कुछ और दीक्षांत समारोहों के बहिष्कार के बाद समझ आएगा चीफ जस्टिस को भी

09 अगस्त 2026  

 

देश की एक प्रतिष्ठित लॉ यूनिवर्सिटी, हैदराबाद स्थित नालसार से ग्रेजुएट होकर निकल रहे छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को आमंत्रित करने का विरोध किया है। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखकर भेजा है कि मुख्य अतिथि बदला जाए। इन स्नातक छात्र-छात्राओं के समर्थन में विश्वविद्यालय के जूनियर भी आ गए हैं, और अब तक 380 के दस्तखत विरोध की चिट्ठी पर हो गए हैं। नालसार में देश के मुख्य न्यायाधीश को ही दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाने की परंपरा रही है, लेकिन छात्र-छात्राओं के विरोध को देखते हुए कार्यक्रम की तारीख तय नहीं की जा सक रही है। इनका कहना है कि हाल ही में दिल्ली में हुए नीट-प्रदर्शन के जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान सूर्यकांत की कही कुछ बातें उन्हें मंजूर नहीं है। जब छात्रों की ओर से एक वकील ने मुख्य न्यायाधीश से कहा था कि उनके पास पुलिस ज्यादती के वीडियो हैं, जिन्हें वे दिखा सकते हैं, तो सीजेआई का कहना था कि इन वीडियो में उनकी दिलचस्पी नहीं है, और न ही उनके पास इन्हें देखने का समय है, हमारा वक्त बर्बाद मत कीजिए। छात्रों का मानना है कि ये टिप्पणियां संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकार के खिलाफ हैं, इसलिए वे अपनी डिग्री ऐसे व्यक्ति से लेना नहीं चाहते। यह विरोध कानूनी शिक्षा, और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। उनका कहना है कि प्रदर्शनकारी नागरिकों पर पुलिस की कथित बर्बरता को इस तरह अनदेखा करना उन संवैधानिक मूल्यों, और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, जो उन्हें नालसार में पढ़ाए गए हैं। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने भी मुख्य न्यायाधीश के इस रूख के खिलाफ लिखा था कि जस्टिस सूर्यकांत मई के महीने में नौजवानों के संदर्भ में कॉकरोच कहकर पहले से घिरे हुए थे, और अब कॉकरोच-आंदोलन पर पुलिस ज्यादती की बात सुनने, देखने का भी समय उनके पास नहीं था। हमने एक पखवाड़े पहले अदालती बेरूखी की खबरों पर लिखा था कि अपने ही पहले के शब्दों से उपजे हुए इस आंदोलन का जिक्र उनकी अदालत में होने पर उन्होंने एक बार फिर संवेदनाशून्य शब्दों का इस्तेमाल किया है। हमने लिखा था कि देश में कॉकरोच को मारने वाली फैक्ट्रियों का कुल उत्पादन मिलाकर भी कॉकरोचों की इस नई पीढ़ी को नहीं मार पाएगा। और ऐसे कारखाने चाहे किसी लोकतांत्रिक संस्था, या स्तंभ की शक्ल में ही क्यों न हों, उनके हमलों से भी ये कॉकरोच अपनी लोकतांत्रिक प्रतिरोधक क्षमता से बच जाएंगे। अपनी एयरकंडीशंड मीनारों में बैठे हुए लोग अपनी फिक्र करें। 

अपनी कही हुई गैरजरूरी, और नाजायज बातों के नुकसान से भी अछूते रहने वाले लोग जब अपना तैश जारी रखते हैं, तो ऐसा ही होता है। अभी इसी हफ्ते की बात है जब मुम्बई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज (टिस) का दीक्षांत समारोह तय वक्त के 48 घंटे पहले स्थगित करना पड़ा क्योंकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत इसमें मुख्य अतिथि बनकर आने वाले थे, और दीक्षांत समारोह में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन की आशंकाओं से संस्थान ने कार्यक्रम टाल दिया। यह अपने आपमें देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ एक दुर्लभ घटना थी, लेकिन दुनिया के अलग-अलग देशों में कई सत्तारूढ़ नेताओं का विरोध करते हुए दीक्षांत समारोह के मंच पर ही छात्र-छात्राओं का बयान देना, फिलीस्तीन जैसे झंडे लहराना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता है। 

हिन्दुस्तान में हाल के बरसों में एक हास्यास्पद बयानबाजी सत्ता के लोगों की तरफ से होती रही है कि छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। जब वोट डालने की उम्र 18 बरस है, पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव में हर बालिग का वोट है, तो उन्हें राजनीति से दूर रहने की सलाह देना अपनी चमड़ी बचाने जैसा है। जब जिसे यह लगता है कि छात्र उनके खिलाफ हो सकते हैं, उन्हें छात्रों को राजनीति से दूर रखना आत्मसुरक्षा का एक तरीका लगता है। लेकिन अब कुछ दशकों के बाद जाकर तिलचट्टों की शक्ल में नौजवान पीढ़ी ने आंदोलन का अपना हक, और आंदोलन की अपनी जिम्मेदारी जिस तरह से उठाई है, उससे देश की तस्वीर एकदम ही बदल गई है। मानो सोती हुई बाकी नौजवान पीढ़ी को किसी ने झकझोर दिया हो कि उन्हें भी जागते रहना होगा। गनीमत यह है कि छात्रों के इस बार के विरोध-प्रदर्शन के पीछे किसी राजनीतिक दल का न साथ है, न हाथ है। छात्रों ने अपनी ताकत, और अपने दलविहीन होने की जरूरत, इन दोनों को खूब पहचाना है, और आंदोलन की शुरूआत इसी तरह हुई है। यह एक अलग बात है कि कुछ वामपंथी छात्र संगठनों के छात्रों ने अपनी संस्कृति, और अपने मिजाज के मुताबिक आंदोलन का साथ दिया है, गैरराजनीतिक आधार पर राहुल गांधी ने इन वामपंथी छात्र नेताओं के साथ खड़़े रहकर कंधे से कंधा टकराया है, और अपनी मौजूदगी को पीछे रखकर इन बच्चों को आगे बढ़ाया है। कुछ ऐसा ही अब जंतर-मंतर से निकलकर कहीं झारखंड में सामने आ रहा है, तो कहीं मुम्बई के टिस में। अब उन लोगों की बोलती बंद हो गई है जो कल तक छात्रों को राजनीति से दूर रहने की नसीहत देते थे, या देश में किसी भी तरह के आंदोलन को अराजकता मानते थे। अब तो मुम्बई के एक स्टेडियम में जाकर जिस तरह आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने छात्र-पीढ़ी से बात की है, जिस तरह उनकी वकालत की है, उनकी आलोचना को खारिज किया है, उससे खुद भाजपा के बड़बोले नेता हक्का-बक्का हैं। मोहन भागवत जिस पीढ़ी और जिन आंदोलनकारियों को अपने लिए देश में सबसे भरोसेमंद करार दे रहे हैं, जिन्हें देशप्रेमी करार दे रहे हैं, उन्हें अब कंगना रनौत क्या खाकर गटर कहेंगी, ऐसा कोई खाद्य पदार्थ हमें समझ नहीं पड़ रहा है। 

हमने आज की यह बात शुरू की थी सीजेआई के अभूतपूर्व, असाधारण, ऐतिहासिक विरोध से, उस विरोध से देश में यथास्थिति कायम रखने वाले तबके चौंके हुए हैं, और सहमे हुए हैं। छात्र पीढ़ी को अपनी ताकत, अपने हक, और अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होना अगर शुरू हुआ है, तो यह लोकतंत्र के लिए जिंदादिली का एक सुबूत है। दूसरी तरफ बुजुर्ग सत्ता-पीढ़ी को अगर यह समझ आ रहा है कि यह पीढ़ी धार्मिक झंडों-डंडों, और पुलिस की लाठी-गोली के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता से लैस है, तो अब इन प्रचलित हथियारों को छोडक़र बातचीत के औजारों का इस्तेमाल शुरू हो गया है। लोकतंत्र में भी आसमान पर पहुंची बददिमागी की अक्ल ठिकाने लगाने में तिलचट्टों और छात्रों की सुगबुगाहट सबको दिख रही है। चीफ जस्टिस को अगर नहीं दिख रही है, तो कुछ और दीक्षांत समारोहों के बहिष्कार के बाद दिखने लगेगी।

(Daily Chhattisgarh)   

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