24 अपै्रल 2014
संपादकीय
लोकसभा चुनाव का एक बड़ा हिस्सा निपट जाने के बाद अब यह अटकल भी लगने लगी हैं कि अगली सरकार किस गठबंधन की बन सकती है, और उसका नेता कौन हो सकता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मानकर चलते दिख रहा है कि नरेन्द्र मोदी अगले प्रधानमंत्री हैं, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि भाजपा की सीटें कम आने पर एनडीए को ऐसे साथियों की जरूरत पड़ सकती है जो कि मोदी के नाम पर तैयार न हों। ऐसे लोगों में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सीटों की कमी पडऩे पर भाजपा के पास मोदी के अलावा किसी दूसरे नाम को सामने रखने में दिक्कत होगी, लेकिन यूपीए की मुखिया कांगे्रस पार्टी मोदी को रोकने के लिए किसी भी तीसरे मोर्चे के किसी भी गैरभाजपाई को बाहर या भीतर से साथ देने पर अधिक आसानी से तैयार हो सकेगी।
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर भाजपा और एनडीए ने इस बार मोदी को अगला मुखिया घोषित करके उन्हीं के नाम पर पूरा दांव लगा दिया, और वोट मांगे। और सच तो यही है कि भाजपा और एनडीए के पास मोदी के मुकाबले न कोई दूसरा नाम था, न कोई दूसरा चेहरा। इसलिए मोदी जिन बातों के लिए भी विख्यात हों, या कुख्यात हों, उन बातों के साथ-साथ वे ही यूपीए के खिलाफ सबसे दमदार उम्मीदवार थे और हैं। लेकिन ऐसे में भी इस बार के लोकसभा चुनाव भाजपा-एनडीए के पक्ष का वोट, या कांगे्रस-यूपीए के विपक्ष का वोट नहीं है। मामला इससे कुछ अधिक जटिल है, और उसकी गुत्थी वोटों की गिनती के बाद ही कुछ हद तक सुलझ पाएगी। यूपीए और एनडीए, इन दोनों गठबंधनों से परे की पार्टियां इतनी अधिक हैं, और उन्होंने कहीं पर त्रिकोणीय, तो कहीं चतुष्कोणीय मुकाबला बनाकर मतदाता के सामने से सिक्का उछालने जैसी सहूलियत हटा दी थी। अब देश के एक बड़े हिस्से में लूडो के पांसे की तरह तीन या चार, और कहीं-कहीं पांच विकल्पों में से किसी एक को छांटने की नौबत है। और हम जिस तरह लिख रहे हैं, उस तरह मतदाता फैसले नहीं करते, और वे बहुत सी बातों को सोचकर, या कई अच्छी बुरी बातों से प्रभावित होकर अपना वोट तय करते हैं।
लेकिन आज एनडीए के अधिकतर उम्मीदवारों के मुकाबले देखें, तो यूपीए, और बाकी पार्टियों के उम्मीदवार वोटों को आपस में बांटते दिख रहे हैं। हम अगर बिल्कुल लुहारी अंदाज में दो हिस्सों में लोहे के टुकड़े को काटें, तो साम्प्रदायिकता के खिलाफ वोट, बहुत से राज्यों में ऐसी पार्टियों में बंट रहे हैं, जो धर्मनिरपेक्ष होने का दावा तो करती हैं, लेकिन जिनके तेवर, और जिनके चाल-चलन धर्मनिरपेक्षता को जगह-जगह चकमा देते भी दिखते हैं। इसलिए यह चुनाव सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के बीच की पसंद का चुनाव नहीं है। एक तरफ से देखें, तो यह बेईमानी के खिलाफ, और ईमानदारी की उम्मीद के बीच का चुनाव भी लग रहा है। और इस चुनाव के और भी कई पहलू हैं, जिनकी चर्चा हम पिछले दिनों में अलग-अलग मुद्दों पर लिखते हुए करते आए हैं।
आज यहां चर्चा का एक बचा हुआ पहलू यह है कि भारतीय चुनावी राजनीति में सीधे-सीधे दो पार्टियों के दिन लद जाने के साथ-साथ, अब दो गठबंधनों के दिन भी लद गए दिखते हैं, और बिना बना हुआ, बेचेहरा, एक तीसरा मोर्चा चुनाव के पहले न सही, चुनाव के बाद सामने आएगा, जो अपने-आपमें हो सकता है कि किसी गठबंधन की शक्ल में न हो, लेकिन हो सकता है कि उसके बिना अगली सरकार बनना मुश्किल हो। यह नौबत देश में स्थिरता के लिए अच्छी रहेगी या खराब, उसके बारे में यहां की इतनी कम जगह में लिखना मुश्किल है, और साथ-साथ यह लिखना भी मुश्किल है कि स्थिरता हर मौके पर, और हर हद तक लोकतंत्र के फायदे की रहती है या नहीं। इसलिए बहुत सी पार्टियों ने मैदान में दो बड़े गठबंधनों से बाहर रहकर तस्वीर को जिस तरह धुंधला किया है, हो सकता है कि उस धुंध के बीच से एक ऐसी तस्वीर सामने आए, जो कि खालिस यूपीए, और खालिस एनडीए की सरकार के मुकाबले बेहतर हो, और जो कि अगली सरकार को भीतरी या बाहरी समर्थन देकर, उसी तरह सही पटरी पर रखे, जिस तरह वामपंथियों ने बाहरी समर्थन देते हुए यूपीए-1 को सही पटरी पर रखा था। आने वाले दिन बड़े दिलचस्प होंगे, भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में दिलचस्पी रखने वाले हर किसी के लिए।

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