महाराष्ट्र सरकार की एक अच्छी पहल जो पूरे देश, में लागू की जानी चाहिए
19 मई 2022
हिन्दुस्तान में चारों तरफ से लगातार आ रही
बुरी खबरों के बीच कोई एक अच्छी सरकारी खबर भी आ सकती है, इसकी उम्मीद कम
ही रहती है। लेकिन आज महाराष्ट्र से ऐसी ही एक खबर आई है। वहां राज्य सरकार
के ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से प्रदेश की एक ग्राम पंचायत, हेरवाड़,
की मिसाल देते हुए सभी पंचायतों के लिए यह आदेश निकाला गया है कि किसी भी
महिला के पति की मृत्यु होने पर उसकी चूडिय़ां तोडऩे, माथे से सिंदूर
पोंछने, और मंगलसूत्र निकालने की प्रथा खत्म की जाए। एक ग्राम पंचायत ने
ऐसी मिसाल कायम की है, और उसकी चारों तरफ तारीफ भी हो रही है। उसका जिक्र
करते हुए सरकार ने पूरे प्रदेश से इस प्रथा को खत्म करना तय किया है। यह
बात कुछ लोगों को सरकार के दायरे के बाहर की लग सकती है क्योंकि ऐसे लोगों
को यह लगता है कि सामाजिक प्रथाएं सरकार के काबू के बाहर रहनी चाहिए, ठीक
उसी तरह जिस तरह कि हिन्दुस्तान में आज बहुत से लोगों को लगता है कि
बहुसंख्यक तबके की धार्मिक भावनाएं संविधान से ऊपर हैं। हिन्दुस्तान के
बहुसंख्यक मर्दों को यह लगता है कि औरतों को कुचलने के लिए जितने तरह के
रीति-रिवाज बनाए गए हैं वे जायज हैं, और धार्मिक या जातिगत संस्कारों के
अंगने में सरकार का क्या काम है?
इस देश में महिलाओं के बराबरी के कानूनी दर्जे, और उनके लिए बनाए गए तरह-तरह के कानूनों के बावजूद उनकी स्थिति बहुत कमजोर है। परिवार में न सिर्फ गृहिणी को आखिर में खाना नसीब होता है, बल्कि किसी लडक़ी को भी अपने भाई के मुकाबले कम पढ़ाई, कम इलाज, और यहां तक कि कम खाना भी नसीब होता है। मुम्बई के टाटा कैंसर अस्पताल का एक सर्वे है कि वहां पहुंचने वाले कैंसर पीडि़त बच्चों में से लडक़ों को तो अधिकतर मां-बाप इलाज के लिए लेकर आते हैं, लेकिन बहुत ही कम लड़कियों को जांच के नतीजे के बाद इलाज के लिए लाया जाता है। दोनों ही किस्म की संतानें उन्हीं मां-बाप की रहती हैं, लेकिन जन्म के पहले अगर कन्या भ्रूण हत्या करने की सहूलियत नहीं रहती, तो बाद में भेदभाव करके उस गंवाए हुए मौके को दुबारा हासिल कर लिया जाता है। भारतीय समाज में पत्नी खोने वाले किसी आदमी के कपड़े, हुलिए, या उसकी किसी और बात से उसके विधुर होने का पता नहीं लगता है, लेकिन पति खोने वाली महिला को सती बनाना अब मुमकिन नहीं रह गया है, इसलिए उसे विधवाश्रम के लायक बनाकर, खुशी के मौकों पर घर के पीछे के बंद कमरे में धकेलकर, उसके रंगीन कपड़े छीनकर, उसका सिर मुंडाकर, उसके गहने और सिंदूर हटाकर, उसका मांसाहार और प्याज-लहसुन तक छीनकर समाज एक औरत को उसकी औकात दिखा देता है। इसलिए ऐसे समाज में सुधार के लिए महिलाओं के मुद्दे चर्चा में भी बने रहना जरूरी है, और जैसा कि महाराष्ट्र सरकार ने इस ताजा फैसले में किया है, सरकार और समाज को इस सुधार के लिए लगातार कोशिश करना भी जरूरी है।
महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए इस देश में महिला आरक्षण जैसे मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहिए था, लेकिन आज देश में कोई भी राजनीतिक दल इसकी चर्चा भी नहीं करते। और तो और जिस कांग्रेस पार्टी ने उत्तरप्रदेश में अभी प्रियंका गांधी की अगुवाई में 40 फीसदी उम्मीदवार महिलाओं को बनाया था, उसने भी अपने ताजा तीन दिनों के चिंतन शिविर में महिलाओं के बारे में कुछ भी नहीं कहा। इंदिरा गांधी के बाद सोनिया गांधी इस पार्टी की दूसरी महिला मुखिया हैं, और प्रियंका गांधी को अगली मुखिया बनाने की सलाह हवा में तैर ही रही है। लेकिन इस पार्टी के राज वाले गिने-चुने बचे प्रदेशों में भी विधानसभा में महिला आरक्षण लागू करने का कोई प्रस्ताव तक नहीं उठाया जा रहा जिससे कि केन्द्र के पाले में गेंद फेंककर महिला आरक्षण को एक बार फिर चर्चा में लाया जा सकता था। कांग्रेस पार्टी के सामने यह एक ऐतिहासिक मौका था कि उसके पास देश में खोने के लिए कोई सीटें भी नहीं हैं, कुल पचासेक सीटें उसके पास लोकसभा में रह गई हैं, और ऐसे में वह उत्तरप्रदेश वाले महिला उम्मीदवारी के फॉर्मूले को पूरे देश के लिए घोषित कर सकती थी, लेकिन यह जाहिर है कि इस पार्टी के भीतर भी महिलाओं का अनुपात कोई मुद्दा नहीं रह गया है, और उत्तरप्रदेश का चुनाव खोने के बाद पार्टी ने बड़ी सहूलियत से महिलाओं के मुद्दे को भुला दिया है। कम ही लोगों को यह याद होगा कि पिछले आम चुनाव में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, इन तीनों कांग्रेस-प्रदेशों में कुल तीन कांग्रेस सांसद चुने गए थे जिनमें छत्तीसगढ़ की श्रीमती ज्योत्सना महंत भी एक थीं। इसी तरह उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में दो कांग्रेस विधायक चुने गए जिनमें से एक आराधना मिश्रा थीं। गांव-गांव में महिला पंच-सरपंच अलग-अलग जाति आरक्षण के साथ भी उम्मीदवारी के लिए भी मिल जाती हैं और जीतकर भी आती हैं। लेकिन कोई राजनीतिक दल उन्हें आबादी के अनुपात में टिकट देने को तैयार नहीं होते। भारतीय लोकसभा में आज कुल 14 फीसदी महिला सांसद हैं जबकि अफ्रीका में सबसे कम महिला सांसद केन्या में हैं, जो कि 22 फीसदी हैं। इसलिए आज जब महाराष्ट्र सरकार के इस महिला के हक के फैसले की हम तारीफ कर रहे हैं, तब देश की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूख पर अफसोस भी जाहिर कर रहे हैं कि जब इस पार्टी के पास खोने को कुछ नहीं बचा है, तब भी उसने महिलाओं के हक की बात करने का यह मौका खो दिया है।
आज जब इस बारे में हम लिख रहे हैं तब भारत का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण सामने है। केन्द्र सरकार के आंकड़े कहते हैं कि सर्वेक्षण में शामिल हुए 80 फीसदी हिन्दुस्तानी कम से कम एक बेटा होने की चाह रखते हैं। और इस चाहत के चलते दो बेटों के बाद तीसरी बेटी हो या न हो, दो बेटियों के बाद तीसरा बेटा तो हो ही जाता है। बच्चों के जन्म के समय लडक़े और लडक़ी का फर्क समाज में जीवनसाथी खो चुके आदमी और औरत के बीच फर्क तक जारी रहता है, और इसे टुकड़े-टुकड़े में नहीं सुधारा जा सकता। महाराष्ट्र सरकार की यह ताजा पहल देश के बाकी प्रदेशों में भी आगे बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि वृन्दावन के विधवाश्रमों में बेसहारा विधवा महिलाएं तो पूरे देश से ही भेजी जाती हैं।
घर के जलते-सुलगते मुद्दों पर फैसला न लेने में महारथ हासिल करने के नुकसान
18 मई 2022
चिंतन शिविर से कांग्रेस की चिंता कम होते
नहीं दिख रही है। जिस दिन राजस्थान में तीन दिन का यह चिंतन शिविर जारी ही
था, उसी दिन पंजाब कांग्रेस के एक बड़े नेता सुनील जाखड़ ने पार्टी से
इस्तीफा दिया, और कल की खबर यह थी कि जाखड़ के समर्थन में बहुत से और
कांग्रेस नेता आवाज उठा रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष
नवजोत सिंह सिद्धू ने उसी वक्त यह ट्वीट किया था कि कांग्रेस को सुनील
जाखड़ को नहीं खोना चाहिए जो कि अपने वजन जितने सोने के बराबर कीमती हैं,
हर मतभेद को बातचीत से सुलझाना चाहिए। अब आज सुबह की ताजा खबर है कि गुजरात
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल ने बड़े गंभीर आरोप लगाते हुए
पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपनी उपेक्षा गिनाने के साथ-साथ
कांग्रेस की नीतियों और तौर-तरीकों की कड़ी निंदा की है। उनके इस्तीफे की
भाषा राहुल गांधी पर सीधा हमला करने वाली है, और उन्होंने कहा कि उन्हें
प्रदेश कांग्रेस कमेटी की किसी भी बैठक में नहीं बुलाया जाता, कोई भी
निर्णय लेने से पहले वो मुझसे राय-मशविरा नहीं करते, तब इस पद का क्या मतलब
है? उन्होंने कहा कि हाल ही में पार्टी ने राज्य में 75 नए महासचिव, और 25
नए उपाध्यक्ष घोषित किए हैं, और उनसे एक बार भी कोई राय नहीं ली गई।
कांग्रेस के चिंतन या संकल्प शिविर से लंबे-लंबे भाषण तो निकलकर आए हैं, लेकिन पार्टी अपने सामने अपने घर के जलते-सुलगते मुद्दों पर कोई भी फैसला लेने की हालत में नहीं दिख रही है। आज कांग्रेस पार्टी अपने आपको भाजपा का विकल्प बता रही है, लेकिन वह अपने खुद के ढांचे को अपने पैरों पर खड़ा करने की हालत में नहीं दिख रही है। हार्दिक पटेल जैसे नौजवान आंदोलनकारी को उसकी भारी लोकप्रियता देखकर कांग्रेस बड़ी उम्मीद और बड़े वायदों के साथ उन्हें पार्टी में लाई थी, और गुजरात में कांग्रेस अपने संगठन से इस हद तक निराश थी कि रातों-रात हार्दिक पटेल को पार्टी का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। इसके अलावा ऐसा कोई दूसरा मामला कांग्रेस में याद नहीं पड़ता कि पहली बार सदस्य बने व्यक्ति को एकदम से कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया हो। लेकिन पिछले कई महीनों से हार्दिक पटेल अपनी उपेक्षा की बात कह रहे थे, कुछ दिन पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया पेज से कांग्रेस का नाम हटा दिया था, और उनकी इस्तीफे की बात हैरान करने वाली नहीं है। यह बात भी हैरान करने वाली नहीं है कि जिंदगी के सबसे खराब दौर से गुजर रही कांग्रेस पार्टी ऐसे दौर में भी अपने साथ आने वाले लोगों को सम्हालकर नहीं रख पा रही है, और न ही पुराने लोग अपनी आज की पार्टी से खुश रह गए हैं। इन तमाम लोगों पर किसी सत्तारूढ़ पार्टी से जुडऩे की तोहमत लगाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि बंगाल के बाहर के कई कांग्रेस नेता भी तृणमूल कांग्रेस में गए हैं, और बंगाल के बाहर तो तृणमूल की सत्ता का कोई फायदा उन्हें होते नहीं दिखता है।
कांग्रेस अपने संकल्प शिविर में संगठन के मुद्दों पर कितनी ही बात करे, हकीकत यह है कि उसने मुद्दों को, जलते-सुलगते मुद्दों को ताक पर धर देने की आदत बना रखी है। किसी भी समस्या पर कुछ भी न करके अपने आप उसके खत्म हो जाने या टल जाने की उम्मीद करते हुए कांग्रेस लीडरशिप चीजों को इस नौबत तक ला रही है। हो सकता है कि हार्दिक पटेल संभावनाविहीन दिखती कांग्रेस में अपनी संभावनाविहीनता से थक गए हों, लेकिन अगर उनकी कही यह बात सही है कि उन्हें संगठन की किसी बैठक में नहीं बुलाया जाता, दर्जनों पदाधिकारी नियुक्त करते हुए उनसे पूछा भी नहीं जाता, पार्टी के लीडर उनसे बात करते हुए अपने मोबाइल फोन पर व्यस्त रहते हैं, तो फिर हार्दिक पटेल की उस पार्टी को क्या जरूरत है, और हार्दिक पटेल को उस पार्टी की क्या जरूरत है? यह सिलसिला टूट जाना ही ठीक था।
कांग्रेस पार्टी की दुर्गति पर लिखना आज का मकसद नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की जरूरत पर लिखना जरूरी है, और इसी नाते हम कई बार कांग्रेस पर लिखने को मजबूर हो जाते हैं। लोगों को याद होगा कि पंजाब के पिछले एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने औपचारिक इंटरव्यू में यह कहा था कि राहुल गांधी से मिले उन्हें साल भर से अधिक हो चुका था। यह नौबत देश के बहुत से कांग्रेस नेताओं की रहती है जिन्हें पार्टी लीडरशिप से मिलने का वक्त नहीं मिलता। पार्टी की लीडरशिप में राहुल गांधी क्या हैं, यह एक रहस्य बना हुआ है। वे कुछ न होते हुए भी सब कुछ हैं, और सब कुछ होते हुए भी उन पर किसी बात की जिम्मेदारी नहीं है। बिना जिम्मेदारी सिर्फ अधिकार ही अधिकार, यह किसी भी लोकतंत्र में अच्छी नौबत नहीं है, और किसी संगठन के लिए तो यह आत्मघाती से कम नहीं है। नतीजा यही है कि पार्टी को जिन मामलों पर तुरंत फैसला लेना चाहिए, वे मामले बरसों तक पड़े रहते हैं, क्योंकि जिनसे फैसले लेने की उम्मीद की जाती है, उनसे कोई सवाल पूछने की संस्कृति कांग्रेस पार्टी में नहीं है। यह तुलना कुछ लोगों को नाजायज लग सकती है कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कोई ईमानदार सवाल पूछने का हक मीडिया को नहीं है, ठीक उसी तरह कांग्रेस के भीतर सोनिया-परिवार से कोई सवाल पूछने का हक भी किसी नेता का नहीं है। मोदी तो अपनी अपार लोकप्रियता या अपार कामयाबी के चलते सवालों को टाल सकते हैं, लेकिन सोनिया-परिवार देश के चुनावों में पार्टी के हाल को देखते हुए सवालों को कब तक टाल सकता है, कब तक टालते रहेगा?
एक सुनील जाखड़, या एक हार्दिक पटेल मुद्दा नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस अपने बड़े नेताओं को जिस लापरवाह और निस्पृह भाव से चले जाने दे रही है, वह पार्टी के एक खराब भविष्य का आसार है। दो दिन पहले हमने कांग्रेस शिविर में राहुल गांधी के भाषण में क्षेत्रीय पार्टियों के खिलाफ कही गई अवांछित बातों की आलोचना की थी, और उसके तुरंत बाद से देश भर में ऐसी आलोचना जगह-जगह से आ रही है, बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बारे में लिखा है, और तेजस्वी यादव जैसे कांग्रेस के दोस्त ने भी इसके खिलाफ बयान दिया है। कांग्रेस जितने किस्म की गलतियां कर रही है, गलत काम कर रही है, उन सबके नुकसान से उबरने के लिए ऐसे कोई संकल्प काफी नहीं हो सकते, जो कि अभी तीन दिनों के शिविर में लिए गए हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने तौर-तरीके सुधारने चाहिए, वरना उसका रहा-सहा वर्तमान भी भविष्य में उसका साथ नहीं दे पाएगा।
साइबर जुर्म अब खुदकुशी की वजह बनते जा रहे हैं, तुरंत जागरूकता की जरूरत
17 मई 2022
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से साइबर ठगी की एक
भयानक खबर सामने आई है। एक महिला को 25 लाख रूपए की लॉटरी लगने का झांसा
देकर ठगों ने उससे 9 लाख रूपए अपने बैंक खातों में जमा करा लिए, और फिर जब
महिला को समझ आ गया कि उसे ठगा जा चुका है तो उससे यह रकम वापिस करने के
नाम पर उसका एक नग्न वीडियो बनवाकर ठगों ने बुलवा लिया। इसके बाद ठगों ने
उससे 5 लाख रूपए और मांगे, और यह रकम न भेजने पर यह वीडियो उसके पति के
मोबाइल पर भेज दिया गया। इसके बाद पुलिस में शिकायत करने के अलावा और कुछ
बचा नहीं था, और इस तरह यह मामला उजागर हुआ।
हर दिन सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के रास्ते लोगों को ठगने और ब्लैकमेलिंग में फंसाने के अनगिनत मामले हो रहे हैं। देश भर में हर दिन हजारों ऐसे मामलों की पुलिस में रिपोर्ट भी हो रही है। किसी भी आम मोबाइल फोन पर कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब ठगी और जालसाजी के कुछ फोन न आएं, और लोगों को फंसाने की कोशिश न की जाए। अभी लगातार एक नए किस्म का जाल इस्तेमाल हो रहा है जिसमें वॉट्सऐप कॉल पर लड़कियां अपनी नग्न तस्वीरों और नग्न वीडियो से लोगों को फंसा रही हैं। पहले वे कपड़े उतारते अपने वीडियो दिखाती हैं, और फिर लोगों को उकसाती हैं कि वे भी कपड़े उतारकर दिखाएं। सेक्स को लेकर भड़ास और कुंठा से लबालब हिन्दुस्तानी मर्द तुरंत इस जाल में फंस रहे हैं, और एक बार बिना कपड़ों का उनका वीडियो मुजरिमों के हाथ लग जाता है, तो उनके बदन की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेने तक उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है, और ऐसे कई मामलों में आत्महत्याएं भी हो चुकी हैं।
यह पूरे का पूरा मामला सोशल मीडिया, मोबाइल फोन, और सेक्स या पैसों की चाह से जुड़ी जालसाजी और धोखाधड़ी का है। मामूली ठगी से लेकर ब्लैकमेल करके आत्महत्या को मजबूर करने तक का काम धड़ल्ले से चल रहा है, लेकिन इस देश की सरकारें अपनी सारी तकनीकी क्षमता के रहते हुए भी ऐसे साइबर-मुजरिमों को पकडऩे में महीनों का वक्त लगा देती हैं, तब तक ऐसे लोग दर्जनों और लोगों को फंसा चुके रहते हैं। देश के कुछ चुनिंदा गांव ऐसे साइबर अपराधों के लिए इतनी अच्छी तरह शिनाख्त में आ चुके हैं कि वहां की पूरी नौजवान पीढ़ी इसी काम को एक पेशे की तरह अपना चुकी है। झारखंड का जामताड़ा नाम का गांव इसी धंधे के लिए तरह-तरह के मोबाइल फोन चोरों से जुटाता है, और एक-एक व्यक्ति दर्जनों सिमकार्ड रखकर रात-दिन ठगी में लगे रहता है। टेक्नालॉजी के मामले में पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियां मुजरिमों से कई कदम पीछे चलती हैं, और मुजरिम जगह भी बदलते रहते हैं, और तरीके भी।
आज सरकार और समाज दोनों को लोगों को जागरूक करने की बहुत जरूरत है। हर तरह के सामाजिक संगठन अपने सदस्यों को इक_ा करके पुलिस के किसी जानकार व्यक्ति को बुलाकर उससे भाषण करवा सकते हैं कि साइबर अपराधों से किस तरह बचा जाए, और सोशल मीडिया पर अनजाने लोगों के जाल में फंसने से कैसे बचा जाए। जागरूकता अभी भी जांच, अदालती कार्रवाई, और नुकसान के मुकाबले बहुत सस्ती पड़ेगी। ऐसे मुजरिमों से पूरी रकम तो कभी भी बरामद नहीं हो पाती है, और सरकार का बहुत सारा खर्च ऐसी जांच और बाद की कार्रवाई में होता है। इसलिए राज्य सरकारों को अपने स्तर पर सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, या तरह-तरह के क्लबों, कर्मचारी संघों के साथ मिलकर जागरूकता कैम्प चलाने चाहिए, अभी पकड़ाए जा रहे जुर्म के तरीके भी बताने चाहिए, और लोगों को सावधान रहने को कहना चाहिए। दरअसल देश में डिजिटल तकनीक, मोबाइल पर बैंकिंग, आधार कार्ड या टीकाकरण जैसे कामों का ऑनलाईन होना ऐसी बातें हो गई हैं कि लोगों के फोन पर कई तरह के संदेश आते हैं, उनसे टेलीफोन पर कई तरह की जानकारी ली जाती है। कहने के लिए तो भारत सरकार ने ऑनलाईन ठगी की खबर देने के लिए अपना नंबर दिया हुआ है, लेकिन उसकी जानकारी अधिक लोगों को अभी भी नहीं है, या फिर लोगों का सरकारी इंतजाम पर उतना भरोसा भी नहीं है। चूंकि ऑनलाईन बैंकिंग जैसे काम और सोशल मीडिया का इस्तेमाल लगातार बढ़ते जाना है, इसलिए जागरूकता के अलावा दूसरा कोई बचाव का रास्ता नहीं है। सरकारें अगर चाहें तो स्कूल की बड़ी कक्षाओं और कॉलेज में छात्र-छात्राओं को साइबर-जुर्म की ओर से जागरूक करने का अभियान चला सकती हैं क्योंकि इस उम्र के अधिकतर बच्चे मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, और एटीएम वगैरह का इस्तेमाल करते ही रहते हैं। अब साइबर जुर्म मोबाइल ऐप के मार्फत कर्ज देकर हिंसक तरीके से उसकी वसूली जैसा विस्तार कर चुका है, इसलिए सरकारों को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
क्या तीन दिन पहले के मुकाबले राजस्थान से कांग्रेस बेहतर निकली है?
16 मई 2022
कांग्रेस पार्टी का तीन दिनों का
विचार-विमर्श राजस्थान में पूरा हुआ, और पार्टी कई नए इरादों के साथ लौटी
है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की दुहराई गई शिकस्त के बाद अभी पांच
राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसके जमींदोज हो जाने पर पार्टी के भीतर
बड़ी फिक्र चल रही थी, और तीन दिनों का यह चिंतन शिविर अपने आपको नवसंकल्प
शिविर कहते हुए पूरा हुआ है। कल जब शिविर का तीसरा और आखिरी दिन चल रहा था,
तो बहुत से लोगों के मन यह सवाल खड़ा हो रहा था कि कांग्रेस उसके सामने आज
खड़े हुए सबसे बड़े सवाल का सामना करने से क्यों कतरा रही है? कांग्रेस
में राहुल गांधी के भविष्य का क्या होगा, या राहुल के रहते हुए कांग्रेस का
भविष्य क्या होगा, इस सबसे बड़े सवाल पर कोई चर्चा नहीं हुई। शायद पार्टी
अपने ढांचे को लेकर इतने बड़े सवाल पर किसी चर्चा के लिए तैयार नहीं थी, और
इसीलिए अगले छह महीनों में देश भर में पार्टी के खाली ओहदों पर तैनाती
करने की बात कही गई। लेकिन एक और मुद्दा कांग्रेस के खिलाफ हमेशा से चले आ
रहा है, और पार्टी पर कुनबापरस्ती की तोहमतें लगती ही रहती हैं, और इस बार
फिर उस मुद्दे पर ऐसा ढुलमुल फैसला किया गया है जिसका कि कोई मतलब नहीं है।
पार्टी ने यह तय किया कि संगठन में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत लागू
होगा, और इसी तरह एक परिवार, एक टिकट का नियम भी लागू होगा। किसी परिवार
में दूसरे कोई सदस्य राजनीतिक तौर से सक्रिय हैं, तो पांच साल के
संगठनात्मक अनुभव के बाद ही वे कांग्रेस टिकट के लिए पात्र माने जाएंगे।
इसका मतलब यह हुआ कि एक परिवार के एक से अधिक लोग आज सांसद, विधायक, या
संगठन में पदाधिकारी हैं, तो पांच साल इन ओहदों पर रहने पर एक परिवार से एक
से अधिक लोग भी टिकट पा सकते हैं। इस रियायत के बाद इस रोक का कोई भी असर
हॅंसी के लायक ही रह जाता है। कांग्रेस के प्रस्ताव की भाषा तो संगठन के
ओहदे की बात भी नहीं कहती, संगठनात्मक अनुभव की बात कहती है जिसे किसी के
भी नाम के साथ जोड़ा जा सकता है। खैर, कांग्रेस से ऐसे किसी भी फैसले की
उम्मीद नहीं की जा सकती थी जो कि सोनिया परिवार की पकड़ को जरा भी कमजोर
करने वाला हो। तीन दिनों की सारी कार्रवाई को देखें तो उसका लब्बो-लुआब यही
है कि सोनिया, राहुल, और प्रियंका जैसा चाहें, वैसा रह सकते हैं।
लेकिन कल राहुल गांधी के एक लंबे भाषण में उन्होंने एक बात कही जो कि 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ जाती हुई बात दिखती है। राहुल ने कहा कि देश में चल रही यह राजनीतिक लड़ाई लंबी है, यह लड़ाई क्षेत्रीय पार्टियां नहीं लड़ सकतीं, क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी को नहीं हरा सकतीं क्योंकि उनके पास विचारधारा नहीं है। राहुल ने कहा कि यह लड़ाई केवल कांग्रेस ही लड़ सकती है। इस सदी में कांग्रेस ने दस बरस लगातार देश पर राज किया है, और वह मोटे तौर पर क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से ही यूपीए नाम का गठबंधन बनाकर किया है। पिछले दो आम चुनावों में तो कांग्रेस इस तरह मटियामेट हुई है कि उसकी अपनी गिनती उसे अगले कुछ चुनावों तक देश पर राज करने के करीब ले जाने की कोई संभावना नहीं दिखाती। मनमोहन सिंह सरकार पूरी तरह से क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से बनी और चली थी, और उन दस बरसों के गठबंधन को अपनी पार्टी के एक मंच से इस तरह औपचारिक रूप से खारिज कर देना समझदारी की बात नहीं है। फिर यह कांग्रेस पार्टी का अहंकार ही दिखता है कि वह क्षेत्रीय पार्टियों को बिना विचारधारा का कह रही है, और यह कह रही है कि क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी को नहीं हरा सकतीं, और यह लड़ाई केवल कांग्रेस ही लड़ सकती है।
राहुल सहित तमाम कांग्रेस नेताओं के सामने यह बात साफ है कि कांग्रेस की मौजूदगी देश भर में बिखरी हुई जरूर है, लेकिन उसकी कोई ताकत बहुत से राज्यों में बची नहीं है। अभी उत्तरप्रदेश में चार सौ से अधिक सीटों पर पंजा छाप के उम्मीदवार थे, और इक्का-दुक्का सीटें पाकर कांग्रेस तकरीबन तमाम सीटों पर जमानत खो चुकी है। ऐसे में उत्तरप्रदेश में एक क्षेत्रीय पार्टी, समाजवादी पार्टी, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां कांग्रेस के मुकाबले अधिक मजबूत दिखती हैं, और क्षेत्रीय पार्टियों के महत्व को कम आंकना, खारिज कर देना, कांग्रेस की अदूरदर्शिता के अलावा कुछ नहीं है। ऐसी राष्ट्रीय पार्टी के साथ कौन सी क्षेत्रीय पार्टियां जाना चाहेंगी जिसका भूतपूर्व और भावी अध्यक्ष क्षेत्रीय पार्टियों को विचारधाराविहीन कहता है।
कांग्रेस के इस आयोजन में पार्टी को लेकर कई किस्म के छोटे-छोटे फैसले लिए गए, जो कि चेहरे को सजाने की कोशिश अधिक दिख रहे हैं। पिछले एक बरस से अधिक से पार्टी के दो दर्जन बड़े नेताओं ने लीडरशिप के सामने कई सवाल खड़े किए हैं, और तीन दिन लंबी इस चर्चा में भी पार्टी उन सवालों से बचकर निकल गई है, न तो पार्टी लीडरशिप पर उसने कुछ कहा, और न ही सोनिया परिवार पर। इन दोनों मुद्दों पर तमाम संभावनाओं को खुला रखकर, और अपने हाथ में रखकर आज की कांग्रेस लीडरशिप ने यथास्थिति कायम रखी है। कांग्रेस का ऐसा शिविर 2013 के बाद, यानी करीब दस बरस बाद हो रहा है, और यह कांग्रेस के मौजूदा खतरों को कहीं से भी कम करते नहीं दिखता है, न ही पार्टी की ऐसी नीयत दिखती है कि वह अपनी बुनियाद में आ चुकी कमजोरी को मंजूर करने को तैयार है। किसी भी समस्या का समाधान तभी निकल सकता है जब उस समस्या के अस्तित्व को माना जाए। आज कांग्रेस अपनी किसी भी बड़ी समस्या के अस्तित्व को ही मानने के लिए तैयार नहीं है, ऐसे में वे ही कांग्रेस नेता खुश होते हुए लौटे होंगे जिन्हें किसी पैमाने के तहत इस चिंतन शिविर में जाने का मौका मिला होगा। लेकिन ऐसी ही खुशी है जो कि पार्टी को अंधेरे में रखती है, खतरों की तरफ से उसकी आंखों को बंद रखती है। इस शिविर के बारे में तीन दिन पढऩे के बाद आज भी हमारे पास यह मानने की कोई वजह नहीं है कि यह पार्टी तीन दिन पहले के मुकाबले आज अधिक जागरूक और अधिक तैयार पार्टी है।





