9 अप्रैल 2014
संपादकीय
अरविंद केजरीवाल पर कल दिल्ली में हुए एक थप्पड़-हमले को लेकर बहुत कुछ कहा और लिखा जा रहा है, और भूखे-प्यासे समाचार चैनलों को मानो भरी हुई थाली मिल गई हो, वे टूट पड़े हैं। लेकिन ऐसी किसी घटना को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में देखने की जरूरत रहती है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी ने किसी नेता को थप्पड़ मारा हो। कुछ ही महीने हुए हैं जब शरद पवार पर किसी ने हाथ उठाया था, सुब्रत राय सहारा पर स्याही फेंकी थी, योगेन्द्र यादव के मुंह पर स्याही पोती थी, चिदम्बरम पर जूता फेंका था। और यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि दिल्ली में कुछ महीने पहले जब विधानसभा चुनाव हुआ तो इसी जूता फेंकने वाले को आम आदमी पार्टी ने अपना टिकट दिया था। अब अगर कांग्रेस पार्टी विमान अपहरण करने वाले को अपना उम्मीदवार बनाती है, समाजवादी पार्टी दर्जनों हत्याओं की जिम्मेदार कही जाने वाली फूलन को अपना उम्मीदवार बनाती है, तो जनता के मन की नाराजगी भी किसी तरह सामने आ सकती है। ऐसे में अगर आम आदमी पार्टी के लोगों को कुछ नाराजगी झेलनी पड़ रही है तो उसके पीछे की स्थितियों को देखने की जरूरत भी है।
दरअसल अन्ना हजारे के साथ शुरू करके अरविंद केजरीवाल ने एक गैरराजनीतिक आंदोलन को जिस रफ्तार से राजनीतिक बनाया, राजनीतिक दल बनाया, चुनाव लड़ा, सरकार बनाई, और सरकार भंग कर दी, इतनी रफ्तार से अब तक लोगों ने सिर्फ सीडी को फास्ट फारवर्ड करते देखा था, और राजनीति में ऐसी रफ्तार किसी ने नहीं देखी थी। इसके अलावा अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल दो साल की अपनी राजनीति में जितनी बार, जितने किस्म के यू-टर्न लिए हैं, उससे भी लोग हक्का-बक्का थे, और हैं। ऐसे में केजरीवाल को लोगों ने हाथों-हाथ ऊपर ले जाकर आसमान पर बिठाया था, और अब निराश होकर वे ही हाथ उनके गालों पर पड़ रहे हैं। भारतीय राजनीति में केजरीवाल एक धूमकेतु की तरह आए हैं, और वे कितनी लंबी राजनीतिक जिंदगी जीते हैं, इसका अभी अंदाज लगाना मुश्किल है। लेकिन वे जनभावनाओं को जिस तरह ऊपर और नीचे ले जाने का काम कर रहे हैं, उसके चलते कभी-कभी लोगों के मन में, कभी खुशी-कभी गम, किस्म की भावनाएं आती ही रहेंगी।
आज जब हिन्दुस्तान में एक नई सरकार को चुनने का सिलसिला शुरू हो गया है, तब ऐसी छोटी-मोटी घटनाओं की अहमियत तब तक नहीं है, जब तक ये किसी के लिए खतरा न बन जाएं। आज मुद्दे कुछ अलग हैं, और अलग होना भी चाहिए। आज हिन्दुस्तान की राजनीति में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा, और भाजपा की अगुवाई में एनडीए के दो दर्जन दल जिस तरह सत्ता की तरफ बढ़ रहे हैं, उसको देखते हुए धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली पार्टियां फिक्र तो जाहिर कर रही हैं, लेकिन मोदी को रोकने की सोच इनमें नहीं है। चुनाव मतदाताओं के सामने नेता, पार्टी, और गठबंधन को पेश करने का मौका रहता है, इसमें आज एनडीए कामयाब है, और कांग्रेस, यूपीए, या तीसरा, चौथा, और पांचवां मोर्चा बिखरे हुए हैं। किसी प्रदेश में तीन, किसी में चार कोनों वाले मुकाबले हो रहे हैं, और ऐसे में सबसे कम बिखराव, सबसे कम टकराव अगर किसी में है, तो वह एनडीए में है। ऐसे में केजरीवाल बाकी भाजपाविरोधी और एनडीएविरोधी मोर्चों में एक और बिखराव खड़ा कर चुके हैं। सोनिया गांधी की यह अपील कि धर्मनिरपेक्ष वोट न बंटें, किसी संभावना वाली अपील नहीं लगती है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता की दावेदार पार्टियां मोदी विरोध के नाम पर भी एक नहीं है। ऐसे में केजरीवाल को लगी थप्पड़ मुद्दा नहीं होना चाहिए, बल्कि देश की अगली सरकार बनने की संभावना, या आशंका, मुद्दा होना चाहिए। लेकिन यह फिक्र मानो हाशिए पर धकेल दी गई है।
जूता फेंकने वालों को टिकट देने वालों को थप्पड़ पडऩे में हैरानी क्यों होनी चाहिए?

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