प्रवीण तोगडिय़ा मोदी के हिमायती हैं या दुश्मन?

21 अप्रैल 14
संपादकीय
जहर भरी और घोर साम्प्रदायिक बातें करने के लिए कुख्यात, विश्व हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण तोगडिय़ा ने गुजरात में अभी एक हिन्दू बहुल बस्ती में एक मुस्लिम के मकान खरीदने के विरोध में वहां किए जा रहे आक्रामक धार्मिक प्रदर्शन में हिस्सा लेते हुए कहा कि हिन्दू संगठनों के लोगों को इस मकान पर कब्जा कर लेना चाहिए और हिन्दू बस्तियों में मुस्लिमों को मकान नहीं खरीदने देना चाहिए। इस खबर के सुबह आ जाने के बाद से लगातार इसके खिलाफ प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, लेकिन अपने मिजाज के मुताबिक इस बात को कहने वाले प्रवीण तोगडिय़ा की तरफ से इसका कोई खंडन आठ घंटे बाद भी नहीं आया है, और इस वजह से यह मानने की कोई वजह नहीं है कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा होगा। 
यही मानकर हम इस बात पर आज यहां लिख रहे हैं कि ऐसी घोर साम्प्रदायिक बात न सिर्फ चुनाव के मौके पर बल्कि किसी भी मौके पर नहीं की जानी चाहिए, और इसके लिए चुनाव आयोग की जरूरत नहीं है, गुजरात के जिस शहर में मकान खरीदने वाले मुस्लिम के खिलाफ रामधुन और राम दरबार लगाकर ऐसा विरोध किया जा रहा है, उस शहर के अफसरों को बिना देर किए हुए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। पिछले दो-चार दिनों के भीतर देश के मुस्लिमों के खिलाफ आक्रामक हिन्दू नेताओं की कही हुई यह दूसरी-तीसरी बात है, और इसका भयानक असर देश के लोगों पर होना तय है। बाकी लोग तो जुबानी बयान देकर रह जा रहे हैं, लेकिन गुजरात में अगर मुस्लिम के मकान खरीदने पर भी सार्वजनिक हमलावर-हिंसक तेवरों से अगर हिन्दू संगठन दबाव डाल रहे हैं, तो इससे यह जाहिर है कि उस प्रदेश में कानून की हालत खराब है, और वैसी नहीं है, जैसी कि वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश भर में घूम-घूमकर बता रहे हैं। 
यहां पर इंसाफ के लिए, हमको यह चर्चा करना भी जरूरी है कि नरेन्द्र मोदी से तोगडिय़ा के मतभेद और खराब रिश्ते बरसों से जगजाहिर हैं, और हम इसके पीछे अगर तोगडिय़ा की ऐसी कोई साजिश हो कि जिससे नरेन्द्र मोदी को नुकसान पहुंचता हो, तो हम उस खतरे से भी इंकार नहीं करेंगे। राजनीतिक दलों में, और उनके सहयोगी संगठनों में ऐसी कोई साजिश अनहोनी बात नहीं रहती, और तोगडिय़ा जैसे लोगों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए भी हो सकता है कि मोदी को हराना जरूरी हो। इसलिए हम अभी तोगडिय़ा की कही बात को मोदी की कही बात सीधे-सीधे नहीं मान रहे, क्योंकि अपनी पिछली साख के खिलाफ जाकर भी मोदी ने दो दिन पहले एक इंटरव्यू में यह कहा था कि वे धर्म के नाम पर वोट मांगने के बजाय हार जाना बेहतर समझेंगे। हमारे विचार इस पूरे मुद्दे पर अपने हैं, लेकिन सच के साथ इंसाफ के लिए यह जरूरी है कि हिन्दुत्व से जुड़े इन अलग-अलग मुद्दों को जोड़कर एक तस्वीर यहां रखी जाए, ताकि पाठक उसे पूरा समझ सकें। आज भी तोगडिय़ा के बयान के खिलाफ जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उनमें बहुत से ऐसे हिन्दू लोग हैं जो कि अब तक यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वे किसे वोट देंगे, लेकिन अब तोगडिय़ा की ऐसी हिंसक बात के बाद उन्होंने अपना दिमाग बना लिया है। 
आज हिन्दुस्तान के चुनाव में एक ऐसी तस्वीर बन रही है, और बनाई जा रही है कि लोग नरेन्द्र मोदी को एक हिन्दू नेता के रूप में साथ दे रहे हैं। हकीकत यह है कि आज का वोट केन्द्र की कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ वोट है, राज्यों में मुलायम सिंह जैसे लोगों के खिलाफ वोट है, और जगह-जगह यूपीए के साथियों के खिलाफ वोट है। भाजपा और एनडीए की इतनी ताकत नहीं थी, और इतनी ताकत नहीं है कि वे देश में अपने बूते पर इतना माहौल बना पाते। लेकिन कांग्रेस और यूपीए के कुकर्मो ने देश में एक ऐसा शून्य खड़ा किया है कि उसमें नरेन्द्र मोदी टहलते हुए ही जा खड़े हुए हैं, और उन्होंने वह खाली जगह भर दी है। इसलिए आज जो लोग कांग्रेस से नाराज हैं, उन तमाम लोगों को हिन्दुत्ववादी, या मोदीवादी मानना ठीक नहीं है। कांग्रेस-यूपीए ने आम जनता को तकलीफ दे-देकर उनको एक ऐसे कोने में धकेल दिया है कि उनके पास मोदी और एनडीए के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। ऐसे में हम चुनावी नतीजों पर अटकल लगाए बिना भी, यह बात लिखना चाहते हैं कि इस चुनाव के नतीजों को हिन्दुत्व पर जनमत संग्रह नहीं माना जाना चाहिए। देश की जनता धर्म के आधार पर बंटी हुई नहीं है, और आने वाले चुनावी नतीजे मोटे तौर पर राजनीतिक मुद्दों पर फैसला सामने रखेंगे। 

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