संपादकीय
17 फरवरी 12

राष्ट्रपति का बेटा और एक करोड़
महाराष्ट्र में म्युनिसिपल चुनावों के दौरान विदर्भ के अमरावती में कांगे्रस के विधायक राव साहब शेखावत को कलेक्टर ने नोटिस जारी किया है कि वे जब्त एक करोड़ रूपए का हिसाब दें। इस विधायक का कहना है कि यह पैसा पार्टी का घोषित पैसा है और कमजोर उम्मीदवारों को बांटने के लिए आया था। इस खबर में देखने की बात यह है कि इतनी बड़ी जब्त नगदी जिस विधायक से जुड़ी है वह राष्ट्रपति का बेटा भी है। 
हमारे नियमित पाठकों को यह मालूम है कि हम किसी भी तरह के विशेषाधिकार किसी नेता या अफसर, जज या किसी और संवैधानिक पद पर काबिज व्यक्ति को देने के खिलाफ रहते हैं। जब कांगे्रस की सरकार ही महाराष्ट्र में अपनी पार्टी के नेता से इस नगदी को जब्त करते हुए दो लोगों को गिरफ्तार करती है, तो कम से कम इतनी बात  तो जाहिर है कि उसमें पहली नजर में कोई गड़बड़ी है। इतनी बड़ी रकम इस तरह से आना-जाना, और राष्ट्रपति के बेटे का उससे जुड़ा होना यह सवाल खड़ा करता है कि अगर ऐसा बेटा राष्ट्रपति के साथ सफर करता होता तो उसका सामान भारत के मौजूदा इंतजाम के मुताबिक सुरक्षा जांच से भी परे होता और / या उसे लेकर कोई सवाल नहीं हो पाते। हम बार-बार यह लिखते हैं कि किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा जांच से छूट नहीं मिलनी चाहिए। यह बात हमने भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम की अमरीका में हुई सुरक्षा जांच के सिलसिले में लिखी थी कि जांच में क्या बुराई है? खासकर तब जब लोग दूसरे मुसाफिरों के साथ सफर करते हैं, दूसरों के साथ किसी स्टेशन या एयरपोर्ट पर रहते हैं, जनता के पैसों से लिए गए सरकारी विमानों में सफर करते हैं।  किसी भी तरह की रियायत राष्ट्रपति के बेटे के ऐसे एक करोड़ रूपए की आवाजाही पर सवाल नहीं उठाने देती। ऐसी घटना को लेकर लोगों को अदालत में जनहित याचिका लगानी चाहिए कि सुरक्षा जांच से देश के किसी भी व्यक्ति को कोई रियायत न मिले। भारत में एक भी कुर्सी ऐसी नहीं है जिस पर बैठे लोग किसी न किसी व्यक्ति को लेकर जनता को यह पक्का भरोसा हो कि वे पक्के भ्रष्ट थे। ऐसे लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक रियायतें देना गलत है और उसके खिलाफ एक जनमत तैयार होना चाहिए। 
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राहुल की नौटंकी
उत्तरप्रदेश का चुनाव तो आधा गुजर चुका है आधा और गुजर जाएगा, लेकिन कांगे्रस के लिए यह कुछ अधिक सोचने का सामान छोड़ जा रहा है। मुसलमानों को लेकर कल तक जो एक उदारवादी मुस्लिम नेता सलमान खुर्शीद थे वे आज एक अधिक कट्टरपंथी मुस्लिम, या धर्म की चुनावी-राजनीति करने वाले ऐसे आक्रामक कानून मंत्री बन गए हैं जिनको चुनाव के कानून को सोच-समझकर तोड़ते देखा जा रहा है। हो सकता है कि ऐसी हरकतें चुनाव में कुछ अधिक वोट पाने के लिए एक कामयाब हरकत हो, लेकिन हम इसके खिलाफ इसलिए हैं कि चुनाव के दौर में ऐसी सस्ती हरकतें उस पार्टी की तो कम से कम नहीं होनी चाहिए जो सवा सौ साल पुरानी पार्टी होने के अहंकार में डूबी रहती है। हमको यह बात भी अच्छी नहीं लग रही कि एक धर्मांधता विरोधी, गैरसाम्प्रदायिक समझी जाने वाली कांगे्रस पार्टी इस तरह से अपने-आपको चुनावी अंधड़ के बीच में धार्मिक चापलूसी करने वाली पार्टी बनाकर रख छोड़े। हम ऐसी बड़े मुद्दे पर चुनावी घोषणापत्र में या कि चुनावी मंच से एक सोच को सामने रखने को सही नहीं मानते। कांगे्रस को इस मुद्दे को पहले ही छेड़ देना था और उस पर लोगों की सोच सामने आती रहती। आज यह एक सस्ती हरकत लग रही है। 
लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने एक दूसरा कारण भी है। पिछले दो-तीन दिनों से राहुल गांधी जिस तरह की अप्रिय चर्चाओं से घिरे हुए हैं वे बहुत निराश करने वाली हैं। उन्होंने अपने भाषण के दौरान एक कागज को फाड़ा, यह जाहिर करते हुए कि मानो वह समाजवादी पार्टी का चुनावी घोषणापत्र हो, और बाद में वीडियो कैमरों ने दिखा दिया कि वह कागज उनकी अपनी पार्टी के नेताओं की एक फेहरिस्त थी। यह नौटंकी ठीक नहीं है। दूसरी कुछ पार्टियों के कुछ नेता, या कांगे्रस के कुछ दूसरे नेता ऐसा करें तो उसमें हैरानी की बात कम हो, लेकिन सोनिया और राहुल नौटंकी से कुछ परे रहते आए हुए खुशमिजाज नेता समझे जाते रहे हैं, लेकिन शायद उत्तरप्रदेश में कांगे्रस की इज्जत का पूरा घड़ा अपने सिर पर आ जाने के बाद राहुल गांधी आपा खो रहे हैं। कल शायद उनके बोझ को कुछ कम करने के लिए कांगे्रस के उत्तरप्रदेश प्रभारी और राहुल गांधी के प्रशिक्षक समझे जा रहे दिग्विजय सिंह ने यह बयान दिया है कि उत्तरप्रदेश में कांगे्रस अगर कामयाब नहीं होती है तो उसके लिए वे (दिग्विजय सिंह) जिम्मेदार होंगे। वैसे अपने-आपमें यह बयान चुनाव के बीच सेनापतियों में से एक की तरफ से आना कुछ हैरान ही करता है कि क्या कांगे्रस वहां पर ऐसी किसी नौबत की तोहमत राहुल गांधी पर से हटाने के लिए अभी से माहौल बनाना शुरू कर रही है?
भारत की चुनावी राजनीति में सस्ती, सतही, घटिया और गैरजिम्मेदार हरकतों की कोई कमी नहीं रहती। और मीडिया के लिए यह एक मजे की बात रहती है कि वह दस सेकंड के एक शॉट को एक ही बुलेटिन में दर्जनों बार दिखाकर अपने दर्शकों को बांधकर रख सके। लेकिन कल के दिन देश का प्रधानमंत्री बनने की चर्चा जिन लोगों के बारे में चलती है, उनसे भी हम यह उम्मीद करते हैं कि वे कुछ बड़प्पन दिखाएं।

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