संपादकीय
30 अप्रैल 2014
महात्मा गांधी के परनाती श्रीकृष्ण कुलकर्णी ने अमेठी में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार कुमार विश्वास का प्रचार करते हुए कहा कि राहुल गांधी, गांधी नाम का दुरुपयोग कर रहे हंै,और उन्हें इस नाम का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। उन्होंने मार्च में भी राहुल गांधी को पत्र लिखकर मांग की थी कि, वह गांधी नहीं हंै, और गांधी नाम का इस्तेमाल बंद कर दें। लेकिन तब संदर्भ यह था कि राहुल ने कहा था कि महात्मा गांधी की हत्या आरएसएस ने की थी। राहुल का यह बयान तथ्यों के हिसाब से गलत था। तब कुलकर्णी को उन्हें यह कहने का हक था कि वह अपने राजनीतिक फायदे के लिए महात्मा गांधी के नाम का इस्तेमाल करना बंद कर दे, लेकिन न तब, और न ही अब, महात्मा गांधी के परिवार से किसी को भी, राहुल गांधी को अपने नाम के आगे गांधी लगाने से मना करने का हक है।
सोनिया गांधी,राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अगर अपने नाम के पीछे 'गांधीÓ लगा होने का फायदा उठाते हंै, तो इसका संबंध महात्मा गांधी से कभी नहीं रहा, बल्कि नेहरू परिवार के बेटी इंदिरा से रहा जिन्होंने फिरोज गांधी से शादी की थी, जिस कारण नेहरू की विरासत इस देश में इस नाम से आगे बढ़ रही है। महात्मा गांधी के परनाती को 'गांधीÓ नाम पर अपने कुनबे का ही हक जताने से पहले यह जानना चाहिए कि भारत में अकेले मोहनदास करमचद गांधी ही अकेले गांधी नहीं थे। गुजरात के अलावा पंजाब, और मारवाड़ में भी इत्र सुगंधित चीजों का व्यापार करने वालों को गांधी कहा जाता था। महात्मा गांधी के रोबोटिक्स इंजीनियर परनाती ने अगर कबीर के दोहे पढ़े होंगे, तो उनमें भी गांधी का जिक्र है - कबीरा संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास, जो कुछ गंधी दे नहीं, तो भी बास सुबास।
यानि इस देश, और दुनिया में ऐसे बहुत से गांधी हंै, जो महात्मा गांधी के कुनबे में पैदा नहीं होने के बावजूद अपने नाम के आगे गांधी नाम लगाते हंै। इनमें से एक, पारसी परिवार में जन्मे फिरोज गांधी भी थे, जिनके परपोते राहुल गांधी हैं। अगर कुलकर्नी के मामा की औलादें महात्मा गांधी के परपोते, या पर पर पोते, होने के कारण अपने नाम के आगे गांधी लगा सकते हंै, तो राहुल क्यों नहीं?
अमेठी में जा कर गांधी के परनाती ने कुछेक अच्छी बातें कहीं और की हंै- जैसे उन्होंने अमेठी में धूल खाती पड़ी गांधी की मूर्ति को दूध से नहलाने से मना करते हुए कहा कि महात्मा गांधी के प्रति भक्ति दिखानी है तो आप पार्टी के कार्यकर्ता अमेठी की साफ सफाई करें। उन्होंने हरियाणा, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश, और तमिलनाडु की राजनीति में वंशवाद की बुराई भी की है, लेकिन क्या उन्हें महात्मा गांधी के कुनबे के लोगों द्वारा बरता वंशवाद दिखता है? कुलकर्णी महात्मा गांधी के वंश का होने का फायदा उठाकर चुनाव के समय एक ऐसी बात कर रहे हैं, जो दरअसल कोई मुद्दा ही नहीं है। राहुल का वंशवाद महात्मा गांधी के वंश से नहीं, नेहरू के वंश से जुड़ा है। न राहुल, न उनके परिवार के किसी ने महात्मा गांधी के कुनबे का होने का दावा कभी किया है। लेकिन कुलकर्णी को यह बयानबाजी करने का मौका ही इसलिए मिला है कि वह महात्मा गांधी के वंशज हैं। राहुल गांधी को गांधी नाम का इस्तेमाल नहीं करने की सलाह देने वाले कुलकर्णी, खुद महात्मा गांधी के कुनबे का होने के कारण वंशवाद का फायदा आम आदमी पार्टी को पहुंचाने अमेठी गए हंै।
वह अमेठी जाने पर वहां के विकास में कमी की बातें करते, सक्षम होते हुए भी भ्रष्टाचार रोकने में राहुल गांधी की नाकामी की बात करते, अमेठी के लोगों से कथित कुव्यवस्था, कुशासन से लडऩे गांधी के तौर-तरीके अपनाने की बात करते, तो यह मौके, और गांधी से उनके जुड़ाव के लिहाज से अच्छा रहता। लेकिन खुद गांधी नाम को अपनी बपौती समझकर अहंकार में घूमते रहना, और राहुल गांधी को उसके इस्तेमाल से बाज आने को कहना अजीबोगरीब है, क्योंकि राहुल, और उनके परिवार में से कोई भी कभी खुद को महात्मा गांधी के साथ नहीं जोड़ता। वह खुद को नेहरू, इंदिरा राजीव के नाम के साथ ही जोड़कर खुश हंै। ऐसे में एक गंभीर राजनीतिक मौके पर, ऐसे बेतुके अंदाज दिखाकर वह किसे बहला रहे हैं? महात्मा गांधी जब कोई नहीं थे, किसी महान हस्ती के वंशज नहीं थे, तब वह अपनी सोच, और आदर्शों पर यकीन रखते हुए उस वक्त की दुनिया की सबसे बड़ी ताकत से, अपने स्तर पर टकराते थे, अपने स्तर पर समाज और लोगों की सोच में बदलाव लाते थे। उन गांधी के नाम का बार-बार इतना घमंड दिखा रहे श्रीकृष्ण कुलकर्णी ने इस देश की बुराइयों के खिलाफ अपने स्तर पर क्या करने की हिम्मत दिखाई है? राहुल गांधी को नसीहतें देने में कोई बड़प्पन नहीं। एक चुनाव हारती दिख रही पार्टी के नेता नजर आ रहे नौजवान पर तो कोई भी कुछ भी बोल सकता है, लेकिन गांधी नाम को अपनी बपौती समझने वाले, दूसरों को अपने नाम के आगे गांधी लगाने से रोकने की चेतावनी देने वाले,दूसरों से किस तरह अलग हंै? बल्कि उनकी यह हरकत उन्हें इस देश के उन लाखों आम नागरिकों से भी सामान्य बनाती हंै, जो अपने स्तर पर देश के लिए वफादारी निभाते हंै, और चुनाव के दिनों में मुद्दे तौलकर मतदान करते हंै,गैर जरूरी कोरी बयानबाजी नहीं करते। महान नेताओं की आल औलादों होने के कारण अहमियत पाने वाले ऐसे लोगों को राहुल गांधी जैसे नेताओं को नसीहतें देने का क्या हक है, जो चाहे जैसी भी, देश की तस्वीर बदलने की कोशिश तो करते हंै!

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