20 अप्रैल 14
संपादकीय
भाजपा के उत्तर भारत के एक बड़बोले और हिंसक जुबान बोलने वाले नेता गिरिराज किशोर ने अपनी पार्टी के लिए एक नई दिक्कत खड़ी की है। जिस दिन नरेन्द्र मोदी एक टीवी इंटरव्यू में यह कह रहे हैं कि वे धर्म के नाम पर वोट मांगने के बजाय हार जाना पसंद करेंगे, उसी दिन गिरिराज किशोर ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके विरोधियों को पाकिस्तान जाना होगा। और ये ऐसी गंदी और राष्ट्रविरोधी बात कहने वाले वे अकेले नहीं हैं, उनकी पार्टी के नेता वरूण गांधी के हाथ काटने वाले वीडियो लोगों को याद हैं, और दूसरी भी कई पार्टियों के नेताओं ने तरह-तरह की हिंसक बातें पिछले दिनों में की हैं। और तो और जम्मू-कश्मीर पर तीन पीढ़ी से राज करते आ रहे फारूख अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि उनके हाथ अगर आतंकी होते, तो वे विरोधियों पर हमले करवाते। समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह ने और कई किस्म की गंदी और संविधान विरोधी बातें कहीं, और पूरी हवा ऐसी हो गई है कि मानो पूरा देश सबसे बुरी गंदगी का घूरा बन गया है।
हमने अभी कल-परसों ही लिखा कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को चुनाव सुधार के लिए कुछ कोशिशें करनी चाहिए, लेकिन अब यह लग रहा है कि कानून जहां-जहां कार्रवाई न भी कर पाए, वहां-वहां मीडिया को और समाज के लोगों को खुद होकर गंदी बातों का खतरा उजागर करते हुए उसके खिलाफ खुलकर सामने आना चाहिए। जब एक राजनीतिक दल के बयान के खिलाफ दूसरे राजनीतिक दल की तरफ से कुछ कहा जाता है, तो उसका वजन कम होता है। जब राजनीति का हिस्सा न रहने वाली बाकी ताकतें, अपनी विश्वसनीयता के साथ हिंसक जुबान के खिलाफ कुछ कहेंगी, तो उसका वजन बहुत अधिक होगा, और ऐसा करना जरूरी भी है।
समाज में जो लोग सोचना-विचारना जानते हैं, जो राजनीति और जिंदगी के बाकी मुद्दों की बारीकियों को समझते हैं, जो लोकतंत्र के पहलुओं को जानते हैं, और लोकतंत्र को बचाने में दिलचस्पी रखते हैं, वैसे लोगों को अलग-अलग छोटे-छोटे अनौपचारिक समूह बनाकर भी, अलोकतांत्रिक बयानों और हरकतों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र ने जब हर किसी को आजादी से जीने का हक दिया है, तो ऐसा हक बिना जिम्मेदारी के नहीं मिल सकता। और जो तबके अपने आपको पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी, और जिम्मेदार मानते हैं, उनकी चुप्पी मानो हिंसक बातों को मौन सहमति रहती है, देश में ऐसा लगता है कि ऐसी हिंसक और नाजायज बातों को देश मान रहा है। इसलिए चुप्पी को खत्म करने की जरूरत है, लोगों को खुलकर बोलने और लिखने की जरूरत है।
राजनीति तो अपनी रफ्तार से, और अपने गैरजिम्मेदार तौर-तरीकों से चलती ही रहेगी, लेकिन राजनीति से परे के लोगों को इस देश को बचाने के लिए, इस लोकतंत्र को बचाने के लिए, गांधी की अहिंसा की सोच को बचाने के लिए, देश की धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए, गरीबों के हक को बचाने के लिए, मुंह खोलना पड़ेगा। वरना इतिहास याद रखेगा कि किस तरह लोकतांत्रिक अधिकार रहते हुए भी तथाकथित बुद्धिजीवियों ने नाजुक और जरूरी मौके पर अपना मुंह नहीं खोला। उतना भी नहीं बोला जितना कि सैकड़ों बरस पहले बिना लोकतंत्र, बिना अदालत, बिना मीडिया, बिना मानवाधिकार आयोग के कबीर ने कहा था। आज शायद ही ऐसे लोग सक्रिय दिखते हैं, जिनमें कबीर जितना कहने का हौसला हो। आज और कुछ नहीं, तो लोग कम से कम कबीर को पढ़ लें, और उस बारे में दूसरों से चर्चा ही कर लें। गांधी, भगतसिंह को पढ़ लें, और दूसरों से उस पर चर्चा कर लें। ऐसा न करने वाले बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इतिहास में बुद्धूजीवी दर्ज होंगे।

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