27 अप्रैल 14
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के बरेली से दिल दहलाने वाली खबर है कि एक आदमी अपनी छह बरस की भतीजी को सारे लोगों के सामने मार डाला, एक हंसिया लेकर आया और भतीजी का गला काटकर सिर अलग कर फेंक दिया। बाद में पुलिस को उसने बताया कि यह लड़की देवी काली का अवतार थी, और उसे मारने के लिए आई थी। इसके पहले कि यह भतीजी उसे मार सके, उसने भतीजी को मार डाला।
अंधविश्वास से ऐसी हिंसा हर हफ्ते देश में कहीं न कहीं होती है, और कहीं महिलाएं टोनही कहकर मारी जाती हैं, तो कहीं किसी की बलि दे दी जाती है। छत्तीसगढ़ में भी हर बरस ऐसी बहुत सी हिंसा होती है, और पड़ोस के झारखंड में भी महिलाओं को मारने का लंबा इतिहास है। हम इसमें अलग-अलग वजहों से होने वाले अंधविश्वास पर अलग-अलग तर्कों की बात करने के बजाय यह चर्चा करना चाहते हैं कि देश में किस तरह से दकियानूसीपन को बढ़ावा दिया जा रहा है, और उसकी वजह से लोगों के बीच में आधुनिक सोच, वैज्ञानिक तर्क-वितर्क पैदा ही नहीं हो पा रहे। लोग पढ़-लिख रहे हैं, लेकिन उनके भीतर धर्मान्धता, कट्टरता, अंधविश्वास और बेइंसाफी कहीं कम नहीं हो रहीं। दरअसल देश में राजनीतिक ताकतें अपने चुनावी नफे-नुकसान को देखते हुए लोगों को दिमाग वाले इंसानों के बजाय बेदिमाग भीड़ की शक्ल में अधिक चाहते हैं, ताकि उनको जानवरों के एक रेवड़ की तरह मनचाहे रास्ते हांककर ले जाया जा सके। इसके लिए कभी धार्मिक आस्था को भड़काया जाता है, कभी जातियों के आधार पर लोगों को उकसाया जाता है, और यह कोशिश की जाती है कि लोकतंत्र और न्याय की समझ से लोगों को दूर ले जाकर किस तरह उन्हें बेसमझ बनाया जाए। भारत की राजनीतिक ताकतों में से अधिकतर पार्टियां लोगों को लोकतांत्रिक-राजनीतिक शिक्षण से परे रखना चाहती हैं, और तर्कहीन आधार पर उनका ध्रुवीकरण करने में लगी रहती हैं। राजनीतिक ताकतों से परे धार्मिक, आध्यात्मिक, और सामाजिक खाप पंचायतों जैसे संगठन जब हिंसक और अन्यायपूर्ण फैसले लेते हैं, कमजोर तबकों का शोषण करते हैं, भक्त-बच्चों के साथ बलात्कार करते हैं तो राजनीतिक नेता बलात्कारियों का साथ तब तक देते हैं, जब तक कि वे सुबूतों के घेरे में पूरी तरह, और बुरी तरह फंस न चुके हों। आसाराम नाम के आदमी का मामला इसकी एक बड़ी मिसाल है, जिसमें कि एक नाबालिग बच्ची ने जब बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई, तो देश की बड़ी-बड़ी राजनीतिक ताकतों ने पल भर में इसे आसाराम के खिलाफ साजिश करार दे दिया।
जब देश में न्याय और वैज्ञानिक सोच, लोकतांत्रिक रूख को कुचला जाता है, और लोगों को कमसमझ बनाए रखने की राजनीतिक साजिश की जाती है, तो जनता के बीच की बाकी बुरी ताकतें अंधविश्वास को बढ़ाने में लगी रहती हैं, और वही वजह है कि ऐसी हत्याएं होती हैं, जैसी कि कल बरेली में हुई है। और आज हम इस मुद्दे पर यहां इसलिए लिख रहे हैं कि यह इतनी भयानक हत्या हो चुकी है, लेकिन हत्या से कम की हिंसा जो परिवार के भीतर महिलाओं को, लड़कियों को, अजन्मी बच्चियों को शिकार बनाती हैं, उस हिंसा पर हम आमतौर पर नहीं लिख पाते, क्योंकि वह इस घटना की तरह खबरों में नहीं आ पाती है। लेकिन आज की ही एक दूसरी खबर यह है कि देश में अजन्मी कन्याओं को मारने में सबसे आगे का हरियाणा आज कुंवारे लड़कों की दिक्कत झेल रहा है, और ऐसे लड़के वहां पर एक संगठन बनाकर अपनी परेशानी को सामने रख रहे हैं। यह भी इस देश का एक अंधविश्वास है कि लड़की को मारकर यह देश आगे बढ़ सकता है। खाप पंचायतों की हिंसक सोच, अंधविश्वास का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा है, इस तरह की हिंसा सैकड़ों अलग-अलग शक्लों में इस देश को पीछे रख रही है।
देश की जनता में वैज्ञानिक और प्रगतिशील, सुधारवादी और न्यायवादी सोच कतरे-कतरे में नहीं आ सकती, यह जिंदगी के तमाम दायरों के लिए एक साथ ही आ सकती है, और राजनीतिक ताकतें ऐसा नहीं होने दे रहीं।

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