हिन्दुस्तानी बारूद के ढेर को है बस एक मैसेज की चिंगारी का इंतजार

संपादकीय
15 जुलाई 2018


भारत में सरकार और समाज दोनों के लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि किस तरह सोशल मीडिया या मैसेंजरों पर पोस्ट की गई बातों से नफरत और हिंसा में बढ़ोत्तरी हो रही है। आज जब इस पर हम लिख रहे हैं, तब कर्नाटक में एक इंजीनियर की लाश गिरी हुई है जिसे वॉट्सऐप पर फैलाई गई एक अफवाह के बाद लोगों ने मार डाला है। बच्चे चुराने की एक जागरूकता वाली पाकिस्तानी वीडियो को असल घटना बताकर भारत भर में इस बात की अफवाह फैलाई गई कि  लोग बच्चे चुरा रहे हैं और भीड़ ने जगह-जगह, अब तक शायद आधा दर्जन प्रदेशों में तमाम बेकसूर लोगों को मार गिराया है, जिनमें से एक भी बच्चाचोर नहीं था। ऐसे में वॉट्सऐप में एक पूरे पेज का इश्तहार देकर लोगों को आगाह किया है कि वे अफवाहें आगे बढ़ाने से बचें और कैसे बचें। लेकिन दूसरी तरफ आज देश का मुख्य धारा का मीडिया लगातार इसी किस्म की बातों को बढ़ाने में लगा हुआ है, और अभी जब दिल्ली में एक परिवार ने दर्जन भर लोगों ने रहस्यमय हालात में एक साथ खुदकुशी की, तो कुछ चैनलों ने इसे भुनाने के लिए तांत्रिकों और बाबाओं को लेकर उस घर में जाकर वहां से प्रसारण करने की हरकत की। शायद उस इलाके के उबलते हुए लोगों ने ऐसे मीडिया को वहां से खदेड़ दिया। 
लेकिन आज वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के साथ परंपरागत मीडिया का एक बड़ा बुरा मुकाबला चल रहा है। अब जैसे कोई कैंसर के इलाज का दावा करे, तो उससे एक भी सवाल किए बिना देश का सबसे प्रमुख मीडिया भी इस अंदाज में खबर को फैलाने में जुट जाता है कि मानो कैंसर का इलाज खोज लिया गया है। चार लाईन के दावे के साथ चालीस लाईन की किताबी जानकारी अपनी तरफ से जोड़कर ऐसी रिपोर्ट को बहुत बड़ा बना दिया जाता है, और उसे बहुत बड़ी विश्वसनीयता दे दी जाती है। यह सिलसिला कम होने का नाम नहीं ले रहा है, और सरकार झूठी खबरों को फैलाने पर जिस सजा का इंतजाम करने जा रही है, वह सजा भी ऐसी झूठी बातों पर शायद लागू नहीं होगी जिसके पीछे लोगों की कोई बदनीयत न हो, और लोग अज्ञानी बनकर जिसे आगे फैलाने में जुट जाते हों। 
दरअसल ऐसी नौबत के पीछे इंसान का वह मिजाज है जो कि सनसनी फैलाने से हासिल होने वाली खुशी का है। लोग अगर हकीकत को साफ और सपाट तरीके से अपने आसपास के लोगों को रूबरू बताएंगे, या कि सोशल मीडिया पर पोस्ट करेंगे, तो शायद ही कोई उस पर ध्यान देंगे। दूसरी तरफ जब बातों को अविश्वसनीय हद तक चटपटा बनाकर, सनसनीखेज बनाकर फैलाया जाता है, तो आसपास के लोग तुरंत ध्यान देते हैं। मनोविज्ञान के हिसाब से ऐसे लोग अटेंशन-सीकर कहलाते हैं, यानी लोगों का ध्यान खींचकर संतुष्टि पाने वाले लोग। ऐसे लोग गणेश की दूध पीने की अफवाह को चारों तरफ फैलाते हैं, और फिर मजे से देखते हैं कि किस तरह लोग उनकी बताई राह पर चल रहे हैं, और लोटा-चम्मच लेकर मंदिर जाकर गणेश के सामने कतार लगा रहे हैं। लोगों की अपनी जिंदगी में जब कुछ रोचक नहीं होता है, तो भी लोग ऐसी हरकतों में लग जाते हैं जिससे उन्हें दिमागी संतुष्टि हो, जिससे उन्हें यह लगे कि उन्हें किसी तरह की कामयाबी हासिल हो रही हो। बड़े-बड़े इलाज के बड़े-बड़े दावों को चारों तरफ प्रसाद की तरह बांटते हुए लोगों को कभी यह नहीं लगता कि वे खुद भी उसे एक बार परख लें या कि अब हर फोन में हासिल गूगल पर उसे तलाशकर उसका सच-झूठ जान लें। 
जब देश मेें, खासकर भारत जैसे देश में लोगों के बीच में वैज्ञानिक सोच को सिलसिलेवार तरीके से घटाया गया है, और पौराणिक कथाओं से लेकर एक फर्जी, कभी मौजूद न रहने वाले इतिहास तक की कहानियां सुनाकर लोगों को इस बात पर भरोसा दिलाया गया है कि तमाम किस्म के चमत्कार इस देश में आम बात रहे हैं, तो फिर लोग उसी चमत्कारी दुनिया में उसी तरह जीना चाहते हैं जिस तरह कि बाहुबली नाम की फिल्म के कल्पना लोक में डूबे हुए लोग अपनी तर्कशक्ति छोड़कर महज नजारों को देखते रह जाते हैं। ऐसे हालात इस देश में आज जो हिंसा करवा रहे हैं, उसे हजार गुना अधिक बढ़ाना चुटकी बजाने जैसा आसान रह गया है, और किसी भी दिन इस देश में धर्म और जाति के नाम पर ऐसे दंगे फैलाए जा सकते हैं जिन्हें फिर सरकार की तरफ से कितने भी संदेेश भेजकर रोका नहीं जा सकेगा। इसलिए आज समझदार लोगों के बीच जरूरत इस बात की है कि जब कहीं, जहां कहीं उन्हें कोई झूठी जानकारी तैरते दिखे, तुरंत ही उस पर सच को ढूंढकर पोस्ट करें, या लोगों को जवाब में भेजें। ऐसी बातों को देखते हुए भी चुप रहने का मतलब यही होगा कि आने वाले वक्त को एक हिंसक झूठ के हवाले कर देना, और लोगों को विरासत में ऐसा मिजाज देना जो कि बारूद के ढेर की तरह का हो, एक चिंगारी की तरह के मैसेज के इंतजार में। (Daily Chhattisgarh)

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