16 अप्रैल 2014
संपादकीय
भारत के मीडिया को देखें, तो पिछले कई महीनों से राजनीति खबरों पर, और विचारों के पन्नों पर भी इस कदर हावी है कि जिंदगी में मानो और कोई बात ही नहीं है। चुनाव अहमियत जरूर रखते हैं, लेकिन चुनावों से परे भी बहुत सी ऐसी बातें होती हैं, जिनके बारे में अखबारों को पढऩे वालों, और टीवी की खबरों को देखने वालों को मालूम होना चाहिए। हम खुद अखबार और टीवी के भरोसे दिन नहीं गुजार पाते, और इस अखबार को तैयार करते हुए ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क को लगातार देखने पर मजबूर रहते हैं, जहां पर कि भारतीय राजनीति से परे खबरें भी भरी रहती हैं। यह हालत मीडिया के कारोबार का एक बहुत आक्रामक तेवर बताती है कि जो सबसे अधिक बिक सकता हो, उसे सबसे अधिक दुह लिया जाए। राजनीति ऐसे ही सबसे अधिक बिकने वाले दो-तीन सामानों में से एक है।
ऐसे में हम उम्र गुजार चुके लोगों के बारे में अधिक फिक्रमंद नहीं हैं, लेकिन जो नई पीढ़ी राजनीति से परे भी बहुत कुछ जानना चाहती है, जिसके लिए दुनिया और जिंदगी के हर पहलू की जानकारी आगे के मुकाबले के लिए जरूरी रहती है, उस पीढ़ी को हिंदुस्तान का आज का मीडिया बहुत ही सीमित दायरे में जानकारी देकर अधर में छोड़ दे रहा है। जिस तरह हिंदुस्तान का खेल क्रिकेट के बोझ से दबकर बाकी लगभग तमाम खेलों को बच्चों के स्तर पर खो सा चुका है, उसी तरह राजनीति में खबरों को दबाकर, कुचलकर, उन पर लगभग एकाधिकार कायम कर लिया है।
यह नौबत इसलिए ठीक नहीं है, कि राजनीति महज राजनीतिक दलों, नेताओं, और चुनावों की बात नहीं होनी चाहिए। राजनीति के साथ जिंदगी के बाकी तमाम पहलुओं का भी एक रिश्ता होना चाहिए, लेकिन आज मानो वह सब खत्म हो चुका है। कला, संगीत, साहित्य, इतिहास, पढ़ाई-लिखाई, टेक्नॉलॉजी, समाज, ऐसे तमाम पहलुओं के बारे में इतना कम पढऩे मिल रहा है, और इतना कम देखने मिल रहा है, कि भारत के मूलधारा के मीडिया को राजनीति मीडिया कहना शायद ज्यादा सही होगा। जिस तरह कुछ अखबार कारोबार के अखबार रहते हैं, और कारोबार की ही खबरों को अधिक छापते हैं, उन अखबारों के पाठकों को बाकी बातों से अधिक लेना-देना नहीं रहता, उसी तरह आज आम अखबार राजनीति की खबरों पर जाकर थम जा रहे हैं। जिंदगी के बहुत से इतने अच्छे पहलू रहते हैं, कि उनके बारे में जानकर लोग राजनीति कडुवाहट से उबर भी सकते हैं, लेकिन उनके लिए मीडिया में कोई जगह नहीं रह गई। हो सकता है कि मीडिया का एक हिस्सा इन आम चुनावों के निकल जाने के बाद एक नए किस्म का मीडिया बनने की कोशिश करे और वह ताजी हवा का एक झोंका हो सकता है, और यह भी हो सकता है कि वह मीडिया के कारोबार के लिए भी एक बेहतर नौबत रहे।

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