आधार-सुरक्षा का दावा घंटों में औंधेमुंह गिरा..

संपादकीय
29 जुलाई 2018


भारत में दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के अध्यक्ष ने आधार कार्ड की पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था का दावा करते हुए अपने आधार कार्ड का 12 अंकों का नंबर जारी कर दिया था, और लोगों को चुनौती दी थी कि वे इस नंबर से उनकी निजी जानकारी निकालकर तो दिखाएं। महज कुछ घंटे के भीतर ही ट्राई के अध्यक्ष का दावा खोखला साबित हुआ। आनन-फानन फ्रांस के एक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ ने इस नंबर के आधार पर घर बैठे बहुत सी निजी जानकारी निकाली, और उसे ट्विटर पर पोस्ट भी कर दिया। उन्होंने ट्वीट्स पर ट्राई के अध्यक्ष आरएस शर्मा के निजी जीवन के कई आंकड़े, उनके आधार संख्या के माध्यम से जुटाकर जारी कर दिए, जिनमें शर्मा का निजी पता, जन्मतिथि, वैकल्पिक फोन नंबर आदि शामिल है। उन्होंने बताया कि आधार संख्या को सार्वजनिक करने के क्या खतरे हो सकते हैं। उसने लिखा कि आधार संख्या असुरक्षित है। लोग आपका निजी पता, वैकल्पिक फोन नंबर से लेकर काफी कुछ जान सकते हैं। 'मैं यही रुकता हूं। मैं उम्मीद करता हूं कि आप समझ गए होंगे कि अपना आधार संख्या सार्वजनिक करना एक अच्छा विचार नहीं है।Ó
जब देश के साइबर मामलों से जुड़ा हुआ एक सबसे बड़ा और प्रमुख व्यक्ति अपनी चुनौती पर इस तरह और इस कदर औंधेमुंह गिरता है, तो फिर यह समझ लेना चाहिए कि साइबर सुरक्षा को लेकर सरकार के अपने दावे किस कदर खोखले हैं, और ऐसा आत्मविश्वास किसी भी सरकार को, किसी भी कारोबार को पल भर में गड्ढे में डाल सकता है। दूसरी बात इससे जुड़ी हुई यह है कि आधार कार्ड की सारी जानकारी सरकार की अपनी दौलत नहीं है कि वह जहां चाहे उसे रखे, और जिस तरह चाहे उस तरह बांटे। यह जनता की जानकारी है, और यह सरकार को जिम्मेदार मानते हुए उसे दी जाती है कि सरकारी कामकाज में, सरकार की योजनाओं का फायदा लेने के लिए अर्जी दी जा सके। आधार कार्ड की अनिवार्यता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में अदालत ने बार-बार सरकार को, केन्द्र और तमाम राज्य सरकारों को यह हुक्म दिया है कि आधार की अनिवार्यता न की जाए। लेकिन आज भी हकीकत यह है कि लोगों को किसी भी सरकारी दफ्तर में पहुंचने पर सबसे पहले अपना आधार कार्ड निकालना होता है, तभी सरकारी अमला उन्हें इंसान मानने को तैयार होता है। सरकार की रियायतों के लिए, बैंक और दीगर कामकाज के लिए आधार कार्ड उतना ही जरूरी कर दिया गया है जितना कि इंसान की धड़कन चलना। नतीजा यह हुआ है कि सरकार और बाजार इन दोनों के सामने लोग अपनी जानकारियों सहित तकरीबन नंगे खड़े हैं, और दुनिया के तमाम मुजरिम, धोखेबाज और जालसाज लोगों की अनगिनत जानकारियों तक पहुंच बना चुके हैं। 
ट्राई के अध्यक्ष का यह हादसा सरकार की आंखें खोलने के लिए काफी होना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में यह तय है कि आधार-अनिवार्यता के विरोधी इस तजुर्बे को अदालत के सामने रखेंगे। इस मामले की सुनवाई कर रहे जजों को भी चाहिए कि वे सोशल मीडिया पर अपने आधार कार्ड नंबर पोस्ट करें, और देखें कि हैकर कितने घंटों में उनकी सारी निजी जानकारी निकालकर पेश कर देते हैं। अदालत को यह भी चाहिए कि सरकार के संबंधित मंत्रियों, आधार कार्ड योजना के मुखिया, और सरकारी वकील से भी कहे कि वे भी सुरक्षा साबित करने के लिए अपने आधार कार्ड नंबर सोशल मीडिया पर डालें, और अपने आत्मविश्वास की अग्निपरीक्षा करें। 
आज देश में हालत यह है कि गरीबों और आम इंसानों की निजी जिंदगी की जानकारी की कोई अहमियत मानी ही नहीं जाती है। यह मान लिया जाता है कि किसी को दस किलो रियायती चावल भी मिलना है, तो उसे अपनी निजी जानकारियों को उजागर करने में हिचकना नहीं चाहिए। और गरीब जनता की बेबसी रहती है कि वह सरकारी दफ्तर की मनमानी को माने और जिंदा रहने का हक पाए। सुप्रीम कोर्ट को आधार कार्ड की अनिवार्यता पूरी तरह से खत्म करनी चाहिए, और लोगों को यह हक भी देना चाहिए कि वे आधार योजना के कम्प्यूटरों से अपनी सारी जानकारी को मिटवा सकें। आम लोगों को भी अपनी निजी जिंदगी को निजी रखने का हक रखना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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