प्रेमी जोड़ों को मारने वाला समाज अपनी संभावनाएं नहीं छू सकता

2 अप्रैल 2014
संपादकीय

बिहार के कटिहार से खबर है कि गांव के एक मुखिया ने जाति के बाहर शादी करने वाले एक प्रेमी जोड़े को बंधक बनाकर रखवाया, मारा-पीटा, और सिर मुंडाकर, जूतों की माला पहनाकर गांव में उनका जुलूस निकाला। इस मामले में तो प्रेमी जोड़े की जान बच गई, लेकिन देश में आए दिन कहीं न कहीं प्रेमी जोड़ों की हत्या होती है, या उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया जाता है। हम बार-बार ऐसे मुद्दों पर लिखते हैं कि जो देश इतना दकियानूसी रहता है, जो समाज इतना हिंसक रहता है, उसमें प्रेम की उम्र वाली पीढ़ी लगातार एक निराशा और कुंठा के बीच जीती है, और देश को, समाज को, परिवार को उसकी संभावनाओं और उसकी उत्पादकता का फायदा नहीं मिल पाता। 
देश का कानून दकियानूसी इलाकों, और जातियों के बीच की ऐसी हिंसा को खत्म नहीं कर पा रहा है, इसलिए कि कानून को लागू करने की जिम्मेदारी सरकार हांकने वाली जिन ताकतों पर है, उनको जाति व्यवस्था, धर्म व्यवस्था की कट्टरता को बढ़ावा देते रहने में वोटों का फायदा दिखता है। 
भारत के समाज को यह समझना होगा कि पे्रम से नफरत करके वह अपने ही बीच के लोगों को ऐसी घोर निराशा में जीने पर मजबूर कर देता है कि उससे समाज की मानसिक सेहत बुरी तरह से खराब हो रही है। आज पे्रम के लिए किसी विदेशी संस्कृति की जरूरत नहीं है, कृष्ण से लेकर कालिदास तक और हिंदी फिल्मों में राजकपूर के भी पहले से लेकर अब तक, कदम-कदम पर पे्रम बिखरा हुआ है। और जिंदगी में पे्रम एक ऐसी भावना है जो लोगों को बेहतर काम करने की तरफ बढ़ाती है और गलत काम करने से रोकती है। ऐसे पे्रम को रोकना अपने ही बच्चों का नुकसान करना है। आत्महत्याओं और हत्याओं की खबरें ही समाज में पे्रम और उससे नफरत की हालत को बताने के लिए काफी नहीं हैं, और हकीकत इन खबरों से हजार गुना अधिक हो। और ऐसे में उस कड़वी हकीकत के चलते नौजवान पीढ़ी की निराशा भी इन खबरों से हजार गुना अधिक हो। जो नाली और गटर से छोटे-छोटे नवजात शिशु बरामद होते हैं, उन हत्याओं और मौतों के पीछे भी समाज का ऐसा नजरिया ही रहता है जो पे्रम संबंधों को इजाजत नहीं देता, दूसरी जाति या दूसरे धर्म में शादी की इजाजत नहीं देता। शादी के पहले बच्चे होने को इजाजत की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
एक साल पहले हमने अपने अखबार में छापा था कि किस तरह छत्तीसगढ़ के एक गांव में पे्रम विवाह करने वाले जोड़े पर गांव की पंचायत ने पचास हजार रुपये का जुर्माना लगाया, तो इस नौजवान जोड़े को गांव छोड़कर ही भाग जाना पड़ा। गुजरात के ईंट भ_े में काम की तलाश में पहुंचे इन लोगों ने अपनी बच्ची से छुटकारा पाने के लिए उसे टे्रन में छोड़ा तो एक अखबार में छपी तस्वीर को देखकर साथी मजदूरों से वह बच्ची पुलिस के मार्फत फिर इस मां-बाप की गोद में आ गई। 
बिहार को कोसना, और छत्तीसगढ़ की ज्यादती को अनदेखा करना गलत होगा। यहां भी कुछ समय पहले बिलासपुर के एक किसी स्कूल या कॉलेज ने लड़कियों के जींस पहनने पर रोक लगाई, और एक किसी जाति के संगठन ने अपनी जाति की लड़कियों की पोशाक पर तरह-तरह की रोक का फतवा जारी किया। सरकार चूंकि वोटों से चुनकर बनती है, इसलिए सरकार समाज सुधार के ऐसे फैसले आसानी से नहीं ले सकती जो कि मतदाताओं के एक संगठित तबके को नाराज करते हों। इसलिए निर्वाचित सरकारों से परे समाज के लोगों को ही आगे आकर समाज के अपने या पराए तबकों की नाराजगी को झेलना होगा। इसके बिना यह समाज दकियानूसी बने रह जाएगा और यह प्रदेश अपनी नौजवान पीढ़ी की क्षमताओं को कभी हासिल नहीं कर पाएगा। आज की जिस घटना को लेकर हम इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, उसके लिए जिम्मेदार सरपंच पर, पंचायत पर कार्रवाई होनी चाहिए और ऐसा न होने पर दकियानूसीपन एक संक्रामक रोग की तरह दूसरी जगहों तक फैलने की ताकत रखता ही है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें