एक राज्य से आए मोदी की अंतरराष्ट्रीय पहल की चर्चा

4 अगस्त 14
संपादकीय
इस वक्त भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पड़ोसी देश नेपाल के विख्यात पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा कर रहे हैं। कल उन्होंने नेपाल में एक अभूतपूर्व स्वागत पाया, और भारत में भी नेपाल के साथ इस गर्मजोशी को उत्साह से देखा जा रहा है। इसके पहले मोदी अपने शपथ ग्रहण के दिन ही सभी सार्क देशों के प्रमुखों से बात कर चुके थे जिनको उन्होंने एक नई परंपरा शुरू करके अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था। इसके बाद वे ब्राजील में ब्रिक्स देशों के प्रमुखों के साथ लंबी मुलाकातें करके लौटे, और उनके भारत आने के कुछ दिनों के भीतर ही अमरीका के विदेश मंत्री ने बड़ी गर्मजोशी के साथ भारत आकर दोनों देशों के संबंध बेहतर और मजबूत बनाने की बातें कीं। 
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते समय पूरी दुनिया के मन में यह बात थी कि उनके पास न तो देश की राजधानी में काम करने का कोई अनुभव था, न ही केन्द्र सरकार में उन्होंने एक दिन भी काम किया था। विदेशों के साथ संबंधों का उनका अनुभव एक गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कारोबार तक सीमित था, और आर्थिक मोर्चे पर उस राज्य की साख बहुराष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के बीच अच्छी थी। उससे ज्यादा विदेशी संबंधों का अनुभव उनका नहीं था। दूसरी बात यह कि गुजरात दंगों के जिन दिनों से उबरकर उन्होंने दो बार गुजरात राज्य के चुनाव जीते, उसके बाद अपनी पार्टी भाजपा को जीता, और फिर देश के आमचुनाव अपने बलबूते पर जीते, उन सबको देखते हुए लोगों के मन में मोदी की अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं को लेकर उम्मीदों से अधिक आशंकाएं थीं, लेकिन पहले कुछ महीनों में ही मोदी ने उन आशंकाओं को तोड़ दिया है, हालांकि अभी उनके कार्यकाल का लगभग पूरा हिस्सा बाकी है, और आने वाले कई बरस उनके अंतरराष्ट्रीय फैसलों को सही या गलत साबित करेंगे। 
पिछले दो-ढाई महीनों में मोदी ने जो अंतरराष्ट्रीय नीति, और भारतीय विदेश नीति बताई है, वह तारीफ की हकदार है। पड़ोस के सारे सार्क देशों को न्यौता देना, प्रधानमंत्री बनने के पहले ही उनका एक मास्टरस्ट्रोक था, और सच तो यह है कि किसी को भी उनसे वह उम्मीद नहीं थी। दूसरी बात यह कि हर किसी को यह अच्छी तरह मालूम है कि अब तक उनके अंतरराष्ट्रीय फैसले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के किसी सक्रिय योगदान के बिना, अकेले प्रधानमंत्री के स्तर पर, उनके निजी विचार-विमर्श पर आधारित हैं। जहां तक विदेश मंत्री की बात है, तो उन्होंने इजराईल-फिलीस्तीन मुद्दे पर संसद में बहस तक नहीं होने दी, लेकिन जब एक देश के रूप में भारत को अपना रूख दिखाना था, तो कुछ दिनों के भीतर ही प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन के पक्ष में वोट दिया, जबकि अमरीका हमेशा की तरह इजराईल के साथ रहा। मतलब यह कि अमरीकी रूख के खिलाफ भी, भारतीय विदेश मंत्री के संसदीय रूख के खिलाफ भी, भारत ने एक देश के रूप में, और मोदी ने एक प्रधानमंत्री के रूप में अंतरराष्ट्रीय मतदान में इजराईल का विरोध किया। यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि पिछले बरसों में सुषमा स्वराज भारत-इजराईल मैत्री संघ की भारतीय मुखिया रही हैं, और इजराईल के लिए उनका लगाव जगजाहिर है। इस पूरे सिलसिले का जिक्र इसलिए जरूरी है कि मोदी की विदेश नीति सुषमा से प्रभावित नहीं है, वह एक देश की विदेश नीति के रूप में विदेश मंत्री से ऊपर तय की जा रही है। यही वजह है कि पिछले दो-ढाई महीनों में किसी भी अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत की विदेश मंत्री को कोई अहमियत नहीं मिली है। 
मोदी ने काम सम्हालते ही सबसे पहले भूटान जाकर अपने और चीन के बीच बसे हुए फौजी अहमियत वाली जमीन पर बसे एक पड़ोसी देश के साथ रिश्ते मजबूत किए। अब वे नेपाल पहुंचे हैं, और भारत-चीन के बीच यह दूसरा देश है। पाकिस्तान के साथ उन्होंने खासी लंबी बातचीत की है, और श्रीलंका के मोर्चे पर तनाव घटाने का काम भी किया है। एक तरफ अमरीका के साथ, दूसरी तरफ चीन के साथ, और तीसरी तरफ रूस के साथ उन्होंने बातचीत तेजी से आगे बढ़ाई है। एक प्रदेश से आने वाले गैरअंग्रेजीभाषी नेता की यह कामयाबी कम नहीं है। लेकिन मोदी की तारीफ करना हमारा मकसद नहीं है, हिन्दुस्तान की विदेश नीति पर चर्चा करना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि कम ही लोग इस बात का अंदाज लगाते हैं कि पाकिस्तान के साथ लगी सरहद पर हिन्दुस्तान का जो खर्च होता है, वह खर्च इस देश में हर स्कूल की जरूरत पूरी कर सकता है, हर अस्पताल को दवाईयों से भर सकता है। ऐसे में अगर नरेन्द्र मोदी हिन्द महासागर क्षेत्र में तनाव को घटाने में कामयाब होते हैं, तो वह तमाम देशों की कमाई बढ़ाने से अधिक बड़ा काम होगा। 
दरअसल नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी रहते हुए जिस तरह का आक्रामक रूख पाकिस्तान के खिलाफ दिखा रहे थे, वह रूख प्रधानमंत्री बनने के बाद ओहदे और देश की जिम्मेदारियों से बिल्कुल ही बदल गया है। और हम ऐसे किसी भी यू-टर्न को सही मानते हैं, और उसका स्वागत करते हैं जो कि मुड़कर अमन-चैन की तरफ जाता है। हम लोगों को किसी वक्त उनकी कही हुई युद्धोन्माद की बातों को याद दिला-दिलाकर उनसे जंग के वायदों को पूरा करने पर भरोसा नहीं रखते। एक चुनावी भाषण अलग होता है, और एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए दिया गया भाषण अलग होता है। एक ओहदे की जिम्मेदारियां लोगों को किस हद तक बदल सकती हैं, किस हद तक बेहतर बना सकती हैं, सकारात्मक बना सकती हैं, आज मोदी इसकी एक मिसाल है। 
भारत का प्रधानमंत्री घरेलू मामलों में किसी एक पार्टी का हो सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर उसे अपनी पार्टी के नारों और मुद्दों से परे देश के व्यापक हित के बारे में सोचना ही पड़ता है। लोगों को यह याद होगा कि एक वक्त प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी को मुखिया बनाकर भेजा था। पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध में फतह हासिल करके बांग्लादेश का निर्माण करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी की अभूतपूर्व और ऐतिहासिक शब्दों में तारीफ की थी। मोदी सरकार बनने के बाद उनके सबसे करीबी और सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक अरूण जेटली ने विदेशी संबंधों पर केन्द्रित एक खुफिया रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की अपनी मांग अपने ब्लॉग से हटा दी है। यह सब सार्वजनिक जिम्मेदारियों के तकाजे से किए गए काम हैं, और हम नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए तारीफ करेंगे कि उन्होंने पड़ोसियों के साथ रिश्ते गहरे बनाने का काम तेजी से शुरू किया है, और ऐसे ही उत्साह की जरूरत भी थी। मोदी को एक फायदा यह भी है कि पिछले पांच बरसों के यूपीए सरकार का काम एक बड़े शून्य की तरह रहा, और आज मोदी आसानी से उस शून्य को भर चुके हैं। आज दुनिया के हर देश को पड़ोसियों से, और बाकी देशों से भी, रिश्ते बेहतर रखने चाहिए, अपने खुद के नागरिकों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए भी यह जरूरी है। इसके साथ-साथ उन्होंने जरूरत के मौके पर, जरूरत के मुताबिक फिलीस्तीनियों के पक्ष में भारत का वोट देकर एक सही फैसला लिया है, और संसद में भारतीय विदेश मंत्री की चूक को तुरंत ही सुधार भी लिया है। आज हमारे साथ-साथ बाकी की दुनिया भी मोदी के रूख और उनकी पहल को उत्सुकता से देख रही है, और इस पर बाकी दुनिया में भी खासी गंभीर चर्चा हो रही है।  

खिलाड़ी पसीना बहाकर मैडल ला रहे, और अधिकारी गिरफ्तार

3 अगस्त 2014
संपादकीय
अभी जब हम यह संपादकीय लिखने बैठे हैं, ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों से खबर है कि वहां भारतीय टीम के दो गैरखिलाड़ी प्रमुख लोग अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार हुए हैं। ये दोनों ही मामले खेलों से परे के निजी चाल-चलन से जुड़े हुए हैं, और भारत के खिलाडिय़ों ने बड़ी मेहनत से पदक पाने की जो कोशिशें की हैं, उनके पसीने पर यह धूल डालने की हरकत है। एक मामला भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव का है, और दूसरा मामला कुश्ती के एक रेफरी का है। इसकी बाकी जानकारी तो खबरों में जा रही है, इसलिए हम यहां पर पूरी बात को नहीं लिख रहे हैं, लेकिन यह बहुत ही शर्मनाक बात भी है, और इससे भारत में खेलों पर राज करने वाले लोगों के हाल का पता लगता है। 
पूरे देश में जगह-जगह खेल संघ नेताओं और अफसरों के कब्जे में हैं, और अधिकतर खेल संघ ऐसे लोगों के हाथ हैं, जिन्होंने वह खेल कभी खेला ही नहीं है, जिन्हें उन खेलों की कोई समझ नहीं है। बल्कि बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो कि कभी किसी भी तरह के खिलाड़ी नहीं रहे हैं। और आज भारत में खेलों को बढ़ावा देने, खिलाडिय़ों को सहूलियतें देने, मुकाबले करवाने, प्रशिक्षण का इंतजाम करने, जैसे बहुत से मामले इन्हीं लोगों के कब्जे में रहते हैं। हमने भारत में खेलों में भयानक आर्थिक भ्रष्टाचार का मामला दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान देखा था, जिनको लेकर सुरेश कलमाडी अभी तक जेल और जमानत के बीच कहीं पर हैं। दूसरी तरफ क्रिकेट नाम का एक खेल जो कि खेल की जगह कारोबार और मनोरंजन अधिक बनकर रह गया है, उसमें भारी भ्रष्टाचार इस कदर हावी है कि वह कांग्रेस और भाजपा के नेताओं को भी अपनी जेब में रखता है, और सुप्रीम कोर्ट भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। लेकिन भारत में खेलों की चर्चा को अगर क्रिकेट से जोड़ा जाएगा, तो बाकी खेलों की बात धरी रह जाएगी। 
हमारा यह मानना है कि किसी भी खेल से जुड़े हुए खेल संघ में पदाधिकारी बनने के लिए यह शर्त रहनी चाहिए कि वे लोग कभी न कभी उस खेल से जुड़े हुए रहे हों। आज खेल संघों से लेकर भारतीय ओलंपिक संघ तक गैरखिलाड़ी काबिज हैं, और उसी का नतीजा है कि सवा अरब के इस देश में दुनिया के छोटे-छोटे से देशों का मुकाबला भी मैडलों के मामले में नहीं हो पाता। जब खेल संघों की राजनीति, उनका बजट, उनकी सामाजिक चकाचौंध का बोलबाला रहता है, तो खिलाड़ी बिना रिजर्वेशन ट्रेन में चढ़ते हैं, दरियों पर सोते हैं, नलों पर नहाते हैं, आधा पेट खाते हैं, और जूतों तक के लिए तरसते हैं। यह हाल करीब-करीब पूरे देश का है, और अगर कुछ प्रदेश इससे परे हैं, तो वह बहुत अच्छी बात है। 
खेलों को लेकर खिलाडिय़ों के चयन में गड़बड़ी की बात होती, तो भी वह एक मतभेद का मुद्दा हो सकता था। लेकिन निजी चाल-चलन को लेकर ब्रिटेन में भारत के दो खेल अधिकारी-पदाधिकारी अगर गिरफ्तार हो रहे हैं, तो यह दुनिया के एक सबसे बड़े मुकाबले के दौर में भारत की टीम के प्रति उनकी लापरवाही का सुबूत है। ओलंपिक संघ के पदाधिकारी और एक खेल के रेफरी को अपना ध्यान खिलाडिय़ों पर और मुकाबलों पर रखना था। ऐसे में लोग वहां जाकर गिरफ्तार हो रहे हैं, तो यह खिलाडिय़ों का हौसला पस्त करने की बात भी है, और देश के लिए शर्मिंदगी की बात भी है। उनका जुर्म कितना बड़ा था, कितना नहीं, यह सब ब्रिटिश जांच के बाद सामने आएगा, आज तो इन गिरफ्तारियों से हमें भारत में खेल संघों के हाल पर चर्चा छेडऩे का एक मौका मिला है, उसकी जरूरत लग रही है, इसलिए हम यह बात कर रहे हैं।

हम नहीं सुधरेंगे

2 अगस्त 2014
संपादकीय
टीवी पर इन दिनों इश्तहार आ रहा है कि एक बगीचे में एक नौजवान खाने के सामान का खाली पैकेट फेंकते हुए आगे बढ़ता है तो वहां मौजूद कई बुजुर्ग उसे घेर लेते हैं, और उनके तेवर देखकर वह पैकेट उठाकर कूड़ेदान में डालता है। यह नौबत हिन्दुस्तान के हर दायरे में देखने मिलती है और अधिकतर लोगों को देखकर यह अफसोस होता है कि वे न धरती को अपना समझते, न शहर को, और न सार्वजनिक सुविधाओं को। इसी बीच इमारत की सीढिय़ों के कोने पान की पीक से रंगे रहते हैं, और कई जगहों पर इस गंदगी से बचने के लिए देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले टाईल्स लगाए जाते हैं, ताकि कम से कम उन पर थूकने से लोग बचेंगे। सार्वजनिक पखानों और पेशाबघरों को लोग गंदगी जोड़े बिना छोडऩा नहीं चाहते, मानो साफ छोड़कर आने पर उनकी क्षमता कम आंकी जाएगी। 
पूरा देश गंदगी और गैरजिम्मेदारी से इस कदर लबालब है कि मानो बाढ़ के दिनों की नदी हो। लोग सड़कों पर गाडिय़ां रोककर गप्प मारते रहते हैं, और आगे-पीछे के आने-जाने वाले लोग हॉर्न बजा-बजाकर नाकामयाब कोशिश करते रहते हैं। चौराहों पर लालबत्तियों में लोग क्रॉसिंग की सीमा पार किए बिना रूकने को अपनी बेइज्जती समझते हैं, और सार्वजनिक जगहों पर जोर-जोर से गालियों में बात करने को अपना हक समझते हैं। यह तो तय है कि इनमें से अधिकतर लोगों का वास्ता दुनिया के सभ्य देशों से, और सभ्य लोगों से या तो पड़ा नहीं है, या ये लोग सभ्यता के किसी भी असर से अछूते रहते हैं। ऐसे में जो लोग दूसरों के हक और अपनी जिम्मेदारी का ख्याल रखते हुए नियम-कायदों पर चलते हैं, उनके मन में भड़ास बढ़ती चलती है, और बदतमीज लोग बेफिक्र भी रहते हैं। 
आसपास के दूसरे लोगों के सुख-चैन का ख्याल किए बिना लोग अपने घर पर कई-कई दिनों तक लाउडस्पीकर लगाकर उस पर चीखते रहते हैं, और उनको इस बात की भी कोई फिक्र नहीं रहती कि दूसरे लोगों के दिल से उनके लिए कितनी गालियां निकल रही होंगी। आसपास के  दर्जनों लोगों तक पहुंचने जितनी ऊंची आवाज में लोग मोबाइल फोन पर बात करते हैं, और दूसरों से मुलाकात के दौरान कोई अपनी नाक में उंगली डाले रखता है, तो कोई दांत या कान साफ करते रहता है। आज न सिर्फ दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसे लोगों के लिए संभावनाएं कम रहती हैं, बल्कि अपने देश के भीतर भी उन्हें यह पता ही नहीं लगता कि उनकी कौन सी हरकतों की वजह से दूसरे लोग उनसे परहेज करने लगते हैं। अतिमहत्वाकांक्षा शायद बुरी बात हो सकती है, लेकिन जब किसी समाज में महत्वाकांक्षा ही न हो, तो वह बात भी बहुत बुरी रहती है। लोगों के मन में इस देश में बेहतर बनने, बेहतर करने का कोई उत्साह नहीं रहता, और हर कोई अपनी जिंदगी के तौर-तरीकों को उतना घटिया बनाए रखने में खुश रहता है, जितना कि सरकारी सप्लाई में घटिया माल खपाकर सप्लायर खुश रहता है। 
अधिक नुकसानदेह और खतरनाक यह बात है कि भारत के लोगों के घटिया तौर-तरीकों में सुधार की कोई चर्चा भी नहीं होती, और अधिकतर लोग आसपास बिखराई जाती गंदगी के साथ जीना सीख लेते हैं, गंदे सलीकों को बर्दाश्त करना सीख लेते हैं, और धीरे-धीरे खुद भी उसी राह पर चलकर भड़ास से बचना भी सीख लेते हैं। जब खुद गंदगी पर उतर जाएं, तो दूसरों की गंदगी से शिकायत जाती रहती है। इस देश का आने वाले वक्त में, बाकी दुनिया में संभावनाओं से बहुत पीछे रहना तो तय है ही, इस देश में आने वाले सैलानियों का भी हौसला हिन्दुस्तानियों की ऐसी हरकतों से बढ़ता नहीं है। सभ्य देशों से आने वाले लोग यहां की गंदगी को देखकर हक्का-बक्का रहते हैं, और यह देखकर भी हैरान रहते हैं कि कदम-कदम पर मंदिरों वाला यह देश अपने धार्मिक रीति-रिवाजों में तो भारी सफाई के नियम रखता है, लेकिन ईश्वर की प्रतिमा से परे असल जिंदगी में गंदगी ही यहां की संस्कृति हो गई है। 
ऐसी सोच के खिलाफ सरकार कुछ नहीं कर सकती, लोगों को खुद पहले अपने परिवार को ठीक करना होगा, फिर पड़ोस को, और फिर मुहल्ले को। यह सिलसिला अभी शुरू होने का आसार भी इसलिए नहीं दिखता क्योंकि अभी लोग इसे बुरा मानते भी नहीं दिख रहे हैं। आज के आम हिन्दुस्तानी घूरों पर रहने के हकदार हैं, और यहां पर आने वाले सैलानी कुछ तो कुदरत की खूबसूरती को देखने आते हैं, और कुछ वे सैकड़ों बरस पहले के इतिहास में बनी खूबसूरत इमारतों को, कला को देखने आते हैं। लेकिन सैकड़ों बरस पहले की अच्छी बातें, आज की गंदगी को कब तक ढो सकेंगी?

Bat ke bat, बात की बात,

1 aug 2014

संयुक्त राष्ट्र की औकात नहीं कि अमरीकी गिरोह से सवाल करे

1 अगस्त 2014
संपादकीय
फिलीस्तीन के गाजा पर इजराईल के बेहिसाब, बेकाबू, और बददिमाग हमलों को देखें, और उस पर संयुक्त राष्ट्र संघ की सारी पहल को देखें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र अब दुनिया के उन तमाम मामलों में प्रसंगहीन हो गया है जिनमें अमरीका की कोई ऐसी दिलचस्पी है, जो कि संयुक्त राष्ट्र की सोच के खिलाफ है। अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र को अपनी जमीन पर जगह क्या दी, उसने मानो इसे अपनी सरकार के एक दफ्तर जैसा ही दर्जा दिया। फिलीस्तीनियों के खिलाफ इजराईली हिंसा की आधी सदी से अधिक गुजर गई है, और दशकों से संयुक्त राष्ट्र ने फिलीस्तीनियों के हक में प्रस्ताव पारित किया है, लेकिन इस सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच का यह दम नहीं है कि अमरीका की मर्जी के खिलाफ वह कुछ भी कर सके। उसका कामकाज दुनिया के इस सबसे बड़े मवाली देश से परे ही चल सकता है, और साथ-साथ अमरीकी गिरोह में शामिल देशों को छूना भी संयुक्त राष्ट्र के लिए मुमकिन नहीं है।
अभी कुछ ही बरस हुए हैं जब अमरीका ने झूठे सुबूत गढ़कर दुनिया के सामने पेश करके इराक पर हमला किया था, यह कहते हुए कि इराक में मानव संहार थोक में करने वाले रासायनिक और दूसरे किस्म के हथियार हैं, और दुनिया के हित में इराक पर हमला जरूरी है। बाद में साबित हुआ कि न तो इराक में ऐसे कोई हथियार थे, और न खुद अमरीकी सरकार के पास ऐसे कोई खुफिया सुराग थे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र रोकते रह गया, सार्वजनिक रूप से अमरीका को ऐसे हमले के लिए मना करते रहा, और अमरीका ने न सिर्फ लाखों लोगों को मारने वाला यह हमला किया, बल्कि दुनिया के देशों को धमकी देकर एक गिरोह में बांटा, यह चेतावनी देते हुए, कि देश या तो इस हमले में अमरीका के साथ हैं, या फिर वे आतंक के साथ हैं। 
ऐसी तमाम बातों को देखें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को बनाने का जो मकसद था, दुनिया की जिस जरूरत के पूरे होने की उम्मीद संयुक्त राष्ट्र से की जाती थी, वह सब अमरीकी दबदबे के तले दबकर रह गए। संयुक्त राष्ट्र दुनिया के बहुत से देशों में शांति सेना तैनात करने में कामयाब है, शरणार्थियों की मदद करना, बच्चों की मदद करना, इन सबमें कामयाब है, लेकिन इसलिए कामयाब है कि ऐसे अधिकतर मामलों में अमरीका के हित कहीं घायल नहीं होते। अमरीकी सरकार अगर इनमें से किसी मुद्दे पर, किसी मोर्चे पर खिलाफ हो जाए, तो संयुक्त राष्ट्र की यह औकात नहीं है कि वह वहां पर किसी जख्मी बच्चे पर मरहम भी लगा सके, किसी भूखे को खाना भी दे सकेगी। 
जिस तरह एक लतीफा चलता है कि एक आदमी कहता है कि वह अपने घर में सब कुछ अपनी मर्जी का करता है, अपनी बीवी की इजाजत से। उसी तरह आज संयुक्त राष्ट्र संघ की हालत हो गई है, वह अमरीका को छोड़कर, उसकी पसंद को छोड़, उसके गिरोह को छोड़, बाकी दुनिया के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मंच की तरह काम कर रहा है, तब तक कर रहा है, जब तक वह अमरीकी फौजी बूटों की राह में रोड़े की तरह नहीं खटकता। जिस दिन वैसी नौबत आती है, अमरीकी बूट एक ठोकर से संयुक्त राष्ट्र को राह के किनारे दूर फेंक देते हैं। यह नौबत बदलने के कोई आसार नहीं हैं, दुनिया के अलग-अलग मोर्चों पर अब अमरीका इस कदर हावी हो चुका है, कि उस पर किसी का बस नहीं है। पूरी दुनिया की जासूसी, पूरी दुनिया पर हमला, पूरी दुनिया के कारोबार पर रोक-टोक के उसके मनमर्जी के नियम-कायदे, इन सबको देखें तो अब लगता है कि पूरी दुनिया का ध्रुवीकरण एक ही ध्रुव के इर्द-गिर्द इतना बड़ा हो चुका है, कि बचे हुए देश तब तक बचे हुए हैं, जब तक कि उन पर हमला करने की अमरीका को जरूरत नहीं पड़ती। 
आज ऐसे में दुनिया को कुछ ऐसे बड़े नेताओं की जरूरत है, जो अपने देश की ताकत लेकर, नैतिकता की ताकत लेकर संयुक्त राष्ट्र सहित दूसरे मोर्चों पर अमरीकी दादागिरी के खिलाफ लोगों को एकजुट कर सकें, और इंसाफ की बात कर सकें। ऐसे आसार हमको दिखते नहीं हैं, और शायद आज से सौ-दो सौ बरस बाद पूरी दुनिया 4 जुलाई को ही अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए मजबूर की जाएगी, अमरीका के साथ-साथ। 
एक बार फिर इजराईल और फिलीस्तीन के मोर्चे पर लौटें, तो अमरीका ने दुनिया के मुस्लिम देशों पर हमले करने की अपनी साजिश के तहत बेकसूर और बेघर किए गए फिलीस्तीनियों पर अपने गिरोह के इजराईल को छोड़ रखा है, और पूरी पश्चिमी दुनिया के वे बड़े देश भी आंख-मुंह बंद किए सैकड़ों बच्चों की लाशों को अनदेखा कर रहे हैं, जो तीसरी दुनिया के मजदूर देशों में बाल मजदूरी के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी चलाते रहते हैं। इतिहास इन तमाम बातों को दर्ज तो करते चल रहा है, लेकिन आखिर में जाकर इतिहास विजेता की कहानी रहती है, क्योंकि जंग में एक तो सब कुछ जायज रहता है, दूसरा यह कि जीतने वाले से कोई सवाल नहीं होते। आज संयुक्त राष्ट्र संघ की भी यह औकात नहीं है कि अमरीकी गिरोह से सवाल कर सके।

बात की बात, Bat ke bat,

30 july 2014

नटवर सिंह की लिखी बातों के महत्व से अधिक बड़ी खबरें

31 जुलाई 2014
संपादकीय
एक वक्त राजीव गांधी और सोनिया गांधी के सबसे करीबी लोगों में से एक रहे, कांग्रेस के नेता और भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री नटवर सिंह की किताब ने कल से चाय की प्याली में तूफान सा ला दिया है। टीवी चैनलों को एक मुद्दा मिला, और कल शाम से रात तक आधा दर्जन चैनल तो नटवर सिंह का इंटरव्यू दिखाते दिख रहे थे। कुछ समय पहले से आने वाली यह किताब खबरों में बनी हुई थी, क्योंकि इसे लेकर एक खबर छपी थी कि इस किताब के कुछ हिस्से को रोकने के लिए सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी नटवर सिंह के घर पहुंचे थे। 
इस किताब की जिस बात पर फिलहाल सबसे अधिक बहस हो रही है, वह यह है कि सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का मुखिया चुन लिए जाने के बाद भी उन्होंने 2004 में प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था, और उस वक्त उन्होंने उसे अपनी अंतरात्मा की आवाज कहा था। अभी नटवर सिंह ने इस किताब में लिखा है कि राहुल गांधी ने सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से मना किया था क्योंकि उन्हें डर था कि अपनी दादी और पिता की तरह वे मां को भी खो बैठेंगे। इस बात के सच होने या न होने से परे एक बहस यह भी चल रही है कि ऐसी अंतरंग बातों को लिखा जाना चाहिए, या नहीं लिखा जाना चाहिए। कल रात ही एक चैनल पर एक सवाल के जवाब में नटवर सिंह ने अपनी लिखी इन बातों को जायज ठहराते कहा कि कैनेडी से लेकर नेहरू तक कौन सा ऐसा नेता रहा है जिसके बारे में छोटी से छोटी बातें न लिखी गई हों? उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति जननेता बनते हैं, तो उनके सार्वजनिक कामकाज और फैसलों की बातें निजी नहीं रह जातीं। 
अब इस किताब के आज आने को लेकर एक सवाल यह उठ सकता है कि बरसों पहले के एक जज के मामले पर आज जिस तरह जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की नींद खुली है, उसी तरह आज नटवर सिंह की भी आत्मा जागी है। लेकिन हम मौके को लेकर किसी नीयत पर सवाल उठाने के बजाय तथ्यों पर जाना चाहेंगे और मुद्दे की बात करना चाहेंगे। मुद्दे की बात यह है कि बड़े ओहदों पर रहने वाले सार्वजनिक जीवन के लोगों की कितनी निजी बातें निजी रहने देनी चाहिए? और दूसरा मुद्दा यह है कि आसपास के किसी व्यक्ति के बारे में लिखते हुए लोगों को कितनी निजी बातों का जिक्र करना चाहिए? ये दोनों ही पैमाने देश, काल, संस्कृति, और निजी संबंधों से, निजी नीति-सिद्धांतों से तय होते हैं। अमरीका में जिस तरह क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की के बारे में लिखा गया, वैसा हिन्दुस्तान में कभी नहीं लिखा जाता। और जहां तक आसपास के लोगों द्वारा भांडाफोड़ की बात है, तो वह तो नेहरू के बारे में जब उनके निजी सचिव रहे मथाई ने लिखा था, तो उस वक्त से यह मिसाल तो देश में चली ही आ रही है कि आसपास के लोग जिस दिन चाहें उस दिन बहुत सी निजी बातों को उजागर कर सकते हैं। 
अभी हम सार्वजनिक जीवन में अहमियत रखने वाले लोगों के सिलसिले में ही इस बात को यहां कर रहे हैं, और ऐसे लोगों का आसपास के दायरे पर कामकाज के दौरान ही अपनी निजी जिंदगी को कुछ या अधिक हक तक उजागर करने की मजबूरी रहती है, और यहीं पर अपने सहयोगियों या अपने साथियों के दायरे के बारे में उनके सही या गलत फैसले का दाम उनको चुकाना होता है। हिन्दुस्तान में चुप्पी की आज तक की सबसे बड़ी मिसाल राजीव गांधी के मित्र और मंत्री रहे अरूण सिंह की है, जिन्होंने राजीव की सरकार जाने के बाद भी हिन्दुस्तान के सबसे चर्चित भ्रष्टाचार बोफोर्स के बारे में, या किसी भी बारे में मुंह भी नहीं खोला। उन्होंने उत्तर भारत की किसी एक पहाड़ी पर बसे रहते हुए कहीं चेहरा भी नहीं दिखाया, और आज हमें यह भी ठीक से याद नहीं है कि अरूण सिंह जिंदा हैं या नहीं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में भी मोनिका लेविंस्की जैसे लोगों के होने पर कोई रोक नहीं है, जो चाहें तो दाग-धब्बों वाले कपड़ों को सम्हालकर रख सकते हैं। 
नटवर सिंह की लिखी बातों को हम बहुत सनसनीखेज या बहुत हैरान करने वाली नहीं मानते। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में नेहरू-इंदिरा के कुनबे में राष्ट्रीय राजनीति के उथल-पुथल के दौर में, परिवार के दो-दो लोगों को खोने के बाद, बच्चों के साथ अकेली रह गई महिला-मुखिया के फैसले बहुत सी बातों से प्रभावित हुए होंगे। नटवर सिंह ने चाहे जिस नीयत से राहुल की अपील का जिक्र किया हो, हम इसे आज से दस बरस पहले जरा भी अस्वाभाविक नहीं मानते, और हम अपनी सामान्य समझबूझ की वजह से इस बात की गुंजाइश भी मानते हैं कि राहुल की ऐसी अपील के बाद भी सोनिया गांधी की अंतरात्मा से वैसा फैसला निकला हो। हम किसी बेटे की सावधानी के बाद मां की आत्मा का काम खत्म हो जाना नहीं मानते। ऐसी दो बातें एक के बाद एक भी जिंदगी में हो सकती हैं। और आज हमको लगता है कि नटवर सिंह की किताब को मुद्दा बनाना, एक ऐतिहासिक तथ्य, अगर वह सच है तो, को मुद्दा बनाना नहीं है, आज राजनीतिक चर्चा और मीडिया के लिए अपने शून्य को भरने के लिए वह एक अधिक बड़ा मुद्दा लगता है। 
जहां तक निजी बातों को किताब में लिखने की बात है, तो इस घटना का जिक्र हमें इतना अधिक निजी भी नहीं लगता, इतना नुकसानदेह भी नहीं लगता कि लोग अपने संस्मरण में, और अपनी आत्मकथा में उसे न लिखें। जब कभी कोई अपनी आत्मकथा लिखते हैं, तो उनमें उनकी जिंदगी के कई दायरों का कुछ-कुछ जिक्र तो आता ही है, कोई भी व्यक्ति सिर्फ अपने बारे में किसी दूसरे की चर्चा के बिना नहीं लिख सकते। और हम समकालीन इतिहास के दस्तावेजीकरण के भारी हिमायती हैं, और इसलिए हम ऐसी बातों को लिखने की उम्मीद सभी महत्वपूर्ण लोगों से करते हैं, जो बातें वक्त के इतिहास को दर्ज करती हों, फिर चाहे वे बातें उनके अपने नजरिए से रंगी हुई ही क्यों न हों। इतिहास कभी भी बेरंग नहीं होता, वह हमेशा लिखने वाले के  पूर्वाग्रह और लिखने से होने वाले नफे-नुकसान से प्रभावित होने का खतरा लेकर चलता है। लेकिन इतिहास लिखना किसी का एकाधिकार भी नहीं होता, उसे बहुत से अलग-अलग नजरियों से लिखा जा सकता है, लिखा ही जाता है। और फिर उन्हें प्रसंग और संदर्भ के साथ, लोगों के पूर्वाग्रहों की रौशनी में देखा जाता है, तौला जाता है, और फिर उन लिखी हुई बातों को आगे इस्तेमाल किया जाता है, या खारिज कर दिया जाता है। न लिखने के बजाय हम लिखना बेहतर समझते हैं, और आज जितनी बातें इस किताब के बारे में खबरों में हैं, उनको लिखना हम नाजायज नहीं पाते। 

सोशल मीडिया पर धार्मिक तनाव फैलाना बाएं हाथ का खेल...

30 जुलाई 2014
संपादकीय
देश के दूसरे हिस्सों की तरह कल छत्तीसगढ़ में भी इंटरनेट के सोशल मीडिया पर देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक बातों के खिलाफ हंगामा शुरू हुआ है। गैरजिम्मेदारी से जब किसी धर्म के खिलाफ ऐसा किया जाएगा, तो उससे तनाव खड़ा होना लाजिमी है। दो दिन पहले गुजरात के भुज में मुसलमान इसी तरह तनाव में थे, और पाठकों को याद होगा कि अभी कुछ ही महीने हुए हैं जब छत्तीसगढ़ के दुर्ग में युवक कांग्रेस के एक नेता को देवी-देवताओं के खिलाफ अश्लील फेसबुक पोस्ट को लेकर गिरफ्तार किया गया था और वहां धार्मिक तनाव खड़ा हो गया था। 
आज भारत में पहले धार्मिक तनाव और फिर साम्प्रदायिक टकराव खड़ा करना बहुत आसान हो गया है। इंटरनेट पर सोशल मीडिया तक लोगों की पहुंच सड़क की धूल तक पांवों की पहुंच जैसी आसान हो गई है। आज जिसके पास भी एक मोबाइल फोन है, वह ऐसी ताकत रखता है कि चार गंदी बातें लिखकर कहीं भी तनाव फैला दे। और लोग अपने मोबाइल फोन, इंटरनेट कनेक्शन, कम्प्यूटर, और सोशल मीडिया के अपने अकाउंट को लेकर आज भी इतने लापरवाह हैं कि कहीं सुनंदा थरूर को यह सफाई देनी पड़ती है कि उनके फोन से किए गए ट्वीट उनके नहीं थे, तो कहीं दिग्विजय सिंह की महिला मित्र के फोन से कई तस्वीरें इंटरनेट पर डाल दी जाती हैं। इस तरह आज का वक्त बहुत नाजुक है, टेक्नालॉजी में लोगों के हाथ में एक ऐसा हथियार दे दिया है जिससे कि वे अपने खुद के बदन को जख्मी कर सकते हैं। आज इंटरनेट पर किसी भी तरह की गैरजिम्मेदारी दिखाने वाले लोगों को पकडऩा आसान हो गया है, और देश का कानून बहुत कड़ा है। अखबारों के मामले में कानून इतना कड़ा नहीं था, जितना कि आज इंटरनेट के मामले में है। दूसरी तरफ अखबारों में लोग जिम्मेदारी के साथ काम करना जानते थे, लेकिन सोशल मीडिया का मिजाज इतना अराजक है, कि लोग वहां पर किसी भी तरह की गैरजिम्मेदारी दिखाते रहते हैं। 
लेकिन यह सिलसिला कहां तक जा सकता है, इसका अंदाज लगाना नामुमकिन है। जब तक देश के भीतर जिम्मेदार और चौकस लोग ऐसे मुद्दों पर खुलकर नहीं बोलेंगे, हर तबके को बर्दाश्त नहीं सिखाएंगे, जब तक राजनीतिक दल और उनके नेता ऐसे मुद्दों पर वोट दुहना बंद नहीं करेंगे, तब तक यह हिन्दुस्तान इंटरनेट की केबलों पर नहीं बैठा है, बारूदी सुरंगों पर बैठा है। किसी भी धर्म की भावनाओं पर दूसरे ने पैर धरा, तो उसी तरह धमाका होगा जिस तरह बारूदी सुरंगों पर किसी गाड़ी के पहुंचने से होता है। यह सिलसिला बहुत ही फिक्र पैदा करने वाला है, क्योंकि भारत में आज धार्मिक भीड़ ही पूरी तरह बेदिमाग रहती है। उसमें सिर हजारों होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता। और फिर जब ऐसी भीड़ साम्प्रदायिक भीड़ में तब्दील हो जाती है, तो उससे खतरा हजार गुना बढ़ जाता है। भारत में आज अलग-अलग लोग कई तरह की साम्प्रदायिक बातें कर रहे हैं, जिनके बारे में हमने पिछले दिनों इसी जगह पर लिखा भी है। उनकी वजह से आज देश का माहौल बहुत विस्फोटक बना हुआ है, और लोग इस ताक में हैं कि कैसे दूसरों की बातों पर कानून की कार्रवाई के पहले खुद कानून हाथ में लेकर जवाबी हमला किया जाए। ऐसी सोच में कई धर्मों के लोग शामिल हैं, कई पार्टियों के लोग शामिल हैं। 
हिन्दुस्तान ने साम्प्रदायिक दंगों में बहुत नुकसान झेला हुआ है। जिंदगियों का नुकसान, अपने पड़ोस के लोगों पर से भरोसा उठ जाने का नुकसान, और अर्थव्यवस्था को नुकसान। बहुत सी बातें साम्प्रदायिक दंगों के पीछे धर्म से अलग की होती हैं, और भारत का दंगों का इतिहास बताता है कि इनकी सबसे बुरी मार हाथों के हुनर वाले कारीगरों पर पड़ी है, और लाखों लोग रोजगार खो बैठे हैं। ऐसे माहौल में अमन-पसंद लोगों को घर पर चुप बैठना बंद करना होगा, और देश के लोगों की सोच को मजबूत करना होगा, कि किसी एक की शरारत, किसी एक की साजिश के चलते पूरा देश आग में न झोंक दिया जाए। राजनीतिक दलों को भी आज बैठकर इस बारे में सोचना होगा, क्योंकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किसी पार्टी को किसी एक चुनाव में फायदे का दिख सकता है, लेकिन बाद में उसके नुकसान बेकाबू हो सकते हैं। 
आज के वक्त में मां-बाप को भी अपने बच्चों को सोशल मीडिया पर जिम्मेदारीसे बर्ताव सिखाना चाहिए, वरना वे जमानत और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अपना बुढ़ापा खपाने पर बेबस रहेंगे। 

21वीं सदी के हिंदुस्तान को गुफा में ले जाने को आमादा

संपादकीय
29 जुलाई 2014

भारत में हिंदुत्व और एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भयानक आक्रामक अंदाज में मीडिया से लेकर अदालत तक अभियान चला रहे दीनानाथ बत्रा देश में अज्ञान बिखेरने में लग गए हैं। उन्होंने एक-दो बड़े प्रकाशकों को कानूनी धमकी देकर हिंदुत्व के इतिहास पर लिखी एक-दो किताबों को नष्ट करवा दिया, और उसके बाद मोदी सरकार आने पर उनका वह उत्साह कई गुना और बढ़ गया। आज जिस तरह वे काल्पनिक बातों को ऐतिहासिक तथ्य बताते हुए प्रचारित कर रहे हैं, जिस तरह अंग्रेजी के खिलाफ एक अभियान चला रहा हैं, जिस तरह भारत की मौजूदा संस्कृति को खत्म करके केक के पहले के दिनों में वे ले जाना चाहते हैं, उससे न तो इस देश की इज्जत बढऩे वाली है, न भाजपा की, और न मोदी सरकार की। यह हिंदुस्तान की 21वीं सदी है, और आज दुनिया भर में जो प्रवासी भारतीय मोदी और भाजपा के दोस्त और शुभचिंतक हैं, उनसे कोई पूछे कि क्या सिर्फ संस्कृत से काम चलाकर वे प्रवासी भारतीय बन सकते थे? क्या वे कुछ कमाकर मोदी और भाजपा को चंदा भेज सकते थे?
लेकिन एक प्रकाशक रहे दीनानाथ बत्रा को आज गुजरात की सरकार में अपनी किताबों को बढ़ावा देने के लिए एक माहौल मिल गया है, और वे पूरे देश की शिक्षानीति को बदलने में जुट गए हैं, पूरे देश के इतिहास को शोले फिल्म के जेलर के अंदाज में एक साथ सबके-सब बदल डालूंगा कहते हुए कल्पना को इतिहास बनाने पर आमादा हैं। उनकी बातें विज्ञान से परे हैं, इतिहास से परे हैं, आज के हिंदुस्तान की सामाजिक हकीकत से परे हैं, सच से परे हैं, और संभव से भी परे हैं। इसलिए वे आज समझदार हिंदुस्तानियों के बीच मखौल का सामान बन गए हैं, और उनकी हरकतों से आज की दुनिया में भारत की इज्जत बढऩे नहीं जा रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने ऐसे समर्थकों और शुभचिंतकों से उन्हें खुद को और देश को हो रहे नुकसान के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। आज वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नहीं हैं, आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं।

बलात्कार के बाद महिला से सत्ता का जुबानी बलात्कार

28 जुलाई 14
संपादकीय
देश भर में जगह-जगह कहीं नेता और कहीं अफसर बलात्कार को लेकर गैरजिम्मेदारी के बयान देते आ रहे हैं, और कोई ऐसा पखवाड़ा नहीं गुजरता जब हमें इसके बारे में लिखना न पड़ता हो। लेकिन उत्तरप्रदेश में अभी एक फिर मामला ऐसा आया जिसमें वहां की अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, एक महिला अफसर, ने बिना किसी जरूरत के अचानक प्रेस कांफ्रेंस लेकर कैमरों के सामने यह बयान दिया कि जिस महिला के साथ बलात्कार के बाद हत्या की बात खबरों में है, उसके साथ बलात्कार नहीं हुआ। इस बयानबाजी के चार दिन बाद फोरेंसिक जांच रिपोर्ट आती है कि उस महिला के साथ न सिर्फ बलात्कार हुआ था, बल्कि सामूहिक बलात्कार हुआ था। इसके पहले ही उत्तरप्रदेश में बलात्कार के मामलों में समाजवादी पार्टी की सरकार ने पुलिस और प्रशासन के सबसे बड़े अफसरों से बलात्कार की आशंका का खंडन करवाते हुए बयान जारी करवाए, और फिर वे खंडन जांच में झूठे साबित हुए। पाठकों को हमारा कई बार यह लिखा हुआ याद होगा कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने किस तरह एक बलात्कार के बाद उसे झूठा करार दिया था, और बाद में उन्हीं की पुलिस ने उस शिकायत को सही पाया था। 
अलग-अलग बहुत से राज्यों में नेता और अफसर ऐसी गैरजिम्मेदार बयानबाजी में लगे रहते हैं, लेकिन जब उत्तरप्रदेश की एक सबसे बड़ी महिला पुलिस अफसर बिना किसी जरूरत ऐसा औपचारिक खंडन जारी करती है, तो हम उसके महिला होने को भी अनदेखा नहीं कर सकते और ऐसा लगता है कि राज्य सरकार ने एक महिला के मुंह से वैसा खंडन जारी करवाकर खबरों को ठंडा करने की कोशिश की थी। हमारा यह मानना है कि महिलाओं के साथ सेक्स हिंसा के मामलों में अगर जिम्मेदार ओहदों पर बैठे हुए लोग गैरजिम्मेदारी के बयान देते हैं, या सच को छुपाने और दबाने वाले झूठ बोलते हैं, तो ऐसे लोगों पर अदालत को खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए, और ऐसे कुछ लोगों को अगर सजा मिल सके, तो उससे बाकी लोगों को सबक मिल सकेगा। 
आज भारत में महिलाओं की जो हालत है, उसे देखते हुए शिकायत करने का हौसला जुटाने वाली महिला की नीयत पर शक करना भी एक हिंसा है। शिकायत पर पूरी जांच के बाद सुनवाई के दौरान अदालत ने महिला की नीयत पर भी विचार हो सकता है, लेकिन जांच शुरू भी नहीं हुई, और महिला के खिलाफ ही अगर सरकारी ओहदों पर बैठे हुए लोग बयान देने लगते हैं, तो हम इसे बहुत ही हिंसक बात मानते हैं। आज भारत में महिला आयोग से लेकर मानवाधिकार आयोग तक, और कम उम्र के बच्चों के साथ होती हिंसा के मामलों में बाल आयोग तक अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहे हैं, वरना ऐसी बयानबाजी के खिलाफ ये संवैधानिक आयोग खुद होकर नोटिस जारी कर सकते थे। दरअसल संवैधानिक कुर्सियों पर जहां-जहां लोगों को मनोनीत करने की व्यवस्था है, सत्ता अपने अनुकूल लोगों को वहां बिठाती है, और फिर वैसे बैठाए गए लोग अहसानों का बदला चुकाने के लिए चुप्पी अपनाते हैं। 
हमारा यह मानना है कि ऐसे माहौल में मीडिया भी सिर्फ सतह पर तैरते हुए तथ्यों को लिख देने से आगे बढ़कर ऐसे गैरजिम्मेदार खंडनों और बयानों पर लोगों से तीखे सवाल कर सकता है, और उसे अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने के लिए ऐसा करना भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे कुछ चुुनिंदा बयानों को लेकर उस पर खुद ही मामला शुरू करके कुछ आला अफसरों को, मंत्रियों और ओहदेदार लोगों को कटघरे में बुलाना चाहिए, तो ही इस देश में हिंसक सिलसिला कुछ थम सकता है।