संपादकीय
22 जुलाई 2018

भारत के पड़ोस का पाकिस्तान चुनाव से गुजर रहा है। राजनीतिक दल तो अपने नेताओं के जेल के बाहर या जेल के भीतर रहते हुए मुकाबले में हैं ही, उनसे परे आतंकी संगठन भी चुनाव लड़ रहे हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि इस चुनाव में फौज का बड़ा दखल माना जा रहा है। पाकिस्तान में जम्हूरियत की जड़ें कभी मजबूत नहीं हो पाईं और कई बार चुनाव हुए, उनके बीच कई बार फौजी हुकूमत भी कायम हुई और कम से कम एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री को वहां फौजी तानाशाह ने फांसी पर भी चढ़ा दिया। एक और भूतपूर्व प्रधानमंत्री को घरेलू आतंकी हमले में उड़ा दिया गया, जिसके पीछे उसके अपने कुनबे से लेकर फौज तक की दखल का अंदेशा जाहिर किया गया, और अच्छी बात यही रही कि किसी ने इस हमले और कत्ल के पीछे हिंदुस्तान या किसी विदेशी हुकूमत पर तोहमत नहीं लगाई। इस बार तो पाकिस्तान के चुनावों में सुर्खियां बताती हैं कि किस तरह इमरान खान की पार्टी इमामों के रहमो-करम पर चल रही है, नवाज शरीफ की पार्टी उनके जेल में रहते हुए भी मजबूती से मैदान में डटी हुई है। और इस पूरी राजनीति में फौजी दखल सिर चढ़कर बोल रही है।
यह कहने के लिए हमारे पास पाकिस्तान के हाईकोर्ट के एक जज का ताजा बयान है जो कि उन्होंने रावलपिंडी बार एसोसिएशन में कल ही अपने भाषण में दिया है। उन्होंने खुलकर कहा कि देश की ताकतवर फौजी खुफिया एजेंसी आईएसआई अदालतों से अपनी मर्जी के फैसले पाने के लिए चीफ जस्टिस और बाकी जजों पर दबाव डाल रही है। इस जज, शौकत सिद्दीकी ने यह भी कहा कि आईएसआई ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के मामले में भी चीफ जस्टिस और बाकी जजों पर दबाव बनाया था। यहां यह जिक्र जरूरी है कि पिछले दिनों नवाज शरीफ और उनकी बेटी को भ्रष्टाचार के आरोपों में कैद सुनाई गई है, और यह जानते हुए भी वे देश लौटे और जेल गए।
जज शौकत सिद्दीकी ने कहा कि आईएसआई न्याय प्रक्रिया और मीडिया दोनों पर काबू रख रही है। उन्होंने कहा कि आज के दिन कोर्ट आजाद नहीं है, और मीडिया को भी सेना से हुक्म मिल रहे हैं। मीडिया सच बयां नहीं कर रहा है, और वह भी फौज के दबाव में है। उन्होंने यह भी कहा कि आईएसआई ने अपने पक्ष में फैसले के लिए पसंदीदा बेंच बनवाई और जज से कहा कि चुनाव से पहले नवाज शरीफ और उनकी बेटी जेल के बाहर नहीं आने चाहिए।
पाकिस्तान की हुकूमत में फौज का ऐसा दखल अनसुना नहीं है। वहां हमेशा से सरकार को फौज के साथ तालमेल करके चलना पड़ा है, और कई मौकों पर फौज के फैसलों को मानना भी पड़ा है। ऐसा न होने पर फौज ने चुनी हुई सरकार को हटाकर अपनी हुकूमत भी बना डाली है। लेकिन फौज के ऐसे हाल को देखते हुए पाकिस्तान के आसपास के दूसरे देशों को कुछ सोचना चाहिए, अपनी कुछ फिक्र करनी चाहिए। हिंदुस्तान के हालात वैसे तो बहुत अलग हैं, लेकिन हाल के बरसों में फौज और फौज के मामलों को जिस तरह चुनाव का मुद्दा बनाया गया, जिस तरह रिटायर्ड फौजियों को राजनीति में लाया गया, जिस तरह फौज को राष्ट्रवादी उन्माद को बढ़ाने के लिए लोकतंत्र से ऊपर बताने की कोशिश की गई, जिस तरह राजनीतिक बयानबाजियों में फौज को गौरवान्वित करके दूसरी पार्टियों को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है, उससे एक खतरनाक नौबत की तरफ यह लोकतंत्र बढ़ रहा है। जिस तरह पिछले बरसों में पड़ोसी देशों खासकर पाकिस्तान और चीन के बारे में बयान देने के लिए मौजूदा फौजी अफसरों का इस्तेमाल हिंदुस्तान में किया गया है, जिस तरह उनसे जंग के फतवे दिलवाए गए हैं, वह लोकतंत्र में फौज के एक गैरफौजी किरदार की जगह देने जैसा गलत काम हुआ है। भारत का लोकतंत्र बहुत मजबूत है और यहां पर फौज को सरकार के मातहत काम करने की लंबी आदत है। ऐसे में सियासती मामलों में न तो फौज के जिक्र का हथियार इस्तेमाल करना चाहिए, और न ही फौज को खुद होकर अपनी बैरकों से बाहर बयानबाजी में झोंकना चाहिए।
पता नहीं भारत के आज के संवैधानिक ढांचे में रिटायर्ड फौजी अफसरों के चुनाव लडऩे पर कोई रोक क्यों नहीं है, लेकिन हमारा मानना है कि अगर फौज को इस लोकतंत्र में राजनीति से परे रखना है, तो रिटायर होने के बाद भी फौजी अफसरों के चुनावी राजनीति में आने पर रोक लगनी चाहिए। ऐसा न होने पर फौज में रहते-रहते अफसरों में एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा आ सकती है जो कि किसी दिन लोकतंत्र को कमजोर करेगी। अपने-आपको ठोकर लगने के बाद तो संभलने की कोशिश हर कोई करते हैं, लेकिन पड़ोस के हाल को देखकर अगर हिंदुस्तान समय रहते नसीहत ले सके, तो उसे लेना चाहिए और फौज का राजनीतिक जिक्र करना बंद करना चाहिए, फौज से राजनीतिक बयान दिलवाना बंद करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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