निजी चिकित्सा उद्योग के जुर्म पकडऩे की जरूरत

संपादकीय
9 दिसम्बर 2017


दिल्ली और गुडग़ांव के इलाके में बड़े-बड़े अस्पतालों पर सनसनीखेज खबरों के बाद सरकारें हड़बड़ाकर कड़ी और बड़ी कार्रवाई कर रही हैं। पांच सितारा और सात सितारा होटलों जैसी रईसी वाले इन अस्पतालों का कहीं कोई लाइसेंस रद्द कर रहे हैं, तो कहीं इनकी जमीन की लीज रद्द कर रहे हैं। अब जब कोई घेरे में आ गए हैं, तो यह पता लग रहा है कि किस तरह वहां की दवा दुकानों से ही दवा खरीदने की अनिवार्यता लादकर उन्हें कई गुना अधिक दामों पर बेचा जाता है। बड़े अस्पतालों का यह हाल पश्चिम के देशों से लेकर हिन्दुस्तान तक है, और दिल्ली से लेकर दूसरे शहरों-प्रदेशों तक मरीजों की ऐसी ही लूटमार चल रही है। यह बात जगह-जगह पकड़ में आती है कि किस तरह अस्पताल मरीज पाने के लिए दूसरे डॉक्टरों को, नीम-हकीमों को, या दलालों को कमीशन देते हैं, कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक अस्पताल के ऐसे खाताबही भी जब्त हो गए थे, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं हुई। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां पर सरकारी इलाज-बीमा हर किसी को हासिल है, उनके बीमा की रकम लूटने के लिए प्रदेश के दर्जन भर अस्पताल महिलाओं के गर्भाशय जबर्दस्ती निकालते हुए पकड़ाए थे, और वे सारे मामले भी आए-गए हो गए।
दरअसल निजी इलाज को बढ़ावा देने की सरकारों की नीतियों के चलते हुए देश भर में अब सरकारी अस्पताल कमजोर किए जा रहे हैं, और सरकारें न सिर्फ अपने कर्मचारियों को, बल्कि गरीब जनता को भी निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए बीमा का कार्ड देने लगी हैं। आज छत्तीसगढ़ सहित बहुत से प्रदेशों में एम्बुलेंस की बड़ी तेज व्यवस्था काम कर रही है, और ये एम्बुलेंस किसी घायल या मरीज को किस अस्पताल में लेकर जाएं, इसके पीछे भी गिरोहबंदी और कमीशन का धंधा जोरों से जारी है। यह बात तो बहुत पहले से जारी है कि डॉक्टरी जांच लिखने के एवज में डॉक्टरों को जांच-केन्द्रों की तरफ से मोटा कमीशन मिलता है, और अभी कुछ दिन पहले कर्नाटक में ऐसा एक पूरा बड़ा मामला पकड़ में भी आया है।
अभी दिल्ली-हरियाणा में बड़े अस्पतालों पर कार्रवाई इसलिए हो रही है कि वहां की दो घटनाएं दिल्ली की वजह से देश भर के मीडिया में छाई रहीं। एक मरीज की मौत के बाद उसकी लाश देने के लिए अस्पताल ने दस-बीस लाख जैसे मोटी रकम मांगी। एक दूसरे मामले में दो बच्चों को जिंदा रहते हुए भी मरा बताकर उन्हें बैग में बांधकर दे दिया गया, और बाद में वे जिंदा निकले। चूंकि ये घटनाएं दिल्ली में थीं, इसलिए टीवी और अखबारों में इन्हें खूब जमकर जगह मिली, और सरकारें इस दबाव में रहीं कि कोई कार्रवाई करनी है। लेकिन पूरे देश में आज निजी चिकित्सा, खासकर बड़े और महंगे अस्पतालों की निजी चिकित्सा और लूटमार में अधिक फर्क नहीं बचा है। लोगों की मजबूरी है कि वे कर्ज लेकर भी, गहने और सामान बेचकर भी इलाज कराते हैं, और अस्पतालों के सामने अधिक विरोध नहीं कर पाते। आज ऐसा लगता है कि निजी अस्पतालों पर निगरानी के लिए क्या कोई एजेंसी बननी चाहिए जो कि नियमित रूप से यह देखे कि वहां पर दवाओं को कितनी कमाई लेकर बेचा जा रहा है, कौन सी गैरजरूरी जांच करवाई जा रही हैं, कितना बिल बनाया जा रहा है? हमारा यह सुझाव देना आसान है, लेकिन सरकारों के लिए भी ऐसा करना आसान नहीं होगा। फिलहाल इस मुद्दे पर और चर्चा जरूरी है ताकि निजी चिकित्सा उद्योग के जुर्म पकड़े जा सकें। (Daily Chhattisgarh)

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