अनचाहे चुनावी संदेशों से लेकर बदनीयत जुर्म वाले संदेशों तक

19 अप्रैल 14
संपादकीय
अभी चल रहे भारतीय आम चुनावों में ट्विटर पर अगर किसी ने मोदी शब्द भी लिख दिया, तो कम्प्यूटर की मदद से मोदी समर्थक ऐसे लोगों को मोदी के पक्ष में संदेश भेजना शुरू कर देते हैं। और लोगों को मशीनी मदद से ऐसे संदेशों से लाद दिया जा रहा है। यह कुछ उसी तरह का है, जिस तरह की लोगों के फोन पर घंटी बजती है, और नेताओं के रिकॉर्ड किए हुए संदेश उन्हीं की आवाज में आने लगते हैं। आज फोन, ई-मेल, और सोशल वेबसाईटों पर लोगों के अकाउंट की जानकारी आसानी से मिल जाती है, और उनको जिस तरह बाजार अपने विज्ञापनों से और अनचाही जानकारी से लाद देता है, उसी तरह राजनीतिक दल और उम्मीदवार यह काम कर रहे हैं। 
यह चुनाव निपट जाए इसके बाद चुनाव आयोग को, और शायद सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देकर लोगों को अनचाहे प्रचार के हमले का शिकार होने से बचाना चाहिए। आज टेक्नॉलाजी की वजह से यह आसान हो गया है कि लाखों-करोड़ों फोन नंबरों पर एक साथ प्रचार के संदेश भेज दिए जाएं। लेकिन इससे लोगों का सुख-चैन छिनता है, और उनको बार-बार अपना फोन उठाकर बाजारू प्रचार का यह हमला देखना पड़ता है। जब कोई देश और समाज टेक्नॉलाजी के विकास का फायदा उठाने की हालत में आते हैं, तो उसी वक्त इस तरह के हमले भी बढ़ते हैं, और ऐसे नाजायज और अनचाहे हमलों को रोकने के लिए सरकार को दखल देनी चाहिए, अदालत को भी पहल करनी चाहिए, और दूरसंचार को नियमित करने के लिए बनाए गए नियामक आयोग को भी अपना जिम्मा निभाना चाहिए। 
आज का जमाना सूचना के बोझ का है। बहुत से लोग अपने खुद के काम के बोझ से इतने दबे रहते हैं, कि उनकी जिंदगी में फालतू के प्रचार को झेलने का वक्त नहीं रहता। चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों से यह जवाब मांगना चाहिए कि जिन फोन नंबरों, ई-मेल खातों, और ट्विटर या फेसबुक अकाउंट पर वे संदेश भेज रहे हैं, वहां क्या वे पाने वालों को यह भी बता रहे हैं कि प्रचार का यह कूड़ा वे कैसे रोक सकते हैं? जिस तरह चुनाव आयोग ने दीवारों को रंगना बंद करवाया है, उसी तरह की डिजिटल गंदगी भी रोकनी चाहिए। टेक्नॉलाजी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने देने की इजाजत किसी को नहीं देनी चाहिए। 
इससे लगी हुई एक दूसरी बात यह है कि इंटरनेट, और फोन पर जो लोग झूठी जानकारी फैलाते हैं, गुमनाम अफवाहें फैलाते हैं, और दूसरों को बदनाम करने के लिए गढ़ी हुई तस्वीरें फैलाते हैं, दंगों के वक्त दूसरे देशों के दंगों को हिन्दुस्तान की हिंसा बताकर वीडियो फैलाते हैं, उनके खिलाफ चुनाव आयोग से लेकर सरकार तक, और अदालत तक, सबको तेजी से कार्रवाई इसलिए करनी चाहिए क्योंकि डिजिटल सुबूत आसान होते हैं, और उनके मार्फत ऐसे मुजरिमों को पकड़कर जब तक तेजी से सजा नहीं मिलेगी, तब तक बाकी लोगों को यह अंदाज भी नहीं लगेगा कि उनकी ऐसी हरकतें उन्हें जेल भेज सकती हैं। अभी तक हमने आईटी एक्ट के तहत सजा पाते हुए लोगों को नहीं देखा है, और कुछ लोग अदालती कार्रवाई तक ही पहुंच पाए हैं। भारतीय अदालतों की धीमी रफ्तार और डिजिटल टेक्नॉलाजी की तेज रफ्तार के चलते ऐसे मुजरिम और ऐसे जुर्म बढ़ते ही चले जाएंगे। इसलिए बाजार से लेकर राजनीति तक अनचाहे संदेशों से लेकर बदनीयत जुर्म वाले संदेशों तक पर तेजी से कार्रवाई की जरूरत है। भारत की संवैधानिक संस्थाएं अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी करें। 

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