अन्ना हजारे, भाड़े के गांधीवादी ने एक बार फिर सुपारी ले ली

संपादकीय
30 जुलाई 2018


अपने-आपको गांधीवादी कार्यकर्ता कहने वाले अन्ना हजारे की ताजा मुनादी सामने आई है कि केंद्र सरकार द्वारा लोकपाल की नियुक्ति में देर करने के खिलाफ वे दो अक्टूबर, गांधी जयंती से आमरण अनशन करेंगे। अभी कुछ हफ्ते पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर खासी नाराजगी जाहिर की थी कि मोदी सरकार कई बरस से लोकपाल नियुक्ति की जिम्मेदारी से बचती चली आ रही है। यह बहुत ताजा इतिहास है और भारत के लोगों को अच्छी तरह याद है कि मनमोहन सिंह सरकार के वक्त अन्ना हजारे ने दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, जस्टिस हेगड़े जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर लोकपाल कानून बनाने के लिए इस किस्म का आंदोलन छेड़ा था, और लोकपाल की एक ऐसी तस्वीर पेश की थी जो कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ रामबाण दवा हो, और जिसके अस्तित्व में आते ही देश से भ्रष्टाचार पूरी तरह मिट ही जाएगा। अन्ना हजारे साल 2011 में दिल्ली में 12 दिनों की भूख हड़ताल के बाद देश में लोकपाल आंदोलन का चेहरा बन गए थे। उनके आमरण अनशन के बाद ही तत्कालीन यूपीए सरकार ने सदन में लोकपाल विधेयक पारित कराया था। लेकिन कई बरस गुजर जाने के बाद भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई है, और सुप्रीम कोर्ट इन बरसों में कई बार मोदी सरकार को छिड़क भी चुका है। 
अब सवाल यह है कि 2011 में अन्ना हजारे ने जिस अंदाज में एक आंदोलन शुरू किया था, उसे मोदी सरकार आने के बाद किनारे रखकर वे अपने गांव रालेगान सिद्धि जाकर सो गए थे। अब जब सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से सीधे-सीधे समय मांग चुका है कि वह बताए कि वह कब तक लोकपाल नियुक्त होगा, और अब केंद्र के हलफनामे का दिन भी आ गया है, तब एक बहुत ही धूर्त इंसान की तरह अन्ना हजारे एक बार फिर आंदोलन की बात कर रहे हैं। गांधी के नाम पर आज वे देश में सबसे बड़े पाखंडी हैं और खादी की टोपी, खादी के कपड़े, सत्याग्रह, अनशन, आमरण अनशन, किस्म के गांधी के औजारों को वे एक राजनीतिक साजिश में हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। जब यूपीए सरकार ने लोकपाल कानून बना दिया था, और मोदी सरकार को आए भी चार बरस से अधिक हो गए हैं, तो गांधी की जयंती और पुण्यतिथि  आठ-दस बार आई-गईं, लेकिन अन्ना हजारे को कोई आंदोलन नहीं सूझा। अब उन्हें किसी रहस्यमय वजह से फिर लग रहा है कि वे ऐसा आंदोलन छेड़ें, फिर आमरण अनशन पर बैठें, और शायद हाशिए से खबरों में आ जाएं। इसके अलावा ऐसा भी लगता है कि अब मोदी सरकार खुद होकर भी सुप्रीम कोर्ट के कड़े रूख को देखकर लोकपाल नियुक्त करने जा रही है, तो अन्ना हजारे मानो बहती गंगा में हाथ धोकर पुण्य कमाने का यह नाटक कर रहे हैं। 
अन्ना हजारे और उनके साथ के बहुत से आंदोलनकारियों का रूख बड़ा साफ है, वे किसी चुनाव के मौके पर, किसी पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए, किसी दूसरी पार्टी को बदनाम करने की सुपारी भी उठाते आए हैं, और किसी पार्टी को वाहवाही दिलवाने के लिए, उसकी छवि सुधारने के लिए भी अपनी टोपी दांव पर लगाने की सुपारी उठाते आए हैं। उन्हीं के आंदोलन का एक समय साथ देने वाले श्रीश्री (स्वघोषित) रविशंकर ने भी समय-समय पर इसी किस्म की चतुराई दिखाई है कि किस पार्टी की सरकार का भ्रष्टाचार देखना है, और किस पार्टी का अपनी आंखों के सामने भ्रष्टाचार अनदेखा करना है। ऐसे पाखंड का खुलकर भांडाफोड़ करना चाहिए, लेकिन हिंदुस्तानी समाज को धर्म, आध्यात्म, योग, गांधीवाद, राष्ट्रवाद, जैसी कई किस्म की खालों को ओढ़कर आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है, और बनाया जा रहा है। अन्ना हजारे का यह नाटक बरसों से चले आ रहा है। लोकपाल बनाने की मांग को लेकर उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार का जीना हराम कर दिया था, और अपनी जिंदगी की नोंक पर सरकार को धमकाकर उसे खलनायक की तरह दिखाया था। लेकिन इसके बाद से सरकार बदली और अन्ना हजारे का गांधीवाद चादर ओढ़कर सो गया था। अब जाकर उसकी नींद टूटी है, और वह किसी नए चुनावी मकसद से एक बार फिर भाड़े के गांधीवादी की तरह सुपारी उठाकर निकल पड़ा है। (Daily Chhattisgarh)

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