पाखंडी देश के घरेलू घंटे,टीवी चैनलों के चुनिंदा रस


आजकल
6 फरवरी 12
सुनील कुमार

पाकिस्तान के एक टीवी प्रोग्राम के बारे में अभी दो हफ्ते पहले ही लिखना हुआ था जिसमें वहां समाज को सुधारने का ठेकेदार बना हुआ एक चैनल अपने कैमरे और लोगों की टीम लेकर बगीचों में पहुंचा और वहां साथ बैठे हुए लड़के-लड़कियों पर हमला सा बोल दिया और उन्हें टीवी पर दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की गई कि ये लोग समाज को तबाह करने में लगे हुए थे। 
दरअसल बाजार में जिंदा रहने के लिए टेलीविजन को जितनी किस्म की हरकतें करनी पड़ती हैं उनकी कल्पना भी किसी ने अखबारों के जमाने में नहीं की थी, जब टीवी नहीं था। लेकिन अखबारों की सहूलियत पढऩे वालों के लिए अलग होती है जहां वे पन्नों को मर्जी से पढ़ या छोड़ सकते हैं और पन्नों के भीतर भी क्या पढ़ें और क्या न पढ़ें, कब पढ़ें, बस में पढ़ें या पखाने में पढ़ें, जैसी अनगिनत सुविधा अखबार के साथ होती है, लेकिन टीवी की अपनी बेबसी यह है कि आज के सैकड़ों चैनलों में से अपने किस्म के दर्जन या आधा दर्जन चैनलों के बीच लोगों को बांधकर रखने में अगर पल भर की कमजोरी भी हुई, तो रिमोट कंट्रोल ऐसे ढीले चैनलों को पल भर में खारिज कर देता है।
यह बात सिर्फ समाचार चैनलों के बारे में हो, ऐसा भी नहीं। मनोरंजन के नाम पर चलने वाले बहुत से चैनल ऐसे हैं जिनमें रियलिटी शो के नाम पर बहुत ही हिंसक और अश्लील तरीके से, भौंड़े तरीके से, निजी जिंदगी को उधेडऩे और पेश करने की हद तक, भावनाओं को भड़काकर, नोंचकर पेश करने का काम हो रहा है। भारत में संस्कृत में जिन नौ रसों का जिक्र है उनमें से अधिकतर को बहुत बेदर्दी से इस्तेमाल करके लोगों को झंकझोरा जा रहा है। श्रृंगार, हास्य, रौद्र, करूण, वीर, अद्भुत, भय, शांत, और वीभत्स। इन नौ रसों में से चूंकि शांत में कोई सनसनी नहीं हो सकती इसलिए उसे मानो भारत के सरकारी और संसदीय चैनलों के लिए छोड़ दिया गया है। और बाकी सबको लेकर यह होड़ लगी हुई है कि कैसे लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं को टीवी के परदे के सामने उछाला जाए, छेदा जाए, कुचला जाए, निचोड़ा जाए और उसे बांध दिया जाए। 
इसके लिए अलग-अलग रस के सबसे तीखे स्वाद वाले राखी सावंत नाम के पैकेट तैयार करके लोगों की आंखों में, उनके कानों में झोंक दिए जाते हैं। एक नाम तो यहां राखी सावंत का लेना हो ही गया है, उससे परे भी बहुत से नाम ऐसे हैं जो अलग-अलग कार्यक्रमों में लाकर लोगों को एकदम पत्थर युग में ले जा रहे हैं। मनोरंजन के कार्यक्रमों पर जिंदा रहने वाले इन चैनलों को अपने मुकाबले के दूसरे चैनलों के मुकाबले अधिक हिंसक, अधिक अश्लील और अधिक फूहड़ बनकर दर्शक संख्या बढ़ाने की बेबसी भी रहती है। लतीफों का एक मजाकिया कार्यक्रम, दूसरे मजाकिया कार्यक्रमों से अधिक गंदे लतीफे पेश करके धीरे-धीरे परिवारों को इस बात के लिए तैयार कर लेता है कि दो-तीन पीढिय़ां साथ बैठकर गंदगी का एक थाली में मजा ले सकें। फिर अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए रात-दिन टीवी में आने की जुगाड़ में लगे हुए हिंदुस्तान के सबसे बड़े फिल्मी सितारे, मनोरंजक और रियलिटी सीरियलों को इतना कड़ा मुकाबला देते चलते हैं कि टीवी को जी सिने अवार्ड में शाहरूख खान के अश्लील लतीफे का मुकाबला भी करना पड़ता है।
मुझे टीवी पर, फिल्मों में या छपे हुए पन्नों पर किसी वयस्क तस्वीर या लिखे हुए से कोई परहेज नहीं है। वयस्क का मतलब सिर्फ गंदगी हो, सेक्स का मतलब सिर्फ पोर्नोग्राफी हो, नग्न का मतलब सिर्फ अश्लील हो ऐसा भारत में ही कुछ अधिक होता है। हालांकि यह देश वात्सायन का देश है जहां बच्चों के जवान होते-होते उन्हें जिंदगी के एक महत्वपूर्ण पहलू, सेक्स के बारे में वैज्ञानिक और सामाजिक ज्ञान देने के लिए बड़ी मेहनत से किताब तैयार की गई थी। लेकिन अब वैज्ञानिकता से परे, सामाजिकता से परे जितनी गंदी और हिंसक फूहड़ता पेश होती है उसे तो बर्दाश्त कर लेने का माहौल देश में बनाया गया है, अलग से वयस्क कार्यक्रमों के लिए कोई जगह, कोई छूट नहीं है। नतीजा यह है कि एक परिवार के साथ बैठकर देखने के वक्त में बिना वयस्क के ठप्पे के वह सब कुछ दोहरे अर्थों में पेश कर दिया जा रहा है जो कि वयस्क लोगों में भी एक साथ बैठकर, एक ही पीढ़ी के कुछ रिश्तों के ही एक साथ देखने लायक होना चाहिए था।
भारत में सैकड़ों बरस से स्थापित नौ रसों में से जिसका शरबत सबसे अधिक तेजी से बिक सकता हो उसे लोगों के आंख-कान में लोटा भर-भर के डाला जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हर किस्म की बातें कही जा रही हैं, और आत्मनियंत्रण के नाम पर उनमें से कई शब्दों को टीवी प्रसारण के वक्त चुप करके लोगों का ध्यान और खींचा जाता है कि  देखों यहां पर कौन सा गंदा शब्द हो सकता है? पहेली की तरह इसे पेश करके वयस्क बनने से काफी दूर बच्चों को भी तेजी से जवान बनाया जा रहा है।
एक मूढ़ और मूर्ख की तरह इस देश को बना देने पर आमादा, एक फर्जी इतिहास का दावा करने वाले संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार भारत की कई पीढिय़ों की मानसिकता को बीमार बना ही चुके हैं। समलंैगिकता को अपराध बताना, वेश्यावृत्ति को अपराध बताना, पे्रम को अवैध बताना, जैसे बहुत से नारे हिंसक होते-होते अब पे्रमी जोड़ों को मार डालने का काम हर हफ्ते-पखवाड़े कर रहे हैं। ऐसी सोच के चलते ही भारत में वयस्क टीवी शुरू नहीं हो पा रहा है और लोगों की वयस्क मनोरंजन की जरूरत पारिवारिक टीवी के चैनलों और घंटों में ही पूरी की जा रही है। एक के बाद एक ऐसे बहुत से रियलिटी शो बढ़ते चले जा रहे हैं जो सनसनी और उत्तेजना की अलग-अलग किस्मों पर टिके हुए हैं। कुल मिलाकर बात यह है, और नौबत यहां तक आ गई है, कि मानो वात्सायन के कामशास्त्र को वयस्कों के लिए भी इस देश में जगह नहीं दी जा रही इसलिए वात्सायन का ज्ञान स्कूली किताबों के अलग-अलग पन्नों पर टुकड़ों में चुपचाप घुसा दिया जा रहा है।

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