18 अप्रैल 14
संपादकीय
महाराष्ट्र की खबर है कि किस तरह वहां के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने अपनी भतीजी, और शरद पवार की बेटी, सुप्रिया सुले के लिए वोट मांगते हुए खुली धमकी दी कि अगर वोट नहीं मिला तो गांव के लोगों को पानी मिलना भी बंद हो जाएगा। देश भर में जगह-जगह नेता हिंसक बातें कर रहे हैं, दूसरों को गंदी गालियां दे रहे हैं, और चुनाव प्रचार को लेकर एक हिंसक और बदबूदार माहौल खड़ा कर रहे हैं। ऐसे में चुनाव आयोग ने कुछ नेताओं पर मामूली रोक लगाई है, लेकिन आज की गंदगी पर इससे कोई फर्क पड़ते नहीं दिख रहा है। ऐसे में जरूरत एक ऐसे कारगर कानून की है, या कि मौजूदा कानून के भीतर ऐसी कारगर कार्रवाई की है कि जिससे गंदी बातों का यह सिलसिला, धमकी, और साम्प्रदायिकता, नफरत, इन सबको रोका जा सके।
भारत में चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया पर मतदान और मतगणना की हद तक तो काबू कर लिया है, लेकिन चुनाव प्रचार की गंदगी, चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल, बेईमानी और भ्रष्टाचार, खरीद-बिक्री पर कोई भी काबू नहीं हो पाया है, और इसी का नतीजा है कि धीरे-धीरे राजनीति में अब हिंसक-मुजरिम उम्मीदवार कम हो रहे हैं, और आर्थिक-अपराधी-कारोबारी उम्मीदवार बढ़ते चले जा रहे हैं। लगातार करोड़पति और अरबपति लोग न सिर्फ चुनावों में टिकट अधिक पा रहे हैं, बल्कि संसद और विधानसभाओं में भी उनकी आबादी बढ़ती जा रही है। नतीजा यह हो रहा है कि चुनाव के वक्त तो चुनाव को खरीदने की ताकत एक बड़ा पैमाना मान ली गई है, और उसके बाद का नतीजा यह होता है कि संसद और विधानसभाओं में गरीबी की समझ रखने वाले लोग घटते चले जा रहे हैं, और उनसे जुड़े मुद्दों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। भारत का चुनाव आयोग दुनिया भर में जिस बात के लिए वाहवाही पा रहा है, उससे अधिक करने की जरूरत है। सिर्फ मतदान केन्द्रों पर कब्जा रोकना काफी नहीं है। मतदान को खरीदने की ताकत का हिंसक और अश्लील इस्तेमाल भी रोका जाना चाहिए, वरना लोकतंत्र का बाजारीकरण भी हो रहा है, और बाजारूकरण भी हो रहा है। कारोबार ने अपने ही एक डिपार्टमेंट की तरह देश की संसदीय राजनीति को खरीदकर रखने का काम किया है, और भारत के चुनाव कानून, संसदीय कानून, ये सब मिलकर भी इसे रोक नहीं पा रहे हैं। एक तरफ संसद अपनी विशेषाधिकार को इंसाफ के ऊपर लेकर चल रही है और यही वजह है कि जब झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को खरीदकर नरसिंह राव की सरकार बचाई गई थी, तब सब कुछ साबित हो जाने के बाद भी मामला संसद के भीतर का होने की वजह से देश की अदालत बिके हुए लोगों का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई थी।
लोकतंत्र के तहत संसदीय व्यवस्था को, लोकतंत्र से भी पहले के प्राकृतिक और बुनियादी इंसाफ के ऊपर मान लेना एक गलती है। भारत में चुनाव सुधार के लिए न सिर्फ चुनाव कानूनों को सुधारने की जरूरत है, बल्कि संसद और विधानसभा के ऐसे विशेषाधिकार खत्म करने की भी जरूरत है जो कि भ्रष्ट सांसदों और विधायकों को बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। कुल मिलाकर आज की तस्वीर यह है कि जो पार्टियां चुनाव के पहले कारोबारियों के हाथ नहीं बिकतीं, वे संसद बन जाने के बाद, विधानसभा बन जाने के बाद वहां के मतदान के मौकों पर बिक जाती हैं, सवाल पूछने के मौकों पर बिक जाती हैं। यह नौबत सुधारना अधिकतर राजनीतिक दलों को गैरजरूरी लग सकता है क्योंकि ऐसा भ्रष्टाचार विपक्ष में बैठी पार्टियों को भी भ्रष्टाचार का मौका देता है, और उनकी भी कीमत लगती है। लेकिन हिन्दुस्तान को बचाने की फिक्र जिन लोगों को है, उनको चुनावों में पैसों के बोलबाले को खत्म करना होगा, वरना लोकतंत्र खत्म हो रहा है, और गरीबों का हक खत्म हो चुका है।
चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को संविधान के बुनियादी ढांचे के भीतर इस सुधार की कोशिश करनी होगी क्योंकि संसद में बिके हुए लोग ऐसा होने नहीं देंगे। हमारा यह मानना है कि भारतीय संविधान को बनाने वाले उस वक्त के महान नेताओं ने इस संविधान की भावना में ऐसे सुधार की गुंजाइश रखी है, और आज सुप्रीम कोर्ट को उसका इस्तेमाल करना चाहिए।

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