10 अप्रैल 2014
संपादकीय
नक्सल हिंसा, धमकी, और धमाकों के बीच आज जिस तरह बस्तर में वोट डल रहे हैं, उसे देखकर छत्तीसगढ़ के बाकी इलाकों, और देश के दूसरे प्रदेशों को भी सोचना चाहिए। खासकर उन शहरी, संपन्न, और शिक्षित तबकों को देखना चाहिए कि लोकतंत्र के इस जलसे में जान का खतरा उठाकर किस तरह गैरशहरी, गैरसंपन्न, और गैरशिक्षित तबके वोट डालते हैं, और शहरी लोग घर बैठे टीवी पर चुनाव देखते हैं या पिकनिक पर निकल जाते हैं।
हम अपनी ही पुरानी बातों को दुहराने का खतरा उठाते हुए एक बार फिर मतदान शुरू होने के बाद, बाकी सीटों को ध्यान में रखते हुए इस बात को यहां लिख रहे हैं कि हर किसी को न सिर्फ खुद वोट डालने जाना चाहिए, बल्कि आसपास के लोगों को भी लेकर जाना चाहिए। अभी पिछले हफ्ते ही अफगानिस्तान की एक खबर आई थी कि किस तरह वहां बच्चे चुनाव का खेल खेलते हुए कतार लगाकर खड़े हैं, और कोई बच्चा बाकी लोगों की उंगलियों पर स्याही का निशान लगा रहा है। जिस अफगानिस्तान में तालिबानी आतंक के चलते लोकतंत्र का बुरा हाल है, सरकार का ठिकाना नहीं है, वहां पर बच्चे खेल-खेल में मतदान कर रहे हैं। उसे देखकर लगता है कि भारत में भी बच्चों को अगर इस तरह खेल में लगाया जाए, कुछ ऐसा किया जाए कि बच्चे भी मां-बाप के साथ मतदान केन्द्र में जाएं, तो एक अलग किस्म की जागरूकता उनके भीतर वोटर बनने के पहले भी खड़ी हो सकेगी। यह तो एक लंबी बात है, लेकिन आज जिन लोगों को वोट डालने का हक है, उनको अपनी लापरवाही और गैरजिम्मेदारी छोड़कर आने वाले दिनों में वोट डालने जाना चाहिए।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच वोटों का फासला पौन फीसदी था। एक फीसदी से भी कम के इस फासले को पाटने का काम मतदाताओं के पांच-दस फीसदी अधिक सक्रिय हो जाने से हो सकता है। उससे देश और प्रदेश को अलग सरकार मिल सकती है, और पार्टियों और नेताओं के होश उड़ सकते हैं। अफगानिस्तान से लेकर बस्तर तक खतरों में जीते हुए लोग शहरी हिन्दुस्तान के सामने एक मिसाल पेश कर रहे हैं, और उससे सबक लेना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें