नेताओं को सुरक्षा नियमों से छूट, न उनके हित में, न लोकतंत्र के

3 अप्रैल 2014
संपादकीय

कल से खबरों में है कि किस तरह भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के विमान को रोका गया, और उसे आगे की उड़ान में देर हुई। दूसरी तरफ एक खबर यह है कि गुजरात के जिस उद्योगपति, अदानी के विमान से नरेन्द्र मोदी प्रचार के लिए पूरा देश घूम रहे हैं, उसकी जांच में केन्द्र सरकार की एजेंसी को बहुत सी खामियां मिलीं, और इस विमान के पायलट भी किसी इमरजेंसी के लिए तैयार नहीं मिले। हम आगे लिखने के पहले एक दूसरी बात यहां साथ में याद दिलाना चाहते हैं कि किस तरह कुछ हफ्ते पहले भाजपा ने केन्द्र सरकार से यह सार्वजनिक मांग की थी कि नरेन्द्र मोदी की सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया जाए। 
भारत में बहुत से नेताओं के साथ हवाई हादसे हुए हैं, और माधवराव सिंधिया से लेकर, वाईएसआर रेड्डी तक, संजय गांधी से लेकर उद्योगपति जिंदल तक, बहुत से लोगों की जिंदगी हवाई दुर्घटनाओं में ही गई है। चुनाव की आपाधापी से परे भी, आम दिनों में भी हवाई दुर्घटनाएं होती हैं, इसलिए हम इस बात को अधिक महत्व नहीं देते कि किस नेता की उड़ान घंटे भर लेट होने से, उसकी आमसभा लेट हो गई। सब लोगों को यह बात समझनी चाहिए कि उड़ान में कोई भी कमी रहने से, न सिर्फ उसमें बैठे हुए लोग मारे जा सकते हैं, बल्कि नीचे जमीन पर जो लोग रहते हैं, वे भी कई मौकों पर ऐसे गिरे हुए विमानों की चपेट में आकर मरते हैं। इसलिए सुरक्षा नियमों, और सुरक्षा इंतजामों से किसी को भी छूट नहीं मिलनी चाहिए। और अगर सब कुछ ठीक रहने के बावजूद, अगर केन्द्र सरकार की मातहत किसी एजेंसी ने जानबूझकर मोदी की उड़ान लेट की है, तो इसकी तो जांच बाद में हो सकती है। खुद भाजपा के लिए यह एक अच्छी बात है कि कभी नहीं से देर भली। अपने प्रधानमंत्री-प्रत्याशी को खतरे में डालने के बजाय, उसे अपने नेता को हिफाजत से रखने की कोशिश करनी चाहिए। 
दूसरी बात चुनाव से परे की भी है। नेताओं की सुरक्षा पर देश का इतना पैसा खर्च होता है, और आम जनता की दिक्कतों की कीमत पर नेताओं को एक खास दर्जा देकर सुरक्षा जांच से छूट दी जाती है, दूसरे लोगों की जिंदगियों को खतरे में डालकर भारतीय लोकतंत्र के नेताओं, और बड़े जजों, और कुछ संवैधानिक ओहदों पर बैठे लोगों को बिना जांच सार्वजनिक विमानों में चढऩे मिलता है, जो कि आम जनता की जिंदगी के लिए खतरा हो सकता है। यह सिलसिला भी खत्म होना चाहिए। पांच बरस पहले से लोगों को पता रहता है कि कब चुनाव होने हैं, इसलिए वक्त रहते दौरा बना लेना चाहिए, और सबकी जिंदगी खतरों में नहीं डालनी चाहिए। किसी तरह देश और प्रदेश में सड़क के रास्ते चलने वाले लालबत्ती काफिलों के लोगों को भी कई दिन पहले से अपने खुद के कार्यक्रम मालूम रहते हैं इसलिए उनको जल्दी रवाना होकर, सड़क की जिंदगी तबाह किए बिना अपने काम पर पहुंचने की आदत डालनी चाहिए। ऐसा न होने पर वे सड़कों पर कितनी जिंदगियों को खतरे में डालते हैं, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। बहुत से ऐसे हादसे हुए हैं जब बड़े ओहदों की लालबत्तियों के ट्रैफिक जाम की वजह से सड़कों पर मरीज मारे गए हैं। 
यह चुनाव तो कुछ हफ्तों बाद खत्म हो जाएगा, लेकिन जनता के बीच से लोगों को देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंचकर आम और खास के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करनी चाहिए, उसके बिना आम जनता के मन में खास नेताओं के लिए नफरत बढ़ती चली जाएगी। खुद नेताओं को भी सुरक्षा नियमों से उनको मिलने वाली छूट छोडऩी चाहिए, जनता से कटकर, जनता की नफरत झेलकर उनका कुछ भला नहीं हो सकता। 

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