26 दिसंबर 2014
संपादकीय
झारखंड के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे रघुबर दास के बारे में छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव से खबर मिली है कि वे बचपन में वहां रहे हुए हैं, और अपने मजदूर मां-बाप के साथ वे यहां से झारखंड गए थे क्योंकि उनके मां-बाप के लिए यहां काम नहीं था। देश के सबसे अधिक खनिज-संपन्न राज्यों में से एक झारखंड में डेढ़ दशक की राजनीतिक अस्थिरता के बाद अब भाजपा का जो मुख्यमंत्री बनने जा रहा है, वह ऐसे बचपन से ऊपर उठकर यहां तक पहुंचा है, यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गौरव की बात है। लोगों के कामकाज तो इतिहास में दर्ज होते हैं, लेकिन इस लोकतंत्र में लोगों की संभावना देखने लायक है। बचपन में चाय बेचने वाला इस देश का प्रधानमंत्री है, और यह कोई आज की ही बात नहीं है, तमिलनाडू के एक वक्त मुख्यमंत्री रहे, और कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति में सबसे बड़े नेताओं में से एक कामराज नाडर को 11 बरस की उम्र में स्कूल छोड़ देनी पड़ी थी, क्योंकि पिता गुजर गए थे, और मां की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कपड़े की दुकान में काम करते हुए जिंदगी आगे बढ़ाई। लेकिन देश भर में राजनीति का यह हाल आम नहीं है। आम तो भारतीय राजनीति में कुछ कुनबों का दबदबा है। हम कई बार देश भर में कई प्रदेशों में, और केन्द्रीय राजनीति में भी बुरी तरह और पूरी तरह से हावी कुछ परिवारों का जिक्र कर चुके हैं, जो कि लोकतांत्रिक राजनीति को एक गृह उद्योग की तरह चलाते हैं। ऐसे में जब पहली पीढ़ी के राजनेता उभरकर सामने आते हैं, और ऊंचाई तक पहुंचते हैं, तो अमरीका के बराक ओबामा की भी याद आती है जो कि एक प्रवासी परिवार में पैदा, अफ्रीकी मूल के, अमरीका में वंचित तबके के, नस्लभेद के शिकार रहते हुए भी राष्ट्रपति बने।
मोदी से लेकर रघुबर दास तक की मिसालें बहुत से लोगों के लिए एक उम्मीद लेकर आती हैं कि अपने कुनबे की ताकत के बिना भी लोग लगातार मेहनत करके ऊपर तक पहुंच सकते हैं। न राजनीतिक विरासत, न सांसदों या विधायकों को खरीदने की जरूरत, अकेले अपने दम पर भी लोग बड़ी कमजोर जिंदगी से लोकतंत्र के सबसे ऊंचे ओहदों तक पहुंच सकते हैं। और राजनीति से परे भी हर बरस केन्द्र सरकार की सबसे बड़ी नौकरियों के लिए होने वाली यूपीएससी परीक्षाओं के बाद कहानियां सामने आती हैं कि किस तरह एक ऑटो रिक्शा वाले की बेटी आईएएस अफसर बन गई, या रोजी पर मजदूरी करने वाले मां-बाप के बच्चे आईपीएस बन गए। यह बात सही है कि भारतीय लोकतंत्र में गैरबराबरी बहुत अधिक है, और ऐसी मिसालें अधिक नहीं हैं, लेकिन मिसालें तो गिनती की ही होती हैं, और उनसे निकलने वाला हौसला दूर तक रौशनी बिखेरता है।
भारत में कई खेलों में भी ऐसे खिलाड़ी बहुत ऊपर तक पहुंचे जहां उनका मुकाबला बड़े ताकतवर और संपन्न परिवारों के बच्चों से हुआ। उसके बावजूद नंगे पैर दौडऩे वाले बच्चे भी आसमान तक पहुंचे। आज जब देश में चारों तरफ चोरी और बेईमानी के चलते आने वाले दिन लोगों को अंधेरे में लगते हैं, तब ऐसी मिसालें भी आगे बढ़ानी चाहिए, ताकि लोग सिर्फ गैरबराबरी का बहाना लेकर मेहनत छोड़ न दें।


