देश को प्रधानमंत्री देने वाले राज्य की बदहाली

संपादकीय
16 जुलाई 2018


उत्तरप्रदेश की एक जेल में जिस तरह एक खूंखार माफिया कैदी को गोलियों से भूनकर रख दिया गया है, उससे वहां जेल के बाहर का हाल भी उजागर होता है। अब खबर यह है कि इस हत्या की जांच शुरू हो, उसके पहले ही उसी जेल में बंद एक दूसरे खूंखार अपराधी का बयान आया है कि उसने किस तरह यह हत्या की थी। जांच करने के लिए जिस पुलिस अफसर को जेल जाना था, उसने बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के वहां से जाने के लिए मना कर दिया, और उसकी हिफाजत के लिए ऐसी जैकेट पहनाकर उसे भेजा गया। दूसरी तरफ अब खबरें आ रही हैं कि इस तरह के कई माफिया सरगना जेल के भीतर से बड़े-बड़े सरकारी कंस्ट्रक्शन ठेके ले रहे हैं, और रेत की खदानों का सौ-सौ करोड़ तक का ठेका ले रहे हैं। एक खबर यह भी है कि जेल में मारे गए माफिया सरगना के गुर्गे बाहर लोगों से अभी भी उसके नाम पर उगाही कर रहे हैं कि जेल के भीतर हत्यारे की हत्या करवानी है, उसके लिए रकम चाहिए। 
उत्तरप्रदेश का यह हाल रातोंरात नहीं हुआ है, और न ही योगी सरकार आने के बाद हालत कुछ सुधरी है। वहां पहले समाजवादी पार्टी की सरकार रहते हुए जिस तरह का जातिवाद पुलिस से लेकर बाकी सरकारी अमले मेें चला उससे ईमानदार और काबिल, जिम्मेदार और मेहनती कर्मचारियों और अफसरों के बीच काम करने की हसरत खत्म ही हो चुकी थी। अखिलेश यादव के पहले मायावती के राज में भी उत्तरप्रदेश का कुछ ऐसा ही हाल था, और वहां पर ठेकेदारी, रंगदारी, और राजनीति का ऐसा बुरा मिलाजुला धंधा दशकों से चल रहा है कि वह जेल के भीतर एक बड़ी चर्चित हत्या से तो खबरों में आया है, लेकिन उससे परे लोगों को वह दिखता नहीं है। इस प्रदेश में नए भाजपाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आने से बदला केवल यही है कि एक जाति के अफसरों की जगह दूसरी जाति के अफसर आ गए हैं, या कि एक पार्टी से जुड़े हुए अफसरों की जगह दूसरी पार्टी से जुड़े अफसरों ने मलाईदार कुर्सियां पा ली हैं। कुछ महीने पहले जब उत्तरप्रदेश में लगातार मुठभेड़ में कुख्यात लोगों को, या निगरानी बदमाशों को मार गिराया गया, तो उसके बाद भी जो दहशत खड़ी हुई उसमें बाकी लोगों की जानबख्शी के लिए और अधिक उगाही होने की भी खबरें हैं। 
किसी प्रदेश में जब जुर्म का बोलबाला इतना हो जाता है कि जेलों की भीतर से सांसद और विधायक भी अपने-अपने गिरोह चलाते हैं, और पेशेवर मुजरिम किसी और को ठेकों में बोली नहीं बोलने देते, तो उस राज्य का कोई भला नहीं हो सकता। बिहार में भी दशकों तक ऐसा ही हाल था, और शायद वहां नीतीश कुमार ने हालात कुछ सुधारे हैं। उत्तरप्रदेश साख के मामले में बहुत कमजोर साबित हो रहा है। ताजमहल को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश या पर्यावरण के कानून मानने से लेकर आम जनता की जिंदगी की हिफाजत तक सभी का बुरा हाल है। जब राज्य सरकार इमारतों को रंगने को अपनी प्राथमिकता समझ लेती हैं, तो फिर उसका ध्यान बाकी जरूरी चीजों की तरफ जाए तो जाए कैसे? राज्य में सांसद और विधायक लगातार साम्प्रदायिक बातें करते घूमते हैं, और किसी को मुजरिमों से परहेज दिखता नहीं है। दिल्ली से लगा हुआ यह राज्य भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, और निकम्मेपन का शिकार होकर अपनी उस साख को पूरी तरह खो बैठा है कि यह राज्य देश को लगातार प्रधानमंत्री देता था। आज यह राज्य देश को जुर्म की और साम्प्रदायिकता की सबसे बुरी खबरें देता है। 
किसी राज्य के ऐसे हाल को देखकर बाकी राज्यों को भी यह नसीहत लेनी चाहिए कि वे राजनीति, और खासकर चुनावी राजनीति के फेर में अगर मुजरिमों को बढ़ावा देते हैं, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, या हिंसा को बढ़ावा देते हैं तो उस राज्य का ऐसा हाल होता है। (Daily Chhattisgarh)

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