अफगान वोटर कौम को देखकर हिन्दुस्तानी मुर्दे कुछ सीखें..

5 अप्रैल 2014
संपादकीय
तालिबानों की धमकियों के बावजूद अफगानिस्तान में जनता आज अगला राष्ट्रपति चुनने के लिए वोट डाल रही है। वहां रात-दिन आतंकी तालिबान सुरक्षा दस्तों को भी मार रहे हैं, इसलिए उनकी धमकी का वजन कम नहीं आंका जा सकता, और इसी वजह से वहां के निहत्थे आम लोगों के हौसले के वजन को भी कम नहीं आंका जा सकता। अफगानिस्तान के आज के इस मतदान पर लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, लेकिन आज जब हिन्दुस्तान अगली सरकार चुनने के कगार पर खड़ा है, तो हम वहां लोगों के हौसले की चर्चा करके यहां के लोगों से कुछ बात करना चाहते हैं। 
हिन्दुस्तान के अधिकतर इलाकों में वोट को लेकर कोई धमकी नहीं रहती है। छत्तीसगढ़़ के बस्तर में नक्सली पिछले कई चुनावों से लोगों को वोट डालने पर हाथ काट देने की धमकी देते आए हैं, लेकिन ऐसा हुआ कभी नहीं है। और बाकी हिन्दुस्तान में भी वोट डालने के खिलाफ किसी तरह की हिंसा होने की खबर नहीं रहती। ऐसे में जब लोग अपने सुरक्षित, शहरी, और संपन्न इलाकों में वोट डालने के दिन घर बैठे रहते हैं, या पिकनिक पर चले जाते हैं, तो वे अफगानिस्तान या बस्तर के लोगों के मुकाबले बहुत ही घटिया और गैरजिम्मेदार साबित होते हैं। ऐसा इसलिए हम मानते हैं क्योंकि देश की जो सरकारें बनती हैंं, वे जितने वोट पाती हैं, अक्सर ही उससे अधिक वोटर घर बैठे रहते हैं। इसलिए गैरजिम्मेदार और मुर्दा वोटरों की वजह से देश अच्छी सरकार पाने का मौका खो बैठता है। 
पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त से छत्तीसगढ़ सहित कुछ राज्यों में मतदाताओं का हौसला बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग और मीडिया ने कई तरह की कोशिशें कीं, और उनका अच्छा नतीजा भी निकला। आज राजनीतिक दल और उनके उम्मीदवार वोटों के जरा-जरा से फासले को लेकर अपने समीकरण बनाते हैं, और जीत-हार की उम्मीद रखते हैं। जबकि पांच-दस फीसदी अधिक वोट डल जाएं, तो नेताओं के सारे हिसाब-किताब धरे रह जाएंगे। और जो मुर्दा कौम पांच बरस में एक बार किसी सरकार को चुनने का मौका पाकर भी उसका इस्तेमाल नहीं करती, वह एक खराब सरकार पाने की ही हकदार रहती है। दिक्कत यह रहती है कि गैरजिम्मेदार और घर बैठे लोगों की वजह से वोट डालने वाले लोगों की मेहनत खराब जाती है, क्योंकि नतीजे को सारे वोटों को मिलाकर ही आते हैं, और जो सबसे भ्रष्ट और सबसे दुष्ट उम्मीदवार रहते हैं, वे तो मेहनत करके अपने पक्ष में मतदान करवा लेते हैं, वोटों को खरीद लेते हैं। दूसरी तरफ जो अच्छे उम्मीदवार रहते हैं, वे ऐसी खरीदी की ताकत नहीं रखते, और जोड़-तोड़ की तिकड़म भी नहीं रखते। इसलिए घर बैठे मुर्दा लोगों को कम से कम पांच बरस में एक बार अपने आपको जिंदा महसूस करते हुए जाकर वोट देने चाहिए और अच्छे लोगों को चुनना चाहिए।
आज जब अफगानिस्तान से बुर्कों में ढंकी हुई महिलाओं की लंबी-लंबी कतारों की तस्वीरें आ रही हैं, और पिछले वर्षों में लगातार तालीबानी हिंसा का इतिहास तो रहा ही है, तो ऐसी अफगान वोटर कौम के हौसले को देखकर तो हिन्दुस्तानी मुर्दों को कुछ सीखना चाहिए।

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