निजी जिंदगी की निजता का हक कायम करने की जरूरत

29 अप्रैल 2014
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट में एक दिलचस्प मामला चल रहा है जिसमें जजों ने केस के दो अलग-अलग हिस्से करके, उनको सुनने की प्राथमिकता भी तय कर दी है। दूरसंचार घोटाले के अलावा कई दूसरे किस्म की दलाली के आरोपों वाले नीरा राडिया टेप पिछले कुछ बरसों से लगातार खबरों में रहे हैं। और अब इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने रतन टाटा की एक अपील पर यह तय किया है कि गैरकानूनी तरीके से की गई इस टेलीफोन टैपिंग के निजता (प्राइवेसी) वाले पहलू पर पहले सुनवाई की जाए, और उसके बाद इन रिकॉर्डिंग्स में आई बातों से सरकार के कामकाज पर असर पडऩे के बारे में देखा जाए। अदालत ने माना कि अगर इन दोनों पहलुओं के बीच प्राथमिकता तय नहीं होगी, तो यह मामला आगे नहीं बढ़ पाएगा। 
हमारे लिए भी यह एक दिलचस्प मामला इसलिए है कि हम लोगों की निजी जिंदगी की निजता के अधिकार के बारे में कई बार लिखते हैं, साथ ही जनहित में किए गए स्टिंग ऑपरेशनों के बारे में भी लिखते हैं। यह मामला स्टिंग ऑपरेशन से परे गैरकानूनी फोन टैपिंग का था, जो अपने आपमें एक बड़ा जुर्म था, और अदालत में सरकार ने यह कह भी दिया था कि यह रिकॉर्डिंग उसकी की हुई नहीं है। अब एक सवाल यह उठता है कि हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े कारोबारी जब सरकार में अपने कामों को सही या गलत तरीके से, सीधे या दलालों के मार्फत करवाने की बात करते हैं, जब वे मंत्रियों को अपनी मर्जी के विभाग दिलवाना तय करते हैं, तो ऐसी बातचीत के सुबूत को गैरकानूनी तरीके से हासिल करना जुर्म है, या कि जनहित में है, या कि जनहित में किया गया जुर्म है, या फिर बाजार की आपसी लड़ाई का नतीजा है? 
इनमें से जो भी बात लागू होती हो, या जितनी भी बातें लागू होती हों, हमारा यह मानना है कि टेलीफोन पर निजी बातचीत अगर सरकार की किसी खुफिया एजेंसी की नजर में रिकॉर्ड करने के लायक नहीं है, अगर ऐसी रिकॉर्डिंग के लिए कानूनी औपचारिकता पूरी नहीं की गई है, तो ऐसी बातचीत को सुबूत मानना, उसकी रिकॉर्डिंग के आधार पर अदालत में केस चलना, गैरकानूनी रिकॉर्डिंग को बढ़ावा देने के अलावा कुछ नहीं होगा। ऐसे में तो लोगों की निजी जिंदगी खत्म होने लगेगी, और जितने मामले अदालतों तक ले जाए जाएंगे, उससे हजार गुना अधिक मामले गैरकानूनी रिकॉर्डिंग के बाद ब्लैकमेलिंग में काम आएंगे। इसलिए निजी जिंदगी की निजता को हम एक बुनियादी हक मानते हैं, और उसे किसी भी गैरकानूनी टैपिंग या रिकॉर्डिंग से ऊपर रखना चाहिए। आज गुजरात में नरेन्द्र मोदी की सरकार जिस कानूनी या गैरकानूनी टैपिंग और निगरानी को लेकर, उसके सही या गलत होने की जांच से घिरी हुई है, वह अपने आपमें बहस का एक मुद्दा है, और पहली नजर में कानूनी तौर पर किया गया एक बड़ा गंभीर गैरकानूनी मामला है। ऐसे में टाटा हो या राडिया, कारखानेदार हो या दलाल, पत्रकार हो या नेता, जब तक टैपिंग के कानून के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे का पैमाना पूरा न होता हो, तब तक ऐसी गैरकानूनी हरकत को सुबूत नहीं, सजा का हकदार मानना ठीक होगा। 
आज टेक्नालॉजी ने सरकार में बैठे हुए लोगों, और संचार कंपनियों के मालिकों और मैनेजरों के लिए लोगों की निजी जिंदगी में तांक-झांक को आसान बना दिया है, और इनके अलावा भी हैकरों, और जालसाजों, मुजरिमों और ब्लैकमेलरों के लिए भी टेक्नालॉजी एकदम नाजुक चीज है, जिसमें छेडख़ानी आसान है। हमारा मानना है कि ऐसी किसी भी छेडख़ानी पर बड़ी सजा का इंतजाम अगर नहीं होगा, तो धीरे-धीरे हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े लोग बड़ी-बड़ी ब्लैकमेलिंग का शिकार होकर बड़े-बड़े गलत काम करने लगेंगे, और छोटे-छोटे लोग भी ब्लैकमेलिंग से शोषण का शिकार होंगे। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और यह चाहे राडिया के टेप हों, या अमित शाह की करवाई गई निगरानी हो, इन सब पर पहले तो गैरकानूनी टैपिंग और निगरानी की सजा तय होनी चाहिए, बाद में बाकी पहलुओं पर बात होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो प्राथमिकता तय की है, हम उससे सहमत हैं।

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