23 अप्रैल 14
संपादकीय
भारत के आम चुनाव में मतदान के बीच बहुत से जागरूक और समझदार लोगों के बीच मुद्दा यह है कि साम्प्रदायिकता की आशंका के साथ भाजपा-एनडीए को जिताया जाए, मोदी को प्रधानमंत्री बनाया जाए, या फिर भ्रष्टाचार में गले-गले तक डूबी यूपीए सरकार को फिर से चुना जाए? कई लोग इस बात पर हैरान हैं कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद भी मोदी न सिर्फ गुजरात में लगातार किस तरह जीते, बल्कि आज देश में अगर किसी एक नेता की सबसे अधिक शोहरत है, तो वह मोदी की है, और दंगों के दाग के साथ गुजरात के इस नेता की देश के और भी हिस्सों में कितनी शोहरत कैसी हुई?
दरअसल इसे समझने के लिए साम्प्रदायिकता और भूख, इन दो बातों को एक साथ समझना होगा। साम्प्रदायिकता का दर्द उस तबके को ही आमतौर पर होता है जो कि साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार होता है। उससे परे के दूसरे तबके के लोगों को एक हमदर्दी हो सकती है, लेकिन उनका दर्द जख्मों जितना बड़ा नहीं हो सकता। यह एक वजह है कि गुजरात में जिस बहुसंख्यक हिन्दू तबके ने साम्प्रदायिक हिंसा के जख्म उतने नहीं झेले हैं, उसे देश के बाकी हिस्सों में साम्प्रदायिकता उतना बड़ा खतरा नहीं दिखती है। अल्पसंख्यकों को साम्प्रदायिकता के जख्म भुलाए नहीं भूलते, और वे इस बात को लेकर मोदी को कभी माफ भी नहीं करते, और भाजपा को वोट भी नहीं देते। लेकिन इन सीधे जख्मों से परे के बाकी के जो समुदाय हैं, उनकी भूख, और उनकी गरीबी, अल्पसंख्यकों के जख्मों के दर्द से अधिक है, और उनको यूपीए-कांग्रेस के भ्रष्टाचार, जिंदगी पर हावी गरीबी, और कांग्रेस नेताओं के बर्ताव का घमंड अधिक दर्द देते हैं। इसलिए साम्प्रदायिकता कुछ लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हो सकती है, और बाकी बहुत से लोगों के लिए भूखी जिंदगी की गरीबी से लड़ाई उससे कहीं अधिक बड़ा मुद्दा हो सकती है।
देश के बहुत से हिस्से ने साम्प्रदायिक हिंसा को रूबरू नहीं देखा है, जैसे छत्तीसगढ़। इसलिए यहां पर न उसके जख्म हैं, न उसका दर्द है। लेकिन गरीबी का दर्द है, और यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार की खबरें हैं। अब तो यूपीए के एक बड़े ईमानदार समझे जाने वाले नेता, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने भी यह मंजूर किया है कि यूपीए के भ्रष्टाचार की खबरों ने उसकी उपलब्धियों को ढांक दिया। इसलिए आज जब देश की आधी गरीब आबादी साम्प्रदायिकता के खतरे, उसके इतिहास, उसके जख्म और दर्द से नावाकिफ रहते हुए, एक साफ-सुथरी और ईमानदार, भ्रष्टाचार विरोधी मोदी सरकार की हिमायती दिखती है, तो उसे साम्प्रदायिक कहना गलत होगा। और जो लोग साम्प्रदायिकता को देश का सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं, जाहिर है कि उनके पेट भरे हुए हैं। खाली पेट पर कोई साम्प्रदायिकता और गरीबी में से पहले गरीबी से छुटकारा पाना ही चाहेंगे। मोदी के पैदा होने के भी जमाने पहले से यह बात चली आ रही है कि भूखे भजन न होए गोपाला।
हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली ताकतें जब गरीबों के मुंह के कौर को बेच-बेचकर अपने लिए माल-मेवा जुटाने लगती हैं, तो उस डकैती के खिलाफ खड़ी होने वाली ताकतें अगर साम्प्रदायिक इतिहास वाली भी रहती हैं, तो भी उनके दाग-धब्बों को भूखी जनता नजरअंदाज कर देती है। आज देश में वही नौबत है। कल जब आम आदमी पार्टी की सबसे चर्चित महिला नेता शाजिया इल्मी कैमरे के सामने मुस्लिमों से बार-बार कम्युनल (साम्प्रदायिक) बनने को कहते कैद होती हैं, तब एक तबके की साम्प्रदायिकता, और दूसरे तबके की साम्प्रदायिकता में कौन सा सतही फर्क बच जाता है? ये चुनाव भारत के लोकतंत्र की विविधता वाली संस्कृति को लेकर नहीं हो रहे, ये चुनाव बेईमानी, और बेईमानी के खिलाफ एक संभावना के बीच हो रहे हैं। ये चुनाव अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियों की साम्प्रदायिकता और हिंसा की वजह से धुंधले हो गए हैं।
जिन पार्टियों को दस या अधिक बरसों से सरकार चलाने का मौका मिला, और जिन्होंने देश-प्रदेशों को लूटने का काम किया, वे अब साख खोने के बाद भूखी जनता के बीच वोट पाने का हक खो चुकी हैं। इसलिए ये चुनाव साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, ध्रुवीकरण, या हिन्दू-मुस्लिम के आधार पर नहीं हो रहे, ये चुनाव भूखे-गरीब की नजर में एक सजायाफ्ता और एक संभावना के बीच हो रहे हैं।

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