26 फरवरी 2018

दुनिया में ऑनलाईन डेटिंग के कारोबार में लगी बहुत सी ऐसी कंपनियां हैं जो कि लोगों को अपनी पसंद के लोगों से मिलवाने का काम करती हैं। जिस तरह हिन्दुस्तान में लंबे वक्त से शादियां तय करवाने के काम में बहुत से वेबसाइटें लगी हैं, उसी तरह पश्चिमी दुनिया में डेटिंग एक बड़ा कारोबार है जिसमें शादी के नजरिए से देखे बिना भी लोगों को आपस में मिलवाया जाता है।
दरअसल इसकी जरूरत इसलिए बढ़ती चल रही है कि पहले तो लोग बाहर निकलते थे तो एक-दूसरे से बात करने के मौके आते भी थे। अब तो अपनी व्यस्त जिंदगी में लोग कानों में ईयरफोन लगाए हुए चलते हैं, और अगल-बगल के लोगों से बात करना घटते जा रहा है। लोग अब खरीददारी करने भी कम निकलते हैं, और वे घर बैठे ऑनलाईन शॉपिंग से काम चला लेते हैं। बाग-बगीचों या जिम में कसरत करते या दौड़ते हुए भी लोगों के कान अगल-बगल के लोगों की बात सुनने को खाली रहते नहीं हैं। ऐसे में लोगों की एक-दूसरे से मेल-मिलाप की गुंजाइश घटती चली गई है, बड़ी तेजी से।
दूसरी तरफ लोगों की उम्मीदें बढ़ती चली गई हैं क्योंकि वे पूरी दुनिया के लोगों को देखने लगे हैं, और महज आसपास के दायरे के गिने-चुने लोगों तक पसंद को सीमित रखने की बेबस मजबूरी उनके सामने नहीं रह गई है। अब लोग सोशल मीडिया पर एक-दूसरे से मिलते हैं, और वहां पर वे अपनी तमाम खामियों-कमजोरियों को छुपाकर या घटाकर भी अपनी एक बेहतर तस्वीर पेश करते हैं जिससे कि उनसे ऑनलाईन मिलने वालों की उम्मीदें बढ़ती जाती हैं।
अब ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि बढ़ी हुई उम्मीदों और घटी हुई संभावनाओं वाले लोगों को आपस में मिलवाने का काम किस तरह किया जाए कि जिससे लोगों के बीच तालमेल की गुंजाइश अधिक रहे? लोगों की पसंद-नापसंद, उनका पेशा, उनके शौक, उनके तौर-तरीके, खानपान, रहने और काम करने के पसंदीदा इलाके, अब ऐसी सैकड़ों चीजें हो गई हैं जो लोगों को एक जटिल ढांचा बना देती हैं, और उसके मनमुताबिक, उसकी जरूरत के मुताबिक एक दूसरे जटिल ढांचे से उसका मेल-मिलाप कराना अब जहां दिखने में पहले से आसान लगता है, वह हकीकत में पहले से अधिक मुश्किल हो गया है। लोगों की अपने साथी को लेकर कल्पनाएं और जरूरतें लगातार बढ़ गई हैं, और ऐसे दो लोगों को मिलाकर एक कामयाब जोड़ा बनाना बहुत आसान बात नहीं रह गई है।
ऐसे में अमरीका की एक बड़ी कंपनी ने कम्प्यूटर के ऑर्टिफीशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करके एक ऐसा लव-एल्गोरिद्म बनाया है जो कि कामयाब जोड़े या कि कामयाब मोहब्बत का दावा करता है। इस कंपनी के लोगों का कहना है कि दो लोगों के बीच एक जोड़ा बनने की, उनके बीच मोहब्बत पनपने की, और फिर कामयाब भी होने की जैसी संभावना उनका यह एल्गोरिद्म पेश करता है, ऐसा इसके पहले कभी नहीं हुआ था।
हिन्दुस्तानी लोगों को याद होगा कि यहां के हिन्दू समाज में जन्म कुंडली मिलाने की पुरानी परंपरा रही है। लोग शादी का जोड़ा तय करते हुए किसी ज्योतिषी के पास जाते हैं जो कि दोनों की कुंडलियों के ग्रह-नक्षत्र देखकर यह तय करता है कि दोनों के कितने गुण मिलते हैं। और जितने अधिक गुण मिलें, उतनी ही अधिक संभावना उस जोड़े के सफल होने की कही जाती है। अब पता नहीं यह बात कितनी सच है, और कितनी पाखंड, लेकिन यह परंपरा सैकड़ों बरसों से तो भारत में चल ही रही है, और अभी भी मैचमेकिंग की जो वेबसाइटें हैं, वे कुंडली पूछती हैं, और यह भी पूछती हैं कि कुंडली में अगर मंगल दोष है तो उसके लिए जोड़ीदार मांगलिक चलेगा/चलेगी, या नहीं। ग्रह-नक्षत्र के रास्ते जोड़ी तय करने का काम भारत में सैकड़ों या हजारों बरस चले आ रहा है, अब वह एक अलग शक्ल में पश्चिम में सामने आया है।
अभी इसी तरह की मोहब्बत मिलवाने के कारोबार पर एक रिपोर्ट आई जिससे ऐसा लगता है कि कारोबारी दिल के फैसला लेने वाले हिस्से का काम अब कम्प्यूटरों से करने लगे हैं, जाहिर तौर पर, कमाई के लिए। एक वक्त हिन्दुस्तान में गांवों में रिश्ते सुझाने का काम नाई किया करते थे क्योंकि उनका हर घर में आना-जाना रहता था, वे बच्चों को बचपन से जानते थे, और परिवार की दूसरी बातें भी उनकी नजरों में रहती थीं। अब उसी किस्म की बहुत सी जानकारियों को लेकर कम्प्यूटरों के रास्ते यह कारोबार पनप रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि एक वक्त जिसे पहली नजर की मोहब्बत कहा जाता था, क्या उसके दिन लद गए हैं? अब यह कारोबार किसी को पहली नजर के असर का मोहताज नहीं रहने देगा, और खुद ही पहली, दूसरी, तीसरी, और चौथी नजर बनकर लोगों को एक-दूसरे से प्रभावित करेगा? अब ऐसे कारोबारी अपने कम्प्यूटरों, और उनकी कृत्रिम बुद्धि से यह फैसला ले लेंगे कि कौन सा दिल किस दूसरे दिल को अधिक पसंद करेगा? क्या समाज में हजारों बरस से चली आ रही एक व्यवस्था को, लोगों के एक-दूसरे से मिलने को, एक-दूसरे को परखने को, एक-दूसरे को पसंद करने को जो मेहनत लगती थी, वह अब ये कम्प्यूटर पल भर में कर लेंगे, और लोगों को एक भुगतान के एवज में उनकी सबसे अच्छी और संभावित मोहब्बत से मिलवा देंगे?
अभी दुनिया के कई दूसरे देशों में कुछ सौ बरस ही हुए हैं जब नौजवान अपनी मर्जी से शादी कर रहे हैं, पहले तो परिवार ही यह काम करता था, जैसा कि हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में आज भी करता है। बीच के कुछ सौ से लेकर कुछ बरस तक का यह दौर लोगों की अपनी पसंद का हुआ, और अब ऐसा लगता है कि एक बार फिर इंसान अपनी पसंद का काम दूसरों को दे रहा है, इस बार किसी नाई और अपने माता-पिता को न देकर एक कम्प्यूटर को दे रहा है!
यह बात सुनने में पहली नजर में अच्छी और कामयाब तरकीब लगती है कि लोग अपने सपने के राजकुमार, या सपनों की राजकुमारी से जितनी उम्मीदें हैं, उसमें से अधिकतर उम्मीदें पूरी करने वाले/वाली जोड़ीदार को पा लेंगे। लेकिन दूसरी तरफ यह लगता है कि समाज में जो सिलसिला लोगों को परखते हुए जोड़ीदार तय करने का विकसित हुआ था, क्या वह एक-दो सदी के भीतर ही हाशिए पर कर दिया जा रहा है, और यह जिम्मा, यह काम कारोबारी-कम्प्यूटरों के हवाले कर दिया जा रहा है? क्या इससे उन लोगों की मोहब्बत नाकामयाब होने, और दिल टूटने के खतरे खत्म होने लगेंगे जो कि उस दौर से निकलकर उर्दू की शायरी करते हैं?
ऐसे कारोबारियों का एक बड़ा दिलचस्प तर्क है, उनका कहना है कि जैसे-जैसे इंसान की जिंदगी लंबी होती जा रही है, वैसे-वैसे उसकी अपने साथी के साथ रहने की उम्र भी लंबी होती जा रही है। अब जब लोग सौ बरस के पार जीने लगेंगे, तो हो सकता है कि उनकी शादीशुदा जिंदगी पौन सदी की हो, और ऐसा लंबा वक्त जिस जीवनसाथी के साथ गुजारना हो, उसे अच्छे से ठोक-बजाकर तय करना अधिक जरूरी होते जाएगा ताकि दिक्कत-तकलीफ अधिक लंबे वक्त का बोझ न बने। इनकी बनाई जोडिय़ां ऐसे सभी किस्म का ख्याल रखकर बनाई जाएंगी जो मोहब्बत से शादी तक और डेटिंग से डेथ तक का ख्याल रख पाएं।
इससे समाज के ढांचे पर एक बुनियादी असर पड़ सकता है क्योंकि लोगों के बीच मेलजोल के मार्फत जो घरोबा होता था, उसे पूरी तरह घटाकर एक-दूसरे को तश्तरी पर धरकर पेश कर दिया जाएगा। क्या यह कुछ उसी किस्म का होगा कि फल-सब्जी खाने के बजाय उनसे मिलने वाले विटामिन का कैप्सूल ही खा लिया जाए? अब यह तो धीरे-धीरे समझ आएगा कि बहुत महीन उम्मीदों और जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने वाले ऐसे जोड़ीदार तलाशने का कम्प्यूटरी-दिमाग समाज की अब तक चली आ रही व्यवस्था को किस तरह तोड़मोड़ कर रख देगा? इंसान ने जब कम्प्यूटर बनाए थे उसने अपने हिस्से का कुछ काम उन पर डाला था। आज कारोबारियों में उन कम्प्यूटरों में ऐसा आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस डाल दिया है कि अब वे इंसान के दिल के हिस्से वाला काम भी करने का दावा कर रहे हैं! (Daily Chhattisgarh)








