा और आप पहले बदन की प्राकृतिक चिकनाई को कम करके फिर किसी क्रीम, तेल को लगाकर उसकी भरपाई करने से बच जाएंगे। ये छोटी-छोटी बातें न सिर्फ आपकी सेहत और जेब की बचत के लिए है बल्कि धरती को बचाने के लिए भी है।  यह ध्यान भी रखा जा सकता है कि किन कपड़ों को हर बार साबुन से धोने की जरूरत नहीं पड़ती और किस तरह सिर्फ पानी से धोकर काम चल सकता है। इससे साबुन, पानी, और कपड़ों जिंदगी, सबकी बचत होती है।  कपड़ों पर पे्रस करने के बारे में हम यहां पहले भी लिख चुके हैं कि जींस और टी-शर्ट जैसे कपड़ों को पे्रस की जरूरत जरा भी नहीं होती। अंगे्रजों का खाली किया हुआ यह देश अभी तक एक ऐसी मानसिक गुलामी में जीता है जिसमें बिना जरूरत की तामझाम को इतनी अहमियत दी जाती है। जब भी आप बिना जरूरत कपड़े पे्रस करते हैं तो बिजली खर्च करते हैं और उस बिजली के लिए धरती पर बहुत सा प्रदूषण पैदा होता है। ताकतवर तबका ऐसी बहुत सी फिजूलखर्ची इसलिए करता है क्योंकि वह इसका खर्च उठा सकता है। लेकिन अपनी आने वाली पीढिय़ों पर आने वाले इस बोझ को भी कोई उठा सकेगा?
-सुनील कुमार


गुफा की तरफ जाने के खतरे


संपादकीय
22 फरवरी 2012
इंटरनेट की मेहरबानी से अश्लील, फूहड़, हिंसक और दूसरे कई किस्म की आपत्तिजनक बातों को लिखने का मौका लोगों को मिल रहा है। इसका फायदा भारत में भी कुछ ऐसे लोग लगातार उठाते हैं जिनके अस्तित्व का ऐसी बातों के बिना किसी को पता नहीं चलता। फिर इंटरनेट से परे का मीडिया तैयार खड़ा हुआ है कि जो सबसे बेहूदी बात है, उसे सबसे पहले लपककर अपने पाठकों और दर्शकों के सामने परोस दिया जाए। नतीजा यह है कि जो सबसे फूहड़ बात हो, उसके आनन-फानन, जंगल की आग की तरह फैल जाने की संभावनाएं अब मीडिया के मल्टीमीडिया हो जाने से बढ़ गई हैं। मुंबई की एक चर्चित मॉडल लड़की ने पहले तो भारतीय टीम की जीत-हार को लेकर अपने कपड़े उतारने के बयान देकर खबरों में जगह पाई थी, और उसके बाद से एक पाकिस्तानी अभिनेत्री ने उसे बेदखल करके फुटपाथ के उस कोने पर अपनी दूकान सजा ली थी। कल से फिर खबरों में यह मॉडल आई है क्योंकि एक दूसरी विवादास्पद महिला, प्रमुख और चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपनी आम जुबान में इस मॉडल को लेकर सही बातें बहुत वयस्क जुबान में इंटरनेट पर लिखी हैं। 
भारत के साथ एक दिक्कत यह हो गई है कि अंगे्रजी और इंटरनेट की वजह से यहां के लोग पूरी दुनिया की संस्कृतियों से जुड़ गए हैं। बहुत रफ्तार से आए इस सैलाब ने पांव संभालने का मौका भी भारत के तौर-तरीकों को नहीं मिल पाया और बहुत सी आंखों में खारा पानी चले गया है, बहुत सी आंखों में रेत चली गई है। नतीजा यह हुआ है कि कुछ लोगों के लिए आम हो चली जुबान बाकी लोगों के लिए, या एक बड़े तबके के लिए बबूल के कांटे सरीखी हो गई है। लोगों को अपने ही बच्चों के फेसबुक या ट्विटर पेज से दूर रहना पड़ता है क्योंकि कई बार उस पेज को देखने के बाद पुराने ख्याल के लोगों को पूजाघर से गंगाजल लेकर आंखें धोनी पड़ती हैं। लेकिन बदलाव के हर दौर में इस तरह का टकराव और खिंचाव संस्कृतियों में और संवेदनाओं में होता ही है। 
लेकिन आज हम यहां यह चर्चा करना चाहते हैं कि इंटरनेट से लेकर पत्र-पत्रिकाओं तक भारत में वयस्क सामग्री के लिए जगह बिल्कुल ही नहीं है। अंगे्रजी की कुछ बहुत चमक-दमक वाली बहुत महंगी पत्रिकाओं को छोड़ दें, कुछ महंगी अंगे्रजी किताबों को छोड़ दें तो भारत के गैरअंगे्रजीभाषी लोगों के लिए उनकी जरूरत, उनके मजे और मनोरंजन के लिए शायद ही कुछ वयस्क मिलता हो। नतीजा यह है कि लोग लिखने की बेकाबू आजादी देने वाले इंटरनेट पर पहुंचते ही कई किस्म की बेहूदी बातें लिखने लगते हैं। फिर प्रचार पर जिंदा रहने वाले बाजार ऐसी गंदगी को चारों तरफ और बढ़ावा देते चलते हैं। न तो यहां देर रात के वयस्क टीवी चैनल की गुंजाइश निकल रही है और न ही भारत में अश्लीलता के मौजूदा कानूनों के चलते हुए थानेदारों के स्तर पर पहली नजर में अश्लीलता तय होने के इंतजाम में कोई गंभीर पत्र-पत्रिका वयस्क लोगों की मानसिक और शारीरिक जरूरतों पर चर्चा के लिए निकल सकती है। यह देश आज की अपनी पाखंडी संस्कृति के बीच बड़े होने का खतरा ही नहीं उठा रहा। जिस देश में सेक्स-शिक्षा के लिए मंदिरों की दीवारों से लेकर, वात्सायन जैसे बड़े विशेषज्ञ जानकार की लिखी महान किताब मौजूद थी, जहां मुगलों और अंगे्रजों के रहते हुए भी नगरवधुओं और तवायफों के कोठों पर तहजीब सीखने की बात होती थी, आज चुनावी नीयत और कट्टरपंथी साम्प्रदायिकता के चलते सिर्फ झंडों-डंडों की बात होती है। 
ऐसे में जिन लोगों को फूहड़ बात कहने का मौका मिलता है, जिनको कपड़े उतारने का मौका मिलता है, वे सभी बाजार को देखते हुए ऐसा करने लगते हैं। इस देश के महान चित्रकारों के सामने मॉडल की तरह बैठकर तस्वीरें बनवाने के लिए महिलाएं जाने कब से कपड़े उतारते आई हैं। लेकिन अब कपड़े उतारने से कला का कोई रिश्ता नहीं रहा, अब अखबारी सुर्खियों और टीवी चैनलों का ख्याल रखकर यह काम होता है। जब एक स्वस्थ वयस्क मनोरंजन या जानकारी नहीं मिलती है तो वहां पर पोर्नोग्राफी कही जाने वाली ब्लू फिल्में अधिक चलती हैं और सेक्स का अधकचरा ज्ञान हर पीढ़ी को गलतफहमी में रखते चलता है। इस देश की संस्कृति को गुफा की तरफ ले जाने की बजाय अगर उसे एक समाज-विज्ञान के नजरिए से उदार नहीं बनाया जाएगा, तो फूहड़ और अश्लील हिंसा ही खबरों में बनी रहेगी। 

छोटी सी बात


छोटी सी बात
21 फरवरी 2011
बातचीत की आम जुबान में लोग किसी भी किस्म की कमजोरी को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। गरीब को फटेहाल या दो कौड़ी का कहते हैं, किसी को लंगड़ा किसी को लूला, किसी को पागल, किसी को अंधड़ा, किसी को कनवा और किसी को चितकबरा या कबरा कह देते हैं। ये सारी जुबान तब तक तो ठीक है जब तक आपके परिवार में किसी को कुदरत से मिली ऐसी कोई तकलीफ न हो। लेकिन जब घर पर कोई ऐसा हो तो क्या उस वक्त भी आप इसी तरह के शब्द इस्तेमाल करते हैं? वैसे तो यह कहा गया है कि जिसके खुद के पैरों में बिवाई न पड़ी हो वह दूसरों का दर्द क्या जाने, लेकिन बेरहम और रहमदिल, अक्लमंद और नासमझ या कमसमझ के बीच फर्क तो यही है कि दूसरों की भावनाओं को देखते हुए किसी ऐसी बात को गाली की तरह इस्तेमाल न करें जिस पर कि उनका कोई बस नहीं है।
अगर कोई बदतमीज है, घमंडी है, हिंसक है, भ्रष्ट या बेईमान है, दगाबाज या झूठा है, तो ऐसी तमाम बातें कुदरत की दी हुई न होकर, लोगों की खुद की पाई हुई होती हैं। किसी के बारे में न्यायसंगत तरीके से अगर ये बातें कही जाएं, तो ये गालियां नहीं हैं। बिना मेहनत जो दूसरों के हिस्से का खाता है, उसे हरामखोर कहने में भी कोई बुराई नहीं है, अगर यह बात अच्छी तरह से साबित हो चुकी है। हालांकि भारत की संसदीय व्यवस्था में इनमें से अधिकांश शब्दों को असंसदीय करार देकर निकाल दिया जाता है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ बोलचाल में इनके इस्तेमाल में कोई बुराई नहीं होती। लेकिन जिन बातों पर किसी का बस नहीं चलता, जन्म से मिली हुई तकलीफों, या साधारण रूप-रंग को लेकर जब कोई जली-कटी जुबान का इस्तेमाल करते हैं तो वे नाइंसाफी करते हैं। इसलिए किसी दूसरे के बच्चे को काला-कलूटा कहने के पहले यह सोचें कि आपकी अगली पीढ़ी के रंग की आपको कोई गारंटी है? मानसिक रूप से कमजोर या अविकसित किसी बच्चे को पागल कहने के पहले यह सोचें कि आपके परिवार में कोई ऐसा पैदा हो और उसे लोग इसी जुबान में बुलाएं तो आपको कैसा लगेगा?
--सुनील कुमार

कुनबापरस्ती के दो और खतरे


21 फरवरी 12
संपादकीय
कल की दो खबरें कांगे्रस पार्टी और यूपीए सरकार के लिए देश के कसैले हो चुके मुंह में कुछ और कुनैन घोलने वाली हैं। हम लगातार कुनबापरस्ती के खिलाफ लिखते हैं और एक ही घर के एक से अधिक लोगों को चुनाव में खारिज कर देने के लिए इंटरनेट पर जगह-जगह चर्चा भी छेड़ते हैं। लेकिन सत्ता है कि उसकी बददिमागी लोगों को अपने कुनबे के लिए देश को पांवपोंछने की तरह इस्तेमाल करती है। यह ठीक है कि आज केंद्र में यूपीए सरकार के चलते सात बरस हो रहे हैं इसलिए अधिक मामले वहीं के सामने आ रहे हैं, लेकिन इक्का-दुक्का सरकारों को छोड़कर बाकी सभी का हाल अपने कुनबों के लिए ऐसा ही है। तमिलनाडु, पंजाब, कश्मीर, बिहार, आंध्र, उत्तरप्रदेश जैसे बहुत से राज्य हैं जहां पिछले दशकों में हम राजवंशों की तरह गिने-चुने कुनबों को न सिर्फ कांगे्रस पार्टी में बल्कि दूसरी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों में भी वंशवाद को पनपाते देख रहे हैं। 
यूपीए सरकार में कुछ महीने पहले तक प्रफुल्ल पटेल एनसीपी की तरफ से ताकतवर विमान मंत्री थे, और इन दिनों वे कनाडा के किसी से रिश्वत लेने के आरोप झेल भी रहे हैं। लेकिन इन आरोपों की असलियत तो सामने आने में बहुत वक्त लग सकता है, अभी जो हकीकत सामने है वह है-'सन् 2010 में तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के रिश्तेदारों को बिजनेस क्लास में जगह नहीं मिलने पर उनकी सेवा में बड़ा विमान लगा दिया था। 25 अप्रैल को बेंगलुरु से मालदीव जाने और 28 अप्रैल को वहां से लौटने के लिए की गई इस विशेष व्यवस्था की जानकारी सूचना के अधिकार (आरटीआई) याचिका के जरिए मिली है।Ó अब अगर घाटे में डूब रही और अब बिक जाने या बंद हो जाने की कगार पर खड़ी हुई राष्ट्रीय एयरलाइंस अपने इसी मंत्री के बरसों वहां काबिज रहने के बाद भी आज इस नौबत को अगर झेल रही है तो जाहिर है कि उसके पीछे मंत्री की ऐसी मनमानी भी रही है। अपने कुनबे के लिए कोई देश के मुसाफिर हवाई जहाज का ऐसा शर्मनाक बेजा इस्तेमाल करे, तो उसे सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए। एक तरफ देश गरीबी की रेखा के नीचे घिसट रहा है, और करोड़ों बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मरने की कगार पर खड़े हैं और पहले कौन मरेगा इसके लिए एयर इंडिया से उनका मुकाबला चल रहा है और मंत्री का कुनबा इस मौत में अपना भी हाथ लगा रहा है। मनमोहन सिंह की थाली में दो रोटी एक सब्जी दाल और दही की बहुत चर्चा होती है। लेकिन उनकी सरकार का अगर देश को लूटने में यही हाल हर सुबह सामने आ रहा है तो उनकी यह ईमानदारी सरकारी नल पर कहीं-कहीं आते गंदे पानी से भी कम इस्तेमाल की है। 
दूसरी खबर है कि यूपीए और कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को देश के विमानतलों पर सुरक्षा जांच से मिलने वाली छूट की। हमने अभी पिछले हफ्ते ही यह लिखा है कि राष्ट्रपति के बेटे से एक करोड़ रूपए की चुनावी नगदी के बारे में पूछताछ को देखते हुए ऐसे किसी भी व्यक्ति को किसी सुरक्षा जांच से कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए। सुरक्षा एजेंसियों की अगर कोई मजबूरी है तो विशेष छूट मिले हुए राहुल-प्रियंका जैसे लोग अलग से जाएं और उनके परिवार के बाकी लोग सुरक्षा जांच से होकर जाएं। सुरक्षा जांच का रिश्ता सिर्फ इन लोगों से नहीं है, हमारे जैसे बाकी साधारणा मुसाफिरों की जिंदगी से भी है, जिसे खतरे में डालने का कोई हक छूट देने वाले लोगों को नहीं है। किसी ईश्वर ने क्या ऐसा कोई सर्टिफिकेट दिया हुआ है कि भारत के ये ढाई-तीन दर्जन लोग कोई अपराध नहीं कर सकते, या आत्महत्या की नीयत से अपने साथ-साथ और लोगों को भी नहीं उड़ा सकते? ऐसी कोई भी रियायत पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और हमारा पक्का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट तक ऐसा मामला जाने पर अगर वहां के जज अपनी खुद की सुविधाओं को खोने के लिए तैयार होंगे, तो ऐसे विशेषाधिकार तुरंत खारिज करेंगे। 
अभी दो-तीन दिन पहले ही सोनिया गांधी के इसी दामाद की बातचीत हमने दिल्ली के अखबार इंडियन एक्सपे्रस से लेकर छापी थी जिसमें रॉबर्ट ने कहा था कि उनका काम सोनिया के परिवार को दलालों से दूर रखने का है। उन्होंने कहा था कि उनकी भूमिका ऐसे व्यक्ति की है, जो परिवार से दलाल टाइप के लोगों को दूर रखता है और गांधी परिवार तक उन बातों को सीधे पहुंचाता है, जो लोग चाह रहे हैं। अब सवाल यह है कि देश की सबसे कड़ी और बड़ी सुरक्षा व्यवस्था से घिरी हुई सोनिया गांधी तक किस तरह के दलालों की पहुंच है जिन्हें रोकने का जिम्मा रॉबर्ट का है? उनके इर्दगिर्द तो सुरक्षा अधिकारियों का तगड़ा घेरा हर पल रहता है, सरकार के कई और बड़े अफसर उनके इर्दगिर्द रहते हैं, कांगे्रस पार्टी के बड़े दिग्गज पदाधिकारी और नेता सोनिया के इर्दगिर्द रहते हैं, ऐसे में कौन से दलाल वहां तक पहुंचते हैं जिनको रोकने का इतना बड़ा काम उनका दामाद कर रहा है? सच तो यह है कि रॉबर्ट वाड्रा की पूरी बातचीत पूरी तरह से सोनिया और कांगे्रस के खिलाफ जा रही है। और जिन लोगों की सरकार में कोई जवाबदेही नहीं बनती, कांगे्रस पार्टी में कोई जवाबदेही नहीं बनती, वे लोग अगर इस तरह निहायत गैरजरूरी और नाजायज बड़े बोल बोलते हैं तो लोगों को देश का यह सबसे पुराना वंशवाद एक बार फिर खटकने लगता है। हम नहीं जानते कि कांगे्रस पार्टी में ऐसे नुकसान के बारे में सोचने की कोई जगह बच गई है या फिर मुसाहिबों की भीड़ को हम जैसों की ऐसी बातें खटकेंगी, जो भी हो इस देश को वंशवाद के खिलाफ एक आंदोलन की बहुत जरूरत है।







इंसान और धनवान





छोटी सी बात
20 फरवरी 2011
शहर की एक व्यस्त सड़क से निकलते हुए एक बारात इस तरह पूरी चौड़ाई को घेरे हुए थी कि मानो किसी बड़ी गौशाला के जानवर एक साथ तालाब जा रहे हों। बहुत रौशनी, बहुत बाजा, मतलब यह कि खासी पैसे वाली बारात थी। यह सड़क शहर के एक बड़े हिस्से को रेलवे स्टेशन से जोड़ती है, इस सड़क पर बहुत से नर्सिंग होम हैं, जिनमें सैकड़ों मरीज हर वक्त रहते ही हैं। यहां दर्जन भर दवा दूकानें हैं जहां तक लोगों को आना-जाना पड़ता है। इन सबके साथ-साथ इस सड़क के दोनों ओर हजारों मकान भी हैं जिनमें रहने वाले लोगों को इसी सड़क से गुजरना होता है। लेकिन एक बारात ने इन सबका जीना घंटों के लिए मुश्किल कर दिया। 
दसियों हजार लोगों की बददुआ के साथ जो जिंदगी शुरू हो रही हो वह कितना सुख पाएगी इसका अंदाज लगाना हो तो भारतीय संस्कृति में अच्छा काम करने से अच्छा होने की जो नसीहत दी जाती है उसे सोचना चाहिए।
दरअसल इंसान एक सीमा तक इंसान रहता है। जैसे-जैसे वह धनवान बनते जाता है उसके भीतर का इंसान छोटा होते जाता है। अधिक पैसों के साथ अहिंसक बने रहने खासा मुश्किल होता है। लोग अपनी खुशी को दूसरों का जीना मुश्किल करते हुए सड़कों पर इस तरह बिखेर देते हैं कि मानो पूरी दुनिया की यह मजबूरी हो कि वे इनकी खुशी के लिए अपनी सहूलियत का हक छोड़ दें। सड़क पर, रेलवे स्टेशन या किसी और सार्वजनिक जगह पर दूसरों के हक पर अपने एक गैरकानूनी हक को लादकर लोग जितनी बेशर्मी और हिंसा से अपने सुख और दुख से जगहों को पाट देते हैं, वह भयानक है। एक तो पैसा अपने-आपमें हिंसक होता है और फिर भीड़ तो पूरी तरह से बेदिमाग होती है। किसी समझदार ने बहुत पहले यह लिखा था कि भीड़ में सिर बहुत होते हैं दिमाग एक भी नहीं होता। इन दोनों का मेल पेट्रोल और आग की तरह का होता है और लोगों की बदतमीजी विस्फोट की चिंगारियों की तरह चारों तरफ फैलने लगती है।
एक दिक्कत यह भी रहती है कि जिन अफसरों पर ऐसी अराजकता को काबू करने की जिम्मेदारी रहती है वे पैसों और बेदिमाग सिरों की भीड़ से उलझने के बजाय घर बैठे रहना बेहतर समझते हैं। 
यह संपन्नता लगातार हिंसक होकर, बदतमीज होकर यही बताती है कि परिवार या व्यापार ने इन्हें पैसों की संपन्नता तो दी है लेकिन इंसानियत से इन्हें विपन्न कर दिया है।---                सुनील कुमार

दूध की धार भूखे पेटों की तरफ क्यों नहीं मोड़ता ईश्वर?


संपादकीय
20 फरवरी 2012
देश भर में आज हिंदू समुदाय शिवरात्रि मना रहा है। सरकारी दफ्तरों की छुट्टी है और शिवमंदिरों में लोगों की भीड़ लगी है। शिवलिंग पर से दूध की धार थम ही नहीं रही है। जितनी तस्वीरें हमारे फोटोग्राफर लेकर आए हैं या जो टीवी के परदे पर दिख रही हैं वे दूध से अभिषेक की तस्वीरें हैं। यही त्यौहार नहीं, बाकी त्यौहार भी और दूसरे धर्मों के भी त्यौहार भी, इसी किस्म के बहुत से रीति-रिवाज लेकर आते हैं जब ईश्वर के सामने लड्डुओं से लेकर तरह-तरह की कुर्बानी चढ़ाई जाती है। ऊपर वाले का दरबार चढ़ावों से लबालब होता है। सड़क किनारे से जब लोगों को हटाया जाता है तो रोज कमाकर रोज खाने वाले फुटपाथी लोग सबसे पहले हटाए जाते हैं, और ईश्वर की दूकान आखिर तक चलती रहती है।
इस बात की चर्चा आज जरूरी इसलिए है कि इस देश में भूख और कुपोषण से हर बरस आधा-एक करोड़ बच्चे मारे जाते हैं। एक तरफ इतनी बड़ी गरीब आबादी की जिंदगियों को जारी रखने का इंतजाम नहीं है, और दूसरी तरफ आज ही दक्षिण भारत के एक मंदिर की दौलत को गिनने का काम अदालती आदेश से शुरू हुआ है। आज ही एक दूसरी खबर है कि अमिताभ बच्चन की अच्छी सेहत के लिए उनका परिवार एक मंदिर पहुंच रहा है। इस परिवार में सुख और दुख के हर मौके पर मंदिर के भगवानों को उनके दर्शन होते हैं, लेकिन इस परिवार की किसी रहमदिली के दर्शन किसी गरीब को हुए हों ऐसी कोई खबर कभी पढऩे में नहीं आती। खैर, हर बरस ये आंकड़े भी आते हैं कि तिरूपति के मंदिर की इस बरस की कमाई कितनी रही और दूसरे किसी धर्म स्थान की कितनी। ईश्वर को जो लोग मानते हैं, वे कहते हैं कि दुनिया में एक पत्ता भी उसकी मर्जी के बिना नहीं हिलता। ऐसे में हमारे मन में यह सवाल उठता है कि कुपोषण से, भूख से दसियों लाख बच्चों को इस देश में ही मरते हुए देखने वाला ईश्वर अपनी पत्थर की मूर्ति पर बहाए जाने वाले दूध की धार को गरीबों की तरफ, भूखों मरते बच्चों की तरफ क्यों नहीं मोड़ पाता? और अगर यह मोडऩे में उसकी दिलचस्पी नहीं है, या यह उसकी ताकत से परे है तो फिर वह किस तरह सर्वशक्तिमान ईश्वर माना जा सकता है?
दुनिया में त्यौहारों के हर मौके पर आस्था का सैलाब देखने मिलता है। यह तो हिंदुस्तान का लोकतंत्र है जो हमें ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाने की इजाजत देता है। दुनिया के कई ऐसे अधिक धार्मिक कट्टर देश हैं जिनमें ऐसे एक सवाल से लोग जेल चले जाते हैं और लंबी सजा या मौत की सजा तक पहुंच जाते हैं। लेकिन ऐसे लोकतंत्र में जहां पर कि गरीबी और भुखमरी की तस्वीरें आए दिन अखबारों में दिखती हैं वहां भी आस्थावान लोग ईश्वर के बजाय भूखों को दूध चढ़ाना, लड्डू खिलाना क्यों नहीं सोच पाते? हम पल भर के लिए बहस के लिए यह मान भी लें कि धर्म का लोगों पर कुछ अच्छा असर होता है और ईश्वर के प्रति आस्था रखने वाले लोग नास्तिकों से बेहतर होते हैं। लेकिन ऐसा एक भी सुबूत तो देखने नहीं मिलता कि उनके ईश्वर के बनाए हुए लोगों की भूख मिटाने को लोग पूजा समझते हों, और धर्म स्थलों की जगह लोग त्यौहारों पर गरीबों की बस्तियों में जाते हों। सच तो यह है कि धर्म और ईश्वर की सोच ही लोगों को कई किस्म के अपराधबोध और ग्लानि से उबरने में मदद करती है। अगर इस जन्म, पिछले जन्म और अगले जन्म की धारणा न हो, पाप और पुण्य जैसी सोच प्रचलित न हो, तो लोग गलत काम करने से हिचकेंगे और इसी जन्म में अच्छा काम करने लगेंगे। हर धर्म लोगों को हजार किस्म के खराब काम करने के बाद प्रायश्चित की छूट देता है और एक वाशिंग मशीन की तरह धर्म लोगों को अपनी आत्मा पर लगे दाग-धब्बों को धोने की बड़ी सस्ती सहूलियत देता है। दुनिया में लगभग तमाम लोग आस्तिक और आस्थावान हैं, नास्तिक तो उंगलियों पर गिने जाने वाले ही किसी को भी याद आएंगे। ऐसे में दुनिया में इतनी बेइंसाफी कैसे है? अगर ईश्वर की धारणा लोगों को गलत काम से रोकती होती तो फिर दुनिया में गलत काम खत्म ही हो जाने थे।
आज हम इस चर्चा को दूध की धार देखते हुए छेड़ रहे हैं, और बहस के लिए एक और पल के लिए मान लेते हैं कि ऊपर बैठा ईश्वर सब कुछ देख रहा है। तो फिर उसके बारे में लिखी गई इस बात को तो वो शर्तिया ही देख लेगा, और अगर वह सर्वशक्तिमान है तो फिर वह दूध की धार को भूखे पेटों की तरफ मोड़ भी देगा।
हम इसका इंतजार करेंगे।


अवैध और नैतिक के बीच की दुविधा


20 फरवरी 2012
आजकल
सुनील कुमार
इन दिनों नकल के खिलाफ दुनिया भर में संगीत कंपनियों, फिल्म इंडस्ट्री और किताबों के प्रकाशकों ने अभियान चला रखा है। जो इंटरनेट वेबसाइटें बिना किसी हक के संगीत को अपलोड करके लोगों के लिए मुफ्त में डाऊनलोड करने की सुविधा देती हैं उनमें से कुछ आज कटघरे में हैं। चीन जैसे देश में कॉपीराइट और पेटेंट अधिकारों के खुले बेजा इस्तेमाल के खिलाफ पश्चिमी देश लंबे समय से लगे हुए हैं। इसके बाद भी दुनिया भर के फुटपाथ लोगों को फिल्म, संगीत, किताब के साथ-साथ हर किस्म के फैशन-सामान की नकल देते हैं। और उन लोगों के सपने पूरे करते हैं जो कि उन्हें खरीद नहीं सकते। 
दुनिया के देशों का अपना कानून और उनके बीच के कानून ऐसी किसी भी चोरी या नकल के खिलाफ हैं। लेकिन जब बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी लागत से दर्जनों गुना अधिक दाम कमाने के लिए बाजार में बड़े-बड़े एकाधिकार कायम कर लेती हैं और दवाओं से लेकर जिंदगी बचाने के दूसरे कई किस्म के सामानों तक के दाम भारी मुनाफाखोरी के साथ तय करती हैं तो उसके खिलाफ दुनिया के कोई कानून नहीं है। और जैसा कि हम भारत की विधानसभाओं और भारत की संसद में देखते हैं, दुनिया के अधिकांश देशों में संसद से सरकार तक कारोबार का ऐसा बोलबाला रहता है कि कानून उन्हीं के हक के बनते हैं। 
भारत में सिगरेट और तंबाकू के पैकेटों पर खतरे की तस्वीर छापने का संघर्ष बरसों से चलते आ रहा था, और आज भी उसे कम भयानक दिखाने की मुहिम कंपनियां चला ही रही हैं। भारत में कहने को तो तंबाकू और शराब के इश्तहारों पर रोक है, लेकिन उसी ब्रांड से संगीत की सीडी या सोडा या पानी या कपड़े बनाकर कंपनियां अपने तंबाकू और शराब का प्रचार भी कर ही लेती हैं। यानी बाजार का कारोबार कानून की आंखों में मिर्च झोंक कर अपना काम निकाल लेता है और बाजार के हाथों बिकी सरकारें इसे सरोगेट पब्लिसिटी कहकर चुप बैठी रहती हैं। रोक के खिलाफ ऐसी राह निकालना और लोगों को नुकसान की तरफ बढ़ाना कुछ वैसा ही है जैसा अमरीका दुनिया भर में हवाई हमले करते हुए बेकसूर मौतों को कोलेटरल डैमेज कहकर इंसाफ ठहरा देता है। 
ऐसी बाजार व्यवस्था के खिलाफ, उसके एकाधिकार के खिलाफ लड़ाई का एक मोर्चा पायरेसी या नकल है। जब दुनिया के कानून और बाजार की रणनीति एक गिरोहबंदी करके लोगों के खिलाफ साजिशों को आए दिन पेश करती हैं, तो इसके खिलाफ आत्मरक्षा की लड़ाई में आम जनता को ही क्या पीछे बंधे हुए अपने हाथों के साथ लडऩे की मजबूरी होनी चाहिए? यह सिलसिला बेइंसाफी का है। 
इसलिए जो कंपनी बहुत बड़ी हो चुकी है, जो लेखक बहुत अधिक सफल हो चुका है, जिस फिल्म की खासी कमाई हो चुकी है, फैशन के जो सामान लागत से दर्जनों गुना दाम लेने की हालत में हैं ऐसे सबकी नकल फुटपाथों से लेने में क्या हर्ज है यह बात मेरे मन में ऐसे तमाम मौकों पर आती ही है। किसी भी चीज की नकल की नौबत तभी आती है जब वह एक सीमा से अधिक कामयाब हो चुकी रहती है। किसी मामूली सामान की नकल बनाने की जहमत कौन मोल लेगा क्योंकि मामूली होने से उसके खरीददार भी तो बहुत कम ही होंगे। इसलिए पाइरेटेड किताब उसी लेखक की बाजार में आती है जो बहुत अधिक बिक चुकी है। ऐसे में दुनिया के कानून से परे लोग अगर खुद होकर यह तय करते हैं कि उसकी नकल खरीदने से लेखक और प्रकाशक भूखे नहीं मरेंगे, तो मामूली कमाई वाले लोगों को बाजार के बहुत कामयाब लोगों के बारे में ऐसा सोचने का हक तो है। 
नकल से बने सामान को खरीदना वैसे तो कानून को तोडऩे जैसा है, लेकिन जब बाजार लोकतंत्र से लेकर इंसानियत तक तक सारे कानून को तोडऩे पर आमादा हो, रात-दिन का अपना धंधा ही उसने यह बना रखा हो, तो फिर कानून के टोकरे को अपने सिर पर लादकर चलने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ गरीबों की है? भारत जैसे महान कहे जाने वाले लोकतंत्र में भी हर कानून कमजोर पर तो पूरी ताकत के साथ लादा जाता है और वही कानून ताकतवर के कदमों तक पहुंचते हुए दम तोड़कर बिछ जाता है। 
जिस तरह अंगे्रज-राज में गांधी ने बहुत से कानून तोड़े क्योंकि वे कानून भारत के हक के खिलाफ बने हुए थे। गांधी से लेकर भगत सिंह तक के आजादी के आंदोलन को देखने के दो नजरिए थे, एक से इन्हें बगावत कहा जाता था और दूसरे से इन्हें क्रांति। ठीक इसी तरह आज के बाजार की एकाधिकार की गुंडागर्दी, मनमानी, मुनाफाखोरी और सरकारी नीतियों की बाजारू खरीद-फरोख्त के खिलाफ नकल को कोई अपराध मान सकता है और कोई उसे एक ऐसा विरोध मान सकता है जो कि बाजार की साजिशों का विरोध करने के लिए शायद अकेला बच गया कारगर तरीका है। 
मैं कानून के दायरे में चलने को हमेशा ही सही और बेहतर मानता हूं। लेकिन जब कानून को बनाने और लागू करने वाली पूरी व्यवस्था गरीब के हकों के खिलाफ हो जाए तो ऐसे गरीब या छोटे ग्राहक इस कानून की आंखों में मिर्च झोंककर बाजार की मुनाफाखोरी के खिलाफ नकल खरीदने का एक नैतिक हक तो रखते ही हैं। अब मेरे मन में यह सवाल भी उठता है कि जो नैतिक रूप से सही लग रहा है, वह वैधानिक रूप से सही क्यों नहीं है? जान बचाने वाली किसी दवा के दाम अंतरराष्ट्रीय मुनाफाखोरी के चलते अगर इतने बढ़ा दिए जाते हैं कि गरीब उसे न खरीद पाने की वजह से बेमौत मर जाए तो ऐसी मुनाफाखोरी को वैधानिक बनाने वाला विधान अनैतिक है। और ऐसे विधान को न मानने में कोई बुराई भी नहीं है।
अब एक सवाल यह भी इस बात के साथ-साथ उठता है कि बाजार के किस हिस्से को अनैतिक माना जाए, और किसके खिलाफ लड़ाई में नकल को सही माना जाए यह कौन तय करेगा, और कैसे यह तय होगा? इसके पैमाने क्या होंगे? और क्या इससे एक अराजकता की नौबत नहीं आ जाएगी? यह तमाम बात मोटे तौर पर शहरों के बारे में हो रही है। और यह सोचने-समझने की जरूरत है कि इन सतही शहरी जरूरतों से कहीं अधिक बड़ी जरूरत राजधानियों से दूर के नक्सल इलाकों के आम गरीब लोगों की है। वहां पर नक्सलियों ने या उनके साथ की कुछ जनता ने अगर सरकार के कानून के कुछ हिस्से को जनहित के खिलाफ और अनैतिक मानकर बंदूक का कानून लागू करने का काम किया हुआ है, तो उसमें से कौन सी बात को जायज माना जाए? शहरों में बाजार और कानून की व्यवस्था के खिलाफ जो बगावत मुझे खटक नहीं रही है वह जंगलों में धमाकों के बीच भी क्या नहीं खटकेगी? इन दोनों मिसालों में फर्क सिर्फ एक है, या शायद बड़ा फर्क सिर्फ एक है कि एक में हिंसा शामिल है और दूसरे में खून-खराबे का कोई काम नहीं है।
एक जगह अराजकता को न्यायसंगत मानते हुए दूसरी जगह की अराजकता के खिलाफ मैं कैसे लिख सकता हूं, यह दुविधा किसी एक तर्क पर पहुंचने के लिए रास्ता ढूंढती है। जब तक ऐसी किसी राह का कोई नक्शा मेरे दिमाग में साफ न हो सके, तब तक भी यह बात साफ है कि मैं अपने पैमाने से जो ब्रांड मुनाफाखोर पाता हूं, उनकी जरूरत होने पर नकल को खरीद भी लेता हूं। दो लाख रूपए की किसी घड़ी की दो हजार रूपए वाली चीन की बनी हुई नकल से अगर कुछ लोगों के सपने पूरे होते हैं तो यह नकल उसी तरह अच्छी है जिस तरह भारत में एक किसी साबुन के इश्तहार में, दाग अच्छे हैं, जैसी बात कही गई है। जो नकल किसी सामान के असली ग्राहकों को कम न करे, और मामूली ग्राहकों के सपने भी पूरे कर सके, तो वह नकल शायद अच्छी ही है।
बाजार की हिंसा और साजिशों के खिलाफ जब सरकार, संसद और अदालत, किसी भी जगह लड़ाई कारगर न हो तो शहरों के भीतर बिना खून-खराबे वाली ऐसी अवैधानिक लेकिन नैतिक हक वाली लड़ाई ठीक है। दुनिया में जहां-जहां देश मिलकर बाजार के नए कानून बनाने को जुटते हैं, उन तमाम सम्मेलनों के सामने सड़कों पर सामाजिक संगठन आर्थिक साजिशों के खिलाफ आंदोलन करते खड़े रहते हैं। नकल को बनाना चाहे कोई सामाजिक आंदोलन न हो, लेकिन बाजार के दानवों को कुछ कमजोर करने में गरीब-विरोधी कानून को तोडऩे में क्या बुराई है? दुनिया में जब आर्थिक समानता की सोच पूरी तरह खत्म कर दी गई हो, तो लोगों को यह हक तो मिलता ही है कि वे अपने हिसाब से पूंजी का एक नया बंटवारा करने का नया रास्ता तलाशें। 
अवैध और नैतिक के बीच की यह दुविधा मेरे मन में जारी ही है।

आदिवासियों के खिलाफ कारखानों की साजिश


संपादकीय
19 फरवरी 12

छत्तीसगढ़ में जगह-जगह कारखानों के लिए आदिवासियों की जमीनें लेने के लिए एक बड़ी साजिश चल रही है। देख भर के बड़े-बड़े कारखानेदार इस खनिज-संपन्न राज्य में कानून तोडऩे में लगे हैं। अभी कुछ ही महीने हुए हैं कि बस्तर में एस्सार नाम की कंपनी को नक्सालियों को एक फर्जी जनसंगठन के रास्ते से नक्सलियों को करोड़ों रूपये देने का मामला पकड़ाया। लेकिन कल हमने जो रिपोर्ट छापी है, वह और भी भयानक है। उद्योगपति इस राज्य में कारखाने लगाने के लिए सैकड़ों और हजारों एकड़ जमीनें खरीद रहे हैं। राज्य का शायद ही ऐसा कोई इलाका हो जहां पर बिजली हो, सड़क और पटरी हो, जो खदानों के पास हो और जहां आदिवासियों की जमीनें न हों। नतीजा यह हो रहा है कि तकरीबन हर कारखानेदार जालसाजी और साजिश करके कुछ गरीब आदिवासियों के नाम पर दूसरे आदिवासियों की जमीनें खरीद रहा है और ऐसे कर्मचारियों या बिचौलियों के नाम की जमीन को कारखाने की जमीन बताकर राज्य और केंद्र से तरह-तरह की मंजूरी भी ले रहा है। यह उसकी अपनी एक कारोबारी मजबूरी हो सकती है लेकिन भारत के आदिवासियों को शोषण से बचाने के लिए उनकी जमीनों की खरीदी-बिक्री गैरआदिवासियों को रोकने के कड़े कानून लागू हैं। और इन दिनों छत्तीसगढ़ में चल रही खरीदी में इस कानून को सोच-समझकर, जमकर तोड़ा जा रहा है जो कि आदिवासियों की लूट से कम कुछ नहीं है। 
कानून की हमारी बहुत साधारण समझ यह कहती है कि आदिवासियों के ऐसे षडयंत्र भरे शोषण पर एक कड़ी कार्रवाई करने के लिए आदिवासी कानून मौजूद हैं। राज्य सरकार का न सिर्फ यह अधिकार बनता है कि आदिवासियों की जमीन को एक साजिश से हथियाने वाले ऐसे लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाए, बल्कि सरकार की यह जिम्मेदारी भी बनती है। और सरकार से परे भी राज्य और केंद्र में आदिवासियों के हितों को बचाने के लिए कुछ संवैधानिक संगठन बने हुए हैं जिनमें मनोनीत नेताओं को जनता के खर्च से ऐशो-आराम मिलते हैं, और अगर ऐसे मामलों में ये संवैधानिक संस्थाएं कार्रवाई नहीं करती हैं तो हमारे हिसाब से वे अपनी जवाबदेही पूरी नहीं करतीं और उनकी इस अनदेखी के खिलाफ भी अदालत जाया जा सकता है। यह मामला आदिवासी हितों को लेकर लडऩे वाले जनसंगठनों के अदालत जाने लायक भी है और अदालतें खुद होकर भी ऐसे मामलों पर कार्रवाई शुरू कर सकती हैं। भारत की न्यायपालिका अपने जज के ट्रैफिक जाम में फंस जाने पर भी अदालती कार्रवाई शुरू करने का इतिहास दर्ज कर चुकी है, लेकिन मासूम और बेजुबान आदिवासियों के खिलाफ ऐसी बाजारू साजिश पर शायद अदालतों को किसी के आने और दरवाजा खटखटाने का इंतजार होगा। सरकारी रोजी के काम में लगे हुए गरीबी की रेखा के नीचे के आदिवासियों के नाम बैंक खाते खुलवाकर, उसमें करोड़ों रूपए डालकर दूसरे आदिवासियों की जमीनें खरीदने की साजिश देखने लायक है। कल के अखबार में हमने इसके दस्तावेजी सुबूतों और तस्वीरों सहित रिपोर्ट छापी है और छत्तीसगढ़ में आदिवासी हितों की बात करने वाले लोगों की परख का यह मौका है।
अब लगे हाथों इस बात पर भी चर्चा होनी चाहिए कि उद्योगों के लिए जमीन लेने में जो दिक्कतें आती हैं, उनका क्या इलाज निकाला जा सकता है। इसके लिए केंद्र सरकार एक अलग कानून की बात कर रही है और वह आने को है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने निजी उद्योगों के लिए जमीनें लेकर देने का सिलसिला बंद कर दिया है और अब कारखानेदारों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे बाजार में अपने लिए जमीन का इंतजाम करें। केंद्र और राज्य की इन दो नीतियों के बीच उद्योगों का लगना खासा मुश्किल है और इसका कोई रास्ता देश में निकालना होगा। लेकिन किसी दिक्कत की वजह से लोगों को कानून तोडऩे का हक नहीं मिल सकता। ऐसा हो तो फिर देश के हर गरीब और भूखे को यह हक मिल जाएगा कि वे संपन्न तबके की कारों को तोड़कर उसमें से सामान निकाल लें और दुकानों को तोड़कर उसमें से खाना निकाल लें। कानून के राज में ऐसी छूट गरीबों को नहीं मिल सकती, इसलिए अमीरों को भी कानून तोडऩे की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में आदिवासी जमीन को लेकर जो साजिश हुई है, उसमें हमारे हिसाब से आयकर विभाग की कार्रवाई भी बनती है और ऐसे तमाम लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा न हो जाए कि अंधा कानून बीच में डाले गए आदिवासियों को जेल भेजकर साजिश करने वाले कारखानेदारों को बचा ले।

राष्ट्रीय खतरे और राजनीतिक हिसाब


संपादकीय
18 फरवरी 12

देश के आधा दर्जन से अधिक गैरकांगे्रसी मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार की एक ऐसी नई निगरानी संस्था राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र (एनसीटीसी) का विरोध किया है।  उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडू, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश  खुलकर इसके खिलाफ आ गए हैं। इसमें केंद्र की यूपीए सरकार के लिए अधिक बड़ी परेशानी पश्चिम बंगाल से है जहां यूपीए की भागीदार पिछले कई महीनों से लगातार केंद्र सरकार से खफा चल रही है और इन दोनों के बीच बिना तनातनी देखे सूरज डूब नहीं रहा है। यूपीए के हिस्सेदारों में से तमिलनाडु में करूणानिधि वैसे ही घायल चल रहे हैं, और बाहर से यूपीए का साथ देने वाले माया-मुलायम के खिलाफ कांगे्रस के नेता लगभग हर घंटे गालियां दे रहे हैं। यह पूरी नौबत एक भयानक कमसमझी का सुबूत है।
लेकिन आज की यह चर्चा हम यूपीए की नासमझी और कमअक्ली भरी बददिमागी पर खराब करना नहीं चाहते। उसके लिए कल तक कांगे्रस फिर सामान जुटा देगी। आज हम इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि भारत के संघीय ढांचे के भीतर केंद्र और राज्यों के अधिकारों को लेकर आज एक ऐसे मुद्दे पर तनाव खड़ा हो रहा है जो पूरे देश को चूर-चूर करने की ताकत रखता है। आतंकवाद विरोधी केंद्र की यूपीए सरकार की सोच राज्यों को उनके अधिकार क्षेत्र में दखल लग सकती है, हो सकता है कि यह कानून व्यवस्था लागू करने के राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में पूरी दखल भी हो। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि जब देश के बहुत से राज्यों में घरेलू और विदेशी आतंक बढ़ते चले जा रहा है तब केंद्र सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है और उसके लिए उसे किस तरह के अभूतपूर्व अधिकारों की जरूरत है? अमरीका की मिसाल सामने है, जो दुनिया भर पर हमले करता है लेकिन खुद अमरीका की जमीन पर उसके खिलाफ किसी तरह के आतंकी हमले के खतरों को लगभग खत्म कर दिया गया है। इसके लिए वहां कुछ ऐसे केंद्रीय कानून हैं जो कि वहां की राष्ट्रीय सरकार को राज्यों के भीतर भी निगरानी रखने और कार्रवाई करने का हक देते हैं। भारत में अमरीका की एफबीआई जैसी कोई संस्था नहीं है। गैरकांगे्रसी पार्टियों की यह आशंका सही है कि ऐसे अभूतपूर्व अधिकारों से लैस कोई केंद्रीय संस्था कांगे्रस जैसे घाघ राजनीतिक दल के हाथों में राजनीतिक साजिशों का हथियार बन सकती है। लेकिन केंद्र पर राज करना न तो कांगे्रस का एकाधिकार है, और न ही दूसरी पार्टियों की सत्ता दिल्ली में आने पर ऐसे किसी बेजा इस्तेमाल से उनको भी रोका जा सकेगा। 
ऐसे में हमको यह बात लग रही है कि आशंकाओं के चलते किसी जरूरी संस्था का विरोध करना केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक परेशानी खड़ी करने का काम तो हो सकता है लेकिन इससे देश एक ऐसे खतरे में भी पड़ सकता है जिससे उबरना फिर रातों-रात मुमकिन नहीं होगा। यह कुछ उसी तरह का मामला होगा कि आग लगने पर बाल्टी खरीदने का टेंडर निकालना। आतंक के खिलाफ लडऩे के लिए एक मजबूत केंद्रीय संस्था पहली नजर में ठीक और जरूरी लगती है। लेकिन देश की इस बहुत ही जरूरी जरूरत पर प्रदेशों को सहमत करने की क्षमता कांगे्रस खो चुकी है। वह गिनती के दम पर यूपीए में मुखिया तो बनी हुई है, लेकिन जिन पार्टियों ने उसे आड़े वक्त पर संसद में साथ दिया था उन पार्टियों को भी बिना किसी जरूरत गालियां बकने से वह अपने बड़बोले नेताओं को रोक नहीं पा रही है। आज पूरे देश की राजनीति में कांगे्रस ने एक ऐसा माहौल बना दिया है कि जिसको गाली खानी हो, वह आकर उसका साथ दे। 
भारत जैसे चुनाव आधारित लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं जनहित और अपनी चुनावी संभावनाओं के बीच डोलती रहती हैं। ऐसे में इस पेंडुलम को अपनी तरफ करने के लिए उस पार्टी को भी कोशिश करनी पड़ती है जो कि देश पर राज कर रही है या देश पर राज करने वाले गठबंधन की मुखिया हो। कांगे्रस के साथ परेशानी यह है कि उसकी मुखिया से कोई उसी वक्त बात कर सकता है जब मुखिया ऐसा चाहती हैं। और उसके गठबंधन के प्रधानमंत्री न कोई बात करते और न ही उनसे बात का कोई मतलब कांगे्रस की व्यवस्था में निकलता है। ऐसे में यह देश केंद्र के सत्तारूढ़ गठबंधन की नालायकी का दाम चुका रहा है और देश के लिए जरूरी सुरक्षा एजेंसी भी खड़ी नहीं हो पा रही है। लेकिन आखिर हम एक बार फिर सभी राजनीतिक दलों से यह कहना चाहेंगे कि राष्ट्रीय खतरों के मामलों को राजनीतिक हिसाब-किताब से परे रखना चाहिए।