6 अप्रैल 2014
संपादकीय
देश के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के चुनाव दुनिया के सबसे बड़े चुनाव होते ही हैं, और यहां से देखकर दुनिया के बहुत से देश चुनाव करवाना सीखते भी हैं। इस बार की चुनाव इंतजाम के हिसाब से पहले के मुकाबले और बेहतर, और पुख्ता तो रहेंगे ही, इस बार देश की जनता सोशल मीडिया पर अपने पसंदीदा नेताओं, और अपनी पसंदीदा पार्टियों का साथ तो दे ही रही है, विरोधियों पर खासे हमले भी कर रही है। पांच बरस पहले के मुकाबले अब भारत में इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कई गुना बढ़ा हुआ दिख रहा है। और दूसरी तरफ देश का मीडिया अपनी-अपनी दुकानों पर पार्टियों और नेताओं का साथ देते हुए, या फिर साथ देता हुआ लगते हुए काम कर रहा है, और उसके इरादों पर भी सवाल उठ रहे हैं। और ये सवाल किसी एक तरफ से नहीं उठ रहे, कई तरफ से उठ रहे हैं।
मीडिया और सोशल मीडिया, इन दोनों के बारे में यहां पर कुछ बातें हमको लिखना इसलिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि इन दोनों पर समझदार बातों के मुकाबले, समझदार तौर-तरीकों के मुकाबले, नासमझी के तौर-तरीके अधिक दिख रहे हैं। और नासमझी कहना भी शायद अपने आप में सही नहीं होगा, क्योंकि लोग बहुत हमलावर तरीके से खुद को नापसंद लोगों के खिलाफ लिख रहे हैं, और ऐसे समर्थकों की वजह से नेताओं और पार्टियों की एक तस्वीर भी बनना तय रहता है। जिस तरह किसी ईश्वर की धारणा के साथ जुड़े हुए उस धर्म के मानने वाले लोग जब अच्छा या बुरा काम करते हैं, तो उस ईश्वर और धर्म की तस्वीर भी बनती या बिगड़ती है। इसी तरह आज जब नरेन्द्र मोदी के समर्थक या विरोधी, राहुल गांधी के भक्त या उनका मजाक उड़ाने वाले, केजरीवाल को देश का भविष्य मानने वाले, या उनको देश को अंधेरे में धकेलने वाला मानने वाले जब सोशल मीडिया पर एक अभियान चलाते हैं, तो उससे ऐसे नेताओं और ऐसी पार्टियों की साख बनती और बिगड़ती भी है।
ऐसे लोगों के लिए ही हम यहां लिखना चाहते हैं कि अगर किसी का साथ देना हो तो तर्कसंगत और न्यायसंगत तरीके से, सच को जोड़कर बना हुआ साथ ही काम आता है। आज बहुत से लोग गालियों और नारों की जुबान में, बेइंसाफी की गंदी बातें करते हुए यह मानते हैं कि उनका किसी एक पर हमला, मुकाबले में उसके विरोधी को मजबूत करेगा। लेकिन होता इससे ठीक उल्टा है। ऐसी ही नौबत और ऐसे ही लोगों के लिए बड़े-बुजुर्ग एक बात कह गए थे कि जिनके ऐसे-ऐसे यार, उनको दुश्मन की क्या दरकार। इस पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि आज जनता का एक तबका खुलकर समर्थन और विरोध की बातें लिखने में लगा है। और यह एक अच्छी बात है कि लोग जनमत बनाने में भरोसा रख रहे हैं और उसके लिए वक्त निकाल रहे हैं। लेकिन उनके हमले अगर लोकतांत्रिक नहीं होंगे, अगर ऐसे हमले तर्कसंगत नहीं होंगे, तो ये सिर्फ मूर्खों को ही प्रभावित कर सकेंगे। इसलिए हम आज इस मुद्दे पर यहां इसलिए लिख रहे हैं कि जिनका साथ देना हो, समझदारी से साथ दें, वरना बेसमझ साथ नुकसान छोड़ कुछ नहीं करता। और आज झूठ को पकडऩे के लिए इंटरनेट जैसा आसान औजार हासिल है, और गढ़े गए झूठ जब पकड़े जाते हैं, तो सिर्फ वे खुद नहीं ढहते, उसके साथ-साथ साख भी ढहती है। इसलिए किसी का साथ भी देना हो, तो झूठ के साथ न दें।

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