एक प्रोफेसर के भाषण पर हमले के पीछे की नीयत और साजिश समझें

 15 फरवरी 2023


देश के एक सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, जेएनयू, के एक प्राध्यापक सुरजीत मजूमदार अभी ओडिशा में राजधानी के उत्कल विश्वविद्यालय सभागार में एक नागरिक मंच के कार्यक्रम में अंबेडकर पर बोल रहे थे कि कुछ लोगों ने चिल्लाते हुए उन्हें गालियां बकीं, और आयोजकों के साथ धक्का-मुक्की की। प्रोफेसर मजूमदार अंबेडकर के सिद्धांतों और उद्देश्यों पर बात करते हुए प्राकृतिक संसाधनों को कुछ लोगों को सौंपे जाने की बात कह रहे थे, तो यह बात कुछ बाहरी लोगों को नागवार गुजरी। वहां मौजूद लोगों का कहना है कि उन्होंने अडानी जैसे किसी उद्योगपति का नाम नहीं लिया था, लेकिन इस मुद्दे पर बोलना ही कुछ लोगों को गवारा नहीं हुआ, और वे विरोध और धक्का-मुक्की पर उतर आए। इस धक्का-मुक्की में एक स्थानीय प्राध्यापक गिरफ्तार भी हुए हैं, और हमलावरों को दक्षिणपंथी गुटों से जुड़ा बताया गया है। 

अब अंबेडकर वैसे भी लोगों को नहीं सुहाते हैं। उनकी बातें संविधान के तहत तो हैं ही, वे बातें सबसे कुचले और वंछित तबकों को हक दिलाने की बातें भी हैं। जिस तरह वे संविधान के लिए अपनी सोच सामने रखते हुए हमेशा ही एक सामाजिक न्याय की वकालत करते रहे, उसकी वजह से वे दलितों के लिए एक प्रेरणा भी बने कि वे जात-पात और छुआछूत मानने वाले हिन्दू समाज को छोडक़र बाहर निकलें, और जात-पात न मानने वाले बौद्ध समाज में जाएं। इस तरह देश के कट्टर हिन्दुओं की नजरों में अंबेडकर इसलिए भी खटकते हैं कि उन्होंने हिन्दू समाज के सबसे निचले कहे जाने वाले तबके, पैरोंतले लगातार कुचले जाने वाले दलितों को हिन्दू समाज से हटा दिया। अब इसके बाद अगर उनकी नसीहत को याद दिलाते हुए कोई जानकार और विद्वान प्रोफेसर प्राकृतिक स्रोतों को लेकर यह फिक्र जाहिर करता है कि ये स्रोत कुछ लोगों को दिए जा रहे हैं, तो इसका एक मतलब यह भी होता है कि वे हिन्दू समाज के भीतर के दलितों के शोषण की चर्चा करते हुए उससे आगे बढक़र आदिवासियों के हक की बात भी कर रहा है, और यह बात हिन्दुत्व के ठेकेदारों, और कारखानेदारों के दलालों, दोनों को खटकने वाली बात है, और आज के हिन्दुस्तान में एक तबका ऐसा खड़ा हो गया है जो कि ये दोनों ही झंडे अपने डंडों पर लगाकर चल रहा है। 

जेएनयू जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को सुनने का ओडिशा में यह गिना-चुना मौका ही रहा होगा। ओडिशा के बारे में लोगों को यह याद रखना चाहिए कि वहां दलितों से बड़ा मुद्दा आदिवासियों का है, और आदिवासियों के जंगल, उनके पहाड़, इन सबको कारखानेदारों को देने के खिलाफ दुनिया का एक सबसे चर्चित आंदोलन ओडिशा में चल रहा है। ऐसे में अभी की इस ताजा घटना को समझने की जरूरत है कि सिर्फ पढ़े-लिखे और समझदार, सोचने वाले लोगों के बीच अगर एक सभागृह में कोई कार्यक्रम हो रहा है, तो वहां पहुंचकर विरोध करना अनायास नहीं हो सकता, और यह विरोध जेएनयू के नाम का भी रहा होगा, और जंगलों पर आदिवासियों के हक की वकालत का भी विरोध रहा होगा। ऐसा लगता है कि विरोध की यह साजिश हमलावर हिन्दुत्ववादियों और कारखानेदारों की तरफ से पहले से गढ़ी गई होगी। क्योंकि हमलावर हिन्दुत्ववादियों को खुद होकर तो जंगलों पर आदिवासियों के हकों की अलग से समझ नहीं है। ऐसा लगता है कि कारखानेदारों के दलालों ने अपने प्राकृतिक समर्थक हिन्दुत्ववादी हमलावरों को साथ लेकर इस कार्यक्रम में यह विरोध किया। यह विरोध अपने आपमें बतलाता है कि आज के हिन्दुस्तान में अंबेडकर की सोच की कितनी जरूरत है, और इस सोच का विरोध करने वाली ताकतें कितने हमलावर तेवरों के साथ मौजूद हैं। 

न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया के तमाम बड़े जंगलों वाले देशों में कारखानेदार और कारोबारी जिस तेज रफ्तार से और जितनी बड़ी मशीनों के साथ कुदरत पर हमला कर रहे हैं, उसकी भरपाई अगले लाखों बरस तक होने के कोई आसार नहीं रहेंगे। अमेजान के जिन जंगलों से दुनिया भर में बिखरा हुआ कारोबार करने वाली कंपनी अमेजान ने अपना नाम लिया है, अमेजान के उन जंगलों को खत्म करने की पूरी कोशिशें चल रही हैं। यह कुदरत का बड़ा अजीब सा इंतजाम है कि जहां खनिज हैं वहीं पर जंगल हैं, और जहां पर जंगल हैं वहीं पर आदिवासी हैं, और इसलिए आदिवासियों की बेदखली के बिना खनिज निकालना मुमकिन नहीं है। यह हाल हम छत्तीसगढ़ में हसदेव के सबसे घने जंगलों के नीचे से कोयला निकालने की अडानी की हड़बड़ी में भी देख रहे हैं, और दुनिया भर के जंगलों में अलग-अलग कंपनियों के हमलों की शक्ल में भी। ऐसे में अगर अंबेडकर को याद करते हुए कोई विचारक इन हमलों के खतरे गिनाता है, तो आज ऐसे विचारक को ही एक खतरा मानकर उस पर हमले किए जा रहे हैं। इनसे पहली बात तो यही साबित होती है कि आज लोगों के कुदरत पर हक बनाए रखने के लिए अंबेडकर की सोच कितनी जरूरी है। दूसरी बात यह साबित होती है कि हिन्दुस्तान में कारोबारी हमलावर गिरोह सिर्फ राष्ट्रवादी खाल ओढक़र नहीं आते, वे हिन्दुत्ववादी खाल ओढक़र भी आ सकते हैं, आ रहे हैं। अभी जब एक अंतरराष्ट्रीय भांडाफोड़ एजेंसी ने अडानी पर खाता-बही में हेरफेर करके, विदेशी रास्तों से संदिग्ध पैसा लाकर कारोबार को बड़ा दिखाने की तोहमत लगाई, तो रातों-रात अडानी ने इसे हिन्दुस्तान पर हमला करार दिया। और अडानी के बचाव में स्वघोषित हिन्दू सांस्कृतिक संगठन आरएसएस ने झंडा-डंडा उठा लिया। जहां पर साफ-साफ जांच एजेंसियों के हरकत में आने की जरूरत थी, वहां पर तिरंगे झंडे से लेकर भगवा झंडे तक की ढाल खड़ी कर दी गई। इस पूरे सिलसिले को समझने की जरूरत है। और ऐसे सिलसिले को समझाने वाले न रहें, इसलिए भी जेएनयू जैसी जगह को खत्म करने की खुली कोशिश चल रही है। जिस दिन जेएनयू जैसे संस्थानों से उपजी हुई जागरूकता खत्म हो जाएगी, उस दिन हिन्दुस्तान में जल, जंगल, जमीन को बचाने के आंदोलन भी खत्म हो जाएंगे। और देश का एक हमलावर तबका वैसे ही ‘अच्छे दिन’ लाने में लगा हुआ है। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 15 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

स्मार्ट सिटी, किस कीमत पर और कितनी बर्बादी से?

 14 फरवरी 2023


नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया था जिसके तहत सौ शहरों को छांटकर उन्हें शहरी सुविधाओं के मामले में बेहतर बनाने का बीड़ा उठाया गया था। अगले महीने मार्च 2023 में इनमें से 22 शहर स्मार्ट होने जा रहे बताए गए हैं, और दावा किया गया है कि इससे वहां के लोगों की जिंदगी बेहतर होगी, और वे एक साफ-सुथरे माहौल में रह सकेंगे। इन शहरों में भोपाल, इंदौर, आगरा, वाराणसी, भुवनेश्वर, चेन्नई, कोयम्बटूर, इरोड़, रांची, सालेम, सूरत, उदयपुर, विशाखापत्तनम, अहमदाबाद, काकीनाड़ा, पुणे, वेल्लूर, पिम्परी-चिंचवाड़ा, मदुरै, अमरावती, तिरुचिरापल्ली, और तंजौर के नाम हैं। अब तक इन शहरों में एक लाख करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं, और तकरीबन उतने ही और शुरू किए गए हैं। इसमें आधी रकम केन्द्र सरकार देता है, और आधी रकम राज्य सरकार या स्थानीय म्युनिसिपल की लगती है। 

जब यह योजना शुरु हुई थी तब भी हमने इसके खिलाफ लिखा था कि यह निर्वाचित म्युनिसिपलों के अधिकारों में दखल है, और स्मार्ट सिटी का काम करने वाली एक अलग बनाई गई कंपनी उन शहरों के म्युनिसिपलों के प्रति जवाबदेह नहीं रहती हैं जो कि एक असंवैधानिक नौबत है। भारत में केन्द्र, राज्य, और स्थानीय संस्थाओं से परे कुछ नहीं हो सकता, लेकिन स्मार्ट सिटी की पूरी धारणा ही केन्द्र सरकार की सोच पर शहरों को ढालने के लिए राज्यों पर थोपी गई थी, और ‘स्मार्ट’ बनने की हड़बड़ी में राज्य इस बात की अनदेखी कर गए थे कि केन्द्र की सोच पर राज्यों को बराबरी से खर्च करना पड़ रहा है, और उनकी अपनी कल्पनाशीलता की कोई जगह इसमें नहीं है। इसके अलोकतांत्रिक मिजाज को भी अनदेखा किया गया था, और अभी छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट में इसके खिलाफ एक पिटीशन पर सुनवाई हो ही रही है। हम ‘स्मार्ट’ बनने जा रहे ऐसे शहरों का हाल देखें तो इनमें से मध्यप्रदेश का इंदौर बार-बार देश का सबसे साफ शहर घोषित हो रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि मध्यप्रदेश की कारोबारी राजधानी होने की वजह से इंदौर म्युनिसिपल की कमाई अंधाधुंध है, और उतना खर्च करके कोई भी शहर साफ रखा जा सकता है। देश के किसी भी शहर में अगर म्युनिसिपल या वार्ड मेम्बर यह तय कर लें कि उन्हें चारों तरफ से रकम जुटाकर शहर को साफ रखना है, तो शहर की संपन्नता में यह मुमकिन तो है, लेकिन सफाई के ऐसे टापू बाकी प्रदेश के हक को छीनते हैं, और एक स्थानीय वाद को बढ़ावा देते हैं। भारत में ही दक्षिण भारत के कुछ शहरों ने सफाई की योजना इस तरह बनाई है कि उन पर धेला भी खर्च नहीं किया जा रहा है, और कचरे से कमाई की जा रही है। ऐसे में सैकड़ों करोड़ सालाना खर्च करके किसी टैक्स देने वाले शहर को साफ रखना कोई बड़ी चुनौती नहीं है। होना तो यह चाहिए कि कचरे को छांटना और सफाई रखना स्थानीय जनता के मिजाज में लाया जाना चाहिए ताकि उस पर टैक्स का पैसा खर्च न हो। शहरों पर अनुपातहीन खर्च करके उन्हें ‘स्मार्ट’ बनाने की सोच असंतुलित विकास है, और जब निर्वाचित संस्था के काबू से परे ऐसा काम होता है, तो वह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक भी रहता है। 

जिस तरह राज्यों में डीएमएफ के नाम पर जो जिला खनिज निधि अंधाधुंध बर्बाद करने के लिए कलेक्टरों के हाथ रहती है, उसी तरह ‘स्मार्ट’ सिटी के नाम पर ऐसा अंधाधुंध खर्च म्युनिसिपल कमिश्नरों के हाथ आ जाता है। और उसकी बर्बादी की मिसाल डीएमएफ से कम नहीं है। यह राज्य के नेताओं और अफसरों की मनमर्जी से होने वाली बर्बादी का जश्न रहता है। हमने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अभी-अभी देखा कि ऐतिहासिक सरकारी खेल मैदान को काटकर किस तरह खाने-पीने का एक बहुत महंगा बाजार स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बनाया जा रहा है, और फिर मानो उसे आबाद करने के लिए आसपास कई किलोमीटर तक सडक़ किनारे के गरीब ठेलेवालों को हटा दिया गया है कि अगर वे भी खानपान बेचते रहेंगे, तो स्मार्ट सिटी का बनाया महंगा बाजार कैसे चलेगा। कुछ दर्जन नई चमचमाती और बड़ी दुकानों को चलाने के लिए सैकड़ों गरीबों को बेदखल और बेरोजगार कर दिया गया, और इसे स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर किया गया है। यह पूरा सिलसिला अमानवीय भी है, और तानाशाह भी है, क्योंकि बिना किसी तर्कसंगत और न्यायसंगत आधार के बरसों से सडक़ किनारे कारोबार कर रहे छोटे और गरीब लोगों को इस तरह रातों-रात हटा देना एक सरकारी गुंडागर्दी के अलावा कुछ नहीं है। और ऐसा इसलिए किया गया है कि स्मार्ट सिटी योजना के तहत एक अफसर के मातहत सैकड़ों करोड़ खर्चने का जिम्मा और हक दोनों दे दिया गया है। जिस तरह डीएमएफ को कलेक्टरों का पॉकेटमनी कहा जाता है, और उसके तहत होने वाले खर्च के ठेकों और सप्लाई में जमकर भ्रष्टाचार होता है, ठीक वैसा ही शहरों में स्मार्टसिटी के नाम पर चलते रहता है जहां दसियों करोड़ के शौचालय बनते रहते हैं, और करोड़ों के कचरे के डिब्बे लगते रहते हैं, और कोई जवाबदेही नहीं रहती। 

जब देश में पंचायत या म्युनिसिपलों की शक्ल में स्थानीय शासन का संवैधानिक इंतजाम है, तो स्मार्ट सिटी के नाम पर यह अफसरशाही शुरू से ही गलत थी, लेकिन मोदी की विरोधी पार्टियों में इसे समझने की फुर्सत नहीं थी। ऐसे खर्च का एक सामाजिक ऑडिट होना चाहिए, और अदालत में इस पूरी सोच को शिकस्त मिलनी चाहिए कि किसी निर्वाचित म्युनिसिपल से अधिक अधिकार किसी एक अफसर को रहे। स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर अंधाधुंध खर्च करके एक अलोकतांत्रिक व्यवस्था चलाना अपने आपमें बेवकूफी है, और यह उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट लोकतंत्र विरोधी इस सोच को रोक पाएगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 फरवरी, 2023



 

नजीर, यह कैसी नजीर पेश की है?

 13 फरवरी 2023


सुप्रीम कोर्ट के एक और जज को राज्यपाल बनाया गया है जो अयोध्या में राम मंदिर बनाने, और तीन तलाक को गैरकानूनी करार देने, और नोटबंदी को जायज ठहराने वाली बेंच पर रहे हैं। जज एस.अब्दुल नजीर अभी 4 जनवरी को ही रिटायर हुए थे, और 40 दिन के भीतर उन्हें आन्ध्र का राज्यपाल बना दिया गया है। अयोध्या में मंदिर का फैसला देने वाली पांच जजों की संविधान बेंच के रंजन गोगोई को मोदी सरकार राज्यसभा भेज चुकी है, और अशोक भूषण को एनसीएलटी का अध्यक्ष बना चुकी है। यह बात भी खबरों में आ चुकी है कि अयोध्या पर मंदिर बनाने के ऐतिहासिक फैसले को पांच जजों की बेंच में अशोक भूषण ने ही लिखा था। इन पांच में से एक, डी.वाई.चन्द्रचूड़ चीफ जस्टिस बन चुके हैं। कांग्रेस ने एस.अब्दुल नजीर को राज्यपाल बनाने के फैसले की आलोचना करते हुए कहा है कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है। कांग्रेस ने अपने तर्क की वकालत में एक गुजर चुके बड़े भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील रहे, केन्द्रीय कानून मंत्री रहे अरूण जेटली का संसद के एक भाषण का वीडियो पोस्ट किया है जिसमें जेटली कह रहे हैं कि रिटायर होने के ठीक पहले के जजों के फैसले रिटायरमेंट के बाद मिल सकने वाले कामों से जुड़े रहते हैं। यह बात अरूण जेटली ने संसद में कही थी, लेकिन संसद के बाहर भी बहुत से लोगों में यह चर्चा होती रहती है कि जजों को रिटायर होने के बाद क्या ऐसे कोई काम लेने चाहिए जिनमें कोई रिटायर्ड जज होना जरूरी न हो। भारत में ऐसी दर्जनों कुर्सियां तय की गई हैं जिन पर रिटायर्ड हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों को ही नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन राजभवन वैसी बंदिश की जगह नहीं है, राज्यपाल बनाने के लिए जज होना कहीं जरूरी नहीं है। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम जजों और अफसरों के रिटायर होने के बाद उन्हें किसी जगह मनोनीत करने के खिलाफ लगातार लिखते आए हैं। बरसों से हम यह मुद्दा उठाते आए हैं कि किसी भी राज्य में वहां काम कर चुके जज या अफसर को किसी पद पर मनोनीत नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसी आस लगाए हुए लोग रिटायरमेंट के पहले सरकार की मर्जी के काम करने का खतरा रखते हैं। यह सीधे-सीधे हितों के टकराव का एक मामला रहता है, और इससे इंसान बच नहीं सकते हैं। अरूण जेटली ने संसद में इसी इंसानी कमजोरी के बारे में कहा था, और हमने इस बात का विस्तार पिछले दस-बीस बरस में हर बरस एक से अधिक बार किया है कि राज्य से रिटायर हो रहे लोगों को उस राज्य में कोई नियुक्ति न मिले। हम यह देखते ही आए हैं कि बहुत सारी संवैधानिक कुर्सियां सत्ता के साथ गठबंधन में खोखली हो जाती हैं, और ऐसे ओहदों की जिम्मेदारी अहसान चुकाते दम तोड़ देती है। 

हिन्दुस्तान में वैसे भी बहुत सारे संवैधानिक आयोग, तरह-तरह के ट्रिब्यूनल, कौंसिल ऐसे हैं जहां पर रिटायर्ड जजों को ही नियुक्त किया जा सकता है। इस बारे में एक दस्तावेज बताता है कि 1950 से अब तक 44 मुख्य न्यायाधीश रिटायरमेंट के बाद कोई न कोई काम मंजूर कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के सौ रिटायर्ड जजों में से 70 ने सरकारी मनोनयन से कोई दूसरा ओहदा संभाला है। कुछ मामलों में तो सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिटायर होने के चार महीने पहले भी किसी आयोग में मनोनीत किया जा चुका है। इस बारे में पहले भी जानकार लोग यह बात लिख चुके हैं कि रिटायर होने के तुरंत बाद जजों को ऐसी कुर्सियां मंजूर करना खटकने वाली बात है जहां किसी गैरजज को भी मनोनीत किया जा सकता था। सरकार को सुहाने वाले फैसलों के बाद जब किसी जज को फायदे, सहूलियत, और अहमियत का कोई ओहदा दिया जाता है, तो वह शुकराना अधिक लगता है, और यह एक खतरनाक सिलसिला खड़ा करता है। 

हमने राज्यों के स्तर पर तो उस राज्य के रिटायर्ड जज और अफसर से बचने की नसीहत दी ही थी, और यह भी सुझाया था कि राष्ट्रीय स्तर पर एक टैलेंट-पूल बनाना चाहिए जिसमें काम करना चाहने वाले रिटायर्ड लोग अपना नाम दर्ज करा सकें, और फिर दूसरे राज्यों की सरकारें उनमें से नाम छांट सकें। जिस राज्य में पूरी जिंदगी काम किया हो, या हाईकोर्ट में जज रहते हुए सरकार से जुड़े हुए बहुत से मामलों में फैसले दिए हों, उसी राज्य में उसी सरकार से वृद्धावस्था-पुनर्वास की बख्शीश पाना नाजायज है। अब राज्यों के स्तर पर तो दूसरे राज्यों से लोगों को लाना चल सकता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सुप्रीम कोर्ट जजों को किसी दूसरे देश भेजना तो हो नहीं सकता। फिर भी इतना तो होना ही चाहिए कि जहां रिटायर्ड जज को ही नियुक्त करने की बंदिश न हो, वहां तो रिटायर्ड जजों को बिल्कुल न छुआ जाए, और राजभवन ऐसी ही एक जगह है। लोकतंत्र में सरकार और जजों को न सिर्फ ईमानदार रहना चाहिए, बल्कि उन्हें ईमानदार दिखना भी चाहिए। जहां कोई कानूनी बंदिश न हो, वहां पर ऐसी आजादी का नाजायज फायदा उठाकर यह तर्क देना बेईमानी है कि इस पर कोई कानूनी रोक नहीं है। लोकतंत्र में हर बात कानूनी रोक से काबू में नहीं की जाती है, कुछ गौरवशाली परंपराओं, और कुछ जनभावनाओं का भी ख्याल रखा जाता है। आज अपार, असाधारण, और जरूरत से ज्यादा बहुमत की सरकार कुछ भी कर सकती है, लेकिन उससे उसका हर फैसला लोकतांत्रिक और जायज नहीं हो जाता। 

बड़ी अदालतों के फैसलों को नीचे की अदालतों में एक मिसाल की तरह पेश किया जाता है जिसे नजीर कहा जाता है। एस.अब्दुल नजीर ने, और केन्द्र सरकार ने भी देश के सामने एक बहुत खराब नजीर पेश की है। इन दोनों को ऐसा करने का हक है, लेकिन यह देश की लोकतांत्रिक भावनाओं, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, और जनभावनाओं के ठीक खिलाफ काम है, यह एक अच्छी नजीर नहीं है। 

 (Daily Chhattisgarh) 

हरामी को गाली मानें, या हराम से उपजा हुआ शब्द?

12 फरवरी 2023

 

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की हमलावर भाषण देने के लिए विख्यात सांसद महुआ मोइत्रा ने अभी एक हंगामा खड़ा कर दिया जब उन्होंने अपने भाषण के बीच बार-बार बाधा पहुंचा रहे भाजपा के एक सांसद को हरामी कहा। महुआ मोइत्रा के संसद के भाषणों के वीडियो उनके पहले दिन से अब तक लगातार सोशल मीडिया पर बने हुए हैं, और लोग उनके भाषणों में मोदी सरकार या भाजपा की धज्जियां उड़ते देखने के आदी हो गए हैं। ऐसे में जब उन्होंने एक सांसद को हरामी कहा, तो उस पर बड़ी बहस छिड़ गई है। आमतौर पर हरामी शब्द का इस्तेमाल विवाह से परे जन्म लेने वाले बच्चे से रहता है जिसे हरामी या हरामजादा कहा जाता है। हिन्दी जुबान में इसे अवैध संतान भी कहते हैं, और ऐसे ही शब्द अंग्रेजी में भी बास्टर्ड के लिए इस्तेमाल होते हैं। लेकिन हरामी कहने के बाद भी महुआ मोइत्रा ने यह शब्द वापिस लेने से इंकार कर दिया, और कहा कि इस शब्द का जन्म अरबी भाषा के हराम से हुआ है, और इसका मतलब प्रतिबंधित, गैरकानूनी, अमान्य, या वर्जित होता है। ऐसा किसी जगह सामान या व्यक्ति के बारे में कहा जा सकता है। और हरामी शब्द हराम से ही बना हुआ है, जो कि ऐसा काम करने वाले के लिए इस्तेमाल होता है। महुआ का कहना है कि अगर लोग इसका कोई दूसरा मतलब निकालना चाहते हैं, तो वे इसके लिए आजाद हैं, उन्हें इस पर कुछ नहीं कहना है, और अगर संसद में इसे लेकर विशेषाधिकार का प्रस्ताव लाया जाता है, तो उसकी उन्हें कोई फिक्र नहीं है। 

तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बैनर्जी भी कई बार अपने भाषणों में आक्रामक शब्दों के लिए घिर चुकी हैं, लेकिन महुआ मोइत्रा का यह शायद पहला ही मौका है। वे विदेशों में पढ़ी और काम कर चुकी एक कामयाब कार्पोरेट अफसर रही हैं, और वह जिंदगी छोडक़र वे बंगाल की खूनी राजनीति में ममता बैनर्जी के साथ काम करने आई हैं, और लोकसभा का चुनाव जीतने के अलावा उन्होंने संसद में अपने दमदार भाषणों से भी मौजूदगी दर्ज कराई है। वे बोलना शुरू करती हैं तो लोग सम्हलकर बैठ जाते हैं कि अब तर्कों और तथ्यों के साथ एक तेजाबी सैलाब आने वाला है। ऐसी महुआ का हरामी शब्द संसद और राजनीति से परे सोशल मीडिया पर भी बहस का सामान बना हुआ है। 

महुआ मोइत्रा गैरहिन्दीभाषी हैं, लेकिन हराम या हरामी जैसे अरबी शब्द भारत की बहुत सी भाषाओं में प्रचलित हैं, जिनमें से महुआ की मातृभाषा बंगला भी एक है। अब हरामी एक बड़ा प्रचलित शब्द तो है, लेकिन हिन्दी या हिन्दुस्तानी में इसका आम इस्तेमाल अवैध कही जाने वाली संतान के लिए ही इस्तेमाल होता है। डिक्शनरी में एक-एक शब्द के बहुत से मतलब होते हैं, और ऐसे ही शब्दों को लेकर समानार्थी शब्दकोष भी बनते हैं। ऐसे में हरामी शब्द के मूल पर जाकर महुआ इसे नाजायज काम करने वाले के लिए इस्तेमाल किया हुआ बता सकती हैं, लेकिन इसका सबसे प्रचलित मतलब तो विवाह से परे पैदा बच्चे का ही होता है। 

अब अगर महुआ मोइत्रा की बात को छोड़ दें, और इस शब्द पर ही बहस करें, तो किसी भी बच्चे के लिए हरामी, बास्टर्ड, नाजायज, या अवैध संतान जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने आपमें हराम होना चाहिए क्योंकि कोई भी बच्चे जो धरती पर अपनी मर्जी से नहीं आए हैं, जिनके जन्म के लिए दूसरे लोग जिम्मेदार हैं, उन्हें हरामी या नाजायज कैसे कहा जा सकता है? ऐसे बच्चे को पैदा करने वाले लोगों को हरामी कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने हराम कहे जाने वाले एक काम को किया है, लेकिन बच्चे के जन्म में उसकी अपनी तो कोई मर्जी रहती नहीं है, इसलिए उसे कोई गाली देना अपने आपमें एक जुर्म रहना चाहिए। हम पहले भी भाषा की बेइंसाफी पर लिखते हुए इस बारे में इसी पेज पर लिख चुके हैं, लेकिन उसे दुहराने की जरूरत है। शादी से परे किसी बच्चे को पैदा करना वैसे भी कोई जुर्म नहीं रहना चाहिए, इसे दुनिया के सभ्य लोकतंत्रों में पूरी तरह से सामाजिक प्रतिष्ठा मिली हुई है, और हिन्दुस्तान जैसे देश में भी कानून ऐेसे किसी भी जन्म को गलत नहीं मानता है। ऐसे में बच्चे पैदा करने के लिए शादी जरूरी मानने वाली सामाजिक सोच अपने आपमें नाजायज है, न कि ऐसे पैदा हुए बच्चे। 

लेकिन महुआ मोइत्रा की बात पर अगर लौटें तो संसद में अपने धुंआधार तथ्यों और तर्कों के बाद उन्हें आपा खोकर ऐसी गाली देने की जरूरत नहीं थी। और लोग सोशल मीडिया पर इसे उनकी तर्कों की हार के बराबर मान रहे हैं। बात भी सही है, कि आवाज तेज होना, और गालियों का इस्तेमाल करना, ये दोनों ही बातें तर्कों की हार का सुबूत होती हैं। फिर बहुत से लोगों का यह भी तर्क है कि एक महिला होने के नाते उन्हें ऐसे बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाली इस गाली से भी बचना चाहिए था जो कि अपने आपमें इन बच्चों के साथ बहुत बड़ी बेइंसाफी है। कुछ शब्द अपने किसी भी स्रोत से परे, बहुत साफ-साफ प्रचलित अर्थों वाले होते हैं, और उन अर्थों को अनदेखा करना भी ठीक नहीं है। 

हम संसद की जुबान से सैकड़ों शब्दों को हटा दिए जाने के हिमायती नहीं हैं, हराम शब्द से ही जुड़े हुए, वहीं से निकले हुए हरामखोर शब्द की हम वकालत करते हैं जिसका साफ-साफ मतलब है कि जिसे जिस काम का भुगतान मिल रहा है, वह उस काम को न करे, हराम का खाए। ऐसी बात खुद संसद के संदर्भ में बार-बार इस गाली के बिना की जाती है कि वहां पर लोग काम नहीं करते हैं, पूरी तनख्वाह पाते हैं, पूरे भत्ते पाते हैं, और रियायती खाना पाते हैं। अब यह संसद के अपने ऊपर है कि वह देखे कि इस तरह की गाली उस पर लागू होती है या नहीं। लेकिन महुआ मोइत्रा की गाली दुनिया भर के अनगिनत बच्चों पर लागू होती है, और किसी भी समझदार, जिम्मेदार, सरोकारी, और इंसाफपसंद इंसान को ऐसी नाजायज गाली देने से बचना चाहिए। महुआ मोइत्रा के शुभचिंतकों ने उन्हें सोशल मीडिया पर ही सलाह दी है कि वे इस गाली को वापिस लें, इसके लिए माफी मांगें, और अपनी इज्जत बरकरार रहने दें। 

(Daily Chhattisgarh)

पड़ोस के चीन में नौजवान दौलत समझे जा रहे हैं, और हिन्दुस्तान में बेरोजगार बोझ!

12 फरवरी 2023


चीन में सरकार बड़ी फिक्रमंद है कि अब देश की आबादी गिरना शुरू हो रही है। और अगर इस गिरावट में अलग-अलग उम्र के तबकों का एक संतुलन रहता, तो भी कोई बात नहीं रहती। हालत यह है कि नए बच्चे पैदा होना कम होते जा रहे हैं, और बूढ़ी आबादी टस से मस नहीं हो रही है। जिंदगी बेहतर होने, इलाज बेहतर होने की वजह से बूढ़े और अधिक बूढ़े होते चल रहे हैं, और मौत को धकेलते जा रहे हैं। लेकिन देश में उनका उत्पादक योगदान नहीं रह गया है, और वे या तो अपने परिवार, समाज पर बोझ हैं, या फिर सरकार पर। और सरकार की फिक्र यह है कि नौजवान या कामकाजी लोगों की उत्पादक आबादी का अनुपात गिरना नहीं चाहिए, वरना देश की कमाई कम होगी, और बूढ़ों पर खर्च अधिक होगा। 

दरअसल चीन में आधी सदी पहले आबादी पर काबू पाने के लिए परिवारों के बच्चे पैदा करने पर रोक लगाई गई थी। इसमें शहरी इलाकों में शादीशुदा जोड़ों को एक बच्चा, और गांवों में दो बच्चे पैदा करने की छूट थी। इससे अधिक बच्चे पैदा करने पर सजा का इंतजाम था। नतीजा यह हुआ कि इस आधी सदी में लोगों के बच्चे कम हुए, वे बच्चे बिना भाई-बहन के बड़े हुए, और जब उनके मां-बाप बनने की बारी आई, तो उन्हें अपने बच्चों के भाई-बहन की बात न सूझी, न सही लगी। ऐसे में इस आधी सदी के भीतर ही चीन में आबादी बढऩा रूक गया, और इस बरस वहां होने वाली मौतों के साथ उसे जोडक़र देखें तो आबादी अब कम होना शुरू हो रही है। 


जैसा कि हिन्दुस्तान में है, जब लोगों को एक ही बच्चा पैदा करना हो, तो अधिक लोग लडक़ा चाहते हैं, और चीन में भी ऐसी सोच रही, और गर्भपात से लोगों ने कन्या शिशु को रोका, और अब वहां आदमियों के मुकाबले शादी के लिए लड़कियां कम हैं, इसलिए भी शादियों में दिक्कत है, लड़कियां मिल नहीं रही हैं। दूसरी बात चीन की आज की अर्थव्यवस्था में एक से अधिक बच्चों को पालना भी बहुत बड़ा आर्थिक दबाव है, और लोग उसे उठाने की हालत में नहीं हैं। इस नौबत को सुलझाने के लिए सरकार वहां अधिक बच्चों पर कुछ किस्म की मदद और रियायत भी दे रही है, या देने जा रही है। 

अब अगर चीन में कामकाजी जवानों का अनुपात कायम नहीं रहेगा, और बूढ़ों का अनुपात औसत उम्र बढऩे से बढ़ते चले जाएगा, तो एक बूढ़ा देश कामयाब अर्थव्यवस्था नहीं बन पाएगा। चीन में इस बात को लेकर बड़ी फिक्र हो रही है, लेकिन चीन से परे भी और देशों को अपने बारे में सोचना चाहिए। अब हिन्दुस्तान की बात करें, तो हिन्दुस्तान में आबादी को देश की हर दिक्कत की जड़़ मान लिया गया है। जिस आबादी की चीन को जरूरत लग रही है, वह आबादी हिन्दुस्तान में बेकार और बेरोजगार है, निठल्ली बैठी है। जो आबादी चीन की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रही है, और चीन को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाकर चल रही है, वह आबादी हिन्दुस्तान में अगर बोझ है, तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? नौजवान कामगारों और कारीगरों की, हुनरमंद लोगों की जो पीढ़ी न सिर्फ देश के भीतर उत्पादक रहती है, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी दूर-दूर तक जाकर काम करती है, कमाई करती है, हिन्दुस्तान में आज वह निठल्ली या ठलहा बैठी है। इसकी जिम्मेदारी इस देश और इसके प्रदेशों की सरकारों की है जो कि पूरी नौजवान पीढ़ी को काम के लायक बनाकर, उनके काम के मौके मुहैया कराकर देश को आगे बढ़ा सकती थीं, लेकिन वे बेरोजगारी भत्ता देने को अपनी कामयाबी मान रही हैं। जब आबादी पढ़ी-लिखी होती है, टेक्नालॉजी के काम कर सकती है, सरकार और बाजार मिलकर उसे काम दे सकते हैं, और सब लोग कमा सकते हैं, वहां पर उसे बेरोजगारी भत्ता देना देश-प्रदेश की सरकारों की परले दर्जे की नाकामयाबी है जिससे ऐसे देशों का पूरा भविष्य ही अंधेरे में डूब रहा है। 

हिन्दुस्तान और चीन, इन्हीं दो देशों को अगल-बगल रखकर देखें, तो 2023 में चीन में न्यूनतम मजदूरी 268 यूरो है, और हिन्दुस्तान में 55 यूरो। बाकी आंकड़ों को देखें तो चीन की प्रतिव्यक्ति आय 2021 में 12564 डॉलर थी, और उसी वक्त हिन्दुस्तान में यह 2280 डॉलर प्रतिव्यक्ति थी जो कि 5वां हिस्सा भी नहीं थी। इस उत्पादकता को हम चीनी नागरिकों की सरकारी स्वास्थ्य सेवा से जोडक़र देखें, तो वह कुछ बरस पहले हिन्दुस्तानियों के मुकाबले प्रतिव्यक्ति तेरह गुना से अधिक थी। पढ़ाई के मामले में चीन का प्रतिव्यक्ति खर्च हिन्दुस्तान के प्रतिव्यक्ति से करीब सात गुना था। अब आंकड़ों पर अधिक न जाते हुए भी हम नौजवान पीढ़ी के कामकाजी बनने लायक पढ़ाई और स्वास्थ्य सेवा दो पैमानों को जरूर देख रहे हैं, और यह समझ पड़ रहा है कि चीन ने इन दोनों में खूब पूंजीनिवेश किया है, लोगों को हुनरमंद बनाया है, और उन्हें देश की उत्पादकता बढ़ाने वाला बनाया है। वहां की आबादी आधी सदी पहले वहां बोझ थी, और आज वहां पर दौलत बन गई है। कमाई की इस खदान का महत्व चीन को आधी सदी के भीतर समझ आ गया है, और आज वह आबादी बढ़ाते चलना चाह रही है। दूसरी तरफ आबादी को समस्या मानकर बैठे हुए हिन्दुस्तान में लोग आबादी को सिर्फ बेरोजगारी भत्ता देकर उसे खुश रखना चाहते हैं, जो कि देश पर एक बोझ भी है, और जिससे किसी उत्पादकता की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। 

चीन को कोसने के लिए हिन्दुस्तानियों को हजार वजहें मिल सकती हैं, लेकिन चीन से सीखने की वजहें तो चीन में अपनी नौजवान आबादी की इज्जत और जरूरत है, जिससे हिन्दुस्तान की बेरोजगारी भत्ता देने वाली सरकारों को बहुत कुछ सीखना चाहिए। जो देश इतनी बड़ी जमीन रहते हुए, इतनी समुद्री सरहदें रहते हुए, सूरज की इतनी रौशनी और धरती के भीतर इतने खनिज रहते हुए भी अपनी आबादी को बेरोजगारी भत्ता दे, वहां की सरकारों को डूब मरना चाहिए। चीन से दो-दो हाथ कर लेने के राष्ट्रवादी उन्मादी नारों से परे हकीकत यह है कि हिन्दुस्तान के बाजार, दुकानें, और कारखानें चीन से आए सामान के बिना चार दिन नहीं चल सकते, यह एक अलग बात है कि चीन हिन्दुस्तानी बाजार के बिना चार बरस भी चल सकता है। 

दीवारों पर लिक्खा है, 12 फरवरी, 2023