समलैंगिकता को बिना देर जुर्म के दायरे से बाहर करें

संपादकीय
12 जुलाई 2018


सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिकता पर बहस चल रही है कि उसे अपराध के दायरे से बाहर निकाला जाए या नहीं। अदालत में सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने अपनी कोई राय रखने के बजाय अदालत से कहा है कि वही इस बात को तय करे कि यह जुर्म माना जाए या नहीं। मतलब साफ है कि सरकार देश के एक बड़े तबके की नाराजगी को मोल लेकर समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर निकालने का अलोकप्रिय काम खुद नहीं करना चाहती, और वह चाहती है कि अदालत इसे करे। ऐसा नहीं रहता तो सरकार खुलकर इसका विरोध करती। यहां पर मौन:सम्मति लक्षणम् वाली बात लागू होती है। खैर, सरकार को अगर देर से यह बात समझ आ रही है तो भी ठीक है क्योंकि जिंदगी को प्रभावित करने वाली बहुत सी दूसरी बातों की तरह समलैंगिकता को भी जुर्म बनाने का काम अंग्रेजों ने किया था, और हिन्दुस्तानी लोग अब तक अंग्रेजों के इस पखाने के टोकरे को ढो रहे हैं। अंग्रेजों ने अपने देश में जिन कानूनों को खत्म कर दिया, उन्हें हिन्दुस्तान गर्व के साथ ढो रहा है, और कहने के लिए पश्चिमी संस्कृति का विरोधी भी है, और अपने आपको एक गौरवशाली संस्कृति का जन्मदाता भी मानता है। 
भारत को यह पाखंड छोडऩा होगा कि समलैंगिकता कोई अप्राकृतिक बात है, या कि कोई ऐसी बीमारी है जिसके चलते लोगों का बच्चे पैदा करना खत्म हो जाएगा, और यह देश ही खत्म हो जाएगा, विवाह नाम की संस्था खत्म हो जाएगी। हकीकत तो यह है कि दुनिया के हर देश में, हर संस्कृति में समलैंगिक लोग हैं, औरतों में भी, और मर्दों में भी। दुनिया के हर देश में ट्रांसजेंडर हैं, और तरह-तरह की दूसरी यौन-प्राथमिकताओं वाले लोग हैं जिनकी अलग-अलग पसंद है। जो लोकतांत्रिक और सभ्य समाज हैं वहां पर प्रकृति की दी हुई इस विविधता को बराबरी का हक दिया गया है, और उसका सम्मान किया जाता है। योरप के बहुत से देशों में जहां-जहां यौन-विविधताओं वाले लोगों की प्राईड-परेड आयोजित होती है, वहां देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री उसमें शामिल होते हैं। अभी दो दिन पहले लंदन में ऐसा एक आयोजन हुआ तो लंदन के मेयर और एक ब्रिटिश मंत्री उस परेड में पहुंचे। 
भारत में समाज के एक बड़े तबके में यह धारणा मजबूती से बिठाई गई है कि समलैंगिकता एक बीमारी है, और उसका इलाज किया जा सकता है। बहुत से मां-बाप यह मानते हैं कि बच्चे अगर समलैंगिक हैं तो उनकी शादी कर देने से वे ठीक हो जाएंगे। बहुत से मां-बाप अपने ऐसे जवान बच्चों को मनोचिकित्सकों के पास ले जाते हैं, और मानते हैं कि परामर्श और दवा से वे ठीक हो जाएंगे। दुनिया के जिन देशों को हम अधिक लोकतांत्रिक और अधिक सभ्य कह रहे हैं, वहां भी समलैंगिकों को बराबरी का और सम्मान का दर्जा पाने में खासा वक्त लगा है, रातों-रात उन्हें किसी ने मंजूर नहीं कर लिया। इसलिए भारत में भी इसमें वक्त लग सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजों को दकियानूसी सोच की फिक्र किए बिना अब दुनिया में बहुत अच्छी तरह स्थापित हो चुके वैज्ञानिक तथ्य और सत्य के आधार पर, लोकतंत्र की फिक्र करते हुए अपना फैसला देना चाहिए। हमारा यह मानना है कि अगर जज बहुत ही दकियानूसी और पूर्वाग्रस्त नहीं होंगे, तो समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर करने का स्पष्ट फैसला देंगे। दो बालिग लोग आपस में कैसे संबंध रखें, यह किसी सरकार या अदालत की दखल का मामला नहीं बनता है। सरकार और अदालत को अपने दायरे में रहना चाहिए क्योंकि इन दोनों का अस्तित्व जनता से बनता है, जनता का अस्तित्व अदालत या सरकार से नहीं बनता। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें