छोटी सी बात


छोटी सी बात
21 फरवरी 2011
बातचीत की आम जुबान में लोग किसी भी किस्म की कमजोरी को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। गरीब को फटेहाल या दो कौड़ी का कहते हैं, किसी को लंगड़ा किसी को लूला, किसी को पागल, किसी को अंधड़ा, किसी को कनवा और किसी को चितकबरा या कबरा कह देते हैं। ये सारी जुबान तब तक तो ठीक है जब तक आपके परिवार में किसी को कुदरत से मिली ऐसी कोई तकलीफ न हो। लेकिन जब घर पर कोई ऐसा हो तो क्या उस वक्त भी आप इसी तरह के शब्द इस्तेमाल करते हैं? वैसे तो यह कहा गया है कि जिसके खुद के पैरों में बिवाई न पड़ी हो वह दूसरों का दर्द क्या जाने, लेकिन बेरहम और रहमदिल, अक्लमंद और नासमझ या कमसमझ के बीच फर्क तो यही है कि दूसरों की भावनाओं को देखते हुए किसी ऐसी बात को गाली की तरह इस्तेमाल न करें जिस पर कि उनका कोई बस नहीं है।
अगर कोई बदतमीज है, घमंडी है, हिंसक है, भ्रष्ट या बेईमान है, दगाबाज या झूठा है, तो ऐसी तमाम बातें कुदरत की दी हुई न होकर, लोगों की खुद की पाई हुई होती हैं। किसी के बारे में न्यायसंगत तरीके से अगर ये बातें कही जाएं, तो ये गालियां नहीं हैं। बिना मेहनत जो दूसरों के हिस्से का खाता है, उसे हरामखोर कहने में भी कोई बुराई नहीं है, अगर यह बात अच्छी तरह से साबित हो चुकी है। हालांकि भारत की संसदीय व्यवस्था में इनमें से अधिकांश शब्दों को असंसदीय करार देकर निकाल दिया जाता है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ बोलचाल में इनके इस्तेमाल में कोई बुराई नहीं होती। लेकिन जिन बातों पर किसी का बस नहीं चलता, जन्म से मिली हुई तकलीफों, या साधारण रूप-रंग को लेकर जब कोई जली-कटी जुबान का इस्तेमाल करते हैं तो वे नाइंसाफी करते हैं। इसलिए किसी दूसरे के बच्चे को काला-कलूटा कहने के पहले यह सोचें कि आपकी अगली पीढ़ी के रंग की आपको कोई गारंटी है? मानसिक रूप से कमजोर या अविकसित किसी बच्चे को पागल कहने के पहले यह सोचें कि आपके परिवार में कोई ऐसा पैदा हो और उसे लोग इसी जुबान में बुलाएं तो आपको कैसा लगेगा?
--सुनील कुमार

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