जुर्म होने के पहले रोकना ही अकेला रास्ता, और कुछ नहीं

संपादकीय
19 जुलाई 2018


उत्तरप्रदेश के देवरिया की एक खबर है कि एक स्कूल में 7वीं की एक छात्रा ने पूरे स्कूल के दोपहर के भोजन में जहर मिला दिया, क्योंकि वह उसी स्कूल में कुछ समय पहले अपने भाई की हुई हत्या का बदला लेना चाहती थी। इस बच्ची को पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया, उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, और उसे बाल सुधार गृह भेजा जा रहा है। स्कूल में पढऩे वाली एक छोटी सी बच्ची के दिमाग में ऐसा भयानक ख्याल कैसे आया, यह अधिक फिक्र की बात है। दूसरी तरफ कल ही छत्तीसगढ़ में एक दूसरी भयानक खबर आई है जिसमें एक पति ने अपनी पत्नी के चाल-चलन पर शक करते हुए उसके गुप्तांग में बिजली का तार डालकर उसे करंट से जलाकर मार डाला। इन दोनों हत्याओं को देखने पर एक बात एक सरीखी है कि ये किसी तैश में पल भर में की गई हत्याएं नहीं हैं, बल्कि सोच-समझकर की गई हैं, और इसीलिए इनके पीछे की कू्ररता अधिक भयानक है, अधिक फिक्र का सामान है। 
दुनिया में कई जगहों पर बड़ी संख्या में कत्ल इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन ऐसे कत्ल जो कि पूरी तरह सोच-समझकर और पूरी क्रूरता से किए जाएं, वे एक जुर्म से अधिक भी होते हैं, और वे समाज के लोगों की संवेदनाशून्य सोच का सुबूत भी होते हैं। फिक्र इस बात की नहीं कि कुछ कत्ल हुए, फिक्र इस बात की कि कातिल इस कदर बेपरवाह हो गए हैं। और धीरे-धीरे यह क्रूरता बढ़ती चल रही है। बड़ों से अब यह बच्चों तक पहुंच रही है, और आदमियों से औरतों तक में, जो कि कम हिंसक मानी जाती हैं। ये हत्याएं और इस किस्म के कुछ दूसरे कत्ल और बलात्कार के मामले समाज में खूंखार जुर्म के लिए लोगों के बीच बढ़ते हुए बर्दाश्त को बताते हैं कि कैसे लोग परिवार की, या पड़ोस की, या अपने स्कूल की कुछ बरस या कुछ महीने की बच्ची के साथ बलात्कार कर लेते हैं, या किस तरह कुछ नाबालिग लड़के किसी नाबालिग लड़की को पकड़कर गैंगरेप करते हैं। 
दुनिया में कई किस्म के जुर्म ऐसे हैं जिनको होते हुए रोकना मुमकिन नहीं रहता, जब तक कि पुलिस ईश्वर न हो जाए। और जैसा कि पूरी दुनिया में चारों तरफ हो रहा बताता है, कि ईश्वर कहीं है नहीं, या है तो वह बेरहमी को खासा पसंद करता है। यह बात साफ रहनी चाहिए कि किसी की कत्ल की नीयत, या बलात्कार का इरादा उनके चेहरे पर लिखा नहीं होता, और ऐसे जुर्म अमूमन जब हो चुके रहते हैं, तब पुलिस के हाथ में अधिक से अधिक इतना ही रहता है कि वह ठीक से जांच करे, और सही मुजरिम को पकड़कर सजा दिलवाए। ऐसे में समाज को अपने भीतर चौकन्ना रहना होगा, और अपनी अगली-पिछली पीढिय़ों को भी हिंसा से दूर रखना होगा। समाज का ढांचा परिवारों से मिलकर बनता है, और लोगों को अपने परिवार के भीतर जुर्म और हिंसा से परहेज की सोच मजबूत करनी होगी। कोई भी मुजरिम एक मजबूत इरादों वाले और कानूनपसंद परिवार के बीच रहते हुए जुर्म के खतरे में कम ही पड़ते हैं। अगर पूरा परिवार आपसी बातचीत में जुर्म को बुरा मानकर, कानून की राह पर चलने पर अड़ा रहता है, तो परिवार के किसी सदस्य का मुजरिम बनने का खतरा खासा घट जाता है। फिर यह भी है कि हत्या या बलात्कार जैसा बड़ा और खूंखार जुर्म करने के पहले लोग आमतौर पर कई छोटे-मोटे जुर्म कर चुके रहते हैं, और जब परिवार उन मौकों पर अपने सदस्य पर काबू नहीं कर पाता, तब बात बेकाबू होती है। 
सरकार और समाज इन दोनों को मिलकर तमाम लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि एक जुर्म से मुजरिम तो जेल जाते ही हैं, लेकिन उनका पूरा परिवार भी जेल के बाहर बहुत किस्म की तकलीफें झेलता है, सामाजिक अपमान और प्रताडऩा झेलता है। बहुत से परिवार घर के किसी एक मुजरिम की वजह से तबाह भी हो जाते हैं। हमने हर महीने ऐसी खबरें देखी हैं जिनमें पति-पत्नी में से एक ने दूसरे का कत्ल किया, और खुद जेल चले गए। ऐसे में बच्चे बुजुर्ग दादा-दादी या नाना-नानी के हवाले रह जाते हैं, और उनकी हालत कई मामलों में अनाथ बच्चों जैसी रहती है। समाज के लोगों के बीच जुर्म के बाद के ऐसे हाल की गंभीरता बड़ी तल्खी के साथ पेश की जानी चाहिए। जुर्म के पहले लोगों को रोकना जरूरी है, जुर्म के बाद तो महज सजा की गुंजाइश बचती है, किसी किस्म की भरपाई नहीं हो पाती, न मुजरिम के परिवार की भरपाई हो पाती, और न ही जुर्म के शिकार, या उसके परिवार की भरपाई हो पाती। (Daily Chhattisgarh)

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