संपादकीय
25 जुलाई 2018

कल ही कांग्रेस पार्टी का यह रूख सामने आया था कि 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी ही कांग्रेस की अगुवाई वाले किसी भी विपक्षी गठबंधन के नेता रहेंगे, और इस नाते वे ही कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी रहेंगे। लेकिन दिल्ली की महिला पत्रकारों के बीच कल शाम एक कार्यक्रम में जब राहुल गांधी से यह पूछा गया कि क्या वे प्रधानमंत्री के लिए मायावती या ममता बैनर्जी के नाम का समर्थन करेंगे, तो उन्होंने कहा कि वे किसी भी ऐसे प्रत्याशी का समर्थन करेंगे जो बीजेपी और आरएसएस को हराएगा। उन्होंने अपने पीएम बनने की संभावनाओं के बारे में कहा कि यह काफी हद तक तात्कालिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। कांग्रेस के कुछ और सूत्रों ने मीडिया से अलग-अलग यह भी कहा है कि पार्टी को आरएसएस समर्थित किसी व्यक्ति को छोड़कर बाकी किसी को भी प्रधानमंत्री के रूप में देखने में आपत्ति नहीं है।
पिछले दो दिनों में कांग्रेस के रूख की यह गर्मी और नर्मी ध्यान देने लायक है। यह बात तय है कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी-भाजपा-एनडीए के मुकाबले कोई ऐसा असरदार गठबंधन नहीं बन सकता जो कि कांग्रेस के खिलाफ हो। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी की हालत देश के कुछ क्षेत्रीय दलों से भी गई गुजरी हो गई दिखती है, और उसके पास एक संपन्न इतिहास, विपन्न वर्तमान, और रहस्यमय भविष्य है। पिछले दिनों कर्नाटक में चुनाव के बाद कांग्रेस ने जिस तरह जेडीएस से समझौता किया और गठबंधन सरकार में अपने से छोटी इस पार्टी को मुख्यमंत्री का पद दिया, वह कांग्रेस की एक जमीनी हकीकत की समझदारी का फैसला था। इसका नतीजा कल इस शक्ल में सामने आया कि कर्नाटक के अपने सीएम-बेटे वाले भूतपूर्व प्रधानमंत्री एच.डी.देवेगौड़ा ने राहुल के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं के पक्ष में बयान दिया। लेकिन ऐसी तमाम बाकी संभावनाओं को देखते हुए भी कांग्रेस को आज एक अक्लमंदी की चुप्पी से काम लेना चाहिए। आज मोदी के मुकाबले किसी गठबंधन के भीतर किसी मुकाबले का वक्त नहीं है, आज तो कांग्रेस को मोदी के मुकाबले बाकी पार्टियों में से हमख्याल पार्टियों को छांटकर उनसे एक व्यापक और लचीला तालमेल बनाने की जरूरत है। आज जब देश में गैरभाजपा, गैरसंघ कोई मजबूत और संभावनाओं वाला गठबंधन दिख नहीं रहा है, तब अगर कुछ कांग्रेसी किराए की घोड़ी लाकर राहुल को दूल्हा बनाकर बारात निकालना चाहते हैं, तो वह एक चापलूस-कमअक्ली होगी। आज जरूरत है कि पहले एक बारात जुटाई जाए, और फिर वक्त आने पर देखा जाए कि किसे दूल्हा बनाने पर सहमति होती है। आज के हालात एक ऐसे स्वयंवर जैसे हैं जिसमें कोई संभावित दुल्हन का वर छांटना बाकी हो। ऐसे में स्वयंवर में जुटे नौजवानों को घोड़े पर चढ़कर बैठना ठीक नहीं है।
वैसे भी अगर कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र की आज की ऐतिहासिक जिम्मेदारी के मौके पर अपनी ऐतिहासिक भूमिका दर्ज कराना चाहती है, तो उसकी प्राथमिकता में प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं रहना चाहिए, बल्कि मोदी जैसी सुनामी के मुकाबले लोगों को एकजुट करना रहना चाहिए। भारत के इतिहास को देखें तो कई ऐसे प्रधानमंत्री बने हैं जो राहुल से डेढ़ गुना उम्र के भी रहे होंगे। इसलिए प्रधानमंत्री के ओहदे की ट्रेन छूट नहीं रही है, पहले कांग्रेस को अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। यह मौका बददिमागी और घमंड दिखाने का नहीं है, आज की हकीकत यह है कि कांग्रेस को उसका कोई हक भी नहीं है, कांग्रेस को एक ऐसी मजबूत स्थिति के लिए कोशिश करना चाहिए जिससे एक ऐसी संभावना खड़ी हो सके कि मोदी का विकल्प देश का प्रधानमंत्री बन सके, और फिर वैसी नौबत में अगर कांग्रेस का बहुमत होगा, तो वैसे भी उसे मौका मिल जाएगा, वरना कांग्रेस को कर्नाटक की तरह पीछे की कतार में बैठना जारी रखना चाहिए, और आगे अपनी बारी की राह देखना चाहिए। कांग्रेस को एक तंगदिल, और तंगनजरिया रिटायर्ड पार्टी के बजाय खुले दिल-दिमाग वाली एक नौजवान पार्टी जैसा बर्ताव करना चाहिए जिसके सामने अभी नहीं तो कभी नहीं जैसी नौबत नहीं है, और जिसके राजकुमार के सामने एक बड़ा लंबा भविष्य बाकी है। (Daily Chhattisgarh)
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