निचली अदालतों के जज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पढऩे की जहमत उठाएं...

09 अगस्त 2026

भारत की छोटी से छोटी अदालत के जज या मजिस्ट्रेट से यह उम्मीद की जाती है कि वे न केवल संविधान की मूल भावना को समझें, बल्कि कानून की प्रक्रिया को भी जानें, और जरूरत पडऩे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों, और उनमें स्थापित मान्यताओं को भी समझें। खासकर उस वक्त जब छोटी अदालतें बड़े संवैधानिक मुद्दों का जिक्र अपने फैसलों में करने लगें। संवैधानिक मुद्दों का जिक्र बिना संवैधानिक शब्दों और भावनाओं की समझ के करना जायज नहीं हो सकता। इसी तरह अदालत चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हों, अगर उसके छुए गए मुद्दों और पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट पहले अपने फैसलों से कानून की सोच स्थापित कर चुका है, तो निचली अदालतों के आदेश या फैसले कम से कम उसके खिलाफ तो नहीं होने चाहिए। फिर भी लोकतंत्र में हमें लगता है कि अदालत की व्यवस्था और प्रक्रिया के भीतर भी अगर कोई मजिस्ट्रेट या जज अपने से बड़ी अदालत से असहमति दिखाना चाहते हैं, तो उसे उन्हें असहमति के रूप में दर्ज करने का एक लोकतांत्रित अधिकार तो शायद हो सकता है, लेकिन उनके आदेश और फैसले अपने से ऊंची अदालत के अपने पर भी लागू फैसलों के खिलाफ नहीं जा सकते। 

अभी मुम्बई में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें पुलिस ने प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज (टिस) के दो छात्रों की अग्रिम जमानत याचिका मुम्बई के एक सत्र न्यायालय ने खारिज कर दी। मुम्बई पुलिस ने टिस परिसर में एक कार्यक्रम के दौरान उमर खालिद और शरजील इमाम नाम के चर्चित और बरसों से बिना सुनवाई जेल में बंद आंदोलनकारियों की रिहाई के लिए नारे लगाए। इन्हें अग्रिम जमानत देने से मना करते हुए एडीजे वी.बी.बोहरा ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों में खालिद और इमाम को जमानत देने से इंकार कर दिया था, इसलिए उनकी रिहाई के लिए नारे लगाना गलत था, और छात्रों से देश के कानून का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है। पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि टिस में दस-बारह छात्रों ने मोमबत्तियां जलाकर मानवाधिकार कार्यकर्ता स्व.जी.एन.साईबाबा की कविताएं पढ़ीं, और उमर खालिद, शरजील इमाम की रिहाई के नारे लगाकर साईबाबा को श्रद्धांजलि दी। 

अदालत ने अपने आदेश में यह जिक्र किया है कि साईबाबा को अदालत ने आतंकी मामले में बरी कर दिया था, इसलिए सिर्फ उन्हें श्रद्धांजलि देने को अवैध नहीं माना जाता। लेकिन जिन दो लोगों को अग्रिम जमानत से मना किया गया है, उनके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर कुछ माओवादियों की प्रकाशित पुस्तकों को डाउनलोड करना मिला है। और कुछ जानकारी उपकरण से हटा दी गई थी। जज ने कहा कि यह आपराधिक अपराध नहीं है, लेकिन यह उनके आचरण पर संदेह पैदा करता है, और कथित अपराध में उनके शामिल होने का संकेत देता है। जज ने लिखा कि किताब डाउनलोड करने और नारे लगाने के पीछे उनके इरादे का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है। एक दूसरी अर्जी पर जज ने कहा कि उसके मोबाइल फोन में मिली वॉट्सऐप चैट से भी पता लगता है कि उन्होंने विभिन्न स्थानों पर भाग लिया था। इसके अलावा उनके द्वारा कुछ जानकारी हटा दी गई थी। जज ने खुद ही कहा कि माओवादी संगठन की पुस्तकों को सिर्फ डाउनलोड करना अपराध नहीं है, लेकिन उनके इरादे और उनके संबंधों का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है। 

एक सत्र अदालत का यह फैसला बहुत बुरी तरह हैरान और निराश करता है। किसी विचाराधीन कैदी की रिहाई के लिए नारे लगाना लोकतंत्र में कब से अपराध होने लगा? अगर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत नहीं दी है, तो सुप्रीम कोर्ट से असहमत होना कोई जुर्म तो नहीं है! हम तो अपने अखबार में यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर कई बार अदालतों से असहमत होते हैं, लोकतंत्र में संसद या अदालत से सहमत होने की कोई बंदिश भी नहीं है। हम तो ट्रम्प जैसे लुच्चों के मामलों में भारत सरकार के रूख से भी असहमत रहते हैं, लेकिन वह भी कोई जुर्म नहीं है, लोकतंत्र ऐसी ही विविधता का नाम है। ऐसे में सेशन कोर्ट के इस आदेश से कई संवैधानिक खतरे खड़े होते हैं, और हमारा ख्याल है कि मुम्बई हाईकोर्ट में जाने पर जमानत न देने का यह फैसला खड़ा नहीं हो पाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट पहले कई मामलों में यह कह चुका है कि जब तक अदालत दोष सिद्ध न कर दे, हर व्यक्ति निर्दोष माने जाएंगे। ऐसे में जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की रिहाई की मांग करना किसी मुजरिम को रिहा करने की मांग नहीं है। और हमारा तो तर्क यह है कि किसी मुजरिम को भी रिहा करने की मांग जुर्म इसलिए नहीं है कि देश में सबसे चर्चित बलात्कारियों की रिहाई की मांग रात-दिन सार्वजनिक रूप से नामी-गिरामी लोग करते ही रहते हैं। पुलिस ने ऐसी मांग करने वाले किसी व्यक्ति को सजायाफ्ता की रिहाई की मांग के जुर्म में तो नहीं पकड़ा है। इंदिरा की हत्या के बाद दो लोगों ने खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए थे, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सिर्फ नारे लगाए गए, जिनसे कि कोई हिंसा नहीं हुई, जिनसे कोई भीड़ नहीं भडक़ी, जिनसे कोई सार्वजनिक अशांति नहीं हुई, तो वह जुर्म नहीं है। ऐसे में उमर और शरजील की रिहाई का नारा कैसे जुर्म हो गया? 

इस जज ने हैरान करने की हद तक तर्कहीन बात कही है। वे खुद जिक्र करते हैं कि नक्सल साहित्य डाउनलोड करना जुर्म नहीं है, लेकिन इसके पीछे के इरादे को लेकर पूछताछ करने के लिए पुलिस हिरासत जरूरी है। जब कोई काम जुर्म नहीं है, तो उसके पीछे के इरादे की पूछताछ का हक पुलिस को कैसे मिल सकता है? और कोई जज कैसे पुलिस के ऐसे किसी कथित अधिकार को लोगों की आजादी के अधिकार के ऊपर मान सकता है? यह एक मुद्दा ही हाईकोर्ट में इस आदेश को खारिज करवाने के लायक है। 

सेशन कोर्ट ने हैरान करने की हद तक दो बातें लिखी हैं। एक तो यह कि इन छात्रों से गिरफ्तार उपकरणों में कुछ डिलीट किया गया है। हर कोई अपने कम्प्यूटर या मोबाइल फोन पर बहुत सी चीजें डाउनलोड करते हैं, बहुत सी चीजें डिलीट करते हैं। यह स्वाभाविक काम कैसे किसी जुर्म का शक करने का आधार हो सकता है? दूसरी बात यह कि किसी प्रतिबंधित संगठन की विचारधारा की किताब डाउनलोड करना कोई जुर्म नहीं है, यह बात सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सारे मामलों में साफ की हुई है। इसके बावजूद यह सेशन कोर्ट उसे मुद्दा बना रहा है, और उसे संदेह का एक आधार बता रहा है। ऐसे में तो सुप्रीम कोर्ट और संसद की लाइब्रेरी में भी ऐसा साहित्य हो सकता है, तो क्या वहां के रजिस्ट्रार या महासचिव से भी उनके इरादे पर पूछताछ की जाए? दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में प्रतिबंधित संगठनों के साहित्य को पढऩे पर कोई रोक नहीं रहती है, तानाशाही जरूर किताबों से डरती है। लेकिन इस अदालत ने एक बात और भयानक लिखी है जिसमें उसने कहा है कि ये छात्र की वॉट्सऐप चैट से यह पता लगता है कि उसने कई इलाकों में फील्डवर्क किया है। अदालत का यह जिक्र हैरान करता है क्योंकि देश के एक विख्यात समाजशास्त्रीय अध्ययन केन्द्र के छात्र अगर फील्डवर्क नहीं करेंगे, तो उनकी पढ़ाई कैसे पूरी होगी? शिक्षा के बुनियादी तत्वों को जुर्म से जोड़ देने का यह अदालती निष्कर्ष बहुत ही भयानक है।

मुम्बई के एक सेशन कोर्ट का यह आदेश हैरान करता है कि अगर विश्वविद्यालयों के मासूम छात्र-छात्राओं को भी अपने अहिंसक, लोकतांत्रिक, और पूरी तरह से गैरअराजक विचारों की भी छूट नहीं है, तो फिर देश को एक विचारहीन लोकतंत्र काफी होगा! आज जब इन तमाम मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के अनगिनत फैसले न सिर्फ अदालतों की लाइब्रेरियों में किताबों की शक्ल में मौजूद हैं, बल्कि इनसे जुड़ी हुई खबरें रात-दिन इसके हिस्सों को बताती हैं। किसी छोटी अदालत के जज को भी अगर बड़े संवैधानिक मुद्दों को छूना है, तो उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे भारतीय न्याय प्रक्रिया में उनसे जुड़ी हुए सर्वोच्च फैसलों को तो कम से कम समझ लें। इस आदेश को तो आगे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की आँच से गुजरना होगा, लेकिन क्या आगे खड़ी उस संभावना को देखकर संतुष्ट रहा जा सकता है, जब निचली अदालत इस हद तक अलोकतांत्रिक रूख वाली हो? देश की न्याय व्यवस्था में यह काफी नहीं है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक फैसले के पलटने की संभावना बाकी है। बहुत से ऐसे लोग होंगे जिनके बस में ऊंची अदालतों तक जाने की ताकत नहीं होगी, वक्त नहीं होगा, और ऐसा करते हुए जिनकी पढ़ाई-लिखाई, या जेलों में बंद उमर और शरजील की तरह जवानी के कई बरस खराब हो सकते हैं। भारतीय न्याय व्यवस्था आदर्श होने से कोसों दूर है, यहां अभी-अभी उम्रकैद की सजा काट रहे किसी को 22 बरस बाद, तो किसी को 33 बरस बाद बेकसूर बरी किया गया है। छात्रों को फर्जी मामलों में, सत्ता से असहमत विचारधारा के आधार पर पुलिस और अदालती प्रक्रिया के माध्यम से प्रताडि़त करना पूरी तरह नाजायज और अलोकतांत्रिक है। किसी के साथ एफआईआर, जांच, मुकदमे, और निचली अदालत में लगातार बेइंसाफी के बाद उसे भरोसा दिलाना कि उनके लिए अभी तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रास्ते खुले हैं, एक बहुत ही फर्जी किस्म का तथाकथित लोकतांत्रिक भरोसा है। 

आज पूरे देश में छात्रों की पीढ़ी से सरकारें जिस तरह हिली हुई हैं, बड़े-बड़े संगठन अपनी रणनीति दुबारा तय कर रहे हैं, वह सब देखते हुए सरकारों को फर्जी केस बनाना बंद करना चाहिए। कॉकरोच नाम का एक शब्द जिस तरह एक विस्फोट के साथ एक फुटपाथी-क्रांति में बदल गया, उससे भी सरकारों को समझ लेना चाहिए कि फर्जी केस फजीहत भी बन सकते हैं, सरकारों की खुद की फजीहत। फिलहाल तो हमें इंतजार रहेगा कि बाम्बे हाईकोर्ट सेशन कोर्ट के इस आदेश के उन पहलुओं पर क्या कहता है, जिन्हें हम आज अलोकतांत्रिक लिख रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें