गरीब किसान की बेटी दुनिया में अव्वल आकर सोना लाई

संपादकीय
13 जुलाई 2018


फिनलैंड में चल रहे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में भारत के असम की एक गरीब खिलाड़ी हिमा दास ने गोल्ड मेडल हासिल करके सबको चौंका दिया। यह किसी एथलेटिक मुकाबले में भारत को मिला अपने किस्म का पहला गोल्ड मैडल है, और यह खिलाड़ी उस असम से आई है जहां पर एथलेटिक्स का ज्यादा चलन नहीं है, और वहां से ऐसे अधिक खिलाड़ी आते भी नहीं हैं। वह एक गरीब किसान की बेटी है, और महज कोच के दिए हौसले से उसने शहर में रहकर यह तैयारी की। उसके लिए शहर के हॉस्टल में जगह भी नहीं थी लेकिन उसे खास रियायत देकर वहां रखा गया, और उसने यह कामयाबी पाई। आज जब विश्वकप फुटबॉल में 40 लाख की आबादी वाला क्रोएशिया फाइनल में पहुंचता है, तो दुनिया के बड़े-बड़े देशों के लिए सोचने की बात हो जाती है। भारत में फुटबॉल खासा खेला जाता है, और इस देश की आबादी में दर्जनों क्रोएशिया समाए हुए हैं, लेकिन इस देश की पूरे विश्वकप फुटबॉल मुकाबलों में कोई भी जगह नहीं है, इसका दाखिला भी वहां नहीं है। भारत फीफा रैंकिंग में पहले सौ में बड़ी मुश्किल से आ पाया है, और उसकी रैंकिंग 99 नंबर की है। 
लेकिन यह मामला बहुत आसान भी नहीं है। किसी देश में खेलों की कामयाबी बहुत सी बातों पर टिकी होती है। चीन की खेलों की तैयारी देखें तो सुनाई पड़ता है कि किस तरह ओलंपिक के लिए जिम्नास्ट तैयार करने वहां के खेल प्रशिक्षक और अफसर गली-गली घूमते हैं, और खेलते हुए बच्चों में से संभावनाओं को छांटकर ले आते हैं, और उन्हें बरसों तक केवल ट्रेनिंग देते हैं। यही वजह है कि चीनी जिम्नास्ट ढेर सा सोना ले जाते हैं। दूसरी तरफ अमरीका या रूस, ब्रिटेन या फ्रांस ऐसे देश हैं जहां पर स्कूलों के स्तर से ही खेलों को बढ़ावा दिया जाता है, सारी सहूलियतें दी जाती हैं, मैदान या इमारतें बनाई जाती हैं, सारे खेल उपकरण दिए जाते हैं, उम्दा दर्जे का प्रशिक्षण मौजूद रहता है, और वहां के बच्चे हर किस्म के मुकाबले में आगे बढ़ते हैं। भारत चूंकि अंग्रेजों का गुलाम रहा है इसलिए क्रिकेट यहां पर एक ऐसा वटवृक्ष हो गया है जिसके तले दूसरे खेलों की कोई अहमियत नहीं लगती है। बाजार का प्रायोजन का सारा पैसा मानो केवल क्रिकेट के लिए रहता है, और क्रिकेट ने अपने आपको एक साम्राज्य की तरह बना लिया है जो कि सरकार या सुप्रीम कोर्ट के काबू से भी बाहर हजारों करोड़ का धंधा हो गया है। इस देश में क्रिकेट का प्रशंसक होना स्कूल-कॉलेज के बच्चों के बीच खिलाड़ी होने की विकल्प की तरह रच-बस गया है। 
लेकिन हम राज्यों में देखते हैं, तो बहुत से राज्यों से ऐसी खबरें आती है कि वहां के खिलाडिय़ों को न मैदान मिलते, न सामान मिलते, न ट्रेनिंग मिलती, न मुकाबलों में जाने-आने, रहने-खाने का इंतजाम मिलता। अधिकतर राज्यों में खिलाडिय़ों का सम्मान तब होता है जब वे जीतकर आ जाते हैं। लेकिन मैडल के पहले की तैयारी में तरह-तरह की दुखभरी कहानियां सुनाई पड़ती हैं, और सरकार में बैठे हुए लोग, या कि खेल संघों की राजनीति पर काबिज बड़े-बड़े नेता और अफसर ऐसे रहते हैं जिनके लिए खिलाडिय़ों की बुनियादी सहूलियतें मायने नहीं रखतीं। सरकारों में बैठे हुए लोगों की अधिक दिलचस्पी करोड़ों के खर्च वाले मुकाबलों में दिखती है, या कि करोड़ों-अरबों की लागत के बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने में दिखती है। ऐसे में अगर देखा जाए तो दुनिया भर से मैडल लाने वाले हिन्दुस्तानी खिलाड़ी ऐसे अफसरों और खेल संघों की वजह से जीतकर नहीं आते हैं, उनके बावजूद जीतकर आते हैं। 
छोटे-छोटे से, बित्ते भर के देश पूरी दुनिया के मुकाबले में फाइनल पर पहुंचते हैं, और हिन्दुस्तान शुरू की 98 टीमों में भी नहीं है। यह नौबत रातों-रात बदली नहीं जा सकती, लेकिन इसे सुधारने के लिए यह जरूरी है कि खेलों को खेल संघों की राजनीति, आयोजनों के ठेके, और कांक्रीट के बड़े-बड़े ढांचों से परे होकर सोचना होगा। जब कभी भारत के किसी गरीब खिलाड़ी को मौका मिलता है, तो वे बहुत से खेलों में बहुत आगे तक बढ़कर दिखाते हैं, लेकिन यहां की अधिकतर आबादी के बच्चे गली-मुहल्ले के खेलों से आगे बाकी खेलों से पूरी तरह अछूते रह जाते हैं। इस नौबत को सुधारने का कोई आसान रास्ता यहां सीमित शब्दों में नहीं सुझाया जा सकता, लेकिन इस बारे में बहुत से स्तरों पर सोचने-विचारने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)

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