4 अपै्रल 2014
संपादकीय
खुफिया कैमरों और माईक्रोफोन से स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए मशहूर कोबरापोस्ट नाम की भारतीय समाचार वेबसाईट ने ताजा भांडाफोड़ किया है, भाजपा, संघ परिवार, और हिंदू संगठनों के बड़े-बड़े नेताओं की बाबरी मस्जिद गिराने में हिस्सेदारी को लेकर। इसका समाचार खुलासे से छप रहा है इसलिए उन बातों को यहां दुहराने की जरूरत नहीं है, लेकिन इस मुद्दे पर चर्चा की जरूरत है कि चुनाव के ठीक पहले ऐसे भांडाफोड़ को लेकर भाजपा जो शिकायत कर रही है, वह शिकायत कितनी जायज है, कितनी नहीं।
1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए हुए अब खासा वक्त हो गया है, और इसके जांच आयोग के नतीजों में कुछ नेता जिम्मेदार पाए गए, और कई नेता सुबूत न मिलने पर बरी हो गए। लेकिन छह दिसंबर के उस दिन से लेकर अब तक देश में शायद ही कोई ऐसे हों, जिनको बाबरी मस्जिद को गिराने को लेकर, उसके पीछे के लोगों और संगठनों को लेकर, उसके पीछे की नीयत को लेकर कोई शक हो। उसके तुरंत बाद जिस तरह से भाजपा-शिवसेना, और बहुत से धर्म संगठनों ने बाबरी मस्जिद गिराने के गौरव पर दावा किया था, या उस पर गर्व किया था, तो उसे लेकर किसी बहुत शक की गुंजाइश नहीं बची थी। अब कोबरापोस्ट का स्टिंग ऑपरेशन अगर लोगों की बातचीत से यह सुबूत सामने रखता है, कि यह विध्वंस इन्हीं तमाम संगठनों का सोचा-समझा काम था, तो यह कोई अधिक सनसनी फैलाने वाला काम नहीं है। अब अगर भाजपा इस बात की शिकायत चुनाव आयोग में कर रही है कि इस स्टिंग ऑपरेशन को चुनावी मौके पर रोका जाए, तो इसे लेकर दो तरह के शक खड़े हो सकते हैं।
नरेन्द्र मोदी की शक्ल में जब भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री प्रत्याशी तय किया, तो यह बात साफ थी कि देश के भीतर बहुसंख्यक हिंदुओं, और अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच किस तरह के धु्रवीकरण की तैयारी भाजपा ने की थी, और बाद में भी धीरे-धीरे न सिर्फ भाजपा ने, बल्कि कांगे्रस और समाजवादी पार्टियों के बकवासी नेताओं ने भी ऐसे धु्रवीकरण में मदद की, जब मोदी के खिलाफ बोटी-बोटी काट देने के सार्वजनिक बयान दिए गए। अब ऐसे धु्रवीकरण के बीच दो दिन पहले ही नरेन्द्र मोदी ने गोश्त के कारोबार को लेकर, गुलाबी क्रांति की तोहमत कांगे्रस पर लगाते हुए जिस तरह गो-हत्या के मुद्दे को छुआ है, वह भी धु्रवीकरण के ऐसे ही बहुदलीय अभियान का एक हिस्सा लगता है। इसलिए आज जब कोबरापोस्ट भाजपा और संघ परिवार, हिंदू संगठनों को बाबरी मजिस्द गिराने के लिए जिम्मेदार साबित करने वाला स्टिंग ऑपरेशन सामने रखता है, तो हमारे लिए यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि इससे भाजपा का नुकसान हो रहा है, या उसका फायदा हो रहा है। जब इस बार की चुनावी राजनीति अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक तबकों के बीच धु्रवीकरण की एक लगातार कोशिश बनकर चल रही है, तो फिर किस तरह की बदनामी किस तबके के बीच नफा दिलाएगी, या नुकसान, यह सोचना आसान नहीं है, और इस ताजा जन्मभूमि-स्टिंग का असर भाजपा के पक्ष में भी हो सकता है।
दरअसल भारत जैसे लोकतंत्र में चुनावी राजनीति शतरंज की बिसात के घोड़े की तरह है, जो कि किसी भी तरफ ढाई घर चलने का काम करता है। हम भारतीय चुनावी राजनीति की हलचलों, और हरकतों को बहुत आसान लेकर नहीं चलते, इनमें घोड़े का मुंह किसी एक तरफ हो सकता है, लेकिन उसके अगले कदम किसी दूसरी तरफ बढ़कर फिर तीसरी तरफ ढाई घर पूरे कर सकते हैं। फिलहाल हम कोबरापोस्ट के इस स्टिंग ऑपरेशन के पीछे की नीयत को बहुत ज्यादा नहीं देखते, क्योंकि हिंदुस्तान में पूरे वक्त कोई न कोई चुनाव या राजनीतिक आंदोलन चलते ही रहते हैं। ऐसे किसी ऑपरेशन के पीछे की नीयत के बजाय अधिक अहमियत इस बात की है कि उससे क्या साबित होता है। अडवानी से लेकर उमा तक, और मुरलीमनोहर जोशी से लेकर विश्व हिंदू परिषद तक, इन सबने अपने शब्दों, और अपने कामों से, अपने अभियानों से बार-बार यही साबित किया था कि बाबरी मस्जिद को गिराना एक साजिश के तहत हुआ था, और तैयारी के साथ हुआ था। अब अगर वही बात खुफिया कैमरों के मार्फत सामने आ रही है, तो वह आज शायद चुनावी धु्रवीकरण में भाजपा का फायदा ही करे।

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