सोना पाने वाले प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण अंग्रेजी?

संपादकीय
14 जुलाई 2018


कल ही इसी जगह पर भारत की एक होनहार एथलीट, हिमा दास, के बारे में लिखा गया था जिसने एक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में विश्व चैंपियनशिप जीतकर गोल्ड मैडल हासिल किया। असम के एक गरीब किसान की गांव की इस बेटी की यह कामयाबी मानो काफी नहीं थी, इसलिए एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने अपने एक ट्वीट में लिखा कि सेमीफाइनल में जीत के बाद हिमा दास ने मीडिया से बातचीत की, उसकी इंग्लिश अच्छी नहीं थी, फिर भी उसने अपना बेस्ट दिया। इसे लेकर फेडरेशन को सोशल मीडिया पर अच्छा जमकर लताड़ा गया है कि एक खिलाड़ी के प्रदर्शन से अधिक फिक्र फेडरेशन को उसकी अंग्रेजी की है। 
भारत में अंग्रेजी के भक्तों का जवाब देने के लिए एक बात लंबे समय से कही जाती है कि अंग्रेज चले गए, अंग्रेजी छोड़ गए। कहने के लिए राष्ट्रभाषा का झंडा लेकर चलने वाले इस देश के बड़े-बड़े आंदोलनकारी ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपनी औलादों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाना बेहतर समझा। ईसाई मिशनरियों के खिलाफ बड़बोले नेताओं के बच्चों को भी हमने ईसाई स्कूलों में पढ़ते देखा है। यह पाखंड इस देश में लोगों के मिजाज में ही है, और जगह-जगह, तरह-तरह से सामने आता है। इसलिए जब खेल संघ खिलाड़ी के लाए हुए सोने से संतुष्ट नहीं हैं, और उसकी अंग्रेजी पर मलाल जाहिर कर रहे हैं, तो उसका एक ही मतलब है कि इन लोगों का खेल संघों में रहने का कोई हक नहीं है। दूसरी तरफ इस देश को अंग्रेजी के अपने बावलेपन को लेकर भी दुबारा सोचना चाहिए। 
हम तो अंग्रेजी के बिल्कुल भी खिलाफ नहीं हैं, और इस हिन्दी अखबार में भी अंग्रेजी के लेख गाहे-बगाहे छापते रहते हैं। लेकिन हिन्दी को मातृभाषा मानकर जिन लोगों को उसकी मां की तरह सेवा करना जरूरी लगता है, हम उस बावलेपन के भी खिलाफ हैं। एक भाषा महज भाषा होती है, एक औजार की तरह। उसका इस्तेमाल अगर अच्छा होता है, उससे कोई कामयाबी हासिल होती है, तो वह भाषा भी मायने रखती है, और उसका भी सम्मान बढ़ता है। दुनिया में नाकामयाब लोगों की भाषा का कोई नाम लेने वाले भी नहीं रहते। इसलिए हिन्दी को एक भाषा के रूप में अगर कामयाब नहीं बनाया जा सकता, तो इस देश में अंग्रेजी का आज का मौजूद बोलबाला इसी तरह जारी रहेगा। दुनिया में ऐसा भी नहीं है कि सभी कामयाब देश अंग्रेजी के बलबूते ही कामयाब होते हैं। चीन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस जैसे अनगिनत देश हैं जो कि अपनी खुद की भाषा में पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, साहित्य, इन सबको इतना संपन्न कर चुके हैं कि वे अंग्रेजी के मोहताज नहीं हैं। जिन लोगों को इन देशों से बात करनी होती है, वे इनकी भाषा को सीखकर भी बात करते हैं। 
भारत में हिन्दी को कामकाज की एक कामयाब भाषा बनाने के बजाय उसकी सेवा करने की बात होती है, उसे मां बना दिया जाता है, और उसके साथ लोगों का रिश्ता भावनात्मक बनाकर उसे एक आक्रामक राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाता है। ऐसे में किसी भाषा का कोई भला नहीं हो सकता। दूसरी तरफ जहां अंग्रेजी की जरूरत है, या कि अंग्रेजी के बिना जहां काम नहीं चल सकता है, वहां पर अंग्रेजी से नफरत को एक आड़ बनाकर लोगों को उसे सीखने से रोका जाता है। इन सबके बाद जिनको अंग्रेजी नहीं आती उनको नीची निगाहों से देखा जाता है, और उन्हें हीनभावना में डाला जाता है। भारत को अपने इन तमाम पहलुओं के पाखंडों से बाहर निकलना होगा, तभी क्षेत्रीय भाषाओं की इज्जत बढ़ेगी, हिन्दी को उन पर लादना खत्म होगा, और जरूरत के मुताबिक अंग्रेजी सीखने को बढ़ावा भी देना होगा। जहां लोगों के बीच बातचीत और संवाद-संपर्क की एक औजार भाषा भावनात्मक रूप से देखी जाती है, वहां उससे किसी का भला नहीं होता, सिवाय राष्ट्रवाद के फतवों के। भारत के भीतर ही जिन राज्यों में अपनी क्षेत्रीय भाषा को इतना संपन्न बना लिया है कि वे अपना सारा कामकाज उसी भाषा में कर लेते हैं, वे हिन्दीभाषी प्रदेशों के मुकाबले अधिक कामयाब भी हैं। इसलिए लोगों को जरूरत के मुताबिक भाषा सीखनी चाहिए, और जब तक वे किसी भाषा को सीख न लें, उसे लेकर किसी किस्म की हीनभावना नहीं रखनी चाहिए। एक कामचलाऊ दर्जे की भाषा भी कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि उससे यह तो पता लगता ही है कि कोई उस भाषा को सीखने की कोशिश कर रहे हैं। 
(Daily Chhattisgarh)

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन लीला चिटनिस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    जवाब देंहटाएं