संपादकीय
26 जुलाई 2018

पाकिस्तान के चुनावी नतीजे अभी सामने आ रही हैं, लेकिन वहां उस देश के बाहर के पर्यवेक्षक और विश्लेषक यह मान रहे हैं कि इमरान खान और उनकी पार्टी की अब तक चल रही सीटों की लीड किसी मासूम चुनाव का नतीजा नहीं है, उन्हें इस चुनाव में जीतने के लिए पर्दे के पीछे से फौज की मदद मिल रही थी। इस चुनाव एक दिलचस्प बात यह भी रही कि हाफिज सईद समेत दूसरे आतंक-समर्थक लोग नकार दिए गए हैं। लेकिन जो बात आज सोचने की है वह यह कि फौज ने पर्दे के पीछे से इस चुनाव को इस तरह काबू किया है कि उनकी पसंद का उम्मीदवार और उसकी पार्टी सत्ता में आ सके। भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों के इतिहास को जानने वाले यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि पाकिस्तान में फौज अपनी हस्ती बनाए रखने के लिए भारत के साथ तनाव को बेहतर नौबत समझती है, और वैसे भी दुनिया के किसी भी देश में फौजी अफसर रहें, जंग उनकी पसंद रहता है, और उन्हें हर समस्या, हर दिक्कत का फौजी निपटारा बेहतर लगता है। ऐसे में फौज की पसंद के इमरान अगर प्रधानमंत्री बनते हैं, तो भारत के साथ सरहद पर और राजधानियों में एक गैरजरूरी तनाव खड़ा रहेगा, बढ़ता रहेगा। अपने चुनाव अभियान के पहले भी इमरान खान ने हिन्दुस्तान के खिलाफ कई किस्म की बातें कही थीं, जो कि फौज की पसंद की थीं, और शायद उनके इस रूख की वजह से वे फौज की पसंद के थे। लोगों को याद होगा कि अभी-अभी पाकिस्तान हाईकोर्ट के एक जज ने वकीलों के एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि किस तरह पाकिस्तानी मीडिया और पाकिस्तानी अदालतें फौज के काबू में हैं। और यह चुनाव शायद अब तक के पाकिस्तान के तमाम चुनावों में सबसे अधिक फौजी दखल वाला चुनाव रहा।
यह एक फिक्र की बात है कि भारत का सबसे करीब का एक लोकतंत्र अब अपना चरित्र खोकर एक फौजतंत्र बन रहा है। हालांकि पाकिस्तान में बीच के बरसों में कई बार फौजी हुकूमत भी आई है, लेकिन वे खुली हुई फौजी हुकूमतें थीं। अब फौज ने पर्दे के पीछे से मीडिया और अदालत पर काबू करके, नवाज शरीफ को जेल भेजकर, इमरान का साथ देकर पाकिस्तान के चुनावों को एक तरफ मोड़ दिया है, और अपना पसंदीदा प्रधानमंत्री बनवाने के करीब फौज पहुंच चुकी है। ऐसे में भारत के साथ रिश्ते पाकिस्तानी फौज के लिए सबसे अधिक मायने इसलिए रखते हैं कि अब तक के तमाम जंग पाकिस्तानी फौज ने महज हिन्दुस्तान के खिलाफ ही लड़े हैं। और किसी भी देश की फौज को यह फिक्र नहीं होती कि उस पर होने वाला खर्च देश के किन गरीबों के पेट काटकर लाया जाता है, और किस तरह सरहद पर एक गैरजरूरी और नाजायज तनाव दोनों देशों को बहुत महंगा पड़ता है। इमरान खान अगर प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनके सामने एक बड़ी दिक्कत यह भी रहेगी कि जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ नारा लगाकर वे सत्ता तक पहुंचे हैं, उस भ्रष्टाचार में पाकिस्तानी फौज का बड़ा हिस्सा बताया जाता है। फौज के गैरजरूरी खर्च को अगर इमरान कम करना चाहेंगे, तो फौज उनके खिलाफ बगावत कर देगी। और भ्रष्टाचार का एक बड़ा हिस्सा फौज के मामलों को लेकर होता है।
हिन्द महासागर के इस क्षेत्र में यह एक फिक्र की नौबत है कि पाकिस्तान में एक कमजोर प्रधानमंत्री बनने जा रहा है, जिसके पीछे फौज की पकड़ रहेगी। इस प्रधानमंत्री के नाम से भारत के खिलाफ कही हुई बहुत सारी बातें दर्ज भी हैं, और आने वाले दिन इस रूख को और खतरनाक बना सकते हैं। दूसरी तरफ भारत की एक घरेलू दिक्कत आने वाले महीनों में यह भी रहेगी कि 2019 में उसे आम चुनाव देखने हैं। और केन्द्र की मोदी सरकार इस चुनाव के वक्त पाकिस्तान के साथ किसी बढ़े हुए तनाव को चुनावी सहूलियत भी मान सकती है। पाकिस्तान के भीतर फौजी हुकूमत के बजाय लगातार चुनाव होते रहें, यह एक अच्छी बात है, वहां आतंकी हारते रहें यह भी एक अच्छी बात है, लेकिन भारत और पाकिस्तान दोनों जगहों पर एक-दूसरे के खिलाफ हमलावर तेवर रखने वाले प्रधानमंत्री होना कभी अच्छी बात नहीं हो सकती, इससे दोनों देशों में गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर सरहद पर फौजियों पर खर्च होना बढ़ते रहेगा। (Daily Chhattisgarh)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें