संपादकीय
2 फरवरी 2012
एम्स में भर्ती बच्ची फलक की जि़ंदगी के लिए लड़ाई हार की कगार पर पहुंची दिख रही है। पुलिस को उसे अस्पताल तक लाने वाली नाबालिग लड़की के बारे में रौंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत पता चली है। एक नाबालिग लड़की को किस तरह उसके पिता ने घर से बाहर निकलने, अपने खाने पीने का इंतजाम आप करने पर मजबूर किया, ताकि वह एक बूढ़े आदमी से शादी कर ले। किस तरह लड़कियों को कथित रूप से वेश्यावृत्ति में धकेलने की कोशिश कर रहे पति-पत्नी में से पति ने उसके साथ लगातार बलात्कार किया, और किस तरह वह दो वक्त की रोटी के लिए यह सब बर्दाश्त करती रही। अखबार अब कह रहे हंै कि इतना कहने पर भी पुलिस यह कहने से कतरा रही है कि यह पति-पत्नी लड़कियों को वेश्यावृत्ति में धकेलने के लिए देशभर में सक्रिय गिरोह का हिस्सा है या नहीं। दिल्ली में ही अपनी औलादों के घर से निकाल देने के बाद पार्क में रहने को मजबूर 80 बरस की एक वृद्ध महिला के साथ हुई क्रूर छेड़छाड़ के मामले में अदालत ने सुझाया कि क्या इसे भी बलात्कार नहीं कहा जाना चाहिए? और जैसे इतना ही काफी नहीं था, तो पश्चिम बंगाल में 6-7 महीने की बच्ची को ट्रेन में छोड़कर कोई उतर गया। दिल दहलाने वाली यह खबरें दुनिया की ताकत बनने जा रहे इस देश का के असली चेहरा उजागर करती हंै। अगर किसी को फिर भी कोई शुबहा रह जाता हो तो इस चेहरे पर चढ़ी मेकप की पर्त के नीचे की बदसूरती खरोंचकर दिखाने का काम संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट और केन्द्रीय स्वासथ्य मंत्रालय की रिपोर्ट कर रही है। यूएन की रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्चियों के पैदा होने के लिए भारत दुनिया की सबसे डरावनी जगह है(फलक और उसे लाने वली लड़की की कहानी देखने के बाद वैसे भी इसमें किसे शक रह जाएगा?) जहां बच्चियों को चुन चुनकर कोख में मार डाला जाता है, बीमार बच्चियों के इलाज पर कोई खर्च से बच सके तब तक बचने की कोशिश की जाती है, उनमें से बहुतों को भरपूर ढंग से खाना नहीं दिया जाता, बीमारियों से बचाने टीके भी नहीं लगवाए जाते। भारत बच्चियों के खिलाफ अपनी संवेदनहीनता में इतना आगे बढ़ चुका है कि यहां जीव विज्ञान का यह जाना माना सच भी झूठा पड़ रहा है कि लड़कियां शारीरिक रूप से लड़कों के मुकाबले ज्यादा मजबूत होती हैं। शिशु मृत्यु में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की ज्यादा तादाद के बारे में इस तथ्य का जि़क्र करते हुए यू एन की रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कों के मुकाबले ज्यादा बच सकने लायक होने पर भी अगर लड़कियां उनके मुकाबले ज्यादा मर रही हंै, तो यह जितनी दिख रही है, उससे ज्यादा चिंता की बात है। लेकिन क्या एक देश के रूप में हम यूएन की रिपोर्ट की यह चेतावनी समझ पाने लायक संवेदनशील है? क्या एक के बाद दूसरी रिपोर्टों से भी हमारे कानों पर जू रेंग रही है? क्या यह हमारी चिंता का विषय भी बन पाया है?
फलक, उसे लाने वाली किशोरी, और बलात्कार जैसी घटना की शिकार 80 बरस की बेसहारा बूढ़ी, यह तीनों खौफनाक जुल्मों का शिकार उसी दिल्ली में हुर्इं, जहां एक महिला मुख्यमंत्री पद पर पिछले कई सालों से बैठी है, जहां देश की सबसे ताकतवर महिला सोनिया गांधी रहती और काम करती है। जहां गरीबों,आम आदमी के लिए काम करने का दम भरने वाली सरकार पिछले दस बरसों से काबिज है। हम इस बात की तरफ ध्यान खींचने के लिए यह बातें कर रहे हैं कि नामी राजनीतिज्ञों की मौजूदगी का असर समाज और प्रशासन की संवेदनशीलता पर कितना है? इस बात की तरफ ध्यान दिलाने के लिए कर रहे हंै कि देश के बहुत बड़े, कद्दावर नेताओं की हस्ती कुछ अहम् सामाजिक मुद्दों पर जाकर कितनी बेअसर हो चुकी है। यू एन की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बच्चियों की स्थिति जितनी चिंताजनक हालत में है, उसे देखते हुए केवल जन जागरण अभियानों से बात नहीं बनने वाली, सरकार को ठोस काम करने होंगे। लेकिन जनजागारण अभियान भी देश भर में कहां मौजूद है? जन संगठनों के काम सतही स्तर पर ही रह गए हैं। ताज्जुब होता है कि अन्ना हजारे की एक हकाल पर हजारों की भीड़ को घर से निकाल सड़कों पर ला देने वाले इस देश में कोई जनसंगठन ऐसी बुराइयों के खिलाफ जनता को इस तरह कैसे नहीं जगा पाता कि सरकार को डर लगे। हरियाणा में स्त्री, बेटियों को कोख में मारने के खिलाफ और लड़कियों के समर्थन में बहुत से अभियानों की खबरें आती हैं, लेकिन ऑनर किलिंग में बेरहमी से लड़कियों के कत्ल की खबरें भी तो आना कम नहीं होती?और ऐसी खबरें भी आती हैं कि किस तरह बड़े नामी नेता ऑनर किलिंग के हामी दबंगों के पैरों में सिर झुकाने पहुंचते रहे हैं।
हमारी समझ से इस समस्या पर एक साथ कई तरफ से हमला करने की जरूरत है अकेले जन जागरण या अकेले कानून पर अमल से बात नहीं बनेगी। देश में कमज़ोरों की हालत, वह जहां भी हंै जिस भूमिका में हैं बहुत ज्यादा चिंता के लायक बनी हुई है। ऐसे तमाम लोग, जो कानून को अपने हिसाब से तोडऩे मरोडऩे की ताकत नहीं रखते फलक जैसी हालत में पहुंचने के डर में जीते हैं - शारीरिक रूप से ना सही तो सामाजिक, मानसिक रूप से, मानवीय मानदंडों को देखते हुए। गरीब, लाचार, कानून तक पहुंच ना रखने वाले, अपने आसपास के लोगों की असंवेदनशीलता का शिकार, व्यवस्था से बेजार, हर कोई फलक जैसे एम्स पहुंचाया नहीं जाता, और हालात का शिकार हो कर गुमनाम मौत मर जाता है, या जिंदा लाश की तरह जीता है। क्या तरक्की का यही पहलू लेकर हम दस फीसदी विकास का सपना देखते हैं? क्या इतना ही काफी है? एक हिट बॉलीवुड फिल्म का हताश पुलिस अफसर हीरो एक डायलॉग कहता है- अगर पुलिस तय करले, तो कोई मंदिर से एक चप्पल भी चुरा नहीं सकता। मुंबइया फिल्म का डायलॉग होते हुए भी यह उतना नाटकीय नहीं, जितना सच है। यहां हमारा निशाना पुलिस नहीं, वह व्यवस्था है जिसमें तय करने का माद्दा नहीं है। अभी कल ही हमने अपने अखबार के पन्नों पर देश की एक बहुत नामी पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट छापी, जिसमें बताया गया है कि किस तरह छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी राजनीतिक इच्छा शक्ति से उस पीडीएस योजना को दोबारा शान से खड़ा कर दिया, जिसे देश भर में खत्म कर देने की दलीलें दी जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों के लिए पीडीएस है उनमें से 97 फीसदी तक छत्तीसगढ़ में यह सक्षमता के साथ पहुंचाई जा रही है। इसकी बहुत सी खामियां तकरीबन दूर कर ली गई हैं। एक अकेले छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार के राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने का यह नतीजा है कि आज देश भर में गरीबों को उनके हक से वंचित रखने की कोशिशों के खिलाफ लोग बोल पा रहे हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति एक ऐसी दवा है जो हमारी व्यवस्था को डस रही बहुत सी बीमारियों का इलाज है। यही राजनीतिक इच्छा शक्ति कमज़ोरों, गरीबों विकलांगों, बच्चों, बूढ़ों, पिछड़ों की हिफाज़त करने में दिखाने की जरूरत है। खुद छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की एक ताजा रिपोर्ट में यह बात साफ नजर आती है। मितानिन कार्यक्रम को बढ़ावा देकर ग्रामीण इलाके में शिशु मृत्यु दर में कमी करने में कामयाब छत्तीसगढ़ में, शहरी इलाकों में शिशु मृत्यु राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है, बल्कि बहुत बुरी हालत में है।
यह सच है कि हर बात के लिए सरकार का मुंह नहीं ताका जा सकता, लेकिन देश को चलाने की जिम्मेदारी का एक हिस्सा समाज को सही रास्ते पर बनाए रखना भी है। फलक का किस्सा सामने आने पर केन्द्र सरकार के मंत्री देह शोषण के लिए देश में बच्चों के व्यापार पर चिंता जाहिर करते हंै, लेकिन उनकी इस चिंता में, ऐसे व्यापार को आंख तरेरने में उनका नाकाम रहने का सच भी शामिल है। यह एक जाना माना सच है कि बहुत से गैर कानूनी काम कुछ नेताओं की सरमाएदारी में चलते हैं, लेकिन एक गैर कानूनी काम को राजनीतिक संरक्षण देने वाले यह नेता, और उनकी तरफ से आंखे मूंदने वाले उनके दल यह इत्मीनान ना रखे, कि इस गैर कानूनी काम के तार दूसरे किसी गैर कानूनी काम से नहीं जुड़ेंगे, और बात घूम फिरकर उन तक ही नहीं पहुंचेगी। जब तक गलत काम करने वालों को कानून और न्यायपालिका का डर नहीं होगा, ताकतवरों का कमज़ोरों का खून चूसना जारी रहेगा। चूंकि देश में यह मंजर बद से बदतर होते जा रहा है यह मान लेना बाकी रहता है कि कानून का खौफ जरा भी नहीं रह गया है, कानून केवल पन्नों पर रह गए है। 80 बरस की बूढ़ी बेसहारा महिला से गलत बर्ताव करने वाला युवक पुलिस की पकड़ में आ गया, फलक को लाने वाली लड़की पर जुल्म करने वाला उसका पिता, और उसे जिस्म फरोशी में धकेलने की कोशिश करने के आरोप में दो और लोगों को भी पुलिस ने पकड़ लिया, लेकिन यह जुर्म के संवेदनहीनता के उस पेड़ की टहनियों पर लगे फल भर हैं। बात इस पेड़ की जड़ को काटने से ही बनेगी। इस काम में समाज, मीडिया को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदारी प्रशासन और उसे काम करने देने लायक छोडऩे के लिए सरकार की है। यह बातें करने का समय कब का बीत भी चुका है, अब यही बाकी रह गया है कि हमेशा के लिए सोने से पहले हमारी नींद टूटे।

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