शहरों की खूबसूरती पर खर्च बंद करके, बुनियादी जरूरतों को जिंदगी के लायक बनाएं

28 अपै्रल 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पीलिया फैलने से दो मौतों के बाद सरकार और स्थानीय म्युनिसिपल के स्तर पर हड़बड़ी मची हुई है। चारों तरफ अफसर और निर्वाचित महापौर-पार्षद नालियों के बीच से गुजरती पानी की पाईप लाईनों की जांच और मरम्मत में जुट गए हैं। लेकिन आधी सदी से चले आ रहे म्युनिसिपल के इस इंतजाम का रातों-रात कोई इलाज नहीं हो सकता। चारों तरफ पानी के पाईप नालियों के बीच से, नीचे से, गंदे पानी होते हुए गुजरते हैं, और जैसा कि सरकारी सप्लाई के पाईपों में होता है, पाईप घटिया क्वालिटी के होते हैं, और उनका बिछते-बिछते ही खराब हो जाना शुरू हो जाता है, और यह तय रहता है कि नाली के पानी में डूबे हुए पाईपों का पानी खराब होगा ही होगा।
हमको हैरानी इस बात पर होती है कि कैसे इस तरह के शहरी इंतजाम के बीच दस लाख लोगों की आबादी बची रहती है, और पीलिया से होने वाली मौतें इतनी कम किस तरह रह सकती हैं। ऐसा लगता है कि लोगों के बदन में गंदे पानी से होने वाले नुकसान के खिलाफ, संक्रमण के खिलाफ, प्रतिरोधक क्षमता इतनी विकसित हो जाती है कि लोग प्रदूषित और गंदा पानी पीते भी रहते हैं, और जिंदा भी रहते हैं। यह हो सकता है कि मौत से कम दर्जे का नुकसान लोगों को होता हो, और लोग बीमार पड़-पड़कर जिंदा रहना सीख जाते हैं। लेकिन सेहत की जो बदहाली ऐसे गंदे पानी से हो सकती है, और होती ही है, उसकी सामाजिक लागत, उससे निजी उत्पादकता का नुकसान, और इलाज का खर्च, सरकारी आंकड़ों में नहीं आ पाते। 
भारत के पुराने शहरों में आबादी बढ़ती चली जाती है, और इंतजाम पुराने रहते हैं। उसी पुराने ढांचे पर बढ़ती आबादी, और हर नागरिक की बढ़ती हुई जरूरतों का बोझ और लदते जाता है, कुल मिलाकर नतीजा यह होता है कि सुविधाओं की क्षमता चुक जाती है। ऐसे में नए बनने वाले शहर तो भविष्य की जरूरतों के हिसाब से क्षमता की गुंजाइश रखकर बनते हैं, लेकिन भारत की शहरी आबादी का शायद तीन चौथाई हिस्सा पुराने ढांचे के तहत ही जीता है। ऐसे में शहरी खूबसूरती पर अंधाधुंध खर्च करने के बजाय राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं को चाहिए कि वे सबसे गरीब जनता की न्यूनतम जरूरतों को सबसे पहले पूरा करें। हम छत्तीसगढ़ के शहरों में देखते हैं कि किस तरह नेता-अफसर, और ठेकेदार बड़े-बड़े निर्माण-ठेकों में अधिक दिलचस्पी रखते हैं। सड़कों पर हर कुछ महीनों में डामर की नई तह बिछाई जाती है दिखती है, दसियों लाख की लागत से जगह-जगह स्वागत द्वार बनते हैं, और हर शहर में गौरवपथ बनाए जा रहे हैं। हमारे हिसाब से ऐसा दिखावटी काम करने के पहले सरकार और स्थानीय संस्था की पाई-पाई का इस्तेमाल नाली, पानी, और साफ-सफाई जैसी बुनियादी जरूरतों पर झोंकना चाहिए, जिससे कि सबसे गरीब की जिंदगी पर सबसे अधिक असर पड़ता है। 
आज राजधानी रायपुर में हड़बड़ी में जो मरम्मत चल रही है, उससे कुछ हासिल नहीं होना है। राज्य सरकार को तुरंत ही पानी पहुंचाने का ऐसा इंतजाम करना चाहिए जो कि नाली के बीच से होकर न गुजरता हो। इसके लिए अगर मौजूदा पाईपों को पूरी तरह भूलकर, नया इंतजाम करना पड़े, तो भी वह सस्ता इसलिए रहेगा क्योंकि वह पूरे शहर में सड़कों को खुदने से बचाएगा। जहां-जहां पाईप नालियों से जा रहे हैं, उन सभी जगहों पर खुले में ऊपर से पाईप ले जाने का काम करना चाहिए। आज की हड़बड़ी के बीच एक बहुत ही कामचलाऊ किस्म का इलाज देखा जा रहा है, ताकि मौतें और आगे न बढ़ें। लेकिन इससे परे एक पुख्ता इंतजाम करना चाहिए। ऐसा न होने तक शहरों की खूबसूरती पर खर्च रोक देना चाहिए, क्योंकि एक जगह शहर को खूबसूरत बनाया जाए, और दूसरी जगह उसी शहर में नाली-पानी के मेल से पीलिया-मौतें होती रहें, तो ऐसी खूबसूरती शर्मनाक ही है।

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