एम्बुलेंस, और नक्सल हमले पर कड़वे फैसले की जरूरत

13 अप्रैल 2014
संपादकीय
बस्तर में कल फिर नक्सल हमला हुआ, और मतदान की ड्यूटी में लगे हुए लोगों में से दर्जन भर लोग शहीद हो गए। इनमें से आधे मतदान कर्मचारी, और बाकी आधे ऐसे सुरक्षा कर्मचारी थे जो कि सड़कों की जांच-पड़ताल करके रास्ते के खतरे के बीच लौट रहे थे, और उन्होंने वहां से गुजरती हुए एक एम्बुलेंस में लिफ्ट ले ली थी। नक्सलियों ने इस एम्बुलेंस पर भी हमला किया, और इससे यह बात जाहिर है कि उनकी नजर इसके भीतर के सुरक्षा कर्मचारियों पर भी बनी हुई थी। यहां पर हम दो-तीन बातों पर लिखना नहीं चाहते हैं, क्योंकि इन पहलुओं पर हम लगातार लिखते आए हैं। नक्सलियों को हिंसा न करने की कोई ताजा नसीहत देने का कोई नया इस्तेमाल अभी नहीं दिखता है, इसलिए हम हमेशा से लिखी आ रही अपनी बातों पर कायम हैं। दूसरी बात यह कि ऐसी शहादत को देखते हुए प्रदेश और देश के बाकी हिस्सों में बचा हुआ मतदान अधिक से अधिक होना चाहिए, क्योंकि जिस देश में लोग दूसरों के वोट डालने के इंतजाम में अपनी जान दे रहे हैं, वहां भी अगर बाकी वोटर अपने इस हक की अहमियत न समझें, तो यह उनके लिए डूब मरने की बात होगी। तीसरी बात जो हम आज यहां लिखना नहीं चाहते, वह यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार के खुफिया विभाग, और मैदानी पुलिस के बीच तालमेल की कोई कमी है, या नहीं, इस पर भी इस जगह लिखने को हमारे पास कोई ताजा विचार नहीं हैं। 
अब बस्तर की कल की इस घटना के साथ एक बहुत ही बुरी यह जानकारी भी जुड़ी हुई है कि दो बरस पहले इसी दिन इसी बस्तर में इन्हीं नक्सलियों ने बीमार बच्चों को अस्पताल ले जा रही एक और एम्बुलेंस पर हमला किया था। अब कल उन्होंने जिस एम्बुलेंस पर हमला किया, वह सुरक्षा कर्मचारियों से भरी हुई थी, और उसे विस्फोट से उड़ाने के पीछे नक्सलियों का एक अलग तर्क हो सकता है। लेकिन यहां दो बातों को सोचने की जरूरत है। एक तो यह कि बस्तर जैसी भयानक नौबत के बीच, जान के खतरे के बीच भी अगर सुरक्षा कर्मचारी एम्बुलेंस का इस्तेमाल करते हैं, तो फिर वे बस्तर की बाकी एम्बुलेंस भी खतरे में डालते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के बीच भी ये नियम कायम रहते हैं कि एम्बुलेंस पर हमले न किए जाएं, लेकिन इसके साथ-साथ ये शर्त भी जुड़ी रहती है कि एम्बुलेंस का फौजी या पुलिसिया इस्तेमाल न हो। इस बात को हम अच्छी तरह समझते हैं कि जब बस्तर जैसे खतरनाक मोर्चे पर सुरक्षा कर्मचारी कदम-कदम पर जान जोखिम में डालकर रास्ता तय करते हैं, तो एम्बुलेंस के इस्तेमाल न करने की बात शहरी, कागजी, और दफ्तरी बात होकर रह जाती है। सबसे बड़ी बात जब अपनी जिंदगी को बचाना रहता है, तो फिर किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के बारे में सोचना मुमकिन नहीं रहता। लेकिन ऐसी आत्मरक्षा के साथ जुड़े हुए खतरों के बारे में भी सोचना होगा जब बाकी एम्बुलेंस भी निशाने पर आ सकती हैं। 
छत्तीसगढ़ में ही पिछले विधानसभा चुनाव को लेकर अभी बिना किसी सुबूत वाली ऐसी बात सुनने मिली है कि पूरे प्रदेश में चलने वाली 108 नंबर की एम्बुलेंस में चुनावी शराब ढोई गई थी। इसी तरह लोगों को याद होगा कि पाकिस्तान में जब ओसामा-बिन-लादेन की शिनाख्त तय करने के लिए अमरीकी खुफिया एजेंटों ने पाकिस्तानी टीकाकरण कार्यक्रम के कर्मचारियों का इस्तेमाल किया था, तो भी हमने उस चर्चा के संदर्भ में कई बार लिखा था कि वह काम चूंकि एक सरकार सोचा-समझा काम था, इसलिए टीकाकरण जैसे कार्यक्रम की विश्वसनीयता खत्म करने वाला यह फैसला युद्ध अपराध माना जाना चाहिए, और उसके लिए अमरीका के खिलाफ मुकदमा चलना चाहिए। छत्तीसगढ़ में एम्बुलेंस के कल के इस वर्दीधारी-हथियारबंद जवानों द्वारा इस्तेमाल के पीछे सरकार की कोई मंजूरी नहीं थी, और यह नक्सल इलाकों में पैदल चलकर थके हुए लोगों द्वारा मौके पर लिया एक तात्कालिक और स्थानीय फैसला था, और उसके लिए जिम्मेदार लोग अपनी जान खो ही चुके हैं। इसलिए अब राज्य सरकार को और केन्द्र सरकार की सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे कड़े फैसले लेने पड़ेंगे कि एम्बुलेंस का किसी तरह का हथियारबंद, या गैरमरीज इस्तेमाल न हो। यह बात सुझाते हुए हमको अच्छा नहीं लग रहा है, और यह बात सुनने वालों को भी यह सलाह बहुत बेरहमी की लगेगी, लेकिन हकीकत यह है कि आने वाले वक्त में बाकी एम्बुलेंस बची रहें, इसके लिए सरकार को यह कड़वा फैसला लेना ही पड़ेगा। यह बात याद रखनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध को लेकर जो नियम सभी देशों ने माने हैं, वे नियम देशों की सरकार तो मानती हैं, लेकिन आतंकवादी, उग्रवादी और हिंसक-हथियारबंद गिरोह इन नियमों की बंदिशों की इज्जत नहीं करते, इसलिए उनसे कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
बस्तर के इस खूनी हमले के बाकी पहलुओं पर हम पहले भी लिख चुके हैं, और आगे भी लिखते रहेंगे। उन बातों पर आज यहां चर्चा से एम्बुलेंस का मुद्दा वजन खो बैठता, इसलिए हम सिर्फ उसी पर बात खत्म कर रहे हैं। वोट डलवाने के लिए ऐसी शहादत के बाद अगर जिंदा बचे बाकी लोग वोट नहीं डालते हैं, तो वे मुर्दों से भी गए-गुजरे होंगे।

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